ग़ज़ल
इंसाँ छोड़ जाता' है निशानियाँ कभी कभी।
ख़त्म शो हो' खूब बजती' तालियाँ कभी कभी ।।
कुछ अलग करो तो हट के बनती हैं हमेशा ही ।
कुछ ही लोगों' की नई कहानियाँ कभी कभी ।।
धर्म के ही' नाम पर शहर में' हो रहे दंगे ।
तब इंसानों की' होती' तबाहियाँ कभी कभी ।।
अब गली में' शोर होता' ही नही पढाई' के ।
बोझ से बच्चों की खत्म छुट्टीयाँ कभी कभी ।।
जिंदगी में' लगता' है यहाँ आ' के खो' ही जाये ।
यूँ ही मिलती है हसीन वादियाँ कभी कभी ।।
पहले' होता इंतजार फोन का यूँ' अब तो' बस ।
मेरे' घर आती हैं' उसकी' चिठ्ठियाँ कभी कभी ।।
"अक़्स" उसका कोई' भी पता नही लगा अभी ।
बंद रहती' उसके' घर की' खिड़कियाँ कभी कभी ।।
© विकास भारद्वाज
9627193400
बदायूं (उ०प्र०)