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सोमवार, 13 अप्रैल 2020

11:07 am

ग़ज़ल :- ग़ज़लमेरी जान कितना सताने लगी है - पारस गुप्ता


मेरी  जान  कितना  सताने  लगी  है..... 
वो सपनों में फिर से हां आने लगी है.....

निगाहों  में मेरी थी तस्वीर जिसकी...
वहीं आंख फिर क्यों सजाने लगी है.....

खयालों  की  दुनिया  में  डूबे हैं ऐसे...
वहीं  रात  दिन  फिर  चुराने लगी है.....

ये  बातें  वही हैं रुकी जो अधर पर..
सभी  सामने  आज  आने  लगी  है.....

मुलाकात होती कभी जो सड़क पर...
हमें  देख  कर  मुस्कुराने   लगी  है.....

जरा  यार  देखो हुआ क्या जुबां को... 
मोहब्बत  के गीतों को गाने लगी है.....

कहीं मैं चुरा लूँ न उसके ये दिल को...
यही  सोचकर  दिल  छुपाने लगी है..... 

कभी  हमने  पूछा  मुहब्बत है हमसे...
दबे  पांव  शरमा  के  जाने  लगी  है.....

उन्हें  प्यार  हमसे  तो  होने लगा है...
सहेली  से  अपनी  जताने  लगी है.....

वो आए हैं छत पे तो मिलने को हमसे...
मगर   क्यूं   दुपट्टा   सुखाने  लगी  है.....

ये  डर  है  कोई  देख  लेगा  हमें  तो...
वो छुप छुप के नजरें मिलाने लगी है.....

कहा  उसने  हमसे मुहब्बत है तुमसे...
वो  चाहते  को अपनी बताने लगी है.... 

अभी तक तो किस्सा था सपनों का
हकीकत  में  पारस  को पाने लगी है......


रचनाकार - पारस गुप्ता
                   (शायर दिलसे)

11:06 am

ग़ज़ल :- क्या खुदा मंजूर करता अब दुआ है.....पारस गुप्ता

२१२२,२१२२,२१२२

क्या  खुदा  मंजूर  करता  अब  दुआ है.....
इश्क़  क्यों  लगता  मुझे  अब बद्दुआ है.....

लिख रहे हैं फिर गजल हम इश्क़ पे हां....
जी  अभी  कोई  नया,  शाबा  जगा  है......
(शाबा= दर्द-ए-दिल)

आइना  क्यों  साफ  करते फिर रहे हो...
गर्द   तो   माथे   पे   तेरे   ही  लगा  है......

रात   भर   सोया   नहीं   याद  में   वो...
रात  भर  गुमशम  कहीं  रोता  रहा  है.....

#पारस_गुप्ता

11:04 am

मुक्तक :- गुलाबी जाम से ज्यादा , गुलाबी होठ कर दूंगा - पारस गुप्ता


गुलाबी जाम से ज्यादा , गुलाबी होठ कर दूंगा.....
मुझे  ना  चूमना  देखो ,  तुम्हें  बेहोश कर दूंगा.....

नशा कितना है मुझमें प्यार का देखो नयन में तुम....
तुम्हें भी प्यार में अपने, सनम मदहोश कर दूंगा......

#पारस_गुप्ता

11:01 am

मुक्तक :- ज़िन्दगी का मजा नहीं खोना है....पारस गुप्ता

मुक्तक

ज़िन्दगी का मजा नहीं खोना है....
दिल्लगी इक सजा नहीं रोना है....

कैसा  है  ये  नशा मोहब्बत का...
आपसे  अब जुदा नहीं होना है....

#पारस_शायर

10:59 am

ग़ज़ल :- गुल में पुष्प खिलाकर देखो.....पारस गुप्ता


गुल  में  पुष्प  खिलाकर देखो.....
बुझता  द्वीप   बचाकर   देखो.....

कब   से   अंधेरा   कायम   है...
तुम  एक  द्वीप जलाकर देखो.....

कितना  अच्छा जीवन लगता...
तम को मन से मिटाकर देखो.....

तुम डूब न जाओ कहना फिर...
हमसे  आंख  मिलाकर  देखो.....

प्यार  मोहब्बत  की दुनिया हैं...
नफ़रत  दिल से हटाकर देखो.....

प्यार  भरा  हैं  हममें  कितना... 
हमसे  दिल को लगाकर देखो.....

दिल में जो , रहता है हर पल...
घर पर उसको बुलाकर देखो.....

महफ़िल  में  शायर  आते  हैैं...
महफ़िल इश्क़ सजाकर देखो.....


#पारस_शायर

10:58 am

मुक्तक :- नहीं यारों मेरी आदत किसी से इश्क करने की - पारस शायर दिल से


नहीं  यारों  मेरी  आदत  किसी  से  इश्क  करने  की.....
मगर इस दिल की हैं चाहत किसी से इश्क करने की.....
यहां   मैं   जी  रहा  कैसे  मेरे  दिल  से  कोई  पूछे...
भला  कैसी  है  ये  आफ़त  किसी से इश्क करने की.....

पारस गुप्ता 

10:56 am

ग़ज़ल :- क्यूँ छिपाते हो किधर जाना हैं - पारस गुप्ता


फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
  २१२२       ११२२        २२

क्यूँ छिपाते हो किधर जाना हैं....
बोलकर बता दो कि घर जाना हैं.... 

भटकना अब नहीं हैं ज़माने में....
हाथ में कुछ तो पसर जाना हैं....

बहती रहती हैं जो नदी हर दफाँ...
एक दिन सागर में बसर जाना हैं.....

प्यार में डूबें हैं देखो सभी...
प्यार की हदों से गुज़र जाना हैं.....

साथ खाई थी तुमने संग मिरे...
झूठी कसमों से मुकर जाना हैं....

साथ रहना संग मिरे ए सनम....
आपके प्यार में तर जाना हैं....

टूटकर बिखरा हूँ इस कदर मैं...
प्यार में उसी के सँवर जाना हैं.....

अपना अपना ही होता हैं पारस... 
आज अपनों के ही घर जाना हैं......

पारस  गुप्ता
शायर दिलसे

10:55 am

मुक्तक :- आओ कभी इक बार तो, मिलने सजन सजनी से भी - पारस गुप्ता

आओ कभी इक बार तो, मिलने सजन सजनी से भी......
कब तक तकेगी राह को, रोते नयन रजनी में भी......
(रजनी=रात)

कैसी विरह की वेदना, कैसा तेरा ये प्यार है.....
कैसे पोछूं अपने नैना, छिपते नहीं ढकनी से भी......

पारस गुप्ता 

10:53 am

ग़ज़ल :- इबादत इश्क़ की करनी वफ़ा दिल पाक रखना है.. पारस गुप्ता

इबादत इश्क़ की करनी वफ़ा दिल पाक रखना है......
न कोई छल कपट करना फक़्त दिल साफ रखना है......

वो ठहरी हुस्न की मलिका जबाँ कमसिन नशीली सी...
उसे तुम चाँद मत बोलो मुझे महताब रखना है....... 

बयाँ जो करना न पाया लफ्ज़ में अहसास वो हो तुम....
बयाँ कैसे करें तुमको नहीं अल्फ़ाज़ रखना है......

मिली जो हैं मुझे किस्मत से वो नायाब मूरत तुम.....
तुम्हें मूरत नहीं रखना तुम्हें हमनाम रखना है.......

हमें मालूम है तुम क्यों उसे ग़ज़लों में लिखते हो.....
अगर ये इश्क नहीं तो क्या उसे बदनाम रखना है......

जिधर देखो जिक्र उसका अधर पर नाम उसका है....
मुहब्बत नाम उसका है नहीं क्या नाम रखना है........


#पारस_गुप्ता

10:51 am

ग़ज़ल :- कभी उनको तो जाना है कभी भी छोड़ जायेंगे - पारस गुप्ता

कभी उनको तो जाना है कभी भी छोड़ जायेंगे.....
तुम्हारा प्यार संग-ए-दिल कभी वो तोड़ जायेंगे.....

चलो अब मान लो तुम ये नहीं हमदम तुम्हारें वो....
तुम्हें रोता हुआ वो छोड़कर मुख मोड़ जायेंगे......

कमाया अबतलक जो था सभी सामान उनको था....
लुटा दो चाहे सब कुछ तुम वो फिर भी छोड़ जायेंगे......

भला कैसे जिओगे तुम बिना हमराज के जाने....
तुम्हारे प्यार की सरगम वो जब भी तोड़ जायेंगे......

जो तुमने ख़्वाब देखा है न सच होगा कभी भी अब....
तुम्हारे इश्क़ में दरिया का रुख जो मोड़ जायेंगे......

नहीं करना सुनो इकरार पारस प्यार का अपना.....
ग़मों से वो तुम्हारा यार रिश्ता जोड़ जायेंगे.....

#पारस_दिलसे

10:49 am

ग़ज़ल :- चल पड़ा फिर आदमी तन्हाइयों की ओर अब तो - पारस गुप्ता

(फ़ाइलातुन*४)
(२१२२*४)

चल  पड़ा  फिर आदमी तन्हाइयों की ओर अब तो......
क्यों भला ये चल पड़ा बर्बादियों की ओर अब तो.....

तुम कहो कैसे करें वो जान की अपनी हिफाज़त....
हर तरफ क़ातिल यहाँ अच्छाइयों की ओर अब तो.......

आप कब तक यूँ ही खुद की जां बचाते जाओगे....
कब तलक छिपकर रहोगे क़ायरों की ओर अब तो.....

देखकर अब रख क़दम को जाल साज़िश सब यहां हैं....
धूप तक रखना गुनाह् परछाइयों की ओर अब तो......

ख़ैर फ़रमा ऐ बशर साहिल पे पहुँच गया सलामत...
डूब जाते कर यक़ीं बैगाइयों की ओर अब तो......
(बशर=आदमी, बैगाइयों=गैर)

जो अकड़ कर ही खड़ा वो टूटकर फिर गिर गया है...
आये जब भी तुम कभी भी आँधियों की ओर अब तो......

चांद सूरज और तारे साथ हैं सब आज कल भी...
तुम हमारे साथ रहना आशिनों की ओर अब तो......
(आशिनों= जिंदगी भर का हमसफ़र)

टूट जायेगा ये मेरा प्यार का दर्पण कभी भी...
फेंकना मत देखो' पत्थर आइनों की ओर अब तो......

#पारस_गुप्ता

रविवार, 6 मई 2018

3:17 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में पारस गुप्ता की कुछ ग़ज़लें

नाम-   पारस वार्ष्णेय
साहित्यिक नाम- पारस गुप्ता शायर दिल से
पिता का नाम- श्री प्रेमहंस गुप्ता
माता का नाम- स्व0 श्रीमति राधा वार्ष्णेय 
जन्मतिथि - 6 दिसम्बर 1995
निवासी- कैथल गेट चन्दौसी जिला- सम्भल
शिक्षा- बीएससी , एमएससी०(गणित) 
समप्रति - अध्ययनरत् 

ग़ज़ल क्र 1
बहर- १२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया- आ
रदीफ- देना

अगर हमसे मुहब्बत हैं सनम हमको बता देना ।
मिटा देना बसी नफरत गिलें शिकवें मिटा देना ।।

अगर तुम कर सको इतना तो करना सिर्फ इतना तुम ।
करो  जो  प्यार  तुम  हमसे  तो हमदम जाँ लुटा देना ।।

भला कैसे कहूं तुमको हैं कितना प्यार अब तुमसे ।
हैं चाहत अब यहीं तुमसे कसम खुद ही बता देना ।।

करें ऐसी मुहब्बत जो कि हम तुम  इस जहां पर ही ।
करेंगी याद जब दुनिया कहानी तुम सुना देना  ।।

न किस्सा ये मुहब्बत का, सुनाना अब किसी से तुम ।
करेंगे लोग जब चर्चे, तो किस्सा तुम सुना देना ।।

अगर हमसे मोहब्बत हैं सनम हमको बता देना ।
मिटा देना बसी नफरत गिलें शिकवें मिटा देना ।।

©  पारस गुप्ता 
        चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र 2
बहर- १२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया- आना
रदीफ- बना डाला

मोहब्बत  के  ख़यालों ने हमें काना बना डाला ।
कभी बिकते कभी मिटते कभी आना बना डाला ।।

करें किससे शिकायत हम ज़माने की बताओ तुम ।
शिकायत को मेरी तुमने कैसे नाना बना डाला ।।

सुनो हम आज भी तुमसे मोहब्बत खूब करते हैं ।
मोहब्बत की बीमारी ने हमें साना बना डाला ।।

गिले शिकवे सभी इतने सुहाने से लगे मुझको ।
कि शिकवों ने तेरे फिर तो हमें ताना बना डाला ।।

नशा दुनिया में हैं इतने लगें मुझको सभी फीकें ।
यूं उसकी एक नज़र नें हमको दीवाना बना डाला ।।

करेंगे हम नशा इतना उन्हीं की आँख में गिरकर ।
उन्हीं की आँख को शायर ने मैखाना बना डाला ।।

1.काना= मोहब्बत में डूबे रहना 
2.आना= पैसा
3.नाना= जिसको कोई सुनने वाला नहीं
4.साना=आशिक

© पारस गुप्ता 
      चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र 3
बहर-१२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया - आनी
रदीफ - हैं

नादाने दिल हमारा हैं तिरी कातिल जवानी हैं ।
हुआ फिर चांद भी बेकल परी तू आसमानी हैं.....

कई शायर चलें आए ग़ज़ल कहने अदाओं पर ।
लचकती जब क़मर तेरी हुई दुनिया दिवानी हैं ।।

खिलें गुलशन बहारों में फिजाओं में नशा छाया ।
हवा चल दी मुहब्बत की हवाओं में रवानी हैं ।।

उठा पर्दा छुपे रुख से हुआ पहरा सितारों पर ।
घटा छाई हैं काली सी कि आई शब सुहानी हैं ।।

नही दिल्ली नही पटना नही रांची नही जम्मू ।
मेरा दिल तो बना डिस्ट्रिक बनी तू राजधानी हैं ।।

जरा इक बार तो कह दो सनम झूठा सही लेकिन ।
नही हमसे मुहब्बत हैं तुम्हें नफरत निभानी हैं ।।

पकड़कर हाथ जब बोले कहाँ जाते हो तुम जानम ।
नही कटते सहर-शामौ बनी हर शब विरानी हैं  ।।

चलें महफ़िल में *पारस* भी लिखें जातें जहाँ किस्सें ।
नहीं किस्सा लिखा हमने लिखी तुमपे कहानी हैं ।।

© पारस गुप्ता
       चंदौसी (सम्भल)


ग़ज़ल क्र  4

बह्र - 2122 2122 2122
काफ़िया - अत 
रदीफ- हो गयी तिरछी नज़र से

इक इनायत हो गयी तिरछी नज़र से ।
दिल में चाहत हो गयी तिरछी नज़र से ।।

गिर के फिर से उठ गयी उनकी नज़र जो ।
दिल में आफ़त हो गयी तिरछी नज़र से ।।

क्या कहें दिल घायल अब हो गया हैं ।
इक शरारत हो गयी तिरछी नज़र से ।।

क्यों रखें दिल अब गिले शिकवों की चाहत ।
हाँ   इज़ाजत  हो  गयी   तिरछी   नज़र  से ।।

आइने की दीद हसरत क्यों करें दिल ।
अब कयामत हो गयी तिरछी नज़र से ।।

© पारस "दिलसे"

ग़ज़ल क्र 5
बह्र - 1222   1222   1222    1222
रदीफ- से
काफिया- आने

मिलें तुझको सितम कितने, बता उनके सुहाने से ।
लगें कितने वो अपने से, सुना सब कुछ ज़माने से  ।।

सुनाऊँ हाल क्या दिल का, किसी से यार अपना मैं ।
नहीं लगता हैं दिल मेरा, किसी का दिल दुखाने से ।।

लिखूं किस्सा मुहब्बत का, मैं दिल के खून से अपने ।
लिखूंगा प्यार के किस्से, हमेशा दिल चुराने से  ।।

ग़ज़ल से गीत से दुनिया, सदा आबाद हैं अपनी ।
सुनें हैं गीत अपने भी, जुबां उनकी भी गाने से ।।

मिला जो आज अबतक हैं, न ग़म उसका भी करना तुम ।
तसल्ली हैं मुझें उसमें, मिला जितना ख़जाने से ।।

मिज़ाजे - दिल रखा अपना, सदा मैंने गरीबों सा ।
कभी हासिल तुम्हें होगा, न कुछ मेरे ठिकाने से ।।

हुई किस्मत मिरी रुकसत कहूं क्या यार मैं उनसे ।
बड़े  मगरूर  से  वो  बेवफा शायर दिवाने से ।।

© पारस गुप्ता 
    चंदौसी (सम्भल)

ग़ज़ल क्र 6
2122  2122  2122  212
काफिया- आर
रदीफ- है

दिल्लगी  का दौर हैं  और प्यार में तकरार है ।
प्यार में तकरार ही अब प्यार का इकरार है ।।

हुस्न उसका लग रहा हैं मानो जैसे चाँद सा ।
चाँद  का  देखो  जमीं पर हो गया दीदार है ।।

जुल्फ़ें हैं उसकी सुनहरी आँखें कातिल भी लगें ।
जब हयाँ करती हैं वो नख़रा बना अगियार है ।।

कशमकश में हैं जो देखें चांदनी का नूर सब  ।
हुस्न उनका लग रहा अब दो-धारी तलवार है ।।

ऐ खुदा कर देना बरकत जाए मिल बाजार में ।
देख कर नज़रें मिली थी फिर हुआ इज़हार है ।।

वो हमें भी देखकर यूं  मुस्कुराकर चल दिये ।
हो गया हो जैसे उसको भी तो मुझसे  प्यार है 

1. अगियार    -  दुश्मन
2. कशमकस -  आन्तरिक संघर्ष

©  पारस गुप्ता 
     चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र 7
बहर- २१२२,२१२२,२१२२,२१२
रदीफ- के लिये
काफिया- आने

वो मिलें हैं सिर्फ हमको आजमाने के लिये ।
ज़ख्म क्या काफ़ी नहीं थे दिल दुखाने के लिये ।।

जब मिलें तब मुस्कुराने की वजह को पूछते ।
मुस्कुराता हूं मैं अक्सर ग़म छिपाने के लिये ।।

क्या कमी हैं इस जहां में आशिकों की भी कहो ।
सैकड़ों आशिक पड़े हैं,  दिल लगाने के लिये ।।

क्या कहें तुमको बताओ मैखाने का पैमाना ।
जानता हूं, वो मिलें हैं,  दिल जलाने के लिये ।।

नाम क्या आया ग़ज़ल में ऐसा आलम हो गया ।
हो गया, मशहूर मैं भी, अब ज़माने के लिये ।।

आजमाने को पड़ी थी, दुनिया  पूरी क्यों  मगर ।
उनको पारस ही मिला फिर आजमाने के लिये ।।

© पारस गुप्ता 
चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र० 8
बह्र-  १२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया- आज
रदीफ- कहता हूं

कहा तुमने नहीं अब तक चलो मैं आज कहता हूं ।
हमें  तुमसे मोहब्बत है मैं दिल का राज कहता हूं ।।

लिखा  था  ख़त  मैंने  तुमको  पढ़ा  तुमने नहीं दिलवर ।
चलो अब ख़त की छोड़ो तुम दिलों अल्फ़ाज़ कहता हूं ।।

मोहब्बत की कहानी क्या दिवानी क्या जवानी क्या ।
निशानी हो अनूठी तुम तुम्हें मैं ताज कहता हूं ।।

बदल बेशक गये हो तुम मगर खोये नहीं हो तुम ।
तलाशें क्यूं तुम्हें अब हम तुम्हें मैं बाज कहता हूं ।।

ग़ज़ल गाकर सुनाना तुम लिखीं हमने जो तुम पर हैं ।
सुना   देना   सभी  गजलें के सरगम साज कहता हूं ।।

जमाना क्या कहेगा अब न सोचो तुम सनम इतना ।
बनोगी तुम मेरी दुल्हन फक़्त दिल राज कहता हूं ।।

हमें   तुमसे  मोहब्बत  हैं   चलो  मैं आज कहता हूं ।
कहां तुमने नहींं अबतक मैं दिल का राज कहता हूं ।।

© पारस "दिल से"

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