हिंदी साहित्य वैभव

EMAIL.- Vikasbhardwaj3400.1234@blogger.com

Breaking

बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी' लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी' लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

4:06 am

मुक्तक :- प्रिये कुछ दूरियाँ रख्खो , कोरोना को मिटाना हैं - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर- 1222*4

प्रिये कुछ दूरियाँ रख्खो , कोरोना को मिटाना हैं ।
सबक ये प्यार का पहला , अभी सबको सिखाना हैं ।।
मिटा देगें सभी दूरी , रुको इक्कीस दिन तक बस ।
खिलेंगे फूल पतझड़ में , जमाने को बताना हैं ।।

🌻🌻🌻🌻587🌻🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

4:04 am

ग़ज़ल :- सच्चाई जो हरदम गले लगाता है - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर- 22, 22, 22, 22, 22, 2

सच्चाई जो हरदम गले लगाता है ।
सच मानो इतिहास वही लिखवाता है ।।

लोग कहेंगे शब्द मिटाया जीवन से ।
मीरा तुलसी सा बनकर दिखलाता है ।।

जिसने मजहब और धर्म सेवा माना ।
वो ही बस रसखान यहाँ बन पाता है ।।

जिसने प्रभु पर अपना सब कुछ छोड़ दिया ।
ईश्वर उसको हरदम राह दिखाता है ।।

जिन्दा जिसने रखा जमीर यहाँ अपना ।
बन्दा वही कबीर यहाँ कहलाता है ।।

मीर तकी गालिब की बस्ती ये भारत ।
इश्क मुहब्बत केवल प्रेम सुनाता है ।।

अपना मन अलमस्त किया जिसने *साथी* ।
रब उसके घर खुद ही मिलने आता है ।।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻482🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

4:01 am

भारती की शान लिखो , देश का सम्मान लिखो - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

मनहरण घनाक्षरी
(8,8,8,7 अंत लघु गुरु)

भारती की शान लिखो , देश का सम्मान लिखो ।
एकता *अखंडता* न , मंद होना चाहिए ।।

नारियों को मान मिले , उन्हे स्वाभिमान मिले ।
पुरुषो के अत्याचार , बंद होना चाहिए ।।

वेद का विधि विधान , सभी करे गुणगान ।
हिन्दू राष्ट्र होने में न , संद होना चाहिए ।।

राम का चरित्र सुनो , कृष्ण उपदेश गुनो ।
जीवन का सार गीता , छंद होना चाहिए ।।

🌻🌻🌻🌻🌻 537🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

(संद-दरार, मतभेद)
4:00 am

ग़ज़ल :- दिल के हालात को दिलवर को सुनाया जाये - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर- 2122, 1122 , 1122 ,22

दिल के हालात को दिलवर को  सुनाया जाये ।
दिल हुआ खाक तो फिर छाऱ दिखाया जाये ।।

बेवजह हिचकियाँ यूँ ही न भरा करते है ।
याद करके न उन्हे और सताया जाये ।।

खामियां मत गिनना आज बहकते  दिल की ।
तुम भी बहके तो थे हमसे न छुपाया जाये ।।

ये शराब पीता है बस याद  भुलाने के लिऐ ।
इस शराबी को शराबी  न बताया जाये ।।

प्यार इजहार किया चूँम के खत  होठो से ।
जी़ तो करता उन्हे सीने से लगाया जाये ।।

मिन्नतें करते  हुऐ  भूल गये खुद को ही ।
आँशियां कोई नया और बसाया जाये ।।

प्यार पर लिखते गज़ल क्वा़फी ये उलझते है ।
काँफियाँ फिर से नया कोई बनाया जाये ।।

चाँदनी रात में देखा यूँ कई बार  चमकते *साथी* ।
चाँद को चाँद से इक बार मिलाया जाये ।।

🌻🌻🌻🌻🌻508🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

3:58 am

ग़ज़ल :- यकींन जिन पर हमें बहुत था , वही तो खंजर चला रहे है - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर- 12122, 12122, 12122,12122

यकींन जिन पर हमें बहुत था ,
         वही तो खंजर चला रहे है ।
यकींन जिन पर कभी नही था ,
       वही तो मरहम लगा रहे है ।।

हमें पता ये है उनकी फितरत ,
     छुपी नही है जनाब बिलकुल ।
गले मिले जब थी ईद उस दिन ,
       नज़र ईद पर ही आ रहे है ।।

बहुत जताते थे प्यार हमसे ,
    तभी तुम्हे तो ये दिल दिया था ।
जिन्हे समझते थे चाँद अपना ,
       वही अमावस दिखा रहे है ।।

है प्यार करना खुदा का सजदा,
           इसे इबादत तुम्ही बताते ।
मिजाज किसने तुम्हारा बदला ,
     गुनाह अब क्यो बता रहे हो ।।

नही समझता है प्यार मजहब ,
       नही मानता ये कोई सरहद ।
इन्ही अदाओ पे मर मिटे हम,
       तभी से सपने सजा रहे है ।।

हमें समझते तुम्ही तो *साथी*,
           ये रंग हुश्ने सभी तुम्हारा ।
नही समझते अगर हमें अब ,
    अभी जहां से लो जा रहे है ।। 

🌻🌻🌻🌻475🌻🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

3:55 am

अजब फितरत ये दुनियाँ की , कलम से हम सुनाते है - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर- 1222*4

अजब फितरत ये दुनियाँ की ,
              कलम से हम सुनाते है ।
मिलाते जिसको मिट्टी में ,
               उसे काँधे बिठाते है ।।

 जवानी की यहाँ कीमत ,
            बुढ़ापा आंकलन करता ।
पिता की परवरिश बच्चे ,
                यहाँ खर्चा बताते है ।।

है गैरत मंद ये इन्सां ,
           हकीकत मानता ये कब  ।   
निकल जाती है जब बारिश ,
              तो छाते जंग खाते है ।।

बुलंदी छू रहे उनको ,
                   यही पैगाम दे देना  ।
जड़े मत खोदना उनकी ,
                 तुम्हे आगे बढ़ाते है ।।

रखो विश्वास बस खुद पर ,
              कभी मायूस मत होना ।
हमारे जो करीबी है ,
              वही हमको गिराते है ।।

समझते जिंदगी को जो ,
               यहाँ किरदार के जैसा ।
खुशी उनको मिले या गम ,
               सदा ही मुस्कराते है ।।

रखे इन्सानियत दिल में ,
               इरादे नेक हो जिसके ।
वही *साथी* मुकद्दर का
           सिकंदर बन ही जाते है ।।

🌻🌻🌻🌻🌻489🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो. 9981013061

3:53 am

ग़ज़ल :- परहित में सब सुख मिलता है - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर- 22, 22, 22, 22

परहित  में सब  सुख मिलता है ।
गुणियो का अनुभव कहता  है ।।

पी  लेता    जो   जह्र   द्वेष का  ।
शिव   शंभू   जैसा   बनता   है ।।

हीरा    बनता     है  पत्थर   वो  ।
सदियों  तक जो दुख सहता है ।।

सदियों   तक   वो  याद  रहेगा  ।
संत  कबीरा   जो  लिखता  है ।।

चमक  अटल जी की सब देखो ।
*कुंदन*  भी फीका लगता है  ।।

तुलसी   गुरुनानक   वाणी   से ।
गंगा    में   अमृत    बहता  है  ।।

गीता    और  कुरान  सुनो सब  ।
मेल  मिलाप   तभी  बढ़ता  है ।।

जन्म   मिले  भारत  में   हरदम ।
*साथी* ये  हसरत   रखता है ।।

🌻🌻🌻🌻🌻547🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

3:51 am

ग़ज़ल :- प्यार करना अगर जुर्म दिलवर , आप बेशक सजा दीजिएगा - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर- 212, 212, 212, 2

प्यार करना अगर जुर्म दिलवर , आप बेशक सजा दीजिएगा ।
होठ पर होठ इक बार रख दो , बाद सूली चढ़ा दीजिएगा ।।

खूबसूरत बला यार तुम हो , शाइरी दिल से खुद ही निकलती ।
शाइरी खत की इक बार पढ़ लो , चाहे बेशक जला दीजिएगा ।।

दोष अपना नही उम्र का है , प्यार होता इसी उम्र में है ।
प्यार थोड़ा अगर हमसे है तो , बेझिझक अब बता दीजिएगा ।।

मीर की शायरी सी तू लगती , शेर गालिब के हम भी तो लगते ।
आओ मिलकर गजल हम बनाऐ , फिर इसे गुनगुना दीजिएगा ।।

*पथ* ये मुश्किल भरा लगता फिर भी , चल के इस पर दिखाएंगे जग को ।
फूल से भी लगेगे वो कोमल , चाहे काँटे बिछा दीजिएगा ।।

तुम दुल्हन बन सको गर न मेरी , एक वादा करो आज मुझसे ।
हाथ तेरे हिना जब रचेगी , नाम मेरा लिखा दीजिएगा ।।

बेवफा उसको *साथी* कहे क्यो , प्यार उसने किया ही नही है ।
बस मेरे दोस्त बनकर के रहना , दोस्त को मत भुला दीजिएगा ।।

🌻🌻🌻🌻🌻572🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

3:49 am

ग़ज़ल :- चाँद हो फिर भी रहो औकात में - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर- 2122, 2122 , 212

चाँद  हो  फिर भी रहो औकात  में ।
दाग हर  अच्छा  नही  सौगात  में ।।

जीत धोखे  से मिली क्या जीत हैं

जीत का केवल मजा शह- मात में ।।

दूर  रहना   चाँदनी   से   चाँद  तू ।
चाँद खिलता कब अमावस रात में ।।

आजकल के आशिको को देख लो ।
जैसे  हो  मेढ़क  कई बरसात में ।।

खून नित  इंन्सानियत का हो रहा ।
लाल कहते माँ  मिली  खैरात में ।।

किस  कद़र दौलत  बनी है अब खुदा ।
लोग भूले   आचरण   हर बात में ।।

गुनगुनाते  है  यहाँ  *मच्छर* भी तो ।
क्यो लगे है हम बड़ी आफ़ात में ।।

राह  से *साथी* मत बताओ अब हमें ।
हम  नये  दूल्हे  नही   बारात  में ।।

🌻🌻🌻🌻🌻574🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी" डबरा मो. 9981013061

आफ़ात -मुसीबत

3:47 am

ग़ज़ल :- दिल हमारा आशिकाना हो गया - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर-2122, 2122 , 212

दिल  हमारा  आशिकाना हो गया ।
लोग  कहते  हैं  तराना  हो  गया ।।

क्यो नही ईश्वर खुदा हमको मिला ।
सिर झुकाते तो जमाना हो गया ।।

लूटने  का  काम अब मुश्किल बहुत ।
आदमी अब हर सयाना हो गया ।। 

आज के अखबार चैनल क्या हुऐ  ।
काम केवल सच छुपाना हो गया ।।

छीनते है  खास  ही हक आम का ।
छीनना  भी हक जताना हो गया ।।

नफरते *साथी* बड़ी अब किस कदर ।
आज तो मजहब फसाना हो गया ।।
🌻🌻🌻🌻🌻575🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

3:45 am

ग़ज़ल :- रहे पास वो सादगी छूटती है - बृजमोहन श्रीवास्तव

बहर  - 122*4

रहे  पास  वो  सादगी   छूटती  है ।
उसे  छोड़  दे  जिन्दगी  छूटती है ।।

नही छोड़ सकते है हम *देश* अपना ।
मुहब्बत की अपनी गली छूटती है ।।

विदाई किसे कहते बाबुल से पूछो ।
पहाड़ों  से  जैसे  नदी  छूटती  है ।।

करो इश्क यारो समझ हैसियत को ।
अधर में तभी आशिक़ी छूटती है ।।

नही देखना ख्वाब परियो के बिलकुल ।
जवानी में  ही  ताज़गी छूटती है ।।

मुहब्बत नही उम्र बंधन समझती  ।
बुढा़पे  में  कब शायरी छूटती है ।।

ये मतलब की दुनियाँ लगे मतलबी क्यो ।
कहो  सच नही दोस्ती  छूटती है ।।

धुँआ धुन्ध धोखा सभी एक *साथी* ।
सुनो इनसे कब ज्यादती छूटती है ।।

🌻🌻🌻🌻🌻571🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव
 "साथी"डबरा

बरहमी - गुस्सा , क्रोध

3:43 am

ग़ज़ल :- प्यार ही जिन्दगी नही होती - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर- 2122, 1212 , 22

प्यार  ही   जिन्दगी  नही  होती ।
मान  लो  बन्दगी   नही  होती ।।

मत करो जंग तुम *मुकद्दर* से ।
अच्छी ये   बानगी   नही  होती ।।

दफ्न  बारूद   तो   वही  होता  ।
आग  जिसमें लगी  नही  होती ।।

खूबसूरत  है    वो   गुलाबो  सी  ।
देखकर   दिल्लगी   नही  होती ।।

झूलती   वो   है   गैर   बाहों   में ।
देखना    सादगी    नही   होती ।।

*प्रेम* में सबको भुलाना *साथी* । 
ऐसे    दीवानगी   नही    होती  ।।

🌻🌻🌻🌻582🌻🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

3:42 am

ग़ज़ल :- आप रहते दिल में हरदम उनका ये कहना रहा - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर- 2122, 2122, 2122, 212

आप रहते दिल में हरदम उनका ये कहना रहा ।
था यकीं खुद से भी ज्यादा बात ये सुनता रहा ।।

उसकी आँखो का तरन्नुम दिल ने हरदम ही सुना ।
दिल तभी उसके ही ख्यालो में सदा डूबा रहा ।।

है अजब अहसास यारो प्यार का कैसे कहें ।
खूब तोड़े ख्वाब दिल के फिर भी वो सच्चा रहा ।।

कद्र रिश्तों की नही की इस जवानी जोश में ।
चंद पैसो के लिऐ क्यो आँखो पे  पर्दा रहा ।।

है बदन चंदन का उपवन बात सच सौ फीसदी ।
जो छुआ इक बार उसने उम्र भर महका रहा ।।

रूठना उसको मनाना हर शरारत याद है ।
उसका मिलना या बिछड़ना ये भी तो किस्सा रहा ।।

बीज बोना प्यार के *साथी* *फसल* लहलाएगी ।
काट लेना चाहे जब भी इसमे कब घाटा रहा ।।

🌻🌻🌻🌻🌻584🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
(मो.9981013061)

3:40 am

ग़ज़ल :- कोरोना से बचकर रहना , कैसी शामत आई है - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

22- 22- 22- 22 -22 -22 -22 -2

कोरोना से बचकर रहना , कैसी शामत आई है ।
बचने का आसान तरीका , केवल साफ सफाई है ।।

मास्क बिना घर से मत निकलो , सेनेटाइजर साथ रखो । 
लोगो को भी जागृत करना , सबसे बड़ी भलाई है ।। 

खाँसी सर्दी से बचना है , गरम गरम पानी पीना ।
नही बुखार करो अनदेखा , लेना तुरत दवाई है ।।

इटली चीन ईरान दुखी है , अमरीका इजरायल भी ।
सारा विश्व आज दशहत में , मिलकर करे दुहाई है ।।

लापरवाही मत कर देना , इटली जैसी मत यारो ।
क्या लेगी कोरोना ये , मानी अब सच्चाई है ।।

कोरोना से जंग जीतना , जिम्मेदारी हम सबकी ।
माँस नही सेवन करना है , सबसे बड़ी बुराई है ।।

हाथ जोड़कर करो नमस्ते , हाथ मिलाना मत *साथी* ।
सुगम संस्कृति भारत की ये , जन जन को सुखदाई है ।।

🌻🌻🌻🌻🌻584🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो. 9981013061
3:36 am

ग़ज़ल :- बात कहना कोई मुस्कुराने के बाद - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर-212, 212, 212, 212

बात  कहना कोई मुस्कुराने के बाद ।
लोग मानेगे बीते जमाने के बाद ।।

प्यार *सहयोग* का नाम है दूसरा । 
प्यार होता भी है दिल लगाने के बाद ।।

प्यार है शर्तिया रोग लाईलाज भी ।
ये तो नासूर है भूल जाने के बाद ।।

आजमा लो ये फितरत मिटी कब तलक ।
ढूढते आब वो लौ लगाने के बाद ।।

और कोई नशा इतना सस्ता कहाँ ।
आदमी हर शंहशाह पिलाने के बाद ।।

तुमने पूछा पता किससे घर का मेरे ।
पी रहा और भी डगमगाने के बाद ।।

कुछ मिलेगा नही बात *साथी* सुनो ।
बारिशों  में  पतंगे  उड़ाने के बाद ।।

🌻🌻🌻🌻🌻586🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो. 9981013061
3:33 am

गीत :- कोरोना को आज भगाना ,सबकी जिम्मेदारी - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

मापनी (16,12)

कोरोना को आज भगाना ,सबकी जिम्मेदारी ।
बीमारी मत समझो इसको , संक्रमित महामारी ।।

रखो *दूरियाँ* अपनो से बस , एक बचाव बताया ।
फोन काँल पर बात करो बस , सबने यही सुझाया ।।
साबुन से हाथो को धोना , घर में बारी बारी ।
कोरोना को आज भगाना...........।।

भीड़ भाड़ से दूर रहो अब , मजमा नही लगाना ।
आफत में सब आ जाओगे , बात यही समझाना ।।
मास्क लगाकर मुँह पर रखना , कोरोना पर भारी ।
कोरोना को आज भगाना............।।

अफवाहों पर ध्यान न देना , झूठी बात समझना ।
कोई खबर हो नही प्रमाणित , फारवर्ड मत करना ।।
लाँकडाऊन के पालन से ही , कोरोना है हारी ।
कोरोना को आज भगाना........।।

इटली चीन स्पेन इजरायल , विश्व समूचा हारा ।
कोरोना का अंत सुनिश्चित , होगा भारत द्वारा ।।
वेद सनातन संस्कृति भारत , की दुनियाँ आभारी ।
कोरोना को आज भगाना.........।।


🌻🌻🌻🌻587🌻🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा
मो.9981013061

3:29 am

ग़ज़ल :- भूला न दिल अभी तक , उस प्यार तिश्नगी को - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

बहर-221, 2122 , 221, 2122

भूला न दिल अभी तक , उस प्यार तिश्नगी को ।
सुनना सुनाऐगी बस , वो मेरी ज्यादती को ।।

ये खेल प्यार का है , इसके नियम अनोखे ।
उसने हराया ऐसे , भूले न दिल्लगी को ।।

नफरत परोसना हैं , उनका तो काम हरदम ।
देखो जला न देना , नफरत से आशिकी को ।।

देखा है उसका जलवा , आगोश में ठहरकर ।
कातिल अदा लगाती , है आग चाँदनी को ।।

अफसोस रहा हरदम , इतना सा बस कहे क्या ।
हम थे खुली किताबे , वो पढ़ न पाए हमीं को ।।

जिसको था हमने समझा , समझे न वो तो अब तक ।
जिसने हमें था समझा , समझे न हम उसी को ।।
 
हमको बताते शायद , रखते न बात दिल में ।
दे देते जान *साथी* , रखते न हम कमी को ।।

🌻🌻🌻🌻🌻588🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

3:26 am

ग़ज़ल :- उनके ऊपर दुनियाँ हमने वारी है - बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी'

बहर- 22-22-22-22-22-2

उनके ऊपर दुनियाँ हमने वारी है ।
वो बस समझे ये तो दुनिया दारी है ।।

हाल बुरा  तस्वीरों  का हमने देखा ।
दीवारों  पर लटकी  वो बेचारी है ।।

जान फँसी है आफत में अपनी यारो ।
उनको दिखती कब अपनी खुद्दारी है ।।

दूर खड़े होकर हम पर हसते हो क्यो ।
बिन देखे रहना भी तो बीमारी है ।।

यौवन की बारुद लिऐ क्यो फिरते हो ।
दूर रहो हम भी रखते चिंगारी है ।।

एक शगूफा मानो है बिलकुल सच्चा ।
किस्मत के आगे मेहनत कब हारी है ।।

अहसास करा दो मुझको मेरे होने का ।
सुन रख्खी तेरी *साथी* फ़नकारी है ।।

🌻🌻🌻🌻🌻592🌻🌻
कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

शुक्रवार, 11 मई 2018

2:58 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी' की कुछ ग़ज़लें

नाम- बृजमोहन श्रीवास्तव
साहित्यिक नाम- साथी
पिता का नाम- श्री राधाकृष्ण श्रीवास्तव
माता का नाम- श्रीमति मथुरा बाई
जन्मतिथि - 20/08/1976
निवासी- वार्ड. नं. 25 मोती अपार्टमेन्ट के बगल में ठाकुर बाबा मन्दिर के पास डबरा जिला ग्वालियर (म.प्र.)
शिक्षा- बी.काँम, एम.काँम, एल.एल.बी.
पुरूस्कार/सम्मान  -वागेश्वरी पुँज अंलकरण ,श्रेष्ठ कलमवीर सम्मान ,जनचेतना मंच बीसलपुर (उ.प्र.)
प्रकाशन विवरण -काव्य नंदिनी मे गीत ,अखबार और पत्रिकाओ गीत कविताओ का प्रकाशन ,sr chenal 84 lndore पर काव्य पाठ प्रसारण 9/6/18 शाम 8.00 बजे

गजल  1
बहर - 22, 22, 22 ,22 ,22 ,22, 22, 2
रदीफ- लगता है ।
काफियाँ- आ

अपने रंग लगाते है तो, दिल को अच्छा लगता है ।
अपने रंग दिखाते है तो, दिल को धक्का लगता है ।।

विष घोले जो मन ही मन मे, बाते मन माफिक करता ।
सच  कहने  मादा जिसमे  क्यो  वो  झूठा  लगता  है ।।

जो  खाते  मेहनत  से रोटी,  जीवित  बस  ईमान रखा ।
वे तो भृष्ट दिखे जन जन को , माल्या सच्चा लगता है ।।

देश चलाओ मोदी जी तुम, बहुमत खूब दिया जन ने ।
मँहगाई  मे  दबती जनता, आज  छलावा  लगता  है ।।

आगे भी सत्ता आऐगी, बस  जनता  का ध्यान रखो ।
जीत सुनिश्चत है हरदम ही, राहुल बबुआ लगता है ।।

बीबी चाहे कितनी सुन्दर, आँख  टिकाते  साली पर ।
साली जब घर में आ जाये , मजनू जीजा लगता है ।।

सोच बहूँ की सब जन रखते, बेटी  से  क्यो  डरते हो ।
बेटी  चाहे  कुछ  भी  कर  ले, बेटा  प्यारा  लगता है ।।

होली  है  त्यौहार  मिलन  का,  सारे  रंग  लगा  देना ।
हिन्दु मुस्लिम गले है मिलते, उत्सव न्यारा लगता है ।।

© बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल 2
बहर -212 , 212 , 212 ,212
काफियाँ -आन
रदीफ -है

चंद पैसो मे  बिकता ये  ईमान है ।
लोग इसमें समझते क्यूँ शान है ।।

प्यार के नाम पर बस छलावा  दिखा ।
हो  रहा  हीर  राँझा  का  अपमान  है ।।

क्या  हुऐ  आज  नेता  बताये  किसे  ।
हर गली हो रहा सच का बलिदान  है ।।

खो रही संस्कृति सादगी सभ्यता ।
आज नंगे बदन का ही सम्मान है ।।

मंदिरो  में  कहाँ  अब  ईश्वर  है   रहे  ।
फिर  भी  देते  वही  पर  सब  दान है ।।

मस्जिदो में खुदा आज बंदी बना ।
कर खुदा पर रहे बंदे अहसान है ।।

भूख उसकी मिटाओ जो भूखा दिखे ।
फिर खुदा आप पर खुद मेहरबान है ।।

लड़ रहे मंदिरो मस्जिदो के लिऐ ।
राम का दूसरा  नाम  रहमान है ।।

आज सिक्को में बिकता है जग देखिऐ ।
हाथ जिसके है पावर वो दीवान है ।।

दुख  करो  मत कभी  जिन्दगी  मे  सनम ।
हमसाथी के पास खुशियो का सामान है ।।

बोल मीठे ही *साथी* सदां बोलना ।
बोल कड़वे से मिलता कहाँ मान है ।।

© बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"          
   
गजल    3
बहर-212,212,212,212
काफियाँ -आ
रदीफ-पड़ा

प्यार करना हमें तुमसे मँहगा पड़ा ।
जेब का खर्च सारा ही भरना पड़ा ।।

जिदंगी  में  थी  आयी दिवाली लगी ।
आज मेंरा दिवाला है निकला पड़ा ।।

सीदा  सादा  था  मार्ग  प्रिये   प्यार  का ।
नाज  नखरो  से  सपनो  में  रोना  पढ़ा ।।

सोचता   हूँ   बचा  लू   मैं   पैसे  अभी ।
आयी जी. एस. टी. है तबसे सूखा पड़ा ।

आज   बरबाद   होकर   खड़ा   सामने ।
फिर भी मुँह तेरा ये क्यो  है लटका पड़ा ।।

खर्च  तूने  किया  इतना  जानू  मेरा ।
तेरे श्रंगार पर मुझको बिकना पड़ा ।।

प्यार  तुमसे  करू  या  तुम्हे  छोड़  दू ।
आज संशय में *साथी* बिचारा पड़ा ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल  4
बहर -2122 , 1212 , 22
काफिया - आब
रदीफ - होती है

जिंदगी इक  किताब  होती  है ।
खूबसूरत   जबाब   होती   है ।।

आईने  पर  यकींन  कर  लेना ।
हर कली ही  गुलाब  होती है ।।

प्यार मिलता नही यहाँ सच्चा ।
हुश्न  जग  में शबाब  होती  है ।।

मत पियो जाम मँहगा है यारो ।
इससे तबियत खराब होती है ।।

नैन  तुमसे मिले  है  अब  शामें ।
बिन  पिये  बेहिसाब  होती   है ।।

आदते गम भुलाने की सीखो ।
यादें मीठा ही ख्वाब होती है ।।

आज *साथी* चले आओ दिल में ।
कब मुहब्बत  हिसाब  होती  है ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल 5
बहर-2122  1212   22
काफियाँ-  ईर
रदीफ- बनता है

प्यादा जब भी वजीर बनता है ।
देख  लेना  नजीर   बनता  है ।।

तोड़   डाली  कमर  गरीबी  ने  ।
कौन  वरना  फकीर  बनता  है ।।

जो मिला है सबक अमल करना ।
कौन  वरना  कबीर   बनता   है ।।

बिछ रही है बिसात धोखे  की ।
राजनेता   अमीर   बनता   है ।।

क्यो किया है  गुरूर काया पर  ।
माँस  से  ही  शरीर  बनता  है ।।

जी रहे  आज किस वहम में हो ।
दूध  फटकर  पनीर  बनता  है ।।

सत्य असहाय सा खड़ा दिखता ।
झूठ  हरदम  अबीर  बनता  है ।।

देख लो सरहदो को अब *साथी* ।
प्यार से  कब  जमीर  बनता है ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल 6
बहर-1222 ,1222 ,122
काफियाँ-  आ
रदीफ-   दो

लगे जो हमसफर अपना पता दो ।
पकड़कर हाथ थोड़ा सा दबा दो ।।

नशे में झूमने  का शौक  जिनको ।
पता मत पूछना उनको पिला दो ।।

पहनकर  बैठते  जामा  सियासी ।
हकीकत से उन्हे वाकिफ करा दो ।।

बने  बैठे  है  जो  गामा  फिरोजी ।
बिना पूछे सिरो को अब उडा़ दो ।।

गरीबों  की  बनी  है  ठंड  दुश्मन ।
बदन पर आज तुम कम्बल उढ़ा दो ।।

मिटा दो आज नफरत को दिलो से ।
सभी का धर्म हो भारत सिखा दो ।।

नशे  *साथी*  बुरे  सब  छोड़  देना ।
युवा  तस्वीर  भारत  की सजा दो ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल  7
बहर-212 , 212 ,212
काफियाँ -  आना
रदीफ-  नही

बेबसो  को  सताना नही ।
डूबते  को  बहाना  नही ।।

रूठने की है आदत बुरी ।
रात में अब सताना नही ।।

हाल दिल का तो हम जानते ।
बात  हमसे  छुपाना  नही ।।

ज़िन्दगी से तू लेना सबक ।
दिल किसी का दुखाना नही ।।

आज दिल की ही सुनना *साथी*।
पर  किसी  को   बताना   नही  ।।

कवि बृजमोहन  श्रीवास्तव "साथी"

गजल  8
बहर- 212, 212, 212, 212
रदीफ- कर दिया
काफियाँ- आ

हाथ मेने जो पकड़ा मना कर दिया ।
गैर बाँहो में झूली ये क्या कर दिया ।।

आँख  मुझसे  कभी  भी  मिलायी नही ।
डूब आँखो में किसकी भला कर दिया ।।

प्यास  मिलने  की तुमसे बहुत थी मुझे ।
हमको आँसू दिखा कर विदा कर दिया ।।

आँखो  में था  बसाया खुशी से सनम ।
अश्क हमको बनाकर दगा कर दिया ।।

प्यार  पावन  मेरा  यार  लज्जा  नही ।
मेरी चाहत को तुमने जफा कर दिया ।।

मत  कराओ  कभी  अपना दीदार तुम ।
आज सजदे में तुमको खुदा कर दिया ।।
 
जी  नही  सकते  साथी  तुम्हारे  बिना ।
जानकर भी हमें क्यूँ  जुदा कर दिया ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
डबरा

विशिष्ट पोस्ट

सूचना :- रचनायें आमंत्रित हैं

प्रिय साहित्यकार मित्रों , आप अपनी रचनाएँ हमारे व्हाट्सएप नंबर 9627193400 पर न भेजकर ईमेल- Aksbadauni@gmail.com पर  भेजें.