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बुधवार, 11 अप्रैल 2018

8:43 pm

ग़ज़ल


इंसाँ    छोड़   जाता'   है   निशानियाँ   कभी   कभी।

ख़त्म  शो  हो'  खूब  बजती'  तालियाँ  कभी  कभी ।।


कुछ  अलग  करो  तो  हट  के  बनती  हैं  हमेशा  ही ।

कुछ   ही   लोगों'  की   नई  कहानियाँ  कभी  कभी ।।


धर्म   के   ही'   नाम   पर   शहर   में'   हो   रहे   दंगे ।

तब   इंसानों   की'   होती'   तबाहियाँ   कभी  कभी ।।


अब    गली    में'   शोर   होता'   ही  नही  पढाई'  के ।

बोझ   से   बच्चों   की   खत्म   छुट्टीयाँ  कभी  कभी ।।


जिंदगी  में'  लगता'  है  यहाँ  आ'  के  खो'  ही  जाये ।

यूँ   ही   मिलती   है   हसीन   वादियाँ   कभी   कभी ।।


पहले'  होता  इंतजार  फोन  का  यूँ'  अब  तो'  बस ।

मेरे'  घर   आती  हैं'  उसकी'  चिठ्ठियाँ  कभी  कभी ।।


"अक़्स"  उसका   कोई'  भी  पता  नही  लगा  अभी ।

बंद  रहती' उसके'  घर  की' खिड़कियाँ  कभी कभी ।।


© विकास भारद्वाज

9627193400

बदायूं (उ०प्र०)

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

9:09 pm

गजल- तुम पे ही जां निसार कर लें क्या

आँखों'   से   आँखे'   चार   कर   ले  क्या  ?
तुमपे'    ही    जाँ   निसार   कर   लें  क्या  ?  

रातों'     को    नींद    ही   न  आये   अब  ।
उससे'   दिल   का   क़रार   कर  लें  क्या  ?

नाम      तेरा    लबों    पे     क्या    आया  ।
दिल    को    हम   बेकरार   कर  ले  क्या  ?

प्यार     करना     गुनाह     है     तो    हम ।
ये   ख़ता   सच   में'   यार   कर   लें   क्या  ?

यूं      मिले      हैं     ज़माने     से     धोखे  ।
उसका'    हम    ऐतबार    कर    लें   क्या  ?

इक    नज़र     भर      उसे     देखा    हमने  ।
दिल   को'   फिर    राजदार   कर   लें   क्या  ?
 
यार    क्या     सोचा    वक्त    हैं    रुखसत ।
"अक़्स"  बाहों    को    हार   कर   लें   क्या ?

© विकास भारद्वाज "अक़्स बदायूँनी"
    8 अप्रेल  2018

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

7:55 am

गजल

वफा   की   कसम   वास्ता   दे   कर   गया ।
वजह   वो    न    कोई    बता    कर   गया ।।

वो'  रूठा  किसी  बात   पर   मुझसे'   फिर ।
वो'  हमसे   ही'   हमको   जुदा   कर   गया ।।

जुबाँ    बंद    आँखे    शायद   कुछ    कहे  ।
वो'   यूँ    दो   दिलों   की  सजा  कर  गया ।।

मेरा   दिल    न    जाने   कहाँ    गुम  हुआ ।
कोई    तो    है'   जो   बावरा    कर   गया ।।

मेरे  दिल  की' धड़कन  कहें  अब  कि वो ।
गलतफहमी'    से    फासला   कर   गया ।।
                        
बीती  रात  के  बाद  वो  फिर  न  जाने  क्यूँ ।
शहर    छोड़    मुझको    तन्हा    कर   गया ।।

उसे    शाम    ही   मैं    मिला   था   कि  एक ।
सुबह  "अक्स" खुद  का   खात्मा   कर  गया ।।

© विकास भारद्वाज "अक़्स बदायूँनी"
    4  अप्रेल  2018

बुधवार, 28 मार्च 2018

11:56 pm

गजल

यूं  हम  दोनों' वादा  वफा  का  निभा  दें ।
चलो   जिन्दगी   को  मुहब्बत   बना   दें ।।
मेरी   रूह   है   अब   तुम्हारी   अमानत ।
मुहब्बत  भरा   दिल   तुम्हीं   पे  लुटा  दें ।।

© विकास भारद्वाज
28 मार्च  2018

सोमवार, 8 जनवरी 2018

7:22 am

गजल (47) - झूटी शानो शौकत


नये  जमाने'  का'  अब  हमने'  पैरहन  देखा ।
बड़ा  अजीब  यहाँ  का  रहन  सहन  देखा ।।

वो  शंहशाह  हो'  या  कोई'  रंक  हो  हमने ।
सभी पे चलते समय एक सा ही कफ़न देखा

न  कोई'  अपना'  न  कोई  पराया' लगता है ।
हरेक आदमी' का जब मतलब से मिलन देखा

बिखरती' जिंदगियां झूठी शानो-शौकत में ।
ये'  कैसा'  हमने' शहर का तेरे' चलन देखा ।।

बे-घर किये बूढे' माँ बाप आज बच्चों ने ।
ठिठुरते'  सर्द रातों में पड़े सयन देखा ।।

बहार आती' थी' खिलते  थे फूल बागों में ।
विकास आज वो' उजड़ा हुआ चमन देखा ।।

सयन- नीद्रा,सोना

©विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"
   2 जनवरी 2018

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

2:35 am

गजल- निश्छल आँखे


                       
चला आया बादल उमड़ता हुआ ।      
अम्बर से झमाझम बरसता हुआ ।।
               
कोई आशियाना भी था कल यहाँ ।
चमन आज ये कैसा उजड़ा हुआ ।।

किसी की आहें गूंजती हैं शायद ।
दफ़न है कोई राज अरसा हुआ ।।

बिखरते गऐ दिल के अरमाँ मेरे ।
कभी था ये गुलशन महकता हुआ ।।

तुफानी सी लहरो में कश्ती फँसी ।
अभी अपना दरिया है ठहरा हुआ ।।

जिसे देखती "अक्स" निश्छल आँखें ।
फलक पर जैसे चाँद ठहरा हुआ ....।।

© विकास भारद्वाज "अक्स"
27 दिसम्बर 2017

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

5:50 am

गजल

आपको जबसे दिल में बसाने लगे ।
फिर नये गीत हम गुनगुनाने लगे ।।

चाँद उतरा बिखरने लगी चाँदनी ।
प्यार तुमसे हुआ वो बताने लगे ।।

कर दिया आपके इश्क ने फिर नशा ।
बिन पिये आज हम लडखडाने लगे ।।
   
जुस्तजू थी मुझे वो अचानक मिले ।
दोस्त हमको गले से लगाने लगे ।।

टूट कर जब बिखरने लगी जिंदगी ।
लोग क्या खूब हमको गिराने लगे ।।

जिंदगी ख्वाब अहसास ए आरजू ।
ये वफा, तुमसे यूँ हम निभाने लगे ।।

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
16 अक्टूबर 2017

शनिवार, 6 मई 2017

10:00 am

गजल

गजल क्र○ 4

तुम्हारे पढे खत जमाना हुआ
मिले बाद वर्षों फसाना हुआ

सताती मुझे याद शामों-सहर
जख़म आज मेरा पुराना हुआ

मुझे देख पलकें झुका के मिली
हमारा सफ़र भी सुहाना हुआ
                  
किये यूँ पराये वफा से मुकर
उसे छोड आँसू बहाना हुआ

कभी इश्क का भी चढा था जुनूं
बिछड के कही ना ठिकाना हुआ

विकास भारद्वाज "सुदीप"
04/05/2017

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

12:54 am

गजल:- इरादा जो किया उसको मुझे अब दिखाना है

गजल क्र○ 3

बह्र- 1222×4
इरादा जो किया उसको मुझे अब दिखाना है
मुहब्बत में मिला गम है वफा यूँही निभाना है
ढहाये जो सितम उसने अभी तक इस मुहब्बत में              
जिगर घायल हुआ मलहम उसे ही अब लगाना है
अगर उसको तर्के-उल्फत फ़साना था मुहब्बत में
जुदा होके सहर संगदिल-फरेबी को भुलाना है
बिछड जाओ बहारेँ भी कही होगी मुहब्बत में
उसी से प्यार है हमको गले उसको लगाना है ।
वो खुद ही चाँद है श्रृंगार की उसको जरूरत क्या
मुझे तो अब तुम्हारे खत कलम-ए-खूं लिखाना है
यही सोच ले डूबेगी उसे खुद पे गुमाँ रहा
मुझे तो अब सनम तन्हा सोच अश्कों को बहाना है
चलो उससे नया दर्द मिला हमदम खुशी से अब,,
नहीं कल हो ज़िंदा हमको खुदा के पास जाना हैं,,
©विकास भारद्वाज "सुदीप"

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

6:12 am

गजल:- मुहब्बत लुटाने के दिन आ रहे है

गजल क्र○ 2

मुहब्बत लुटाने के दिन आ रहे है
नजर को चुराने के दिन आ रहे है
तुम्हारी निगाहें मुण्डेरे पे अटकीं
कबूतर उडाने के दिन आ रहे है
तुम्हारा बदन पैरहन ये गुलाबी
अदाऐं दिखाने के दिन आ रहे है
खतों से खुलासा हुआ है तुम्हारे
कि डोली सजाने के दिन आ रहे है
सितारें जमीं पे सुदीप ले उतारो
उन्हें आजमाने के दिन आ रहे है
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
9627193400           28 मार्च 2017

सोमवार, 27 मार्च 2017

4:14 am

गजल :-तुम्हारे सितम को सहन कर रहा हूँ

गजल क्र○ 5

तुम्हारे सितम को सहन कर रहा हूँ
जिगर का तलातुम दफन कर रहा हूँ
नशीली निगाहों से घायल हुये जब
जखम को छुपाकर कफन कर रहा हूँ
चमन में गुजारे खुशी के हसीं पल
तुझे मैं भुलाने का जतन कर रहा हूँ
तुम्हारे पुराने खतों को जलाकर
सुबह की हवा में मनन कर रहा हूँ
पुराने जखम पर दवा को लगाकर
लिबासे जिस्म को तपन कर रहा हूँ
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
    26 मार्च  2017

बुधवार, 15 मार्च 2017

10:21 pm

गजल:- चाहत ए इश्क

गजल क्र○ 1

उसको जब मोहब्बत निभानी नही थी
उसको चाहत ए इश्क दिखानी नही थी

बडी मुश्किल से सीखा है तेरे बगैर जीना
इस दिल को मोहब्बत सिखानी नही थी

तुमसे सनम गिले-सिकबे दूर कैसै करे
दिल की हर बात तुमको बतानी नही थी

मुझको शामो-शहर तेरी याद आयेगी
फितरत  जालिम को आजमानी नही थी

जिन्दगी एहसासो की पटरी पर दौडती
वफा की रिवाज शहर में चलानी नही थी

तकिया कही, जुल्फे कही ,वो खुद कही
अब विकास वो आँखों में तरानी नही थी

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
   5/03/2017

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