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शनिवार, 4 अप्रैल 2020
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
4:04 am
ग़ज़ल :- सच्चाई जो हरदम गले लगाता है - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर- 22, 22, 22, 22, 22, 2
सच्चाई जो हरदम गले लगाता है ।
सच मानो इतिहास वही लिखवाता है ।।
लोग कहेंगे शब्द मिटाया जीवन से ।
मीरा तुलसी सा बनकर दिखलाता है ।।
जिसने मजहब और धर्म सेवा माना ।
वो ही बस रसखान यहाँ बन पाता है ।।
जिसने प्रभु पर अपना सब कुछ छोड़ दिया ।
ईश्वर उसको हरदम राह दिखाता है ।।
जिन्दा जिसने रखा जमीर यहाँ अपना ।
बन्दा वही कबीर यहाँ कहलाता है ।।
मीर तकी गालिब की बस्ती ये भारत ।
इश्क मुहब्बत केवल प्रेम सुनाता है ।।
अपना मन अलमस्त किया जिसने *साथी* ।
रब उसके घर खुद ही मिलने आता है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻🌻482🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
सच्चाई जो हरदम गले लगाता है ।
सच मानो इतिहास वही लिखवाता है ।।
लोग कहेंगे शब्द मिटाया जीवन से ।
मीरा तुलसी सा बनकर दिखलाता है ।।
जिसने मजहब और धर्म सेवा माना ।
वो ही बस रसखान यहाँ बन पाता है ।।
जिसने प्रभु पर अपना सब कुछ छोड़ दिया ।
ईश्वर उसको हरदम राह दिखाता है ।।
जिन्दा जिसने रखा जमीर यहाँ अपना ।
बन्दा वही कबीर यहाँ कहलाता है ।।
मीर तकी गालिब की बस्ती ये भारत ।
इश्क मुहब्बत केवल प्रेम सुनाता है ।।
अपना मन अलमस्त किया जिसने *साथी* ।
रब उसके घर खुद ही मिलने आता है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻🌻482🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
4:01 am
भारती की शान लिखो , देश का सम्मान लिखो - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
मनहरण घनाक्षरी
(8,8,8,7 अंत लघु गुरु)
भारती की शान लिखो , देश का सम्मान लिखो ।
एकता *अखंडता* न , मंद होना चाहिए ।।
नारियों को मान मिले , उन्हे स्वाभिमान मिले ।
पुरुषो के अत्याचार , बंद होना चाहिए ।।
वेद का विधि विधान , सभी करे गुणगान ।
हिन्दू राष्ट्र होने में न , संद होना चाहिए ।।
राम का चरित्र सुनो , कृष्ण उपदेश गुनो ।
जीवन का सार गीता , छंद होना चाहिए ।।
🌻🌻🌻🌻🌻 537🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
(संद-दरार, मतभेद)
(8,8,8,7 अंत लघु गुरु)
भारती की शान लिखो , देश का सम्मान लिखो ।
एकता *अखंडता* न , मंद होना चाहिए ।।
नारियों को मान मिले , उन्हे स्वाभिमान मिले ।
पुरुषो के अत्याचार , बंद होना चाहिए ।।
वेद का विधि विधान , सभी करे गुणगान ।
हिन्दू राष्ट्र होने में न , संद होना चाहिए ।।
राम का चरित्र सुनो , कृष्ण उपदेश गुनो ।
जीवन का सार गीता , छंद होना चाहिए ।।
🌻🌻🌻🌻🌻 537🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
(संद-दरार, मतभेद)
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
4:00 am
ग़ज़ल :- दिल के हालात को दिलवर को सुनाया जाये - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर- 2122, 1122 , 1122 ,22
दिल के हालात को दिलवर को सुनाया जाये ।
दिल हुआ खाक तो फिर छाऱ दिखाया जाये ।।
बेवजह हिचकियाँ यूँ ही न भरा करते है ।
याद करके न उन्हे और सताया जाये ।।
खामियां मत गिनना आज बहकते दिल की ।
तुम भी बहके तो थे हमसे न छुपाया जाये ।।
ये शराब पीता है बस याद भुलाने के लिऐ ।
इस शराबी को शराबी न बताया जाये ।।
प्यार इजहार किया चूँम के खत होठो से ।
जी़ तो करता उन्हे सीने से लगाया जाये ।।
मिन्नतें करते हुऐ भूल गये खुद को ही ।
आँशियां कोई नया और बसाया जाये ।।
प्यार पर लिखते गज़ल क्वा़फी ये उलझते है ।
काँफियाँ फिर से नया कोई बनाया जाये ।।
चाँदनी रात में देखा यूँ कई बार चमकते *साथी* ।
चाँद को चाँद से इक बार मिलाया जाये ।।
🌻🌻🌻🌻🌻508🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
दिल के हालात को दिलवर को सुनाया जाये ।
दिल हुआ खाक तो फिर छाऱ दिखाया जाये ।।
बेवजह हिचकियाँ यूँ ही न भरा करते है ।
याद करके न उन्हे और सताया जाये ।।
खामियां मत गिनना आज बहकते दिल की ।
तुम भी बहके तो थे हमसे न छुपाया जाये ।।
ये शराब पीता है बस याद भुलाने के लिऐ ।
इस शराबी को शराबी न बताया जाये ।।
प्यार इजहार किया चूँम के खत होठो से ।
जी़ तो करता उन्हे सीने से लगाया जाये ।।
मिन्नतें करते हुऐ भूल गये खुद को ही ।
आँशियां कोई नया और बसाया जाये ।।
प्यार पर लिखते गज़ल क्वा़फी ये उलझते है ।
काँफियाँ फिर से नया कोई बनाया जाये ।।
चाँदनी रात में देखा यूँ कई बार चमकते *साथी* ।
चाँद को चाँद से इक बार मिलाया जाये ।।
🌻🌻🌻🌻🌻508🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:58 am
ग़ज़ल :- यकींन जिन पर हमें बहुत था , वही तो खंजर चला रहे है - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर- 12122, 12122, 12122,12122
यकींन जिन पर हमें बहुत था ,
वही तो खंजर चला रहे है ।
यकींन जिन पर कभी नही था ,
वही तो मरहम लगा रहे है ।।
हमें पता ये है उनकी फितरत ,
छुपी नही है जनाब बिलकुल ।
गले मिले जब थी ईद उस दिन ,
नज़र ईद पर ही आ रहे है ।।
बहुत जताते थे प्यार हमसे ,
तभी तुम्हे तो ये दिल दिया था ।
जिन्हे समझते थे चाँद अपना ,
वही अमावस दिखा रहे है ।।
है प्यार करना खुदा का सजदा,
इसे इबादत तुम्ही बताते ।
मिजाज किसने तुम्हारा बदला ,
गुनाह अब क्यो बता रहे हो ।।
नही समझता है प्यार मजहब ,
नही मानता ये कोई सरहद ।
इन्ही अदाओ पे मर मिटे हम,
तभी से सपने सजा रहे है ।।
हमें समझते तुम्ही तो *साथी*,
ये रंग हुश्ने सभी तुम्हारा ।
नही समझते अगर हमें अब ,
अभी जहां से लो जा रहे है ।।
🌻🌻🌻🌻475🌻🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
यकींन जिन पर हमें बहुत था ,
वही तो खंजर चला रहे है ।
यकींन जिन पर कभी नही था ,
वही तो मरहम लगा रहे है ।।
हमें पता ये है उनकी फितरत ,
छुपी नही है जनाब बिलकुल ।
गले मिले जब थी ईद उस दिन ,
नज़र ईद पर ही आ रहे है ।।
बहुत जताते थे प्यार हमसे ,
तभी तुम्हे तो ये दिल दिया था ।
जिन्हे समझते थे चाँद अपना ,
वही अमावस दिखा रहे है ।।
है प्यार करना खुदा का सजदा,
इसे इबादत तुम्ही बताते ।
मिजाज किसने तुम्हारा बदला ,
गुनाह अब क्यो बता रहे हो ।।
नही समझता है प्यार मजहब ,
नही मानता ये कोई सरहद ।
इन्ही अदाओ पे मर मिटे हम,
तभी से सपने सजा रहे है ।।
हमें समझते तुम्ही तो *साथी*,
ये रंग हुश्ने सभी तुम्हारा ।
नही समझते अगर हमें अब ,
अभी जहां से लो जा रहे है ।।
🌻🌻🌻🌻475🌻🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:55 am
अजब फितरत ये दुनियाँ की , कलम से हम सुनाते है - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर- 1222*4
अजब फितरत ये दुनियाँ की ,
कलम से हम सुनाते है ।
मिलाते जिसको मिट्टी में ,
उसे काँधे बिठाते है ।।
जवानी की यहाँ कीमत ,
बुढ़ापा आंकलन करता ।
पिता की परवरिश बच्चे ,
यहाँ खर्चा बताते है ।।
है गैरत मंद ये इन्सां ,
हकीकत मानता ये कब ।
निकल जाती है जब बारिश ,
तो छाते जंग खाते है ।।
बुलंदी छू रहे उनको ,
यही पैगाम दे देना ।
जड़े मत खोदना उनकी ,
तुम्हे आगे बढ़ाते है ।।
रखो विश्वास बस खुद पर ,
कभी मायूस मत होना ।
हमारे जो करीबी है ,
वही हमको गिराते है ।।
समझते जिंदगी को जो ,
यहाँ किरदार के जैसा ।
खुशी उनको मिले या गम ,
सदा ही मुस्कराते है ।।
रखे इन्सानियत दिल में ,
इरादे नेक हो जिसके ।
वही *साथी* मुकद्दर का
सिकंदर बन ही जाते है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻489🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो. 9981013061
अजब फितरत ये दुनियाँ की ,
कलम से हम सुनाते है ।
मिलाते जिसको मिट्टी में ,
उसे काँधे बिठाते है ।।
जवानी की यहाँ कीमत ,
बुढ़ापा आंकलन करता ।
पिता की परवरिश बच्चे ,
यहाँ खर्चा बताते है ।।
है गैरत मंद ये इन्सां ,
हकीकत मानता ये कब ।
निकल जाती है जब बारिश ,
तो छाते जंग खाते है ।।
बुलंदी छू रहे उनको ,
यही पैगाम दे देना ।
जड़े मत खोदना उनकी ,
तुम्हे आगे बढ़ाते है ।।
रखो विश्वास बस खुद पर ,
कभी मायूस मत होना ।
हमारे जो करीबी है ,
वही हमको गिराते है ।।
समझते जिंदगी को जो ,
यहाँ किरदार के जैसा ।
खुशी उनको मिले या गम ,
सदा ही मुस्कराते है ।।
रखे इन्सानियत दिल में ,
इरादे नेक हो जिसके ।
वही *साथी* मुकद्दर का
सिकंदर बन ही जाते है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻489🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो. 9981013061
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:53 am
ग़ज़ल :- परहित में सब सुख मिलता है - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर- 22, 22, 22, 22
परहित में सब सुख मिलता है ।
गुणियो का अनुभव कहता है ।।
पी लेता जो जह्र द्वेष का ।
शिव शंभू जैसा बनता है ।।
हीरा बनता है पत्थर वो ।
सदियों तक जो दुख सहता है ।।
सदियों तक वो याद रहेगा ।
संत कबीरा जो लिखता है ।।
चमक अटल जी की सब देखो ।
*कुंदन* भी फीका लगता है ।।
तुलसी गुरुनानक वाणी से ।
गंगा में अमृत बहता है ।।
गीता और कुरान सुनो सब ।
मेल मिलाप तभी बढ़ता है ।।
जन्म मिले भारत में हरदम ।
*साथी* ये हसरत रखता है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻547🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
परहित में सब सुख मिलता है ।
गुणियो का अनुभव कहता है ।।
पी लेता जो जह्र द्वेष का ।
शिव शंभू जैसा बनता है ।।
हीरा बनता है पत्थर वो ।
सदियों तक जो दुख सहता है ।।
सदियों तक वो याद रहेगा ।
संत कबीरा जो लिखता है ।।
चमक अटल जी की सब देखो ।
*कुंदन* भी फीका लगता है ।।
तुलसी गुरुनानक वाणी से ।
गंगा में अमृत बहता है ।।
गीता और कुरान सुनो सब ।
मेल मिलाप तभी बढ़ता है ।।
जन्म मिले भारत में हरदम ।
*साथी* ये हसरत रखता है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻547🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:51 am
ग़ज़ल :- प्यार करना अगर जुर्म दिलवर , आप बेशक सजा दीजिएगा - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर- 212, 212, 212, 2
प्यार करना अगर जुर्म दिलवर , आप बेशक सजा दीजिएगा ।
होठ पर होठ इक बार रख दो , बाद सूली चढ़ा दीजिएगा ।।
खूबसूरत बला यार तुम हो , शाइरी दिल से खुद ही निकलती ।
शाइरी खत की इक बार पढ़ लो , चाहे बेशक जला दीजिएगा ।।
दोष अपना नही उम्र का है , प्यार होता इसी उम्र में है ।
प्यार थोड़ा अगर हमसे है तो , बेझिझक अब बता दीजिएगा ।।
मीर की शायरी सी तू लगती , शेर गालिब के हम भी तो लगते ।
आओ मिलकर गजल हम बनाऐ , फिर इसे गुनगुना दीजिएगा ।।
*पथ* ये मुश्किल भरा लगता फिर भी , चल के इस पर दिखाएंगे जग को ।
फूल से भी लगेगे वो कोमल , चाहे काँटे बिछा दीजिएगा ।।
तुम दुल्हन बन सको गर न मेरी , एक वादा करो आज मुझसे ।
हाथ तेरे हिना जब रचेगी , नाम मेरा लिखा दीजिएगा ।।
बेवफा उसको *साथी* कहे क्यो , प्यार उसने किया ही नही है ।
बस मेरे दोस्त बनकर के रहना , दोस्त को मत भुला दीजिएगा ।।
🌻🌻🌻🌻🌻572🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
प्यार करना अगर जुर्म दिलवर , आप बेशक सजा दीजिएगा ।
होठ पर होठ इक बार रख दो , बाद सूली चढ़ा दीजिएगा ।।
खूबसूरत बला यार तुम हो , शाइरी दिल से खुद ही निकलती ।
शाइरी खत की इक बार पढ़ लो , चाहे बेशक जला दीजिएगा ।।
दोष अपना नही उम्र का है , प्यार होता इसी उम्र में है ।
प्यार थोड़ा अगर हमसे है तो , बेझिझक अब बता दीजिएगा ।।
मीर की शायरी सी तू लगती , शेर गालिब के हम भी तो लगते ।
आओ मिलकर गजल हम बनाऐ , फिर इसे गुनगुना दीजिएगा ।।
*पथ* ये मुश्किल भरा लगता फिर भी , चल के इस पर दिखाएंगे जग को ।
फूल से भी लगेगे वो कोमल , चाहे काँटे बिछा दीजिएगा ।।
तुम दुल्हन बन सको गर न मेरी , एक वादा करो आज मुझसे ।
हाथ तेरे हिना जब रचेगी , नाम मेरा लिखा दीजिएगा ।।
बेवफा उसको *साथी* कहे क्यो , प्यार उसने किया ही नही है ।
बस मेरे दोस्त बनकर के रहना , दोस्त को मत भुला दीजिएगा ।।
🌻🌻🌻🌻🌻572🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:49 am
ग़ज़ल :- चाँद हो फिर भी रहो औकात में - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर- 2122, 2122 , 212
चाँद हो फिर भी रहो औकात में ।
दाग हर अच्छा नही सौगात में ।।
जीत धोखे से मिली क्या जीत हैं
।
जीत का केवल मजा शह- मात में ।।
दूर रहना चाँदनी से चाँद तू ।
चाँद खिलता कब अमावस रात में ।।
आजकल के आशिको को देख लो ।
जैसे हो मेढ़क कई बरसात में ।।
खून नित इंन्सानियत का हो रहा ।
लाल कहते माँ मिली खैरात में ।।
किस कद़र दौलत बनी है अब खुदा ।
लोग भूले आचरण हर बात में ।।
गुनगुनाते है यहाँ *मच्छर* भी तो ।
क्यो लगे है हम बड़ी आफ़ात में ।।
राह से *साथी* मत बताओ अब हमें ।
हम नये दूल्हे नही बारात में ।।
🌻🌻🌻🌻🌻574🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी" डबरा मो. 9981013061
आफ़ात -मुसीबत
चाँद हो फिर भी रहो औकात में ।
दाग हर अच्छा नही सौगात में ।।
जीत धोखे से मिली क्या जीत हैं
।
जीत का केवल मजा शह- मात में ।।
दूर रहना चाँदनी से चाँद तू ।
चाँद खिलता कब अमावस रात में ।।
आजकल के आशिको को देख लो ।
जैसे हो मेढ़क कई बरसात में ।।
खून नित इंन्सानियत का हो रहा ।
लाल कहते माँ मिली खैरात में ।।
किस कद़र दौलत बनी है अब खुदा ।
लोग भूले आचरण हर बात में ।।
गुनगुनाते है यहाँ *मच्छर* भी तो ।
क्यो लगे है हम बड़ी आफ़ात में ।।
राह से *साथी* मत बताओ अब हमें ।
हम नये दूल्हे नही बारात में ।।
🌻🌻🌻🌻🌻574🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी" डबरा मो. 9981013061
आफ़ात -मुसीबत
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:47 am
ग़ज़ल :- दिल हमारा आशिकाना हो गया - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर-2122, 2122 , 212
दिल हमारा आशिकाना हो गया ।
लोग कहते हैं तराना हो गया ।।
क्यो नही ईश्वर खुदा हमको मिला ।
सिर झुकाते तो जमाना हो गया ।।
लूटने का काम अब मुश्किल बहुत ।
आदमी अब हर सयाना हो गया ।।
आज के अखबार चैनल क्या हुऐ ।
काम केवल सच छुपाना हो गया ।।
छीनते है खास ही हक आम का ।
छीनना भी हक जताना हो गया ।।
नफरते *साथी* बड़ी अब किस कदर ।
आज तो मजहब फसाना हो गया ।।
🌻🌻🌻🌻🌻575🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
दिल हमारा आशिकाना हो गया ।
लोग कहते हैं तराना हो गया ।।
क्यो नही ईश्वर खुदा हमको मिला ।
सिर झुकाते तो जमाना हो गया ।।
लूटने का काम अब मुश्किल बहुत ।
आदमी अब हर सयाना हो गया ।।
आज के अखबार चैनल क्या हुऐ ।
काम केवल सच छुपाना हो गया ।।
छीनते है खास ही हक आम का ।
छीनना भी हक जताना हो गया ।।
नफरते *साथी* बड़ी अब किस कदर ।
आज तो मजहब फसाना हो गया ।।
🌻🌻🌻🌻🌻575🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:45 am
ग़ज़ल :- रहे पास वो सादगी छूटती है - बृजमोहन श्रीवास्तव
बहर - 122*4
रहे पास वो सादगी छूटती है ।
उसे छोड़ दे जिन्दगी छूटती है ।।
नही छोड़ सकते है हम *देश* अपना ।
मुहब्बत की अपनी गली छूटती है ।।
विदाई किसे कहते बाबुल से पूछो ।
पहाड़ों से जैसे नदी छूटती है ।।
करो इश्क यारो समझ हैसियत को ।
अधर में तभी आशिक़ी छूटती है ।।
नही देखना ख्वाब परियो के बिलकुल ।
जवानी में ही ताज़गी छूटती है ।।
मुहब्बत नही उम्र बंधन समझती ।
बुढा़पे में कब शायरी छूटती है ।।
ये मतलब की दुनियाँ लगे मतलबी क्यो ।
कहो सच नही दोस्ती छूटती है ।।
धुँआ धुन्ध धोखा सभी एक *साथी* ।
सुनो इनसे कब ज्यादती छूटती है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻571🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव
"साथी"डबरा
बरहमी - गुस्सा , क्रोध
रहे पास वो सादगी छूटती है ।
उसे छोड़ दे जिन्दगी छूटती है ।।
नही छोड़ सकते है हम *देश* अपना ।
मुहब्बत की अपनी गली छूटती है ।।
विदाई किसे कहते बाबुल से पूछो ।
पहाड़ों से जैसे नदी छूटती है ।।
करो इश्क यारो समझ हैसियत को ।
अधर में तभी आशिक़ी छूटती है ।।
नही देखना ख्वाब परियो के बिलकुल ।
जवानी में ही ताज़गी छूटती है ।।
मुहब्बत नही उम्र बंधन समझती ।
बुढा़पे में कब शायरी छूटती है ।।
ये मतलब की दुनियाँ लगे मतलबी क्यो ।
कहो सच नही दोस्ती छूटती है ।।
धुँआ धुन्ध धोखा सभी एक *साथी* ।
सुनो इनसे कब ज्यादती छूटती है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻571🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव
"साथी"डबरा
बरहमी - गुस्सा , क्रोध
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:43 am
ग़ज़ल :- प्यार ही जिन्दगी नही होती - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर- 2122, 1212 , 22
प्यार ही जिन्दगी नही होती ।
मान लो बन्दगी नही होती ।।
मत करो जंग तुम *मुकद्दर* से ।
अच्छी ये बानगी नही होती ।।
दफ्न बारूद तो वही होता ।
आग जिसमें लगी नही होती ।।
खूबसूरत है वो गुलाबो सी ।
देखकर दिल्लगी नही होती ।।
झूलती वो है गैर बाहों में ।
देखना सादगी नही होती ।।
*प्रेम* में सबको भुलाना *साथी* ।
ऐसे दीवानगी नही होती ।।
🌻🌻🌻🌻582🌻🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
प्यार ही जिन्दगी नही होती ।
मान लो बन्दगी नही होती ।।
मत करो जंग तुम *मुकद्दर* से ।
अच्छी ये बानगी नही होती ।।
दफ्न बारूद तो वही होता ।
आग जिसमें लगी नही होती ।।
खूबसूरत है वो गुलाबो सी ।
देखकर दिल्लगी नही होती ।।
झूलती वो है गैर बाहों में ।
देखना सादगी नही होती ।।
*प्रेम* में सबको भुलाना *साथी* ।
ऐसे दीवानगी नही होती ।।
🌻🌻🌻🌻582🌻🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:42 am
ग़ज़ल :- आप रहते दिल में हरदम उनका ये कहना रहा - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर- 2122, 2122, 2122, 212
आप रहते दिल में हरदम उनका ये कहना रहा ।
था यकीं खुद से भी ज्यादा बात ये सुनता रहा ।।
उसकी आँखो का तरन्नुम दिल ने हरदम ही सुना ।
दिल तभी उसके ही ख्यालो में सदा डूबा रहा ।।
है अजब अहसास यारो प्यार का कैसे कहें ।
खूब तोड़े ख्वाब दिल के फिर भी वो सच्चा रहा ।।
कद्र रिश्तों की नही की इस जवानी जोश में ।
चंद पैसो के लिऐ क्यो आँखो पे पर्दा रहा ।।
है बदन चंदन का उपवन बात सच सौ फीसदी ।
जो छुआ इक बार उसने उम्र भर महका रहा ।।
रूठना उसको मनाना हर शरारत याद है ।
उसका मिलना या बिछड़ना ये भी तो किस्सा रहा ।।
बीज बोना प्यार के *साथी* *फसल* लहलाएगी ।
काट लेना चाहे जब भी इसमे कब घाटा रहा ।।
🌻🌻🌻🌻🌻584🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
(मो.9981013061)
आप रहते दिल में हरदम उनका ये कहना रहा ।
था यकीं खुद से भी ज्यादा बात ये सुनता रहा ।।
उसकी आँखो का तरन्नुम दिल ने हरदम ही सुना ।
दिल तभी उसके ही ख्यालो में सदा डूबा रहा ।।
है अजब अहसास यारो प्यार का कैसे कहें ।
खूब तोड़े ख्वाब दिल के फिर भी वो सच्चा रहा ।।
कद्र रिश्तों की नही की इस जवानी जोश में ।
चंद पैसो के लिऐ क्यो आँखो पे पर्दा रहा ।।
है बदन चंदन का उपवन बात सच सौ फीसदी ।
जो छुआ इक बार उसने उम्र भर महका रहा ।।
रूठना उसको मनाना हर शरारत याद है ।
उसका मिलना या बिछड़ना ये भी तो किस्सा रहा ।।
बीज बोना प्यार के *साथी* *फसल* लहलाएगी ।
काट लेना चाहे जब भी इसमे कब घाटा रहा ।।
🌻🌻🌻🌻🌻584🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
(मो.9981013061)
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:40 am
ग़ज़ल :- कोरोना से बचकर रहना , कैसी शामत आई है - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
22- 22- 22- 22 -22 -22 -22 -2
कोरोना से बचकर रहना , कैसी शामत आई है ।
बचने का आसान तरीका , केवल साफ सफाई है ।।
मास्क बिना घर से मत निकलो , सेनेटाइजर साथ रखो ।
लोगो को भी जागृत करना , सबसे बड़ी भलाई है ।।
खाँसी सर्दी से बचना है , गरम गरम पानी पीना ।
नही बुखार करो अनदेखा , लेना तुरत दवाई है ।।
इटली चीन ईरान दुखी है , अमरीका इजरायल भी ।
सारा विश्व आज दशहत में , मिलकर करे दुहाई है ।।
लापरवाही मत कर देना , इटली जैसी मत यारो ।
क्या लेगी कोरोना ये , मानी अब सच्चाई है ।।
कोरोना से जंग जीतना , जिम्मेदारी हम सबकी ।
माँस नही सेवन करना है , सबसे बड़ी बुराई है ।।
हाथ जोड़कर करो नमस्ते , हाथ मिलाना मत *साथी* ।
सुगम संस्कृति भारत की ये , जन जन को सुखदाई है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻584🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो. 9981013061
कोरोना से बचकर रहना , कैसी शामत आई है ।
बचने का आसान तरीका , केवल साफ सफाई है ।।
मास्क बिना घर से मत निकलो , सेनेटाइजर साथ रखो ।
लोगो को भी जागृत करना , सबसे बड़ी भलाई है ।।
खाँसी सर्दी से बचना है , गरम गरम पानी पीना ।
नही बुखार करो अनदेखा , लेना तुरत दवाई है ।।
इटली चीन ईरान दुखी है , अमरीका इजरायल भी ।
सारा विश्व आज दशहत में , मिलकर करे दुहाई है ।।
लापरवाही मत कर देना , इटली जैसी मत यारो ।
क्या लेगी कोरोना ये , मानी अब सच्चाई है ।।
कोरोना से जंग जीतना , जिम्मेदारी हम सबकी ।
माँस नही सेवन करना है , सबसे बड़ी बुराई है ।।
हाथ जोड़कर करो नमस्ते , हाथ मिलाना मत *साथी* ।
सुगम संस्कृति भारत की ये , जन जन को सुखदाई है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻584🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो. 9981013061
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:36 am
ग़ज़ल :- बात कहना कोई मुस्कुराने के बाद - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर-212, 212, 212, 212
बात कहना कोई मुस्कुराने के बाद ।
लोग मानेगे बीते जमाने के बाद ।।
प्यार *सहयोग* का नाम है दूसरा ।
प्यार होता भी है दिल लगाने के बाद ।।
प्यार है शर्तिया रोग लाईलाज भी ।
ये तो नासूर है भूल जाने के बाद ।।
आजमा लो ये फितरत मिटी कब तलक ।
ढूढते आब वो लौ लगाने के बाद ।।
और कोई नशा इतना सस्ता कहाँ ।
आदमी हर शंहशाह पिलाने के बाद ।।
तुमने पूछा पता किससे घर का मेरे ।
पी रहा और भी डगमगाने के बाद ।।
कुछ मिलेगा नही बात *साथी* सुनो ।
बारिशों में पतंगे उड़ाने के बाद ।।
🌻🌻🌻🌻🌻586🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो. 9981013061
बात कहना कोई मुस्कुराने के बाद ।
लोग मानेगे बीते जमाने के बाद ।।
प्यार *सहयोग* का नाम है दूसरा ।
प्यार होता भी है दिल लगाने के बाद ।।
प्यार है शर्तिया रोग लाईलाज भी ।
ये तो नासूर है भूल जाने के बाद ।।
आजमा लो ये फितरत मिटी कब तलक ।
ढूढते आब वो लौ लगाने के बाद ।।
और कोई नशा इतना सस्ता कहाँ ।
आदमी हर शंहशाह पिलाने के बाद ।।
तुमने पूछा पता किससे घर का मेरे ।
पी रहा और भी डगमगाने के बाद ।।
कुछ मिलेगा नही बात *साथी* सुनो ।
बारिशों में पतंगे उड़ाने के बाद ।।
🌻🌻🌻🌻🌻586🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो. 9981013061
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:33 am
गीत :- कोरोना को आज भगाना ,सबकी जिम्मेदारी - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
मापनी (16,12)
कोरोना को आज भगाना ,सबकी जिम्मेदारी ।
बीमारी मत समझो इसको , संक्रमित महामारी ।।
रखो *दूरियाँ* अपनो से बस , एक बचाव बताया ।
फोन काँल पर बात करो बस , सबने यही सुझाया ।।
साबुन से हाथो को धोना , घर में बारी बारी ।
कोरोना को आज भगाना...........।।
भीड़ भाड़ से दूर रहो अब , मजमा नही लगाना ।
आफत में सब आ जाओगे , बात यही समझाना ।।
मास्क लगाकर मुँह पर रखना , कोरोना पर भारी ।
कोरोना को आज भगाना............।।
अफवाहों पर ध्यान न देना , झूठी बात समझना ।
कोई खबर हो नही प्रमाणित , फारवर्ड मत करना ।।
लाँकडाऊन के पालन से ही , कोरोना है हारी ।
कोरोना को आज भगाना........।।
इटली चीन स्पेन इजरायल , विश्व समूचा हारा ।
कोरोना का अंत सुनिश्चित , होगा भारत द्वारा ।।
वेद सनातन संस्कृति भारत , की दुनियाँ आभारी ।
कोरोना को आज भगाना.........।।
🌻🌻🌻🌻587🌻🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो.9981013061
कोरोना को आज भगाना ,सबकी जिम्मेदारी ।
बीमारी मत समझो इसको , संक्रमित महामारी ।।
रखो *दूरियाँ* अपनो से बस , एक बचाव बताया ।
फोन काँल पर बात करो बस , सबने यही सुझाया ।।
साबुन से हाथो को धोना , घर में बारी बारी ।
कोरोना को आज भगाना...........।।
भीड़ भाड़ से दूर रहो अब , मजमा नही लगाना ।
आफत में सब आ जाओगे , बात यही समझाना ।।
मास्क लगाकर मुँह पर रखना , कोरोना पर भारी ।
कोरोना को आज भगाना............।।
अफवाहों पर ध्यान न देना , झूठी बात समझना ।
कोई खबर हो नही प्रमाणित , फारवर्ड मत करना ।।
लाँकडाऊन के पालन से ही , कोरोना है हारी ।
कोरोना को आज भगाना........।।
इटली चीन स्पेन इजरायल , विश्व समूचा हारा ।
कोरोना का अंत सुनिश्चित , होगा भारत द्वारा ।।
वेद सनातन संस्कृति भारत , की दुनियाँ आभारी ।
कोरोना को आज भगाना.........।।
🌻🌻🌻🌻587🌻🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो.9981013061
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:29 am
ग़ज़ल :- भूला न दिल अभी तक , उस प्यार तिश्नगी को - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
बहर-221, 2122 , 221, 2122
भूला न दिल अभी तक , उस प्यार तिश्नगी को ।
सुनना सुनाऐगी बस , वो मेरी ज्यादती को ।।
ये खेल प्यार का है , इसके नियम अनोखे ।
उसने हराया ऐसे , भूले न दिल्लगी को ।।
नफरत परोसना हैं , उनका तो काम हरदम ।
देखो जला न देना , नफरत से आशिकी को ।।
देखा है उसका जलवा , आगोश में ठहरकर ।
कातिल अदा लगाती , है आग चाँदनी को ।।
अफसोस रहा हरदम , इतना सा बस कहे क्या ।
हम थे खुली किताबे , वो पढ़ न पाए हमीं को ।।
जिसको था हमने समझा , समझे न वो तो अब तक ।
जिसने हमें था समझा , समझे न हम उसी को ।।
हमको बताते शायद , रखते न बात दिल में ।
दे देते जान *साथी* , रखते न हम कमी को ।।
🌻🌻🌻🌻🌻588🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
भूला न दिल अभी तक , उस प्यार तिश्नगी को ।
सुनना सुनाऐगी बस , वो मेरी ज्यादती को ।।
ये खेल प्यार का है , इसके नियम अनोखे ।
उसने हराया ऐसे , भूले न दिल्लगी को ।।
नफरत परोसना हैं , उनका तो काम हरदम ।
देखो जला न देना , नफरत से आशिकी को ।।
देखा है उसका जलवा , आगोश में ठहरकर ।
कातिल अदा लगाती , है आग चाँदनी को ।।
अफसोस रहा हरदम , इतना सा बस कहे क्या ।
हम थे खुली किताबे , वो पढ़ न पाए हमीं को ।।
जिसको था हमने समझा , समझे न वो तो अब तक ।
जिसने हमें था समझा , समझे न हम उसी को ।।
हमको बताते शायद , रखते न बात दिल में ।
दे देते जान *साथी* , रखते न हम कमी को ।।
🌻🌻🌻🌻🌻588🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
3:26 am
ग़ज़ल :- उनके ऊपर दुनियाँ हमने वारी है - बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
बहर- 22-22-22-22-22-2
उनके ऊपर दुनियाँ हमने वारी है ।
वो बस समझे ये तो दुनिया दारी है ।।
हाल बुरा तस्वीरों का हमने देखा ।
दीवारों पर लटकी वो बेचारी है ।।
जान फँसी है आफत में अपनी यारो ।
उनको दिखती कब अपनी खुद्दारी है ।।
दूर खड़े होकर हम पर हसते हो क्यो ।
बिन देखे रहना भी तो बीमारी है ।।
यौवन की बारुद लिऐ क्यो फिरते हो ।
दूर रहो हम भी रखते चिंगारी है ।।
एक शगूफा मानो है बिलकुल सच्चा ।
किस्मत के आगे मेहनत कब हारी है ।।
अहसास करा दो मुझको मेरे होने का ।
सुन रख्खी तेरी *साथी* फ़नकारी है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻592🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
उनके ऊपर दुनियाँ हमने वारी है ।
वो बस समझे ये तो दुनिया दारी है ।।
हाल बुरा तस्वीरों का हमने देखा ।
दीवारों पर लटकी वो बेचारी है ।।
जान फँसी है आफत में अपनी यारो ।
उनको दिखती कब अपनी खुद्दारी है ।।
दूर खड़े होकर हम पर हसते हो क्यो ।
बिन देखे रहना भी तो बीमारी है ।।
यौवन की बारुद लिऐ क्यो फिरते हो ।
दूर रहो हम भी रखते चिंगारी है ।।
एक शगूफा मानो है बिलकुल सच्चा ।
किस्मत के आगे मेहनत कब हारी है ।।
अहसास करा दो मुझको मेरे होने का ।
सुन रख्खी तेरी *साथी* फ़नकारी है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻592🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
शुक्रवार, 11 मई 2018
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'
2:58 am
मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी' की कुछ ग़ज़लें
नाम- बृजमोहन श्रीवास्तव
साहित्यिक नाम- साथी
पिता का नाम- श्री राधाकृष्ण श्रीवास्तव
माता का नाम- श्रीमति मथुरा बाई
जन्मतिथि - 20/08/1976
निवासी- वार्ड. नं. 25 मोती अपार्टमेन्ट के बगल में ठाकुर बाबा मन्दिर के पास डबरा जिला ग्वालियर (म.प्र.)
शिक्षा- बी.काँम, एम.काँम, एल.एल.बी.
पुरूस्कार/सम्मान -वागेश्वरी पुँज अंलकरण ,श्रेष्ठ कलमवीर सम्मान ,जनचेतना मंच बीसलपुर (उ.प्र.)
प्रकाशन विवरण -काव्य नंदिनी मे गीत ,अखबार और पत्रिकाओ गीत कविताओ का प्रकाशन ,sr chenal 84 lndore पर काव्य पाठ प्रसारण 9/6/18 शाम 8.00 बजे
गजल 1
बहर - 22, 22, 22 ,22 ,22 ,22, 22, 2
रदीफ- लगता है ।
काफियाँ- आ
अपने रंग लगाते है तो, दिल को अच्छा लगता है ।
अपने रंग दिखाते है तो, दिल को धक्का लगता है ।।
विष घोले जो मन ही मन मे, बाते मन माफिक करता ।
सच कहने मादा जिसमे क्यो वो झूठा लगता है ।।
जो खाते मेहनत से रोटी, जीवित बस ईमान रखा ।
वे तो भृष्ट दिखे जन जन को , माल्या सच्चा लगता है ।।
देश चलाओ मोदी जी तुम, बहुमत खूब दिया जन ने ।
मँहगाई मे दबती जनता, आज छलावा लगता है ।।
आगे भी सत्ता आऐगी, बस जनता का ध्यान रखो ।
जीत सुनिश्चत है हरदम ही, राहुल बबुआ लगता है ।।
बीबी चाहे कितनी सुन्दर, आँख टिकाते साली पर ।
साली जब घर में आ जाये , मजनू जीजा लगता है ।।
सोच बहूँ की सब जन रखते, बेटी से क्यो डरते हो ।
बेटी चाहे कुछ भी कर ले, बेटा प्यारा लगता है ।।
होली है त्यौहार मिलन का, सारे रंग लगा देना ।
हिन्दु मुस्लिम गले है मिलते, उत्सव न्यारा लगता है ।।
© बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 2
बहर -212 , 212 , 212 ,212
काफियाँ -आन
रदीफ -है
चंद पैसो मे बिकता ये ईमान है ।
लोग इसमें समझते क्यूँ शान है ।।
प्यार के नाम पर बस छलावा दिखा ।
हो रहा हीर राँझा का अपमान है ।।
क्या हुऐ आज नेता बताये किसे ।
हर गली हो रहा सच का बलिदान है ।।
खो रही संस्कृति सादगी सभ्यता ।
आज नंगे बदन का ही सम्मान है ।।
मंदिरो में कहाँ अब ईश्वर है रहे ।
फिर भी देते वही पर सब दान है ।।
मस्जिदो में खुदा आज बंदी बना ।
कर खुदा पर रहे बंदे अहसान है ।।
भूख उसकी मिटाओ जो भूखा दिखे ।
फिर खुदा आप पर खुद मेहरबान है ।।
लड़ रहे मंदिरो मस्जिदो के लिऐ ।
राम का दूसरा नाम रहमान है ।।
आज सिक्को में बिकता है जग देखिऐ ।
हाथ जिसके है पावर वो दीवान है ।।
दुख करो मत कभी जिन्दगी मे सनम ।
हमसाथी के पास खुशियो का सामान है ।।
बोल मीठे ही *साथी* सदां बोलना ।
बोल कड़वे से मिलता कहाँ मान है ।।
© बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 3
बहर-212,212,212,212
काफियाँ -आ
रदीफ-पड़ा
प्यार करना हमें तुमसे मँहगा पड़ा ।
जेब का खर्च सारा ही भरना पड़ा ।।
जिदंगी में थी आयी दिवाली लगी ।
आज मेंरा दिवाला है निकला पड़ा ।।
सीदा सादा था मार्ग प्रिये प्यार का ।
नाज नखरो से सपनो में रोना पढ़ा ।।
सोचता हूँ बचा लू मैं पैसे अभी ।
आयी जी. एस. टी. है तबसे सूखा पड़ा ।
आज बरबाद होकर खड़ा सामने ।
फिर भी मुँह तेरा ये क्यो है लटका पड़ा ।।
खर्च तूने किया इतना जानू मेरा ।
तेरे श्रंगार पर मुझको बिकना पड़ा ।।
प्यार तुमसे करू या तुम्हे छोड़ दू ।
आज संशय में *साथी* बिचारा पड़ा ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 4
बहर -2122 , 1212 , 22
काफिया - आब
रदीफ - होती है
जिंदगी इक किताब होती है ।
खूबसूरत जबाब होती है ।।
आईने पर यकींन कर लेना ।
हर कली ही गुलाब होती है ।।
प्यार मिलता नही यहाँ सच्चा ।
हुश्न जग में शबाब होती है ।।
मत पियो जाम मँहगा है यारो ।
इससे तबियत खराब होती है ।।
नैन तुमसे मिले है अब शामें ।
बिन पिये बेहिसाब होती है ।।
आदते गम भुलाने की सीखो ।
यादें मीठा ही ख्वाब होती है ।।
आज *साथी* चले आओ दिल में ।
कब मुहब्बत हिसाब होती है ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 5
बहर-2122 1212 22
काफियाँ- ईर
रदीफ- बनता है
प्यादा जब भी वजीर बनता है ।
देख लेना नजीर बनता है ।।
तोड़ डाली कमर गरीबी ने ।
कौन वरना फकीर बनता है ।।
जो मिला है सबक अमल करना ।
कौन वरना कबीर बनता है ।।
बिछ रही है बिसात धोखे की ।
राजनेता अमीर बनता है ।।
क्यो किया है गुरूर काया पर ।
माँस से ही शरीर बनता है ।।
जी रहे आज किस वहम में हो ।
दूध फटकर पनीर बनता है ।।
सत्य असहाय सा खड़ा दिखता ।
झूठ हरदम अबीर बनता है ।।
देख लो सरहदो को अब *साथी* ।
प्यार से कब जमीर बनता है ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 6
बहर-1222 ,1222 ,122
काफियाँ- आ
रदीफ- दो
लगे जो हमसफर अपना पता दो ।
पकड़कर हाथ थोड़ा सा दबा दो ।।
नशे में झूमने का शौक जिनको ।
पता मत पूछना उनको पिला दो ।।
पहनकर बैठते जामा सियासी ।
हकीकत से उन्हे वाकिफ करा दो ।।
बने बैठे है जो गामा फिरोजी ।
बिना पूछे सिरो को अब उडा़ दो ।।
गरीबों की बनी है ठंड दुश्मन ।
बदन पर आज तुम कम्बल उढ़ा दो ।।
मिटा दो आज नफरत को दिलो से ।
सभी का धर्म हो भारत सिखा दो ।।
नशे *साथी* बुरे सब छोड़ देना ।
युवा तस्वीर भारत की सजा दो ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 7
बहर-212 , 212 ,212
काफियाँ - आना
रदीफ- नही
बेबसो को सताना नही ।
डूबते को बहाना नही ।।
रूठने की है आदत बुरी ।
रात में अब सताना नही ।।
हाल दिल का तो हम जानते ।
बात हमसे छुपाना नही ।।
ज़िन्दगी से तू लेना सबक ।
दिल किसी का दुखाना नही ।।
आज दिल की ही सुनना *साथी*।
पर किसी को बताना नही ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 8
बहर- 212, 212, 212, 212
रदीफ- कर दिया
काफियाँ- आ
हाथ मेने जो पकड़ा मना कर दिया ।
गैर बाँहो में झूली ये क्या कर दिया ।।
आँख मुझसे कभी भी मिलायी नही ।
डूब आँखो में किसकी भला कर दिया ।।
प्यास मिलने की तुमसे बहुत थी मुझे ।
हमको आँसू दिखा कर विदा कर दिया ।।
आँखो में था बसाया खुशी से सनम ।
अश्क हमको बनाकर दगा कर दिया ।।
प्यार पावन मेरा यार लज्जा नही ।
मेरी चाहत को तुमने जफा कर दिया ।।
मत कराओ कभी अपना दीदार तुम ।
आज सजदे में तुमको खुदा कर दिया ।।
जी नही सकते साथी तुम्हारे बिना ।
जानकर भी हमें क्यूँ जुदा कर दिया ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
डबरा
साहित्यिक नाम- साथी
पिता का नाम- श्री राधाकृष्ण श्रीवास्तव
माता का नाम- श्रीमति मथुरा बाई
जन्मतिथि - 20/08/1976
निवासी- वार्ड. नं. 25 मोती अपार्टमेन्ट के बगल में ठाकुर बाबा मन्दिर के पास डबरा जिला ग्वालियर (म.प्र.)
शिक्षा- बी.काँम, एम.काँम, एल.एल.बी.
पुरूस्कार/सम्मान -वागेश्वरी पुँज अंलकरण ,श्रेष्ठ कलमवीर सम्मान ,जनचेतना मंच बीसलपुर (उ.प्र.)
प्रकाशन विवरण -काव्य नंदिनी मे गीत ,अखबार और पत्रिकाओ गीत कविताओ का प्रकाशन ,sr chenal 84 lndore पर काव्य पाठ प्रसारण 9/6/18 शाम 8.00 बजे
गजल 1
बहर - 22, 22, 22 ,22 ,22 ,22, 22, 2
रदीफ- लगता है ।
काफियाँ- आ
अपने रंग लगाते है तो, दिल को अच्छा लगता है ।
अपने रंग दिखाते है तो, दिल को धक्का लगता है ।।
विष घोले जो मन ही मन मे, बाते मन माफिक करता ।
सच कहने मादा जिसमे क्यो वो झूठा लगता है ।।
जो खाते मेहनत से रोटी, जीवित बस ईमान रखा ।
वे तो भृष्ट दिखे जन जन को , माल्या सच्चा लगता है ।।
देश चलाओ मोदी जी तुम, बहुमत खूब दिया जन ने ।
मँहगाई मे दबती जनता, आज छलावा लगता है ।।
आगे भी सत्ता आऐगी, बस जनता का ध्यान रखो ।
जीत सुनिश्चत है हरदम ही, राहुल बबुआ लगता है ।।
बीबी चाहे कितनी सुन्दर, आँख टिकाते साली पर ।
साली जब घर में आ जाये , मजनू जीजा लगता है ।।
सोच बहूँ की सब जन रखते, बेटी से क्यो डरते हो ।
बेटी चाहे कुछ भी कर ले, बेटा प्यारा लगता है ।।
होली है त्यौहार मिलन का, सारे रंग लगा देना ।
हिन्दु मुस्लिम गले है मिलते, उत्सव न्यारा लगता है ।।
© बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 2
बहर -212 , 212 , 212 ,212
काफियाँ -आन
रदीफ -है
चंद पैसो मे बिकता ये ईमान है ।
लोग इसमें समझते क्यूँ शान है ।।
प्यार के नाम पर बस छलावा दिखा ।
हो रहा हीर राँझा का अपमान है ।।
क्या हुऐ आज नेता बताये किसे ।
हर गली हो रहा सच का बलिदान है ।।
खो रही संस्कृति सादगी सभ्यता ।
आज नंगे बदन का ही सम्मान है ।।
मंदिरो में कहाँ अब ईश्वर है रहे ।
फिर भी देते वही पर सब दान है ।।
मस्जिदो में खुदा आज बंदी बना ।
कर खुदा पर रहे बंदे अहसान है ।।
भूख उसकी मिटाओ जो भूखा दिखे ।
फिर खुदा आप पर खुद मेहरबान है ।।
लड़ रहे मंदिरो मस्जिदो के लिऐ ।
राम का दूसरा नाम रहमान है ।।
आज सिक्को में बिकता है जग देखिऐ ।
हाथ जिसके है पावर वो दीवान है ।।
दुख करो मत कभी जिन्दगी मे सनम ।
हमसाथी के पास खुशियो का सामान है ।।
बोल मीठे ही *साथी* सदां बोलना ।
बोल कड़वे से मिलता कहाँ मान है ।।
© बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 3
बहर-212,212,212,212
काफियाँ -आ
रदीफ-पड़ा
प्यार करना हमें तुमसे मँहगा पड़ा ।
जेब का खर्च सारा ही भरना पड़ा ।।
जिदंगी में थी आयी दिवाली लगी ।
आज मेंरा दिवाला है निकला पड़ा ।।
सीदा सादा था मार्ग प्रिये प्यार का ।
नाज नखरो से सपनो में रोना पढ़ा ।।
सोचता हूँ बचा लू मैं पैसे अभी ।
आयी जी. एस. टी. है तबसे सूखा पड़ा ।
आज बरबाद होकर खड़ा सामने ।
फिर भी मुँह तेरा ये क्यो है लटका पड़ा ।।
खर्च तूने किया इतना जानू मेरा ।
तेरे श्रंगार पर मुझको बिकना पड़ा ।।
प्यार तुमसे करू या तुम्हे छोड़ दू ।
आज संशय में *साथी* बिचारा पड़ा ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 4
बहर -2122 , 1212 , 22
काफिया - आब
रदीफ - होती है
जिंदगी इक किताब होती है ।
खूबसूरत जबाब होती है ।।
आईने पर यकींन कर लेना ।
हर कली ही गुलाब होती है ।।
प्यार मिलता नही यहाँ सच्चा ।
हुश्न जग में शबाब होती है ।।
मत पियो जाम मँहगा है यारो ।
इससे तबियत खराब होती है ।।
नैन तुमसे मिले है अब शामें ।
बिन पिये बेहिसाब होती है ।।
आदते गम भुलाने की सीखो ।
यादें मीठा ही ख्वाब होती है ।।
आज *साथी* चले आओ दिल में ।
कब मुहब्बत हिसाब होती है ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 5
बहर-2122 1212 22
काफियाँ- ईर
रदीफ- बनता है
प्यादा जब भी वजीर बनता है ।
देख लेना नजीर बनता है ।।
तोड़ डाली कमर गरीबी ने ।
कौन वरना फकीर बनता है ।।
जो मिला है सबक अमल करना ।
कौन वरना कबीर बनता है ।।
बिछ रही है बिसात धोखे की ।
राजनेता अमीर बनता है ।।
क्यो किया है गुरूर काया पर ।
माँस से ही शरीर बनता है ।।
जी रहे आज किस वहम में हो ।
दूध फटकर पनीर बनता है ।।
सत्य असहाय सा खड़ा दिखता ।
झूठ हरदम अबीर बनता है ।।
देख लो सरहदो को अब *साथी* ।
प्यार से कब जमीर बनता है ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 6
बहर-1222 ,1222 ,122
काफियाँ- आ
रदीफ- दो
लगे जो हमसफर अपना पता दो ।
पकड़कर हाथ थोड़ा सा दबा दो ।।
नशे में झूमने का शौक जिनको ।
पता मत पूछना उनको पिला दो ।।
पहनकर बैठते जामा सियासी ।
हकीकत से उन्हे वाकिफ करा दो ।।
बने बैठे है जो गामा फिरोजी ।
बिना पूछे सिरो को अब उडा़ दो ।।
गरीबों की बनी है ठंड दुश्मन ।
बदन पर आज तुम कम्बल उढ़ा दो ।।
मिटा दो आज नफरत को दिलो से ।
सभी का धर्म हो भारत सिखा दो ।।
नशे *साथी* बुरे सब छोड़ देना ।
युवा तस्वीर भारत की सजा दो ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 7
बहर-212 , 212 ,212
काफियाँ - आना
रदीफ- नही
बेबसो को सताना नही ।
डूबते को बहाना नही ।।
रूठने की है आदत बुरी ।
रात में अब सताना नही ।।
हाल दिल का तो हम जानते ।
बात हमसे छुपाना नही ।।
ज़िन्दगी से तू लेना सबक ।
दिल किसी का दुखाना नही ।।
आज दिल की ही सुनना *साथी*।
पर किसी को बताना नही ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
गजल 8
बहर- 212, 212, 212, 212
रदीफ- कर दिया
काफियाँ- आ
हाथ मेने जो पकड़ा मना कर दिया ।
गैर बाँहो में झूली ये क्या कर दिया ।।
आँख मुझसे कभी भी मिलायी नही ।
डूब आँखो में किसकी भला कर दिया ।।
प्यास मिलने की तुमसे बहुत थी मुझे ।
हमको आँसू दिखा कर विदा कर दिया ।।
आँखो में था बसाया खुशी से सनम ।
अश्क हमको बनाकर दगा कर दिया ।।
प्यार पावन मेरा यार लज्जा नही ।
मेरी चाहत को तुमने जफा कर दिया ।।
मत कराओ कभी अपना दीदार तुम ।
आज सजदे में तुमको खुदा कर दिया ।।
जी नही सकते साथी तुम्हारे बिना ।
जानकर भी हमें क्यूँ जुदा कर दिया ।।
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
डबरा
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