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प्रदीप तिवारी 'ध्रुव' लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

5:23 am

ग़ज़ल :- तिरी दामन बचाने की ये आदत भी अदावत है - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-1222-1222-1222-1222-मफाईलुन, मफाईलुन, मफाईलुन, मफाईलुन
***   ****   ****   ***   **  **
तिरी दामन बचाने की ये आदत भी अदावत है।
मिला कर जोर से खुलकर तिरी ही बादशाहत है।-01
*
नहीं ले कुछ भी आया है न ले कर कुछ भी जाएगा,
जिया कर बादशाहों की तरह ये ही इबादत है।-02
*
बहुत मसले जहां में हैं न इनकी तू वकालत कर,
मसीहा बन यतीमों का दुआओं से ही राहत है।-03
*
यहीं ज़न्नत यहीं दोज़ख़ किया महसूस जो हमने,
हंसाया कर किसी भी शख़्स की ये ही तो चाहत है।-04
*
नहीं इंसानियत का इल्म भी हांसिल किया जिसने,
यकीं माने खुदा के इस जहां की ये ख़िलाफत है।-05
*
न सीरत और सूरत हो भले,ईमान हो कायम,
अगर ईमान कोसों दूर हट जाती क़यामत है।-06
*
जियें खुलकर सुखनवर की यही तो है निशांदेही,
हंसी चहरा इरादे नेक ही सच्ची अमानत है।-07
***
★★★  ★★★  ★★★  ★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़जलकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.08/01/2020
मो.09589349070
★★★  ★★★  ★★★  ★★

5:22 am

ग़ज़ल :- हवाले आग के गफलत में करते जा रहे वो - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-1222-1222-1222-122
मफाईलुन, मफाईलुन, मफाईलुन, फऊलुन.
***
हवाले आग के गफलत में करते जा रहे वो।
न हो जाएं खुदी नीलाम डरते जा रहे वो।-01
*
अमन की बात करते वो रहे दिल बेरहम रख,
समझ आया हमारे अब हैं फंसते जा रहे वो।-02
*
वहां रख माल होना चाहते क़ाबिज कहीं पे,
सिकंदर की अदाकारी में ढलते जा रहे वो।-03
*
किसी की हैंसियत पर अश्क़  ये अच्छा न होगा,
उन्हीं के खंदकों में आज धंसते जा रहे वो।-04
*
किसी के दौर की बातें मुनासिब तो नहीं अब,
गिराने की है ख़्वाहिश खुद ही गिरते जा रहे वो।-05
*
तमन्ना ये हिला डालें जहां करते मुक़र्रर,
खुदी की हरक़तों में आज घिरते जा रहे वो।-06
*
अदाकारी समझ में आ रही "ध्रुव" की सभी के,
करेंगे चोंट गुपचुप आज,कहते जा रहे वो।-07
*
***   ****   ****  ***  ***  **
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.09/01/2020
मो.09589349070
***  ****  ****  ***  ***  ****
5:21 am

ग़ज़ल :- खुशी का कोई लम्हा याद रखना है - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-1222-1222-1222,
मफाईलुन, मफाईलुन, मफाईलुन.
****  ***  ***  ***  ***  ****
खुशी का कोई लम्हा याद रखना है।
नहीं दिल में कोई फ़रियाद रखना है।-01
*
खुशी के और भी मौके मिलें शायद,
अमानत यार की आबाद रखना है।-02
*
कहीं पे डूबकर यादें सहेजेगे,
हमारी दोस्ती नाबाद रखना है।-03
*
भले हो गैर पर इतना मगर करना,
करे नेकी तो दिल से दाद करना है।-04
*
ख़बर मनहूसियत की ना सुनाए वो,
वज़ह ये है उसे तो शाद करना है।-05
*
सुखाकर खूं वो लिखता शायरी इससे,
हमारा फ़र्ज़ है इरशाद करना है।-06
*
शहीदी का जिसे जामा मिला होगा,
तहेदिल से कि ज़िंदाबाद करना है।-07
***
★★★  ★★★  ★★★  ★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.09/01/2020
मो.09589349070
★★★  ★★★  ★★  ★★★
5:19 am

ग़ज़ल :- रूबरू ना मिल सकें तो काल होना चाहिए - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-2122-2122-2122-212
अर्कान-फाइलातुन,फाइलातुन
,फाइलातुन,फाइलुन
***   ***   ***  ***   ***   ***
रूबरू  ना  मिल  सकें  तो काल होना चाहिए।
बात का इक सिलसिला हर हाल होना चाहिए।-01
*
हाय कोई शख़्स कैसे यार बिन भी रह सके।
दौर लम्बा गर चले बदहाल होना चाहिए।-02
*
हो रक़म ज़्यादा भले कम फ़र्क इससे है नहीं,
इश्क़ 
पर मुहब्बत से नहीं कंग़ाल होना चाहिए।-03
*
चाहतें हो ग़र किसी से तो चले फिर सिलसिला,
ग़र न मुमकिन इश्क़ का ये जाल होना चाहिए।-04
*
मानिए भी यार है पर दूरियां भी वो रखे,
हरक़तें ये आंख अपनी लाल होना चाहिए।-05
*
ये उन्हें पैगाम है "ध्रुव" दूरियां ही अब रखें,
ये न कोई दोस्ती जंजाल होना चाहिए।-06
***   ***   ***
★★★★★★★★★★★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.12/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:16 am

★★★गीत-अंजुरी भर★★प्रदीप ध्रुव★


भावनाओं ने कहा तो अंजुरी भर गीत ले कर आ रहे हम।
विघ्न भी हैं सघन राह में निशिचर खड़े आघात को तम।
*
संगठित निशिचर हुए और भद्रजन में द्वेष है।
बुद्धि का अभिमान अतिशय नेह न अब शेष है।
भावनाएँ शून्य हैं अब वो स्वयंभू बन गये खुद,
बुद्धि का वो आचमन हैं दे रहे अतिशेष है।
दैव होने का है किंचित भाव उनको हो रहा भ्रम।-01
*
इन्द्र सम है आचरण पग हैं भ्रमित पावन बने ग़ुलनाग से।
मेनकाएँ और रम्भा की शरण में प्रेमरस हैं पी रहे अनुराग से।
मिल चुका आशीष सत्ता की शरण में गोद बैठे दिख रहे,
लिख रहे नूतन कथानक स्वर्ग सुख ज्यों खेलते वो फाग से।
चल रहा अनुकूल मौसम जा चुका अब जो रहा कल तक विषम।-02
*
आज प्रतिभा है उपेक्षित गढ़ रहे नूतन नवल प्रतिमान हैं।
नीतिगत मत पूँछिए जो वो कहें तो मानिए इंसान हैं।
टकटकी हम हैं लगाए आश जागी अंजुली भर आचमन की,
दैव समझा मतिभ्रमित खुद को नहीं वो मानते इंसान हैं।
कालजय की राह में वो जा रहे मुझको गिराकर है वहम।-03
*
★★★★★★★★★★★★
स्वरचित कापीराइट गीतकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली, भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.11/12/2019
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:15 am

ग़ज़ल :- तू खुदा तो नहीं पर इनायत किया कर - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-212-212-212-212,2
***
तू खुदा तो नहीं पर इनायत किया कर।
बावफा रह,न कोई बग़ावत किया कर।-01
*
यार है यार मानिन्द रुख चाहिए,
दुश्मनो की न कोई वकालत किया कर।-02
*
ख़ास दिखता रहा ख़ास वो है नहीं,
अर्ज़ उससे करें, ना अदावत किया  कर।-03
*
तू फ़रेबी हुआ और मक्कार भी
भूल कर यार से ना अदालत किया कर।-04
*
आसमाँ की तरह हौसला हो भले,
रह अदब से,नहीं तू जलालत किया कर।-05
*
यार ने रख यकीं मिल्कियत सौंप दी,
ना गला.घोंट ना ही खयानत किया कर।-06
***
★★★★★★★★★★★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.19/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:14 am

ग़ज़ल :- लिफाफा बंद उनके नाम का पैगाम लिक्खा है - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-1222-1222-1222-1222,मफाईलुन×4
***  ***  ***  **   ***   **  **
लिफाफा बंद उनके नाम का पैगाम लिक्खा है।
खयालो में वही आते सुबह से शाम लिक्खा है।-01
*
हुई थी दोस्ती इक दिन निहायत हादसे माफिक़,
वही था दौर इस दिल में तिरा ही नाम लिक्खा है।-02
*
अमानत छोड़ मेरे पास दिल की भूल वो बैठे,
वो ले जाएं किराए बिन,भी है आराम लिक्खा है।-03
*
जलाते हैं चरागा नाम से जिनके वो क्या जानें,
इबादत भी करें उनकी ज़रूरी काम लिक्खा है।-04
*
ग़ुनाहों में नहीं ग़र ख़ास भी माना किसी को तो,
मिरे दिल में कि उनका नाम चारों धाम लिक्खा है।-05
*
करें बेइंतहा भी इश्क़ ये उसको पता भी हो,
पता मेरा सुनो अब यार "ध्रुव" गुमनाम लिक्खा है।-06
*
★★★★★★★★★★★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.20/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:12 am

ग़ज़ल :- उनकी दुकां हुई जो बंद ये सवाल है - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-221-212-221-212-12/
मफ़ऊल,फाइलुन, मफऊल,फाइलुन,फआ,

उनकी  दुकां  हुई  जो बंद ये सवाल है।
इस बात के लिए ही मुल्क़ में बवाल है।। 
*
जिस बात का वो माइना ही जानते नहीं,
उसकी ख़िलाफ़तो में हैं ये तो कमाल है।-02
*
हिन्दू मुसलमां बीच नफरत के बीज बो,
हासिल करेंगे कुर्सियां असली ये हाल है।-03
*
ये मुल्क़ भी जले मगर उसका निज़ाम हो,
इस वास्ते ही हो रहा सारा बवाल है।-04
*
सामंतवाद फिर चले वो इस फ़िराक़ में,
ज़म्हूरियत हटा के लूट का ख़याल है।-05
*
जो राजशाही छिन गई तो हांथ मल रहे,
वो अब भी कह रहे कि मुल्क़ उनका माल है।-06
*
उनकी लगाई आग में ये मुल्क़ जल रहा,
ताज़ुब है रत्ती भर नहीं उनको मलाल है।-07
*
★★★★★★★★★★★★
स्वरचित,कापीराइट,शायर, प्रदीप
ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.22/01/2020
मो.9589349070
★★★★★★★★★★★★
5:11 am

★★गीत-प्रीति न कीजिए★★ प्रदीप ध्रुव


प्रीति न कीजिए,है अदावत बहुत।
प्रीति है अब सियासी बग़ावत बहुत।
*
मुख में अमृत है,दिल में ज़हर जो भरा।
खोट वाले हैं मिलते,न मिलता खरा।
अब कहीं नहिं मिलेगी शराफत बहुत।
प्रीति है अब सियासी बग़ावत बहुत।-01
*
आज मिलते बहुत जो दग़ाबाज़ हैं।
काक हैं गिद्ध हैं वो कहें बाज़ हैं।
आचरण से कहें है शिकायत बहुत।
प्रीति है अब सियासी बग़ावत बहुत।-02
*
जो मिले लूट लें,ऐसे बटमार हैं।
कालनेमि के वो तो कि अवतार हैं।
नहिं करे छलियों से हम शराफत बहुत।
प्रीति है अब सियासी बग़ावत बहुत।-03
*
★★★★★★★★★★★★
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.24/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:10 am

★गीत-लहरा लो तिरंगा प्यारा★प्रदीप ध्रुव


तिरंगा पे हुए क़ुर्वान, शहीदों की अमानत है।
तिरंगा प्यारा लहरा लो,नहीं करना बग़ावत है।
*
न जाने कितनी माताओं की गोद भी हुई सूनी।
सुहागें उजड़ी बहनों की,गम बरसात भी दूनी।
शहीदों ने दी आज़ादी, हमें रखना सलामत है।
तिरंगा प्यारा लहरालो,नहीं करना बग़ावत है।-01
*
हुए आज़ाद पर इस मुल्क़ की बाहें कटी फिर जब।
सभी रोयें थे जब उन्मादियों में हवस आई तब।
लुटी थी लाज़ अपनों से,तो फिर रोई शहादत है।
तिरंगा प्यारा लहरालो,नहीं करना बग़ावत है।-02
*
कटे सर लाश रेलों में,पेशावर से इधर आई।
लिखा आज़ादी का तोहफ़ा,नहीं उनको शर्म आई।
चुकाया मोल है जिसका,उस आज़ादी से राहत है।
तिरंगा प्यारा लहरालो,नहीं करना बग़ावत है।-03
*
नहीं कोई था मज़हब तब कहलाते थे बलिदानी।
लड़ी थी ज़ंग़ मिलकर तब, नहीं की कोई नादानी।
बहे आंसू थे बलिदानों से,लेकिन दूर आफ़त है।
तिरंगा प्यारा लहरालो, नहीं करना बग़ावत है।-04
***
★★★★★★★★★★★★
स्वरचित,कापीराइट,गीतकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.25/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:08 am

ग़ज़ल :- बवंडर लग रहा होगा ये इम्तेहान थोड़ी है - प्रदीप ध्रुव


बवंडर लग रहा होगा ये इम्तेहान थोड़ी है।
उसे भी तो पता होगा कि वो नादान थोड़ी है।-01
*
हुआ था कल जो बंटवारा उसी का है नतीज़ा ये,
हमारा है रहेगा भी ये पाकिस्तान थोड़ी है।-02
*
बहाकर खूं मिला हमको शहीदों की अमानत ये,
ये हिन्दोस्ताँ हमारा लूट का सामान थोड़ी है।-03
*
वहम कोई नहीं पाले मिलेगा एक क़तरा भी,
न मुमकिन है किसी हालात पे आसान थोड़ी है।-04
*
किसी फ़िरकापरस्ती से दफ़ा इक मुल्क़ बंट जाए,
जो पूरा हो सके ऐसा कि ये अरमान थोड़ी है।-05
*
किसी शैतान का पैगाम तामीली में आ जाए,
जहां मे ये नहीं मुमकिन भी वो भगवान थोड़ी है।-06
****
★★★  ★★★  ★★★ ★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
दिनाँक.25/12/2019
मो.09589349070
★★★  ★★★  ★★  ★★★
5:07 am

गीत-उपवन और झरने - प्रदीप ध्रुव


***
गीत उपवन और झरने नदी बह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।
*
पीर है इक सदी की जो संभाब्य है।
ये तो वृत्तांत लघु में महाकाव्य है।
गीत सुर में जो ढलती मचलती हुई,
गीत वो धूप और स्वेद का काब्य है।
गीत है जो ब्यथा ज़िन्दगी सह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।-01
*
गीत अल्लढ़ मचलती नदी धार है।
गीत केवट की अनुपम वो पतवार है।
जो लगा दे कि उस पार ये ज़िन्दगी,
गीत वो सौम्य नाविक की मनुहार ही।
काब्य की धार उर में है जो बह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।-02
*
गीत जो जो किला लाल बिन चल रही।
गीत मज़दूर कवि के हृदय पल रही।
गीत आभार है इस वतन के लिए,
राष्ट्र के भक्त उनके हृदय ढल रही।
अब बचाओ भी मर्यादा जो ढह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।-03
*
गीत कविता का ब्यापार बिल्कुल नहीं।
मात्र प्रियतम का मनुहार भर ये नहीं।
गीत है लोरियाँ माँ की वात्सल्य मय,
गीत जीवन का आसार भर ये नहीं।
ये सदृश जो विहंगम सरित बह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।-04
*
गीत टूटे हुए दिल का आसार है।
सुख की अनुभूति का गीत आगार है।
जो चरम कल्पनाओं में हो अग्रसर,
सृष्टि और ज़िन्दगी का परम सार है।
गीत है अस्मिता उर में जो रह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।-05
***
★★★  ★★★  ★★★  ★★
स्वरचित,कापीराइट,गीतकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.27/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:06 am

ग़ज़ल :-ग़रीबों पे ग़ज़ल है ये निहायत दास्तां उनकी - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-1222×4,मफाईलुन×4
***
ग़रीबों पे ग़ज़ल है ये निहायत दास्तां उनकी।
बयां करते फटेहालात जो है खामखां उनकी।-01
*
यतीमों पे ग़ज़ल है तो उन्हीं के नाम से होगी,
न हो क्यों ये हिफाज़त भी करे वो बागवां उनकी।-02
*
यतीमों ने है फरमाया यकीं उनको खुदा पे है,
दुआ मांगे न चाहत में रहा है आसमां उनकी।-03
*
बड़े ईमान वाले हैं खुदा कहता यही बहतर,
गिला इस बात की ना कद्र कर पाए जहां उनकी।-04
*
ग़ुमां पाले जमाना "ध्रुव"नहीं कुछ संग में जाना,
रुकी सांसें नहीं फिर काम आती है फ़िजां उनकी।-05
***
★★★★★★★★★★★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.28/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:05 am

ग़ज़ल :- ये प्यार भी मुक़म्मल मिलता नहीं सभी को - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-2212-1222-2121-22
***
ये प्यार भी मुक़म्मल मिलता नहीं सभी को।
चाहत खिला हुआ ग़ुल  मिलता नहीं सभी को।-01
*
बेज़ार हो चला वो गम की तपिश हुई जब,
रौशन हुआ मगर दिल मिलता नहीं सभी को।-02
*
आशिक़ रहा फ़िजां का इंसानियत नहीं की,
गम है मिला मुसलसल मिलता नहीं सभी को।-03
*
आना बहार थी पर गम की तपिश मिली है,
मानिन्द उनके भी फल मिलता नहीं सभी को।-04
*
ये वक़्त भी उठा औ देता उतार सबको,
हों रास्ते ज़ुदा हल मिलता नहीं सभी को।-05
*
आसां नहीं जगह भी दिल में बना सकें हम,
कोई मिला है हरदिल मिलता नहींं सभी को।-06
*
बेखौफ जी सकें "ध्रुव" अरमां रहा सभी का,
सब कुछ रहे मुक़म्मल मिलता नहींं सभी को।-07
***
★★★★★★★★★★★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.29/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:00 am

ग़ज़ल :- जिनके खातिर भी हमने लुटा जान दी - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-2222-1221-2212
***
जिनके खातिर भी हमने लुटा जान दी।
उनने भी तो मुझे मौत आसान दी।-01
*
ये है आसां नहींं दोस्त हरदम रहे,
दोस्त कल का मिटा दे मुझे ठान दी।-02
*
मैं ही पागल रहा यार माना उसे,
उसने दी चोंट मैने मेरी जान दी।-03
*
कब है आया फरेबी किसी काम पे,
उसने ही तो सभी कुछ हलाकान दी04
*
चलते चलते पहुँच है गये मोड़ पे,
उसने तो मार किश्तो में आसान दीँ।-05
*
ऐसा जायज़ नहींं ज़िन्दगी में कभी,
उसने मंदिर में कर्कश भरी तान दी।-06
*
होती आसां नहीं मौत या ज़िन्दगी,
रब ने तक़दीर "ध्रुव" को बियाबान दी।-07
***   ****   ****   ***    *****
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल म.प्र.
दिनाँक.30/01/2020
मो.09589349070
★★★★  ★★★   ★★★★
4:59 am

गीत :-खुशियाँ ज़िन्दगी की - प्रदीप ध्रुव


मात्राभार-14-14
***
खूटियों पर टाँग खुशियाँ,हो गये परिवार के हम।
चैनसुख भूले सभी कुछ,बन मुसाफ़िर ख़ार के हम।
*
भूल हम बैठे स्वयं को,कर्मपथ चलते रहे बस।
त्याग का पर्याय देखा,आँख सब मलते रहे बस।
हम हुए हैं शून्य संग,साक्षवत संसार के हम।
चैनसुख भूले सभी कुछ,बन मुसाफ़िर खार के हम।-01
*
डूबकर संसार में हम,पी रहे सबका जो गम था।
आँसुओं से तरबतर थे,बाँट डाला जो सितम था।
हम बने कर्तव्य पालक,साक्ष्य थे अधिकार के हम।
चैनसुख भूले सभी कुछ,बन मुसाफ़िर खार के हम।-02
*
पर मिला निष्कर्ष ये भी,फल नहीं मिलता यहाँँ छल।
आज में जीते नहीं हम,और है आता नहींं कल।
यत्न नाहक क्यों करें गम,मोहरे ब्यापार के हम।
चैनसुख भूले सभी कुछ,बन मुसाफ़िर खार के हम।-03
*
आचमन पीते रहे हम,संग पिया हमने सितम है।
भाग्य से मिलता रहेगा,दिल में जो आया वहम है।
रात पूनम की अँधेरा,पर तमस में ही रहे हम।
चैनसुख भूले सभी कुछ,बन मुसाफ़िर खार के हम।-04
*
★★★★★★★★★★★★
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.31/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
4:57 am

ग़ज़ल :- यादों के साये ज़िन्दगी ग़ुज़ार लेंगे हम- प्रदीप ध्रुव


यादों  के  साये  ज़िन्दगी  ग़ुज़ार  लेंगे हम।
पहले  जो  हो  गई  ख़ता  सुधार  लेंगे हम।-01

उनपे  दीवानगी   हुई  बेइंतहा  मुझे,
चाहत  है  उनका  प्यार  भी  उधार लेंगे  हम।-02

आवारगी  है  हिज़्र  में  हम  बेखबर हुए,
यादों  में  आपके  ये  दिन  ग़ुज़ार  लेंगे हम।-03

तनहाइयाँ  तो  ज़िन्दगी  में  हमसफ़र   हुईं,
यादों  में  उनका  अक्स  भी  उतार लेंगे  हम।-04

मुमकिन  भले  आसाँ  नहीं  सब बेशुमार  हो,
मंज़िल  न  आए  हाँथ  में  बिसार  लेंगे  हम।-05

ग़ुमनाम  अपनी  ज़िन्दगी  जो  अब  तलक  रही,
कुछ  फूल  भी  रखें  उधार  ख़ार  लेंगे हम।-06

★★★★★★★★★★★★
कवि शायर प्रदीप ध्रुवभोपाली,
भोपाल,दिनाँक.10/06/2019
मो.9893677052/9589349070
★★★★★★★★★★★★

4:55 am

ग़ज़ल :- जब से रुखसत हुआ दिलरुबा नही आया - प्रदीप ध्रुव


जब से रुखसत हुआ दिलरुबा नही आया ।
जाने  क्या कुछ  हुआ  महरवाँँ नहीं आया ।।-01
*
हमने मागा सुकून था उससे मगर वो तो
बदला मौसम कभी कहकशां नहीं आया।-02
*
दे के सपने गया बहुत से मगर अब तक,
वो है ज़ालिम मिरा हमनवां नहीं आया।-03
*
मेरा माशूक दे के तड़प गया जब से,
उसके मानिन्द कोई ज़वां नहीं आया।-04
*
कबसे हाथों हिना सजाई हुई आखिर,
कैसा ज़ालिम मिरा नौज़वां नहीं आया।-05
*
रो के होने लगे अश्क़ "ध्रुव" ख़त्म अब तो,
मेरे दिल का हसीं बागवां नहीं आया।-06
***
****   ****  ***  ***  ***  ***
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.07/02/2020
मो.09589349070
★★★  ★★★  ★★★  ★★
4:53 am

गीत :-प्रेम क्या है - प्रदीप ध्रुव


प्रेम क्या है सुनो साथियों, प्रेयसी का मिलन साज है।
मीरा ने ज्यों किया कृष्ण से,बस वही नेक अंदाज़ है।
*
राग है रागिनी प्रेम स्वर,माँ का वात्सल्य शुचि प्रेम है।
राखियों में पगा प्रेम है,करती वो जो बहन नेम है।
ईश की साधना प्रेम है,मर्म या हम कहें राज है।
मीरा ने ज्यों किया कृष्ण से,बस वही नेक अंदाज़ है।-01
*
भ्रात का प्रेम अनुपम भरत,
लक्ष्मण का वो वनवास है।
जो सखी के मिलन के लिए,मन में जगती हुई आश है।
प्रेम निकले हृदयतल से जो,नेह की एक आवाज है।
मीरा ने ज्यों किया कृष्ण से,बस वही नेक अंदाज़ है।-02
*
प्रेम निर्बल नहीं है सबल,प्रेम तो एक आकाश है।
प्रेम संभावना सिद्धि की,ये भगीरथ की अभिलाश है।
प्रेम जो प्रेयसी के लिए,हद पे जाने का आग़ाज़ है।
मीरा ने ज्यों किया कृष्ण से,बस वही नेक अंदाज़ है।-03
*
बिन बताये जो मन जान ले,प्रेम पावन सा एहसास है।
हो कर जो न घटे फिर कभी,प्रेम मन का ये विश्वास है।
प्रेम का राज हरदम रहा,प्रेम सदियों से था आज है।
मीरा ने ज्यों किया कृष्ण से,बस वही नेक अंदाज़ है।-04
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प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.16/02/2020
मो.09589349070
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4:52 am

गीत :-खुशबुओं की तरह - प्रदीप ध्रुव


खुशबुओं की तरह हम बिखरते रहे,
दिल में सबके मगर हम उतरते रहे।
वक्त के जो थपेड़े पड़े हम पे हैं,
उससे ज़्यादा और हम निखरते रहे।
*
कभी गुल सरीखे सजाये गये,
सजावट  से फिर हम हटाये गये।
कभी दौर था जब रहे अर्श पे हैं,
सरताज़ भी हम बनाये गये।
वही दौर था शेर मानिन्द हम या,
सदर की तरह हम ग़ुज़रते रहे।
वक़्त के जो थपेड़े पड़े हम पे हैं,
उससे ज़्यादा और हम निखरते रहे।-01
*
वक्त बदलाव का नाम है ज़िन्दगी,
ज़िन्दगी ने हमें आजमाया बहुत।
जब रहे अर्श पे तो हँसे भी बहुत,
ज़िन्दगी ने मगर फिर रुलाया बहुत।
हार माने नहीं तय हुई मंज़िलें,
अश्क़ संग और भी हम सँवरते रहे।
वक़्त के जो थपेड़े पड़े हम पे हैं,
उससे ज्यादा और हम निखरते रहे।-02
*
बात ईमान की और अदब संग चले,संग मेरा मुश्किलों नें निभाया बहुत।
कुछ मिले कालनेमि मगर राह पे,
बच निकलते रहे,पर लुभाया बहुत।
जब चले तो चले फिर रुके ही नहीं,देखने को असलियत ठहरते रहे।
वक्त के जो थपेड़े पड़े हम पे हैं,
उससे ज़्यादा और हम निखरते रहे।-03
*
टिमटिमाता दिया जल रहा अनवरत,कोशिसें आँधियों की बुझा न सके।
गर्त में डालने की रहीं कोशिसें,
उनके फन कुचला सर वो उठा न सके।
हम कभी टूटते नाम उसका नहीं,
मेरे अरमां और भी मचलते रहे।
वक्त के जो थपेड़े पड़े हम पे हैं,
उससे ज़्यादा और हम निखरते रहे।-04
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प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.17/02/2020
मो.09589349070
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