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रघुनंदन शर्मा 'दानिश' लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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बुधवार, 1 अप्रैल 2020

9:53 pm

ग़ज़ल :- ये कूचा आज तक महका नही क्या - रघुनन्दन शर्मा "दानिश"

ये कूचा आज तक महका नही क्या
यहाँ  से  वो कभी गुज़रा नही क्या?
 
दरो - दीवार   से    करते    हो  बातें
तुम्हारा  कोई  भी अपना नही क्या?

शजर  के   दिन   गिने  जाने   लगे हैं
शजर पर  कोई  भी  पत्ता नही क्या?

घड़े  में  जूँ  का तूँ  पानी  है अब तक
यहाँ  पर  कोई  भी प्यासा नही क्या?

अँधेरे    को    उजाला   कह   रहे  हो
सिवा  इसके  कोई  चारा  नही  क्या?

गिनाता  है   जो  अहसानों  को अपने
शजर   के  साए  में   बैठा  नही  क्या?
                          रघुनन्दन शर्मा "दानिश"
9:50 pm

ग़ज़ल :- सारा क़र्ज़े हुनर चुका दिया है - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

सारा  क़र्ज़े  हुनर चुका दिया है ।
कूज़ागर ने  दिया  बना दिया है ।।

अय   दरख़्तों  को  काटने  वाले
हम परिंदों को क्यूँ उड़ा दिया है।

इक  नदी   की   ख़मोश लहरों ने
मेरी आँखों  में  पानी ला दिया है।

क्या मैं सचमुच में एक मुजरिम हूँ
मेरे हक़  में  क्यूँ  फ़ैसला दिया है।

गाँव  को  हमसे  क्या तवक़्क़ो थी
शह्र ने  हमको  क्या  बना दिया है।

रात  तू  मुझसे  क्यूँ    हुई   नाराज़
मेरा   साया   कहाँ  छुपा  दिया  है।

#@रघुनंदन शर्मा "दानिश"@#
Raghunandan Sharma Danish
Raghunandan Sharma Danish
9:42 pm

ग़ज़ल :- नदी से कोई भी प्यासा न जाए - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

नदी  से  कोई   भी  प्यासा   न जाए
किनारों  से  अगर  उलझा  न जाए।

ये  माना  बन  चुका  है पुल नदी पर
मगर  मल्लाह  से  उलझा  न  जाए।

समन्दर   की  बस  इतनी  आरज़ू  है
नदी   का    रास्ता   रोका   न  जाए।

चुराकर   ले   गया   है  कोई  मुझको
मिरे   अंदर   मुझे    ढूँढा   न   जाए।

कुछ  इतने  ग़ौर  से  देखो  न  उसको
कि फिर ख़ुद की तरफ़ देखा न जाए।

समझ   लेना   तुम्हारा  दुःख  बड़ा  है
किसी दुःख  में  अगर  रोया  न  जाए।

बिगड़ सकता है  कश्ती  का  तवाज़ुन
किनारे   की   तरफ़   देखा  न   जाए।
                            रघुनंदन शर्मा "दानिश"
9:37 pm

ग़ज़ल :- इसलिए धोके खा रहा हूँ मैं - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

ग़ज़ल :-

इसलिए   धोके   खा  रहा  हूँ मैं
इस  गली  में   नया - नया हूँ मैं।

मुझसे  होकर  नहीं गुज़रते लोग
क्या  कोई   कच्चा   रास्ता हूँ मैं।

तू  जिसे   पा  के   मुतमईन है ना
उसके  दिल   में बसा  हुआ हूँ मैं।

मेरे   होंटो   पे    क़हक़हे   क्यूँ  हैं
क्या  किसी  ग़म में मुब्तला हूँ मैं।

मौत    पीछे   पड़ी    हुई    है  सो
अपना  पैकर  बदल  रहा   हूँ  मैं।

अपने  हाथों  की  ओट  में रखना
आँधियों  से   घिरा   दिया  हूँ  मैं।

इसलिए   बाख़बर   हूँ   लहरों  से
एक  कश्ती  का   नाख़ुदा   हूँ  मैं।

                             ------- रघुनंदन शर्मा "दानिश"
9:35 pm

ग़ज़ल :- हमीं तो डूबे किसी ने डुबोया थोड़ई है - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

ग़ज़ल :-

हमीं  तो  डूबे  किसी   ने  डुबोया  थोड़ई है
ये  सानेहा  है  ख़ुदा  का  इशारा  थोड़ई  है।

किसी का अक्स किसी में तलाश क्या करते
कोई  जहान  में   अपने   इलावा  थोड़ई  है।

अभी  मकान  की चीज़ों  पे  हक़  है मेरा भी
अभी  मकान  से  मुझको निकाला थोड़ई है।

किसे  ये  गिरते   हुए   बामो-दर  नज़र  आएं
कि इस मकां में कोई  आता -जाता थोड़ई है।

जिसे ये दुनिया मिरा कह रही है अब तक वो
नज़र में रहता है  दिल  में  समाया  थोड़ई है।

तुम्हारे  बाद  ज़माने  का  क्या  करें  "दानिश"
हमारा  ख़्वाब  तो  तुम  थे  ज़माना थोड़ई है।
                            #@रघुनंदन शर्मा "दानिश"@#
9:33 pm

ग़ज़ल :- ख़ुद को अगर हरा देता हूँ - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

ख़ुद   को  अगर  हरा  देता  हूँ
समझो इश्क़  निभा सकता हूँ।

कोई   नहीं  दुःख  सुनने  वाला
रोकर  काम    चला   लेता  हूँ।

मुझको   चुप   रहना  आता  है
मैं  भी   शोर  मचा  सकता  हूँ।

दुनिया   वहशी   कह  सकती है
इतनी    ख़ाक   उड़ा   लेता  हूँ।

सब  के  सब  मल्लाह  हैं  इसमें
कैसे   नाव    बचा    सकता  हूँ।

दुनियादारी     सीख     ली   मैंने
अब  मैं  उसको  गँवा सकता हूँ।
                                       रघुनंदन शर्मा "दानिश"
9:31 pm

ग़ज़ल :- किसी को ज़ख़्म दिखाया नहीं बहुत दिन से - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

किसी को ज़ख़्म दिखाया नहीं बहुत दिन से
मज़ाक़ अपना  बनाया  नहीं  बहुत  दिन से।

न जाने  किसकी नज़र लग गई मुसव्विर को
कुई  भी  नक़्श  बनाया  नहीं  बहुत  दिन से।

किसी  के साथ  में  खिंचवा के  तुमने तस्वीरें
हमारे  जी  को  जलाया  नहीं  बहुत  दिन से।

बदन  तक आता है उर आ  के लौट  जाता है
कोई भी  रूह  तक  आया नहीं बहुत दिन से।

मैं  आइना   हूँ   उसे   इल्म   हो   गया  शायद
वो  मेरे   सामने   आया   नहीं  बहुत  दिन  से।
   #@रघुनंदन शर्मा "दानिश"@#
9:28 pm

जो ख़्वाब , ख़्वाब रहे ऐसा ख़्वाब मत देखो - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

जो ख़्वाब , ख़्वाब रहे ऐसा ख़्वाब मत देखो
किसी  चिराग़  में  तुम  आफ़ताब  मत देखो
अभी तो तितली पे नज़रें रखो मियां "दानिश"
अभी  से  जूही   ,चमेली ,  गुलाब  मत  देखो.......

                                     रघुनंदन शर्मा "दानिश"

9:25 pm

ग़ज़ल :- रोशनी थी, तुम थे या ख़ुद मेरा साया ,कौन था - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

रोशनी थी, तुम थे या ख़ुद मेरा साया ,कौन था
 रोज़ मेरे  ख़्वाब में आकर बिखरता कौन था?

      वो तो रग़बत हो गई है नाख़ुदा तुझसे मुझे
   वर्ना तेरी कश्तियों में आता- जाता कौन था?

     मान लूं तेरी कि मैं इक संगदिल हूँ पर बता
   बन के आँसू ये मिरे अंदर पिघलता कौन था?

     शोर सा उट्ठा था मुझमें ख़ामुशी के बावजूद
        मेरे अंदर अय ख़ुदा मेरे अलावा कौन था?

   मुझसे पहले किसको मेरी मंज़िलें हासिल हुईं
         देखना है मेरे पीछे-पीछे चलता कौन था?
                            @# रघुनंदन शर्मा "दानिश"@#

9:22 pm

ये किस मुक़ाम पे ले आई मुझको तन्हाई - रघुनंदन शर्मा "दानिश

ये किस  मुक़ाम  पे  ले आई मुझको तन्हाई
के अपने साथ भी इक पल नहीं रहा जाता।

मैं  तेज़  धूप  में  राज़ी  था  बैठने   के  लिए
वो मेरा  साया  अगर  ओढ़ने को आ जाता।

ये    राहगीर    मिरे    शह्र   का   नहीं  वर्ना
मिरे  मकान  में  पत्थर  तो  फेंकता  जाता।

अब  उसके  लौटने  की  आस छोड़ दी मैंने
अब अपने आप को धोका नहीं दिया जाता।

अगर  मैं    रौशनी   से   क़ुर्बतें   नहीं  रखता
तो  मेरा  साया मुझे  छोड़कर  चला   जाता।

फिर  इक  ख़याल  ने  घुटने पकड़ लिए वर्ना
मैं अपने आप से बाहिर निकल के आ जाता।
                     #@रघुनंदन शर्मा "दानिश"@#
9:19 pm

न जाने कौन था जिसकी तलाश करता था - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

न जाने  कौन  था  जिसकी  तलाश करता था
मैं इक हुजूम में रहकर भी  कितना तन्हा था।

जब अपने आप की मुझको बहुत ज़रूरत थी
मैं अपने  आप से  उस मरहले  पे बिछड़ा था।

अजीब वक़्त  है अब  ख़्वाब में भी आता नहीं
वो एक शख़्स  जो  आँखों में जागा करता था।

न जाने क्या हुआ दरिया  की  शोख़  लहरों को
गुज़िश्ता साल  तो  ये  साहिलों  से  लिपटा था।

चराग़   रक्खा   था    गुमनामी   के    अँधेरे   में
हरेक   सम्त   मगर   रौशनी    का    चर्चा   था।
                         रघुनंदन शर्मा "दानिश"
Raghunandan Sharma Danish
Raghunandan Sharma Danish
9:16 pm

ग़ज़ल :- मेरे आँगन से उजाला क्या गया - Raghunandan Sharma

ग़ज़ल :-

मेरे   आँगन   से  उजाला  क्या  गया
छोड़कर  मुझको  मिरा  साया गया।

मैंने   देखा   था   किसी   को   डूबते
और   मैं   भी    डूबते    देखा  गया।

दोस्त  घर  आया  था  आधी  रात में
मुझसे  दरवाज़ा  नहीं   खोला  गया।

भीड़  से  ख़ुद  को  बचा  लाया था मैं
और   अपने   आप  से   टकरा  गया।

ठीक   से   दिखता   नहीं   पैकर तिरा
तू   मिरे   नज़दीक   इतना  आ  गया।

बादलों   को   है  ख़बर  इस  बात  की
कौन किस दरिया से कब प्यासा गया।
Raghunandan Sharma 

9:13 pm

कुछ तो बोलो के क्या हुआ है दोस्त - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

कुछ तो बोलो के क्या हुआ है दोस्त
बेसबब  कौन   जागता   है   दोस्त।

उसके  सीने  में  क्या  है  इल्म  नहीं
उसके  होंठों  पे  कहकहा  है दोस्त।

रौशनी     शब     से    माँगने   वाले
ये  तुझे  किसका मशविरा  है दोस्त।

नींद    टूटे    न    ये    दुआ    करना
आज  ख़्वाबों  का रतजगा है दोस्त।

चाँद    सूरज       क़रीब     आये   हैं
इश्क़  को  हुस्न   ने  छुआ  है  दोस्त।

तू  है   दुनिया  का  मैं   हूँ   मौला  का
दरमियाँ   अपने   फ़ासला   है  दोस्त।

#@रघुनंदन शर्मा "दानिश"@#
Raghunandan Sharma Danish
Raghunandan Sharma Danish


9:11 pm

डूबने से बचा रहा है मुझे - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

कुछेक अशआर :-

डूबने  से   बचा   रहा    है  मुझे
कोई साहिल  प ला रहा है मुझे।

एक  दरिया   है  मेरी  आँखों  में
एक  सहरा  बुला   रहा  है मुझे।

रूह  से  जिस्म  मुतमइन   है तो
ख़ुद प रोना क्यूँ आ रहा है मुझे।

वस्ल  के  वक़्त  तो  मैं तुझमें था
हिज्र  दुनिया  में  ला रहा है मुझे।

मेरे    जैसी    सदाएँ    लगती   हैं
कोई  मुझसा  बुला  रहा  है  मुझे।

#@रघुनंदन शर्मा "दानिश"@#
Raghunandan Sharma Danish
Raghunandan Sharma Danish

9:08 pm

ग़ज़ल :- बेसबब दिल नहीं दुखा होगा - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

एक ग़ज़ल :-

बेसबब  दिल  नहीं  दुखा  होगा
आपके  साथ  कुछ हुआ होगा।

जिस्म तो भीड़  में जा सकता है
रूह की ख़ामुशी का क्या होगा।

पेड़   की    देखभाल    जारी  है
पेड़ पर अब भी फल लगा होगा।

चाँद   की   मौत   हो   गई   होगी
रात  ने  दिन  को  छू  लिया होगा।

मैं  मुसाफ़िर  हूँ  इश्क़ का "दानिश"
मेरे   तो   दिल  में  आबला  होगा।

#@रघुनंदन शर्मा "दानिश"@#
Raghunandan Sharma Danish
Raghunandan Sharma Danish

9:06 pm

ग़ज़ल :- समन्दर इसलिए घबरा रहा है - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

ग़ज़ल :-

समन्दर   इसलिए  घबरा  रहा है
नदी का  रस्ता रोका  जा रहा है।

जुदा  क्या  हो गए पंछी शजर से
लकड़हारा  बहुत  इतरा  रहा है।

उतर जाएंगे हम भी अब नज़र से
हमें जी भर के  देखा  जा रहा है।

मिरे  अंदर  कुई  तो है जो मुझको
मिरे बारे  में  ही  भड़का  रहा  है।

ख़मोशी  क्यूँ   न   टूटेगी  नदी  की
कि  उसमें  संग  फेंका जा  रहा है।

                       रघुनंदन शर्मा "दानिश"

9:04 pm

ताज़ा ग़ज़ल :- वो ज़माना न सही इतना तो दे सकता था - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

ताज़ा ग़ज़ल :-

वो  ज़माना  न  सही  इतना  तो दे सकता था
मुझको इक दोस्त मेरे जैसा तो दे सकता था।

देने  वाले  का   इरादा   न  था  कुछ  देने  का
वर्ना  दरिया  न  सही क़तरा तो दे सकता था।

क्यूँ  नहीं  आने  दिया  बज़्म  में  उस  गूँगे को
वो हमें लफ़्ज़  नहीं  लहजा  तो दे सकता था।

कैसे  अफ़सोस  न  हो  लाश  न मिल पाने का
मैं  उसे  साँस  नहीं  कांधा  तो  दे  सकता था।

वो   नहीं   चाहता   था   यादों  से   बेचैन   रहूँ
वर्ना जाते  हुए  इक  बोसा  तो  दे  सकता था।

                                           रघुनंदन शर्मा "दानिश"

9:02 pm

इसीलिए तो कहीं और दिल लगा रहे हैं - रघुनंदन शर्मा "दानिश"

ग़ज़ल :-

इसीलिए   तो   कहीं   और  दिल  लगा  रहे हैं
हम  एक  बिछड़े  हुए  शख़्स  को भुला रहे हैं।

हमें  ये   डर  है   तअल्लुक़  न  टूट  जाए कहीं
सो   जान   बूझ   के   उससे   फ़रेब खा रहे हैं।

वही   सफ़ीना   उन्हें   ग़र्क़    करना   चाहता है
वो जिस सफ़ीने को साहिल की सम्त ला रहे हैं।

जो  मिल  गया  है  अगर  उससे मुतमइन हैं हम
बिछड़ने  वाले   की   तस्वीर   क्यूँ  बना  रहे  हैं।

हमें   पता   है   मुहब्बत   की   बंदिशें   "दानिश"
किसी  ग़ज़ल  के  कभी  हम भी क़ाफ़िया रहे हैं।

                                         रघुनंदन शर्मा "दानिश"

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