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बुधवार, 13 दिसंबर 2017

8:07 pm

"माँ याद तुम्हारी सताती है "


माँ तो बच्चों के लिए खुद को भूल जाती है ।
माँ ही सदा हमें पापा की डाँट से बचाती है ।।
जमाने के ताने - बाने से घबराता मेरा मन,
माँ अब घर से दूर याद तुम्हारी सताती है ।।

माँ से हर मनुष्य के आस्तित्व का आधार है ।
माँ से पल बढ कर बनता जीवों का संसार है ।।
संयम, जीवन-त्याग और ममता की मुरत,
माँ तो इस धरती पर भगवान का अवतार है ।।

अपना ख्याल छोड़ कर परिवार के लिए माँ हर दुख सहती है ।
हम माँ का इंतज़ार करें न करें पर माँ हर पल इंतज़ार करती है ।।
जिसके ममता भरे आँचल को पाने भगवान भी तरस जाते है,
नजर लगें न बच्चों को माथे पर माँ काला टीका रखती है ।।

दुनिया के सब रिश्ते-नातों में सबसे प्यारा रिश्ता माँ का होता है ।
हर झूठे रिश्ते नातों में सुदीप बस सच्चा प्यार माँ का होता है ।।
ठोकर लगने पर रास्ते पर फिर हाथ पकड़ कर सभाँले रखती,
अनजाने में हुई गलती माफ कर दे वो दिल सिर्फ माँ का होता है ।।
   
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
   12 दिसम्बर 2017

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

8:34 am

रिश्तों की संजीवनी में बुजुर्गो की भूमिका

रिश्तों की संजीवनी में बुजुर्गो की भूमिका

रिश्तों की संजीवनी बूटी बन जाते है, हमारे
घर के बुजुर्ग
कांपता हाथ सिर पर रखते ही, रास्तों के पत्थर हटा देते हैं, घर के बुजुर्ग।
हमेशा बुजुर्गों की छत्रछाया में ही महफूज
रहते है हम सब
देकर मशविरा तहजीब का, एक तजुर्बा बन जाते हैं, घर के बुजुर्ग ।।

हमारा हौसला, हमारी ख्वाहिश, ताकत बढाते हैं, घर के बुजुर्ग
अपने खून पसीने रूपी खाद से सींच कर पल्लवित करते है, घर के बुजुर्ग
गलत व्यवहार से उनके आत्म-सम्मान को ठेस ना देना कभी तुम
कभी होते हम उलझन में, तब प्यार से समझाते है घर के बुजुर्ग ।।

विकास भारद्वाज 'सुदीप'
20 जुलाई 2017

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

6:37 am

गंगा स्वच्छता/नमामि गंगे

विधा-तुकांत
नदियों का नहीं कोई रखवारा
हरा भरा स्वच्छ हो जग सारा
पापियों का हो उद्‌धार जिससे
पवित्र निर्मल बहती गंगा धारा

जन-जन में जब आस जागाएगा,
फिर यूँ गंदगी न कोई फैलाएगा।
जब मुर्दाघाट जब अलग बनेगा
तब कोई लाश नहीं दफनाएगा।

मति मारी छोडते कचरा सारा
नाले में फैक्ट्री का मलबा सारा
कीटाणुओं का संक्रमण फैलता
पवित्र निर्मल बहती गंगा धारा
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
9627193400           10/04/2017

मंगलवार, 28 मार्च 2017

1:50 am

कविता- वो है मेरी प्यारी माँ

मेरे सपनों को सहलाती है माँ
जिद्द करने पर बहलाती है माँ
घर में नये पकवान बनाये जो
वो है मेरी प्यारी माँ।

आँचल की छाँव में रखती है माँ
मेरी चोट पर हल्दी रखती है माँ
घर में सबकी चिन्ता करती जो
वो है मेरी प्यारी माँ।

अपने रोते बच्चों का पलना है माँ
गंगा-जमुना का मीठा झरना है माँ
मेरे रूठने पर प्यार से मनाये जो
वो है मेरी प्यारी माँ

जब नई नई कहानी सुनाती है माँ
दूर होने पर फोन से बुलाती है माँ
शैतानी पर भी डाँटकर हँसाये जो
वो है मेरी प्यारी माँ

अपने दुख को समेटे रखती है माँ
मेरी आँखों में काजल रखती है माँ
अपनी ममता का रस बरसाये जो
वो है मेरी प्यारी माँ।

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
   9627193400          27 मार्च 2017

रविवार, 19 मार्च 2017

1:28 am

उत्तर प्रदेश- "योगी राज" कविता- वीर रस

गुन्डागर्दी बन्द करो,यूपी में जब से जोगी है
भ्रष्टाचार बन्द करो ,यूपी में अब से योगी है ।।
महाराष्ट्र में देवेन्द्र, यूके में त्रिवेन्द्र हुये सिद्ध
संन्यासी के हाथ में सत्ता योगी हुये प्रसिद्ध ।।
यूपी में ज्यादा रोगी है इनका इलाज योगी है
राज्यों में सुशासन है देश में जब से मोदी है ।।
देशद्रोहीयों,चोर-गुन्डों से जनता जब रोती है
हर नाकाम सरकारें अपनी सत्ता तब खोती है ।।

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
   9627193400
 

सोमवार, 13 मार्च 2017

12:14 am

होली/रंग


केसरिया गुलाल अम्बर से बरसा ऐसा पानी
नशीली आँखें गुलाबी गाल हर सूरत हरषानी

देखो छोटू भी भर लाया पिचकारी रंग वाली
गुडिया भी ले आई रंग-बिरंगे रंग की थाली

आया मौसम रंगने का कर दो धरती लाल
देवर ने लगाया भाभी के गालों पर गुलाल

घर-गली में ढम-ढम ढोल बजाते होली पर
होकर मस्त अबीर गुलाल उड़ाते होली पर

हमने भी खेली थी उनके संग उसदिन होली
फिर नही कर पाये उनके संग हँसी ठिठोली

अब तुम बोलो में किसके संग खेलूँ होली
जब सुना है मैनें वो किसी और की होली

जब पीकर भाँग हुडदंग किया इस होली
वो भी खिडकी से झाकनें लगी इस होली

सब मिल मिटा दो मतभेदों को इस होली
प्यारे फूल खिला दो गुलशन में इस होली

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
   9627193400
   13/03/2017

रविवार, 5 मार्च 2017

12:28 am

♡बसंत का मौसम♡

पेडों पर नयी शाखाऐं और फूलों की डाली ,
खेतो मे लहराती सरसो और गेहूँ की बाली
हर तरफ खुशहाली बंसत के मौसम में
हल्की ठंण्क का सुहानी मौसम आ गया ।।

हर तरफ सुर-संगीत लहरमय वीणावादन
माता सरस्वती का संगीतमय अभिवादन ।
पतझड बीता, हर तरफ हरियाली छाई
नर्म हवा, कच्ची धूप का मौसम आ गया ।।

प्रकृति की सुन्दरता से तन मनमोहक हुआ,         बहती नदियाँ,आसमां में बादल छाया हुआ ।
नयी जगह घूमने,बागों में खेलने के दिन आये
रंग-बिरंगी पतंगे उड़ाने का मौसम आ गया ।।

धूप-छाँव के बहाने सूरज धरती को सजाने
अब ऋतुराज को बसंत रंगीन परवेश बनाने
सदाबहार गीत प्रेम के प्रीतम को सुनाने
सुख-सम्रद्धि को बढाने देखो बसंत आ गया ।।

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
01/02/2017

12:25 am

●एक नयी सुबह●


सुबह मंदिर की घंटी आरती की थाली है
सुबह नदी के किनारे सूरज की लाली है
सुबह की ख्वाहिशें शाम तक टाली है,
कुछ इस तरह हमने जिंदगी संभाली है

शमा में इस वहम में सो गये हम परवाने
कहीं आम न हो जाए बात, नींद खोली है
चिडियों की फिजा में प्रेम मधुर वाणी है
उठते हुए सूरज से नजर मिलने वाली है
छुयेंगे आसमां को हम एक रोज देखना है
ये लहूलुहान परिंदे उड़ान जारी रखना है

सूरज की किरणों में हवाओं का बसेरा
खुले इस आसमान मे सूरज का चेहरा
नयी सोच नयी उम्मीद रोशनी लायी है
फिर से नये सपनों का सबेरा लायी है

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
   03 मार्च 2017

12:13 am

मेरे हिन्द देश की संस्कृति

हम भारतीय अपनी संस्कृति से बेहद लगाब रखते है
भारत के उत्तरी कोने से दक्षिणी कोने तक भ्रमण करें तो निस्संदेह भिन्नताओं को देखते हुए यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि ये सब भारत के ही भू भाग हैं । यहाँ का धरातल कहीं पर्वतीय है तो कहीं सपाट, कहीं घने जंगल हैं तो कहीं पठार । भाषा की विविधता भी यहाँ देखने को मिलती है । कुछ प्रदेशों में हिंदी भाषी लोग अधिक हैं तो कुछ में अवधी या फिर मराठी भाषा प्रधान है ।

केवल अशिक्षित ही नहीं अपितु हमारे कथित सभ्य-शिक्षित समाज में भी दहेज का जहर व्याप्त है । प्रतिदिन कितनी ही भारतीय नारियाँ दहेज प्रथा के कारण मनुष्य की बर्बरता का शिकार हो जाती हैं अथवा जिंदा जला दी जाती हैं ।

अंधविश्वास व रूढ़िवादिता जैसी सामाजिक बुराई देश की प्रगति को पीछे धकेल देती है । अंधविश्वास व रूढ़िवादिता हमारे नवयुवकों को भाग्यवादिता की ओर ले जाती है फलस्वरूप वे कर्महीन हो जाते हैं । अपनी असफलताओं में अपनी कमियों को ढूँढ़ने के बजाय वे इसे भाग्य की परिणति का रूप दे देते हैं ।

भ्रष्टाचार भी हमारे देश में एक जटिल समस्या का रूप ले चुका है । सामान्य कर्मचारी से लेकर ऊँचे-ऊँचे पदों पर आसीन अधिकारी तक सभी भ्रष्टाचार के पर्याय बन गए हैं। जिस देश के नेतागण भ्रष्टाचार में डूबे हुए होंगे तो सामान्य व्यक्ति उससे परे कब तक रह सकता है । यह भ्रष्टाचार का ही परिणाम है कि देश में महँगाई तथा कालाबाजारी के जहर का स्वच्छंद रूप से विस्तार हो रहा है ।

हमें ईमानदारी एवं कर्म निष्ठा से कार्य का निरवाहन करना चाहिए सामाजिक कार्यो मे भी सहयोग करना हमारा कर्तव्य है

12:10 am

पहाडो की रानी : नदी

सदियों से पहाडो के बीच बहती हुई,
शांत, सहनशील नदी के सुन्दर नजारे ।
दूर आसमां में छटा बिखेरता चाँद,
फिजा का प्यारा सुहावना रंगीन मौसम ।।
आसमान में टिके हुये चाँद-सितारे,
उस पर सफ़ेद बादलों के नजारे ।
बगुला रखता मछली पर ध्यान,
मनमोहक सा फुहार का मौसम ।।
चहचहाती चिडियाँ,फूलों पर तितली रानी,
मेढक-टिड्डे उछले,बोले कोयल मधुर बाणी ।
चंचल-ए-ठण्डी हवाऐं दिल छू जाये,
खुबसूरत झरना सबके मन को भाये ।।
नदी पर पनहारिन की बातें,पनघट के किनारे,
सुहाने मौसम की सौगातें,झरने के पुरनूर धारे।
काश...तुम साथ होती नदी के किनारे,
साथ बैठ करते मस्ती नदी के किनारे ।।

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
8/01/2017 Sunday

रविवार, 15 जनवरी 2017

6:12 am

♡ अदभुत एहसासों के मोती ♡

जो बिखरे तो फ़िर मुद्दतों बिखरे ही रहे हम,
माला के वो अदभुत मोती,मिले ही नही हमें  ।
दिल की हकीकत के मोतीयों से बने हुए है हम, 
उसके रूखसार पे तिल देख फिदा हुए है हम।।
उसकी कातिल नजरों से घायल होने लगे हम,
चाँद से चेहरे से महफिल में गजब नूर ढहा रहे है ।
रातों में ख्वाबों की दुनिया में हक़ीक़त सी निराली है,
सुना है प्यार की वो खूश्बू अजब सी नियारी  है ।।
मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम
एक दूसरे की याद में अब रोया करेंगे हम ।
आँखो में आंसू छलक सतायेंगे रात भर,
एहसासों के मोती पलक पे पिरोया करेंगे हम ।।
अर्णव=दरिया
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
9627193400                  14/01/2017

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

7:20 am

माता-पिता ही मेरे फरिश्ते

सबक जिंदगी के पल पल सीख रहा हूँ,
माँ मै मंजिल-ए-तमन्नाओ के साथ बड रहा हूँ
जिंदगी के जिन रास्ते पर तलवे मेरे छिल रहे है,
कभी उसी रास्ते पर पिताजी कईयों मील चले थे ।।
तुम जिसे अपने प्यार के पिंजरे मे फँसा बैठी हो,
वो किसी माँ-बाप की उम्मीदों का सहारा होगा ।
मैं अपनी माँ की आँखो का तारा रहा हूँ ,
उनके आँख में आँसू आते ही मेरा अस्तित्व समाप्त होगा ।।
माता-पिता में बस रहें , साक्षात भगवान ।
मन्दिर-मस्जिद ढूँढता , मानव है नादान ।।
बिखरे-बिखरे सपने हुए ,तार-तार विश्वास ।
माँ-बाप को बेटो ने घर से करा दिया वनवास ।।
आजकल देखो घर बँटते नही है, सीधा नये बन जाते है ।
बेकार वस्तुये और माँ-बाप, पुराने घर में रह जाते है ।।
सदा चलेगें जिस पर अपने, मेरे न रहने के बाद ।
अभी विकास इन कदमों से, वो रास्ता बनाना है।।

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सूचना :- रचनायें आमंत्रित हैं

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