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गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

12:01 pm

भारत जिसका शौर्य सूर्य है दीप्तिमान सदियों से - आदित्य तोमर

भारत जिसका शौर्य सूर्य है दीप्तिमान सदियों से।
झलका जिसका गर्व पहाड़ों से, ममता नदियों से।।

कण-कण में छविचित्र राम के, पग पग तीर्थ अटे हैं।
जोकि समय के झंझावातों से भी नहीं मिटे हैं।।

इसने स्वर्णमयी वैभव भी, काला युग भी देखा।
उस वर्णन से भरा पड़ा है इतिहासों का लेखा।।

उन लेखों में परम पूज्य है नाम एक बलिदानी।
जोकि कभी स्वातन्त्र्य समर का रहा प्रथम सेनानी।

बेड़ी में जकड़ी जब भारत माँ की नर्म कलाई।
क्रूर अनय अत्याचारों की खिली वेल, लहराई।।

बर्बर चोर लुटेरे ही जब सत्तासीन हुए थे।
सच के नीति-नियन्ता सब उनके आधीन हुए थे।।

झूठे को झूठा, पापी को पापी कौन कहे फिर।
सच्चाई के साथ अडिग होकर भी कौन रहे फिर।।

चारो ओर भयंकर अत्याचार दिखाई देते।
शहर-गाँव में भीषण नरसंहार दिखाई देते।।

भारतीय योद्धाओं ने पहले भी युद्ध लड़े थे।
इतने अत्याचार न पहले होते दीख पड़े थे।।

तिल-तिल कर मरवाये जाते थे रणवीर अभागे।
आम हो गए थे जौहर के दृश्य दृष्टि के आगे।।

शिशुओं को भालों के नेज़ों पर उछालते थे वे।
खड़ी फसल के साथ गाँव को जला डालते थे वे।।

उस कुसमय में बढ़ प्रताप ने पूजा थाल उठाया।
तब माँ ने भी झुका हुआ सदियों का भाल उठाया।।

दे अगणित आशीष शीश को स्नेहमयी ने चूमा।
रोम-रोम राणा प्रताप का आनन्दित हो झूमा।।

पगरज से कर तिलक वीर ने तब तलवार उठा ली।
कहा समझ ले मात, रात अब बीत चुकी है काली।।

माँ-बहनों की लाज न जीते जी मैं लुटने दूँगा।
और चोटियाँ भी न हिन्दुओं की मैं कटने दूँगा।।

तेरे सुत का देखेंगे अब कायर मुग़ल जड़ाका।
मैं बतलाऊँगा उनको क्या होता है रण साका।।

यही वचन राणा प्रताप आजीवन रहे निभाते।
भर देता है हृदय नाम जिव्हा पर आते-आते।।

सहे घाव पर घाव, घाव को भले न मिली दवाई।
कभी न झुक पाई लेकिन रण में तलवार उठाई।।

कभी न दरवाज़ा देखा अकबरशाही महलों का।
कभी न लगने दिया दाग़ भी घोड़ों पर मुग़लों का।।

ढहा दिया गढ़ आतताईयों के बलशाली डर का।
सपना पूरा कभी न होने दिया मुग़ल अकबर का।।
-
आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)

रविवार, 5 अप्रैल 2020

6:02 pm

वीरता के साथ ही गम्भीरता का थामो हाथ - आदित्य तोमर

वीरता के साथ ही गम्भीरता का थामो हाथ,
ताकि मार हम इस महामारी को सकें.
आपदा के बीच आपाधापी नहीं ठीक, सभी -
- से कहो कि सभी इस सीख को संजो सकें.
लहरें विनाशकारी हावी होना चाहती हैं,
सावधान, ये हमारी नाव न डुबो सकें.
दुनिया में गर्व से सदैव जो तनी रही हैं,
मूँछें कभी भारत की नीची नहीं हो सकें.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)

6:01 pm

हर तरफ़ इक सुगबुगाहट - आदित्य तोमर

हर तरफ़ इक सुगबुगाहट
हर तरफ़ इक आग फैली।
भारती ने फैंक क्या दी
शीश से चादर कुचैली।।

भीति से जुड़ने लगे हैं
सब अभयधारी लुटेरे।
हाथ में तलवार थामे,
क्रोध से आँखें तरेरे।।

है समय यह भ्रान्ति के जब
पट सरकते जा रहे हैं।
स्वार्थ के सब घट अवा में
ही चटकते जा रहे हैं।।

भोर होने के समय पर,
अंध तम हावी हुआ है।
जान ले वह अब धरा पर
सूर्य सम्भावी हुआ है।।
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ.

5:56 pm

महाराणा प्रताप :- जिस पुतली पे सुनते हैं चाल चेतक की - आदित्य तोमर

महाराणा प्रताप पर कुछ छन्द -

जिस पुतली पे सुनते हैं चाल चेतक की,
कहीं उसके जो कोने भी सिकुड़ जाते थे.
दहलाते थे कलेजे पापियों-दबंगो के तो,
टूटे भारतीयों के हृदय जुड़ जाते थे.
वीर महाराणा की दुधारी भारी तेग देख,
क्रोध भरी आँधियों के वेग मुड़ जाते थे.
दृष्टि उठने भी पाती नहीं थी प्रताप की कि
दुष्ट मुग़लों के धुंएँ-धुंएँ उड़ जाते थे.
-
राणा की कहानी को न अतिश्योक्ति मानो कोई
जब भारती भवानी माता धैर्य खोती थी.
सवा सौ किलो का वो कवच बतलाता है कि
राजपूताने की वीर छाती कैसी होती थी.
भाला ये बताता है बहत्तर किलो का हमें,
उसे देख कैसे मुग़लों की फ़ौज़ रोती थी.
रक्त की पिपासु महाराणा की वो तलवार,
नित्य प्रति अरि रक्त से ही मुँह धोती थी.
-
आप कहते हैं हमको प्रताप से क्या काम,
पिता पुत्र होने का ही होता नहीं नाता कुछ.
जो प्रताप की प्रखर लपटें न मिल पातीं,
स्वाभिमानी सूर्य कोई भी न चमकाता कुछ.
कहा जाता राजस्थान मुग़लों ने बसाया है,
कोई इतिहासकार कर नहीं पाता कुछ.
जैसे नाम बदल गए हज़ारों शहरों के,
ऐसे ही चित्तौड़ का भी नाम धर जाता कुछ.
-
कड़क के बोले पृथ्वीसिंह बीकानेरी, 
देरी हो न जाये बाजे शादीयाना बन्द कीजिये.
इतनी हँसी हँसुली न चली जाए कहीं,
कोरे ये ठहाके भी लगाना बन्द कीजिये.
अकबर वो बबर शेर है भवानी माँ का
तन ताने डर को छिपाना बन्द कीजिये.
भ्रम खाये आप हैं कि भय खा गया प्रताप
मुझे झूठा ख़त ये दिखाना बन्द कीजिये.
-
जिसमें हो अंश राणा सांगा की परम्परा का
हार कर भी वो वीर झुक सकता नहीं.
पन्ना धाय की सहायता से हो जो वंशवृक्ष
असहाय होके कभी रुक सकता नहीं.
मीरा ने ममीरा जिन आँखों में लगाया
उन आँखों में अंधेरा कभी टिक सकता नहीं.
जिस हेतु प्राणदाह किया झालाशाह ने
वो चाह के भी खत ऐसा लिख सकता नहीं.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ
5:52 pm

छत्रसाल :- कोई कवि कण्ठ कहा कहैगो कहानी बाकी - आदित्य तोमर

कोई कवि कण्ठ कहा कहैगो कहानी बाकी,
करैं जसगान जाको नारद, महेश री.
तलवार की अगारी पै विराजीं रणचंडी,
बाजि बनि बाके उतरे ख़ुदै खगेश री.
यमुना सै नर्मदा लौ, टोंस सै लै चम्बल लौ,
शत्रु घर राखो नहीं दिया एकौ शेष री.
सुनिके दहाड़ फटे मुग़ल पहाड़, ऐसो - 
भओ छत्रसाल हो बुन्देलखण्ड केसरी.
-
धूरि उठि रही है सुदूर दिशा दक्षिन सै,
पक्षिन को शोर चहुँ ओर घहरायो है.
धौंसा की धमक सुनि बिजुरी चमक रही,
कड़कि रही है मानो काल मण्डरायो है.
चम्बल किनारा तोड़ि मोड़ि चली धारा कौ है,
पारावार देखि पारावार भरमायो है.
का भई कहानी, कहते न बने बानी, कहूँ -
राजा छत्रसाल सेना लैके चढ़ि आयो है।। 1
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
5:50 pm

नरकुल में ले जन्म देह पर घाव अनेकों खाके - आदित्य तोमर

नरकुल में ले जन्म देह पर घाव अनेकों खाके
तपी आग में कितनी तब यह बनी बांसुरी जाके
तब जग-रास-रचैया मोहन ने अधरों पर लाके
किये अनोखे कार्य इसी बंशी को बजा-बजा के
शहनाई, बांसुरी, नफ़ीरी क्या-क्या रूप गए धर
मन के झंझा को न कहीं स्नेहिल आयाम मिले पर
गहन पीर से बंकिम होकर जब-जब तन जाती थी
यही नफ़ीरी रणरागी रणभेरी बन जाती थी
तब उसकी ध्वनि पर प्रतिध्वनि करती थीं दसों दिशाएं
थिरक-थिरक भैरवी नाच उठती लेकर ज्वालायें
*******
एक दिवस का भले किन्तु पूर्णत्व चाह है जिसकी
अंदर-अंदर ज्वालायें छवि बाहर रहे शिशिर की
शनैः शनैः पूर्णत्व प्राप्त कर शनैः शनैः खोता है
किन्तु एक क्षण भी निराश राकापति कब होता है
यद्यपि विधि के विधि-विधान से ठगा-ठगा रहता है
भीषण भले यातनाओं में पगा-पगा रहता है
सोये सारी सृष्टि किन्तु वह जगा-जगा रहता है
सतत निरत उद्यम में योगी लगा-लगा रहता है
इसी लगन को मान जगत में भोलेनाथ दिलाते 
बंकिम छवि का चंद्र धार वे चंद्रमौलि बन जाते
******
ऐसा ही बंकिम था जग में बंकिमचन्द्र चटर्जी
जिसके आगे चली नहीं गोरों के मन की मर्जी
जब अंग्रेजों ने भारत पर बंकिम दृष्टि धरी थी
गोद-भारती की सूखी जो रहती हरी-भरी थी
बलिदानों का भी न कहीं कोई उबाल दिखता था
हर कोने में लूट-पाट का ही बवाल दिखता था
चारों ओर हताशाओं का ही सवाल दिखता था
भारत का लोहू अम्बर पर लाल-लाल दिखता था
जो-जो सर उठते थे वो-वो कटा दिए जाते थे
आज़ादी के सपने जड़ से मिटा दिए जाते थे
********
ऐसे में आभारत भारत बुझता दीख पड़ा जब
कलम-बाँकुरे बंकिम का कवि भीतर चीख पड़ा तब
बोला कवि अब गहो कलम यह स्वर ललाम कर जाओ
जीते-जी इन अंग्रेजों का इंतजाम कर जाओ
फूट पड़े धमनी से जिसको सुन लोहू की धारा
बुझी-बुझी आँखें यौवन की हो जाएँ अंगारा
जिसको गाकर मिट जाए यह क़ौमों का बंटवारा
बन जाये स्वातन्त्र्य समर का जो अनन्यतम नारा
गहन चिन्तना में कवि का मन रह-रह रहा खौलता
कई दिवस तक शब्दों की ताक़त को रहा तौलता
********
पृथक-पृथक अब कितने वीरों का मैं आश्रय धारूँ
नायकहीन हुआ भारत है किसका नाम पुकारूँ
कौन एक वह तत्व कि जिसकी ख़ातिर बैर भुलाकर
जुड़े राष्ट्र सम्पूर्ण एक ध्वज की छाया में आकर
कितने ही नामों पर चिन्तन हुआ एक ही क्षण में 
भाव यथेष्ट न भर पाया पर कोई भी कवि प्रण में
सहसा एक उजाला फूटा छवि वह पड़ी दिखाई
सबसे बड़ी प्रेरणादायक भारत माता पाई
उठा प्रभंजन ऐसा थर-थर काँप उठा यह अम्बर
तब वन्देमातरम गीत अवतरित हुआ धरती पर
********

आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ
29 जून 2017
5:48 pm

क्या लखा किसी ने ऋतु बसन्त का अरुणोदय - आदित्य तोमर

क्या लखा किसी ने ऋतु बसन्त का अरुणोदय ?
क्या कहीं किसी ने गुनी चाप उसके पग की.?
क्या हुआ भास जन-मन को सुरभि झकोरों का ?
मुंद सकीं आँख क्या आह्लादित होकर जग की.?

क्या सुमन किसी डाली पर थिरके इतराये ?
भौंरों की गुँजन ध्वनि निद्रा को तोड़ सकी ?
भद्रा के योग हटे क्या ? भरणी धरिणी यह
श्रंगार हेतु तंद्रिल मुद्रा को छोड़ सकी ?

हैं कहाँ असंख्य छत्रपों की वे सेनाएँ
जो कभी सेम की हरकारा बन आती थीं,
बरसातों को जो देख-देख मुसकाती थीं,
चढ़ती आँधी को आँख दिखा धमकाती थीं,

यह क्या बसन्त जब तेजहीन रवि रश्मिरथी
विरथी हो हार रहे कोहरे से बिना लड़े.

वे भी दिन थे जब कविता में यह ऋतु बसन्त,
ऋतुराज नाम पाकर किरीट तक जा पहुँची,
ये भी दिन हैं जब मंजुल कोमलता खोकर,
कल्पना काव्य की कंकरीट तक आ पहुँची.
-
आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
5:45 pm

शहीद औरंगजेब-- वक़्त जब आता तब खड़े होते हैं सपूत - आदित्य तोमर


वक़्त जब आता तब खड़े होते हैं सपूत,
दिखा देते हैं कि हिन्दुस्तानी अभी ज़िन्दा है.
हँस-हँस मृत्यु को वरण करने लेने वाली,
परम्परा वही ख़ानदानी अभी ज़िन्दा है.
हवाओं में विष घोलने वाले भी जान जाते
गंगा-जमुना का कहीं पानी अभी ज़िन्दा है.
सिद्ध कर देते हैं औरंगज़ेब जैसे वीर,
अब्दुल हमीद की निशानी अभी ज़िन्दा है।
*
सिर से कफ़न बाँध लहू से जो सींचते हैं,
आज़ादी का वीर वे चमन जीत लेते हैं.
देश की सुरक्षा हेतु अग्नि की परीक्षा देके
जीते-जी वे मृत्यु की दुल्हन जीत लेते हैं.
पद प्राप्त होता इतिहास में अनन्यता का,
धन्यता का बहुमूल्य क्षण जीत लेते हैं.
ऐसे मतवाले रखवाले ही वतन के तो
तन हार के करोड़ों मन जीत लेते हैं।
*
भारतीय वीर दिखा जाते ऐसे जौहर हैं,
यकायक विश्व हक्का बक्का कर जाते हैं.
शातिरों के पत्ते पत्ते-पत्ते हो बिखर जाते
ऐसा एक तुरुप का इक्का धर जाते हैं.
जानता जहान है उफान मारता है जोश 
रगों में जवानी का वो धक्का भर जाते हैं।
रोक न सकें जटायु रावणों को भले, किन्तु
राक्षसों का मृत्यु पथ पक्का कर जाते हैं.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
09368656307
5:44 pm

अब तक उल्टा सीधा जो कुछ लिख पाया - आदित्य तोमर

अब तक उल्टा सीधा जो कुछ लिख पाया 
अगर वही कविता है तो मैं भी कवि हूँ.
वेदों में जो सदियों से पूजा गया यहाँ
बहुचर्चित अर्चित उस रवि की मैं भी छवि हूँ.

मैं भले न निराला, बच्चन और महादेवी
की कोई भी शेष निशानी देख सका.
मुझे न दिनकर के प्रचण्डतम शब्द मिले,
मैं न सुभद्रा की चौहानी देख सका.

काका हाथरसी बाबा निर्भय के युग में
उन आशीषों के तले न मैंने किये शोध.
मैं नीरज के मंचों पर कविता पढ़ न सका.
मुझको न मिले जीवन में कोई मुक्तिबोध.

दो-दो वटवृक्ष रहे थे पर, दुर्भाग्यपूर्ण
मैंने उनकी भी कभी न छायाएँ पायीं.
हा ! उर्मिलेश के बाद अवस्थी चले गए
उनकी स्मृतियाँ ही शेष बदायूँ में गायीं.

मैं नहीं किसी गर्वीले कविकुल का वंशज
मैं हूँ न महान परम्पराओं का अधिकारी.
जैसी भी है मिट्टी है इसी बदायूँ की.
जिस मिट्टी में रहती सदैव कविता ज़ारी.

हाँ भले नहीं उत्तराधिकार मिला कोई
हो भले न मेरे पीछे कहीं खड़ा कोई
लड़ने को मेरे साथ कभी न लड़ा कोई
इससे तो होता छोटा या न बड़ा कोई

मैं चन्द्रगुप्त की परम्परा गढ़ने वाला
वनसुमन समान बिन देखभाल बढ़ने वाला
दिनकर हूँ दिन पर दिन ऊपर चढ़ने वाला
मैं हूँ इस माटी की कविता पढ़ने वाला

आपने निमंत्रण दिया चला आया मैं भी
आपके प्रेम का चाहक हूँ, आभारी हूँ.
अनवरत दहकते इस साहित्यिक यज्ञ हेतु
आहुति तो एक चढ़ाने का अधिकारी हूँ.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ
5:42 pm

कृति :- कालिका शतक से कुछ छन्द - आदित्य तोमर

कृति - कालिका शतक से कुछ छन्द

काल की है काल, महाकाली नेत्र लाल-लाल,
धार करवाल आज धरती पे आओ माँ।

व्यथित, विदग्ध भक्त पापियों से हो रहे हैं,
मुण्ड काट-काट मुण्डमाल में बढाओ माँ।

दिया वरदान था जो भक्त रक्षणार्थ अम्ब,
करो न विलम्ब वह वचन निभाओ माँ।

चहुँ ओर काल सी है कालिमा कराल काली,
उसे अनुपान कर दरश दिखाओ माँ।
-
****** ***** ****** ***** ***** *** **

सुन-सुन माँ पुकार, लेके हाथ में कटार, कर- 
कर के प्रहार अन्तणी निकाल दे।

चीर-फाड़ वक्ष, नख खोपड़ी में गाड़ कर
शोणित का पान कर खोपड़ी उछाल दे।

दैत्य बलवान, वीर्यवान, शौर्यवान भट,
तोमर-त्रिशूल से उतार आज भाल दे।

तीर-तलवार-तनुत्राण सारे काट डाल,
पटक-पटक मार मेदिनी पे डाल दे।।
-
**** ***** ***** ***** ****** **** *** *

कालिका भवानी, हे शिवानी, तेरा नाम माता,
देव, ऋषि, मुनि सभी जपते चले गए।

जपते गए जो एकमनमग्न होके तुझे,
काज या अकाज सभी सधते चले गए।

सधते गए हैं कीर्तिमान रणक्षेत्र में भी,
काव्यवीर भी तो तुझे भजते चले गए।

भजते गए हैं मेरी कविता के शब्द तुझे,
मान-उपमान सभी सजते चले गए।।
-
******* ***** ******* ******* ****** ***** 

धर्म के विरुद्ध छिड़ा युद्ध, कर्म अवरुद्ध,
सदपरिणाम मिलें, आर-पार कीजिये।

धरणी पे बचे नहीं कोई भी दनुज कहीं,
ऐसे महाअस्त्र का कठोर वार कीजिये।

राजपूतों को दिया जो देशरक्षा का सुकर्म,
सुप्त पड़े हैं जगाओ, ललकार दीजिये।

ठाकुरों के हाथ नहीं आज तलवार कोई,
कलम को तलवार वाली धार दीजिये।।
-
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जहाँ देखता हूँ लप-लप लपलपा जीभ
चाहती है भर लेना खप्पर जो खाली है।

पीछे-पीछे कदमों पे दौड़ा आ रहा है काल
काल से भी दो कदम आगे दौड़ी काली है।

यत्र-तत्र जगती में भक्ति के मिटे हैं चिन्ह
खिन्न इसी बात से हो खडग उठा ली है।

बरसों पुरानी बासी मुण्डमाला रही फेंक
ताज़ी मुण्डमाला एक चाहती कपाली है।
-
****** ****** ******* ******* ****** ***
कालिका ने देखा जब देवगण हार रहे,
जौहर न सह पा रहे हैं रक्तबीज के।

खप्पर-खडग को उठाके एक झटके से
कूद पड़ी माता रणक्षेत्र में पसीज के।

किन्तु जब रक्तकणों से उठे हज़ारों दैत्य,
फिर खोल ही दिया विशाल मुख खीझ के।

रक्त, मज्जा, मांस रक्तबीज का चबाया ऐसे
जैसे बच्चा रोटी खा रहा हो दूध-मीज के।
-
******** ***** ****** ***** **** **

मैंने तो सुना था बड़े-बड़े भटों से लड़ी तू,
दुखियों को दिया त्राण दुष्टों को सँहारकर।

जब-जब किसी ने सताया तेरे भक्तों को तो,
दौड़ी-दौड़ी चली आई तलवार धार कर।

किन्तु क्या हुआ कि विपदा न दीखती है मेरी,
अस्त्र-शस्त्र खुन्न हो गए क्या दैत्य मारकर?

या तो आज तू ही सामने उतर आ माँ काली,
या मैं अपना ही शीश रख दूँ उतारकर।।
-

आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ
5:40 pm

सोमनाथ :- जब भारत में सोमनाथ का मंदिर गया ढहाया - आदित्य तोमर


जब भारत में सोमनाथ का मंदिर गया ढहाया
महालिंग के टुकड़ों को सीढ़ी में गया चुनाया
मंदिर का दरवाजा गजनी मस्ज़िद में लगवाया
तब क्या कोई वीर देवता धरती पर था आया ?

नगरकोट देवी की मूरत के टुकड़े करवाकर
बांटी गयी कसाइयों में थी उसके बाट बनाकर
फिर जब बाटों से मासों के टुकड़े गए थे तोले
तब क्या महाकाल धरती पर रौद्र रूप ले डोले ?

मथुरा, काशी कहाँ नहीं ये दृश्य निरंतर दौड़े !
भारत की अस्मत के टुकड़े किसने नहीं भंभोड़े !
ऐसे में भी किसी देव ने भारत नहीं बचाया
बोलो कौन देव ने कोई पापी राख बनाया ?

धर्मो रक्षति रक्षितः का भूल गए संदेशा
अपने मन में भ्रम लेकर पाले झूठा अंदेशा
भूल गए हम धर्म उसी का जो नित कर्म करे है
रक्षा करने वाले की ही रक्षा धर्म करे है

एक-एक मंदिर की शुचिता नष्ट हुई भारत में
सकल सनातन संस्कृति अपनी भ्रष्ट हुई भारत में
और आँख मूँदे भारत के सोते रहे बहादुर
इसी बात पर रहे म्लेच्छ भारत आने को आतुर

अब तुम सोचो महादेव खुद इनसे लड़ने आएं ?
अपने मंदिर, अपने भक्तों के हित शस्त्र उठायें ?
प्रकृति नहीं करती है कोई हस्तक्षेप कभी भी
होना शेष दीखता भ्रम का पट-आक्षेप अभी भी

धर्मयुद्ध में सारथि बनकर आये कृष्ण भलें हों
और बाण उनकी भी प्रतिज्ञाओं पर खूब चले हों
किन्तु यही था मर्म धर्म हित नर ही आगे आएं
बलिदानों के पथ पर बढ़ कर कुल का मान बढ़ाएं

अरे हिन्दुओ कब तक भेड़ों जैसे कटे रहोगे
आपस में बिन बात अहम की खातिर बंटे रहोगे
बलबानों से धर्म सदा होता आया परिभाषित
वे जबरन ढोते हैं इसको जो होते हैं शासित

क्यों भक्तों पर हमले शिव को डिगा नहीं पाते हैं
इनके चीत्कार क्यों उनको जगा नहीं पाते हैं
भीषण नरसंहार शूल को उठा नहीं पाते हैं
उनके संहारक को भोले मिटा नहीं पाते हैं

कोई प्रलयानल शंकर का कहीं न धधका अब तक
देवराज का वज्र भक्तहित कहीं न फड़का अब तक
साफ़ यही सन्देश स्वयं इस धर्मयुद्ध को तोलो
हर-हर-बम-बम महादेव के जय-जयकारे बोलो

आग वही तीसरे नेत्र की तुममें धधक उठेगी
इंद्रदेव की वज्र शक्ति बाजू में फड़क उठेगी
लड़ते-लड़ते राम नाम ध्वनि होंठों पर आएगी
तो बजरंगबली की ताक़त तुमको मिल जायेगी

यही सीख मिलती है सिख गुरुओं के बलिदानों में
पूजो अपने इष्टदेव को अपनी किरपानों में
कोरे आह्वान से कोई देव नहीं आएगा
भीषण हमलावर के आगे भक्त न बच पायेगा

उठो धर्मभीरुओ, भैरवों जैसा रंग बनाओ
अगर काल से भी लड़ना पड़ जाए तो लड़ जाओ
कब तक हम इस कायरता को ढोते और रहेंगे
कब तक वीर योद्धा अपने सोते और रहेंगे

आज पुनः दत्तात्रेय के महापन्थ पर आओ
अपने अपने पिंड दान कर धर्म युध्द में धाओ
अन्यथा श्वेत पथ अमरनाथ का रक्तिम-रक्तिम होगा
यही इशारा हिन्दूधर्म की खातिर अंतिम होगा.

विधि क्या विधिना के ही सारे योग पलट जायेंगे
और सनातन होने के भ्रम में हम मिट जायेंगे.
-
©
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
11 जुलाई,2017
संपर्क सूत्र - 9368656307
5:39 pm

नज़्म - लम्हा लम्हा तुम्हें याद आएगी मेरी - आदित्य तोमर

एक नज़्म दोस्तों के लिए -
*
लम्हा लम्हा तुम्हें याद आएगी मेरी
लम्हा लम्हा तुम्हें याद करता रहूँगा
इन पलों की तुम्हें याद आती रहेगी
हर इक तस्वीर तुमको रुलाती रहेगी

कौन तुमको अब इतना सतायेगा बोलो
रूठ जाओगे तुम तो मनाएगा बोलो 
ये हसीं पल न ऐसी कोई बात होगी
बस ख्यालों में तुमसे मुलाकात होगी

बस मैं तन्हा तुम्हें याद करता रहूँगा
डूबता दिल में अपने उभरता रहूँगा
जब अंधेरे गमों के डराने लगेंगे
हौसले भी मेरे डगमगाने लगेंगे

तब मुझे इक किनारे की दरकार होगी
अपनेपन की सहारे की दरकार होगी
तीरगी में उजाले करोगे न बोलो
डूबते दोस्त को हाथ दोगे न बोलो

दोस्त बोलो मुझे तुम भुला तो न दोगे
अपनी यादों से मुझको मिटा तो न दोगे ?
अपनी यादों से मुझको मिटा तो न दोगे ??
************ ********* *********
इक खिलौना जो अपनी लड़ाई में टूटा
एक चेहरा जो कागज़ पे आधा है छूटा
फिर तुम्हारी छुअन को तरसते हैं देखो,
मेरी आँखों से आँसू बरसते हैं देखो,

दिन वे अन्दर ही अन्दर दबी आशिक़ी के
दिन रजिस्टर के पीछे लिखी शायरी के
दिन बेफिकरी के, यारी के, आवारगी के
दिन सभी से छिपाकर रखी डायरी के

इन दिनों भी कभी याद आते तो होंगे ?
बेवज़ह ही हँसाते, रुलाते तो होंगे ?
फूल पर बैठी तितली लुभाती तो होगी ?
याद मेरी भी तुमको दिलाती तो होगी ?

अपने कॉलेज की वे खिड़कियाँ याद हैं न ?
अपने कॉलेज की वे सीढ़ियाँ याद हैं न ?
अपनी यादों की किरचन अभी भी वहाँ है.
अपनी बातों की तड़पन अभी भी वहाँ है.

ये नज़ारे जो तुमको बुलाते बहुत हैं.
बिन तुम्हारे ये मुझको रुलाते बहुत हैं.
बिन तुम्हारे ये मुझको रुलाते बहुत हैं. ❤️❤️
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ
5:37 pm

गीत - अब कलाई पर घड़ी बंधती नहीं है - आदित्य तोमर

गीत -

अब कलाई पर घड़ी बंधती नहीं है,
वक़्त के पाबन्द इतने हो गए हैं।
पल किसे कहते हैं, क्या बतला सकेंगे,
गिनतियों से दिन, महीने खो गए हैं।
सो रही है सृष्टि पर हम जागते हैं।
बिस्तरों पर हैं मगर हम भागते हैं।
किस सफलता का चषक कर ले लिया है ?
पा लिया कुछ याकि सब कुछ खो दिया है ?
-
सत्य कहने की ललक हमको बहुत थी,
सत्य का घुटता गला पर, नित्य देखा।
रात को भी रात कहने में लगा भय,
दिन दहाड़े नित्य ऐसा कृत्य देखा।
युद्ध अपने सामने उत्थान पर था,
थरथराता हाथ खाली म्यान पर था,
फिर अचानक ही समर्पण कर दिया है।
पा लिया कुछ याकि सब कुछ खो दिया है ?
-
कोसते आये थे अब तक कुरु सभा को,
लुट गयी द्रौपदि जहाँ, वे कौन थे तब।
पर लुटी जब लाज अपने सामने तो,
सिर झुके थे शस्त्र फिर से मौन थे सब।
आन पर मिटने की अपनी एक ज़िद पर,
सौ विवशताएँ रहीं हावी निरन्तर,
और इच्छा-मृत्यु का विष पी लिया है।
पा लिया कुछ याकि सब कुछ खो दिया है ?
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
5:35 pm

एक बार फिर बजा चुनावी बिगुल यहाँ - आदित्य तोमर

एक बार फिर बजा चुनावी बिगुल यहाँ,
एक बार फिर वादे थोपे जायेंगे.
एक बार फिर हम लोगों की पीठों पर,
ख़ालिस खादी खंज़र घोंपे जायेंगे.

बाग़ बहारों की सतरंगी बातें ले,
बंजर में कुछ पौधे रोपे जायेंगे.
जिन आँखों से दृष्टि नोचकर फैंक चुके,
उन आँखों को सपने सौंपे जायेंगे.

कैसी राजनीति में नीति नई आई,
किन जन्मों का बैर हाय, ये लेती है.
पहले निष्ठुरता से पैर तोड़ देती है
फिर स्नेहिलता से बैशाखी देती है

वे कहते, तुम खड़े हो सको पैरों पर
ऐसा दिन हम कभी नहीं आने देंगे.
तुम हमको सत्तासुख देते जाओ, हम-
ख़ैरातों में कमी नहीं आने देंगे.

हा ! जाने इसने अपनी जन्मपत्री पर,
कैसे विषम ग्रहों का क्रूर लगन पाया.
सत्तर वर्षों में भारत का यह वोटर
भिखमंगे से अधिक न कुछ भी बन पाया.
-
आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
5:31 pm

ये धुन्ध कैसी छाई है, देता न दिखाई है - आदित्य तोमर

ये धुन्ध कैसी छाई है, देता न दिखाई है 
जैसे भोर में ही घोर रात घिर आई है 
वायु ज़हरीली है, पानी पर पहेली है 
किन्तु किसी की न अभी आँख कहीं गीली है 
कोई बोलता है दोष है यही दीवाली का 
कोई बोलता है सारा दोष है पराली का 
किन्तु मूल दोष तक दृष्टि नहीं मोड़ेंगे 
धरती को जीवन के योग्य नहीं छोड़ेंगे 

शस्य-श्यामला की बातें आज बेईमानी हैं 
चारों ओर दीखतीं विनाश की निशानी हैं 
भव्यता का दिव्य स्वप्नजाल जैसे टूटा हो 
जैसेकि पुत्र ने ही हाय, माँ को लूटा हो
ऐसा कुलघाती बना मानव ये आज का 
इसके अलावा दोषी और न समाज का 
जाने किस रोज़ पंजे अपने सिकोड़ेंगे 
धरती को जीवन के योग्य नहीं छोड़ेंगे 

यमुना ने सदियों की रूप निधि खोई है 
गंगा भी भाग्यहीनता पे फूट रोई है 
माँ भारती की माला पे हाथ गये डाले हैं 
सभी नदियाँ पवित्र बन गयीं नाले हैं 
जंगलों को कंकरीट से कुचल डाला है 
पर्वतों को नित्य खोद-खोद के खंगाला है 
ऐसे बुरे कर्म पर माथा नहीं फोड़ेंगे 
धरती को जीवन के योग्य नहीं छोड़ेंगे 
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ
5:25 pm

बाहर भले ही कितना ही झगड़ें ये नेता - आदित्य तोमर

चार नीतियाँ हैं मित्र - साम, दाम, दण्ड, भेद 
चारों का ही नेतागिरी से घनिष्ट नाता है.
बाहर भले ही कितना ही झगड़ें ये नेता,
भीतर सदैव इन्हें साम भाव भाता है.
काम धेला भर का न करते हों किन्तु आम-
-बात है कि दाम निर्विवाद बढ़ा जाता है.
नित्य ही समाज में बढ़ाते आये हैं ये भेद,
और दण्ड मात्र जनता के हिस्से आता है.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ.
11:25 am

अब न विश्वास रहा बातों में या काम में - आदित्य तोमर

अब न विश्वास रहा बातों में या काम में,
ख़ुशी दीखती ही नहीं कहीं ख़ासो-आम में,
भाव गिर गया आते-आते जैसे शाम में,
लोकतन्त्र बिक रहा कौड़ियों के दाम में,

कहीं टोपियों की होली जलवाई जा रही,
कहीं आग हरिधाम में लगाई जा रही,
कीमत कहीं उठाई या गिराई जा रही,
भारत की अस्मिता भी लुटवाई जा रही,

राजनीति ने ये कैसे बन्दे बना रक्खे हैं,
सत्ताभोग ने ये सभी अंधे बना रक्खे हैं,
सेवा नहीं, सबने ये धंधे बना रक्खे हैं,
जन को कुचलने के फन्दे बना रक्खे हैं,

मतदान ऐसा दान है जो फलता नहीं,
अब इस दान से निदान मिलता नहीं,
मति बंद होती मार्ग भी निकलता नहीं,
बलि का विधान यह टाले-टलता नहीं,

राजनीतिजन्य कोलाहल, काँव-काँव में
लोभी-पापियों की नगरी में, ठाँव-ठाँव में
उन तक ध्यान बरबस चला जाता है
एक वही रूप हमें ढांढस बँधाता है

एक कर्म, एक धर्म धारते रहे हैं वे
भारती की आरती उतारते रहे हैं वे
उनके ही दम से हमारा अभिमान है
उन वीरों का ऋणी तो पूरा हिन्दुस्तान है

प्रणाम है, प्रणाम है, प्रणाम है, प्रणाम है
उन रण बांकुरों को सादर प्रणाम है.
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ
11:23 am

आदित्य तोमर की कुछ मुक्तकें

मुक्तक

खुशियाँ तो ज़िन्दगी में न जाने कहाँ रहीं.
बे-घर ही मेरी हसरतों की तितलियाँ रहीं.
रहने को तुम ही थे जो यहाँ कुछ बरस रहे,
आँखों में बाक़ी उम्र महज़ सुर्ख़ियाँ रहीं.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ.

जीवन का वह दौर सुनहरा फिर देखें.
नदियों के रस्ते से सहरा फिर देखें.
आँखों की ख़्वाहिश है बुझने से पहले,
एक बार वह दिलकश चेहरा फिर देखें.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ.

बेख़याली में भी इतना होश का पहरा रहा।
मुन्तज़िर आँसू पलक पर देर तक ठहरा रहा.
इक विवादित भूमि बनकर रह गया मेरा ये दिल,
नाम तो उसके हुआ कब्ज़ा मगर तेरा रहा।
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ.

वक़्त से नज़रें चुराने का न सर इल्ज़ाम लेना.
दिनकरो ! थकने न रुकने का अभी से नाम लेना.
सीढ़ियों पर लड़खड़ाकर गिर रही है फिर सियासत,
फ़र्ज़ यह साहित्य का है, दौड़कर तुम थाम लेना.
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ.

ढेर दौलत के भले हम न कमाएँ भगवन.
आपकी भक्ति के झरने में नहाएँ भगवन.
प्रार्थना है यही जीवन में हमारे कारण,
आँख में आँसू किसी के नहीं आएँ भगवन.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ.
11:22 am

शक्तिपूजको हे ! व्रत नवरात्रि का उठा के - आदित्य तोमर

शक्तिपूजको हे ! व्रत नवरात्रि का उठा के
लोक-परलोक में तो भर पुण्यालोक लो।
किन्तु दूजी ओर अत्याचारों से है त्रस्त नारी
कभी कोई उसके भी दुःख को विलोक लो ।
कर्मकाण्ड छोड़ काण्ड कर्म के रचाओ आज
धर्म यही है कि हर उसके ये शोक लो ।
कन्यापूजा केवल कहायेगी सफल जब
कन्याओं पे उठती कटारियों को रोक लो ।
-
वृक्ष वन आदि कोई बचे ही नहीं हैं कहीं
पूजा में कहाँ से वन्य सामग्री को लाओगे ।
तालाबों को खाकर पचा गए शहर सभी
तो फिर कहाँ से आज कमल चढ़ाओगे ।
प्रकृति स्वरूपा भगवती देखती है तुम्हें
कितना उजाड़ोगे या कितना बनाओगे ।
धरती का सर्वनाश कर देने वालो, पूजा- 
-कितनी ही करो देवी को न रिझा पाओगे ।।
-
गर्व में रहे थे सदियों से भारतीय जन,
जगती में ज्ञान का प्रकाश किया हमने.
कथ की तो सभी देश परिभाषा देते रहे,
किन्तु, हाँ, अकथ पर भाष किया हमने.
वीरता में पृथु, दानवीरता में थे दधीचि,
ऐसे न सिकन्दर हताश किया हमने.
ख़ुद को भुला के हाय, औरों के पथों पे भागे
इसी से ही ख़ुद का विनाश किया हमने
-
विकसित होने को विकासशील रहे नित्य,
किन्तु शील,श्वांस में ज़हर भर गया है.
अंदर ही अंदर पनपने लगा है कोढ़,
चेहरा भले ही बाहरी निखर गया है.
ऊपर से, चिन्ता लेशमात्र दीखती न कहीं,
जाने व्यक्ति किस नशे से गुज़र गया है.
'तोमर' ये किसे जगा रहे ललकार कर,
लाशें ही बची हैं, आदमी तो-मर गया है.
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आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ
11:20 am

यदि आज राम राजा होते, यदि होता अब-तक राम-राज - आदित्य तोमर

यदि आज राम राजा होते, यदि होता अब-तक राम-राज.
रावण के अधिवक्ता बनकर, उठते न कहीं फिर प्रश्न आज.
जनता न व्याभिचारी होती, शासक यदि होते धर्मनिष्ठ.
तब शिष्य राम से भी मिलते, यदि होते कोई गुरु वशिष्ठ.

दर्पण, अर्पण की मूर्तिमान छवि होते हैं शासक, गुरुजन.
उनके ही बिम्ब झलकते हैं जनता में सच्चरित्रता बन.
वीरता-धीरता उनसे ही, सत्यता उन्हीं से फलती है.
जैसे चलते हैं ये दोनों, जनता भी वैसे चलती है.

यदि राजा कर्म-धर्म साधक, जनपालक, न्यायहितैषी हो.
प्रगति गति उसके शासन की क्या कहें भला फिर कैसी हो.
व्यापार फला-फूला रहता, जनता में भरता रोष नहीं.
धन-धान्य अतुल्य उपजते हैं खाली होते हैं कोष नहीं.

बादल भी उमड़-घुमड़कर नित जलराशि अपार लुटाते हैं.
हरियाकर हर्षाती धरती, धरती से मन हर्षाते हैं.
झरझर झर-झर बहते रहते, नदियों की धार नहीं रुकती.
स्वाभिमान के प्रश्नों पर जनता फिर कभी नहीं झुकती.

वैसे ही सच्चे गुरुओं से, गुरुता परिभाषित होती है.
शासक अनुशासित होते हैं, जनता अनुशासित होती है.
फिर गुरु का तो दायित्व नित्य शासक से कहीं अधिक होता.
गुरु का प्रभाव सदियों चलता, शासक का भले क्षणिक होता.

यह सृजन और संहार शक्ति उसके ही खेल अनूठे हैं.
है एकमात्र गुरु सत्य और सब दृश्य यहाँ के झूठे हैं.
जगती की ऐसी राह कौन, जिस पर पग पहले धरे नहीं.
क्या युद्धपंथ, क्या शान्तिमन्त्र, गुरु से तो कुछ भी परे नहीं.
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)

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