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मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

6:58 am

बालकविता~"मेरे प्यारे-प्यारे पापा - दिलीप पाठक

मुझे दिखाओ मेला पापा|
वहाँ दिलाना केला पापा||

झूलूँगा मैं झूला पापा|
झूला फूला-फूला पापा||

बाइक पर बैठाओ पापा|
जल्दी से ले जाओ पापा||

कपड़े तो हो पहने पापा|
लगते हो क्या कहने पापा||

कर ली सब तैयारी पापा|
मइया की बलिहारी पापा||

लेना खेल खिलौने पापा|
लगते बड़े सलौने पापा|

मेरे प्यारे -प्यारे पापा|
सारे जग से न्यारे पापा||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"


बुधवार, 8 अप्रैल 2020

2:02 am

घर प्यासे-प्यासे घर - दिलीप पाठक सरस

घर

प्यासे-प्यासे घर, 
बड़े उदासे घर|
अच्छे-खासे घर
गोल बतासे घर||
         आते-जाते घर, 
         कथा बताते घर|
         नेह जताते घर, 
          बहुत छिपाते घर||
छप्पर छानी घर,
टपकन पानी घर|
बड़ी परेशानी घर, 
मन-रजधानी घर||
            एक बनाते घर, 
            आस सजाते घर|
             दीप जलाते घर, 
              पर्व मनाते घर||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"
1:57 am

दिलीप पाठक के महाशिवरात्रि दोहे

विषय~महाशिवरात्रि
दोहे~😊

कृपा आपकी शीश पर, जिसके भोलेनाथ |
उसका जीवन धन्य है, यश है उसके हाथ ||

नाथ आपकी है कृपा, खुशियाँ रहतीं साथ|
माँ के छूता जब चरण, माँ चूमे मम माथ||

एक हृदय शिव शक्ति है, अद्भुत-सा चलचित्र |
सुन्दरतम् वरदान है,पाया पत्नी-मित्र ||

एक साधना आपकी, योगी का विस्तार |
साध रही हर साध जो,एक आप आधार||

गणपति के प्यारे जनक, मेरे मन के ईश|
रखते भर निज नेह से, वरदहस्त मम शीश ||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"
      संस्थापक 
विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत
1:55 am

रचना उत्तम आपकी, कुण्डलिया है छंद - दिलीप पाठक सरस

🙏कुण्डलिया छंद 🙏

रचना उत्तम आपकी, कुण्डलिया है छंद|
शब्द खौफ दहशत जहन, उर्दू के हैं चंद||
उर्दू के हैं चंद, नहीं छंदों में भाते|
हिन्दी तत्सम शब्द, सदा ही छंद सजाते||
कुछ तो करो उपाय ?शब्द उर्दू से बचना |
"सरस" निवेदन एक, छंद हिन्दी में रचना||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"
1:39 am

दिलीप कुमार पाठक जी के कुछ छंद लिस्ट 3

कृष्ण /वपु छंद~221 1
रोये हम|
आँखें नम||
रातों अब|
सोते कब||
यादें मन|
आतीं तन||
होली रँग|
खेले सँग||
मेघा सुन|
प्यासी धुन||
देखूँ दर|
आओ घर||
तेरे बिन|
काटे दिन||
लम्बा दुख|
दे जा सुख||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक सरस
कृष्ण /वपु छंद~221 1
विषय~कोंपल~☘☘☘
हैं कोमल|
ये कोंपल||
हो चंचल|
वृन्तों दल||
हे जीवन|
सींचो मन||
झूमे तन|
वृन्दावन ||
स्नेहाजल|
दे दे चल|
तेरा बल|
मैं कोंपल||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊��
दिलीप कुमार पाठक सरस
देवी छंद~112 2
चल आ जा|
अब गा जा||
तुम मेरे|
हम तेरे||
कजरारी|
रतनारी||
सखियाँ हैं|
अँखिया हैं||
रस घोला|
जब बोला||
सुन प्यारे|
दिल हारे||
धुन ऐसी|
मधु जैसी||
जब आये|
तब गाये||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक सरस
देवी छंद~112 2
चल आ जा|
अब गा जा||
तुम मेरे|
हम तेरे||
कजरारी|
रतनारी||
सखियाँ हैं|
अँखियाँ हैं||
रस घोला|
जब बोला||
सुन प्यारे|
मन हारे||
धुन ऐसी|
मधु जैसी||
जब आये|
तब गाये||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक सरस
सुमति छंद~111 212 111 122
कलम हाथ में अब गह लीना|
सरस काव्य को सब नित पीना||
गुनत सोम पावन मन होता|
रटत नाम सुन्दर शुचि स्रोता||


दिलीप कुमार पाठक सरस


सुमति छंद~111 212 111 122
कलम हाथ में अब गह लीन्हा|
सरस काव्य को मन महुँ चीन्हा||
गुनत सोम पावन मन होता|
रटत नाम सुन्दर शुचि स्रोता||


दिलीप कुमार पाठक सरस

सुमति छंद
सरस सोम रोम बसत साँची|
लिखत सोम नाम सरस बाँची||
कहत सोम सोम मन शत बारा|
कबहुँ हो न ता घर बँटवारा ||

दिलीप कुमार पाठक सरस


रंगी छंद~212 2
लाउ तिल्ली|
देख बिल्ली||
दीपबाती|
आ जलाती||
पान पानी|
तान तानी||
रोड बिच्ची|
पिच्च पिच्ची||
बैठ पीढ़ी|
सुर्र बीड़ी||
ला तमाकू|
फट्ट थू थू||
है बजारू|
पी न दारू||
खैंच सुट्टा|
हैं न छुट्टा||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक सरस 😀
कदली छंद~112 1
भज साथ|
जग नाथ|
खिल प्रात|
जलजात||
वह मूल|
अनुकूल|
सब धूल|
प्रतिकूल|
हरियोग|
चख भोग|
हर रोग|
हँस लोग|
सब काम|
हरि नाम|
भज राम|
जय राम|
🖊🖊🖊💐🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
वसन्ततिलका छंद
221 211 121 121 22
आओ चले हृदय की गति है रुकी~सी|
प्यासे हुए नयन भी पलकें झुकी~सी||
बोले सदैव मुझसे तुमको पुकारूँ|
मैं भी उसे निरख के मन आज (वारूँ) हारूँ||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक सरस
वसंततिलका~छंद
221 211 121 121 22
बातें करें सरस लोग वही पुरानी|
मैया पुकारत सुनो ललना कहानी||
कौआ उड़ो पकड़ हार गले न पाया|
चीनी दही सब रखो नहिं लौट आया||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
राधारमण छंद
विधान - नगण नगण मगण सगण
१११  १११  २२२  ११२

नटखटपन छोड़ो आप सभी|
झटपट उठ बैठो आज अभी||
जलभर कर लाओ प्यास लगी|
अब सरस कमाओ आस जगी||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

🌷 राधारमण छंद 🌷
[नगण नगण मगण सगण]
(111  111  222  112)
12 वर्ण, 4 चरण, दो-दो चरण समतुकांत]
मन उलझन में है नाथ धँसा|
चरण शरण में लो आप बसा||
मम प्रभु सम प्यारा कौन कहो|
नटवर जग न्यारा नाम गहो||
समझत सबकी लीला मन की|
सुधिजन कहते वृंदावन की||
तनमन बसते कान्हा अपने|
सच सब मन के होते सपने||
प्रभु सम जग में को है कहतीं|
नटखट सँग राधा जी रहतीं||
सब समझत हैं लीलाधर जी|
हम सब कहते आना घर जी||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"



1:37 am

दिलीप कुमार पाठक जी के कुछ छंद लिस्ट 2

रंजन छंद
विधान~2111111,2111111,2111111,21122|
चार चरण, दो दो चरण समतुकान्त|
तू अति नटखट, दौड़त सरपट,
आ अब झटपट, राज दुलारे|
पावन मन गुन, मंतर ध्वनि धुन,
 होत यजन सुन,आ बबुआ रे||
भावत चितवन, है सब मम धन,
आवत बन ठन, है छवि प्यारी||
अंजन अँखियन,है रस बतियन,
भागत विथियन, चंचलधारी||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
      संस्थापक
जनचेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति ~226
बीसलपुर पीलीभीत (उ. प्र.)

छंद~रुचिरा
विधान~21122,111122|
चार चरण, दो दो समतुकान्त
💐💐💐💐💐💐💐💐
मौन हुआ हूँ ,खुटपुट भारी|
देत खड़ी है, जब तब गारी|
मात हमारी ,सब सच मानो|
ग्वालिन राधा,ठनगन जानो|
दूध पिलाती ,दधि नवनीता|
काम करावै,सब विपरीता|
घाघर चोली, मम पहनाती|
और सुनौ माँ, सरस नचाती|
बूझति बंशी, इत कित राखै|
चोर बड़ी है, समुझत भाखै|
लालन झूठी, कहत कहीं है|
माखन चोरी, करत नहीं हैं|
ग्वालिन गोरी,सब पथ बाधा|
माँ अति नीकी ,सुन वह राधा|
कोप दिखावै, कबहुँ न छोरी|
प्रीत जुड़ी है, सचमुच भोरी||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
छंद~रुचिरा
विधान~21122,111122|
चार चरण, दो दो समतुकान्त
💐💐💐💐💐💐💐💐
मौन हुआ हूँ ,खुटपुट भारी|
देत खड़ी है, जब तब गारी|
मात हमारी ,सब सच मानो|
ग्वालिन राधा,ठनगन जानो|
दूध पिलाती ,दधि नवनीता|
काम करावै,सब विपरीता|
घाघर चोली, मम पहनाती|
और सुनौ माँ, सरस नचाती|
बूझति बंशी, इत कित राखै|
चोर बड़ी है, समुझत भाखै|
लालन झूठी, कहत कहीं है|
माखन चोरी, करत नहीं हैं|
ग्वालिन गोरी,सब पथ बाधा|
माँ अति नीकी ,सुन वह राधा|
कोप दिखावै, कबहुँ न भोरी|
प्रीत जुड़ी है, सरगम मोरी||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
छंद~रुचिरा
विधान~21122,111122|
चार चरण, दो दो समतुकान्त
💐💐💐💐💐💐💐💐
मौन हुआ हूँ ,खुटपुट भारी|
देत खड़ी है, जब तब गारी|
मात हमारी ,सब सच मानो|
ग्वालिन राधा,ठनगन जानो|
दूध पिलाती ,दधि नवनीता|
काम करावै,सब विपरीता|
घाघर चोली, मम पहनाती|
और सुनौ माँ, सरस नचाती|
बूझति बंशी, इत कित राखै|
चोर बड़ी है, समुझत भाखै|
लालन झूठी, कहत कहीं है|
माखन चोरी, करत नहीं हैं|
ग्वालिन गोरी,सब पथ बाधा|
माँ अति नीकी ,सुन वह राधा|
कोप दिखावै, कबहुँ न भोरी|
चन्द्र समाना, वह बृज गोरी||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

रंजन छंद
विधान~2111111,2111111,2111111,21122|
चार चरण, दो दो चरण समतुकान्त|
तू अति नटखट, दौड़त सरपट,
आ अब झटपट, राज दुलारे|
पावन मन गुन, मंतर ध्वनि धुन,
 होत यजन सुन,आ बबुआ रे||
भावत चितवन, है सब मम धन,
आवत बन ठन, है छवि प्यारी||
अंजन अँखियन,है रस बतियन,
भागत विथियन,क्यों बनवारी||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

तन्त्री छंद
😄🙏🏻😄
सरस गवैया, है अति भैया,
सुनत सुनत, सब के सब हारे|
शब्द हमारे, भाव तुम्हारे,
छोड़ हमें, फिर कौन पुकारे||
सोम सरल~से,हैं अविरल~से,
देख हमें, जब तब मुस्काते|
हँसी ठिठोली, मीठी बोली,
मिल जाते, अपने गले लगाते||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

तन्त्री छंद
8,8,6,10 पर यति, प्रति चरण 32 मात्रा,दो दो चरण समतुकान्त|चरणान्त~22
आपै राघव, आपै माधव
मन भज ले, अब कृष्णा कृष्णा|
जो कलुषित अति, कर पावन मति,
ईश नाम, मेटे मन तृष्णा||
जय जय गिरधर,जय जय नटवर,
वंशीधर, हे रास रचैया|
मुरलीवाले, सुन रे ग्वाले,
चरण शरण, निज आप बसैया||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

*◆तंत्री छंद◆*
विधान~ प्रति चरण 32 मात्राएँ,8,8,6,10मात्राओं
पर यति चरणान्त 22 , चार चरण, दो-दो
चरण समतुकांत।
आओ आओ,गाओ गाओ,
         छंद रचे,सरस गुनगुनाओ|
मीठे बयना, प्यारे नयना,
        हरषाओ, आ रस बरसाओ||
आयी रैना, नाहीं चैना,
     चुप रहते, नित दुख  सहते जी|
राहें गहते, नैना बहते,
 तुम बिन हम ,किससे कहते जी||
तुम मेरा मन, मेरा जीवन,
       खुशियों के, आँगन में आना|
आँखों भरकर, देखूँ जीभर,
      मुझे हँसा,तुम आ हँस जाना||
आ मुस्काना, गले लगाना|
        सरस मिलन , वन कुंजन में हो||
अँखियन अंजन, बतियन रंजन|
          छंदों का,रस गुंजन में हो||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
तन्त्री छंद आधारित एक गीत
विधान~8,8,6,10 पर यति, 32मात्राएँ|
दो चरण समतुकान्त, चरणान्त~दो गुरु|
--------------💐------------------
भीगी अँखियाँ,अँसुअन जल से,
थक हारे, पग घर लौटाये|
उस दिन तुमने, कहा कि आना,
हम पहुँचे, तुम क्यों नहिं आये||
नैनन अंजन, आँझ प्रिये जब,
बन ठन के,मिलने तुम आतीं|
पैर पैंजनी,करती छम छम,
कुछ सुनतीं,कुछ तुम कह जातीं||
फूल मिलन के, खिलते गंधिल,
पथ लख थक, मन में मुरझाये|
उस दिन तुमने,कहा कि आना,
हम पहुँचे, तुम क्यों नहिं आये||
मन में सोचा, जब आयेगी,
खायेगी, है चाट चटोरी|
चार समोसा, मिर्च पकौड़ी,
लीं टिक्की, दो तीन कटोरी||
गरम गरम थीं, फिर सब ठंडी,
ठगे खड़े, कुछ समझ न पाये|
उस दिन तुमने, कहा कि आना,
हम पहुँचे, तुम क्यों नहिं आये||
फूल खिले सब, झरने लागे,
झूठे~से,मन टूटे वादे|
प्यास हृदय की ,घुट घुट बोली,
चल घर अब, सिर बोझा लादे||
मौन बुलाये,कौन सुनाये,
छंदों में, सरस गुनगुनाये|
उस दिन तुमने, कहा कि आना,
हम पहुँचे,तुम क्यों नहिं आये||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

राधारमण छंद
111 111 222 112
🙏🏻श्री गणपति स्तुति🙏🏻
-------------- 💐💐----------------
सुधिजन शुचिता सम्बोधक हैं|
गणपति मन प्यारे मोदक हैं||
सब दुख हरते कौतूहल में||
सब सुख सबको देते पल में||
पशुपति पटरानी के ललना|
खलदल बल को आके दलना||
सुन गजमुखधारी है विनती|
तव चरणन हो मेरी गिनती||
बचपन मन के प्यारे तुम हो|
छलबल जग से न्यारे तुम हो||
दुख हर सुख की मंजूषक है|
सब कहत सवारी मूषक है||
तड़फत मछली~सी है कहती|
मम मति अति माया में रहती||
तन मन भव व्याधा आप हरो|
उर सरस उजाला आप करो||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
🌹🌻 *राधारमण छंद* 🌻🌹
🔧विधान - नगण नगण मगण सगण
१११  १११  २२२  ११२
🌴🌹🌻🌺🌼🌺🌼
हर पल मन नाचे ज्यों तकली|
मुख पर मुख है दूजा नकली||
कथनि करनि भारी अंतर है|
जग धन बल जादू मंतर है||
नवल कमल जैसे है खिलता|
नित छलबल वैसे है मिलता||
सब कुछ जग की माया करती|
भ्रम जनमत नाहीं है डरती||
पिसत रहत दो पाटों चकली|
समझत असली होता नकली||
मृदुल बचन में आके कहना|
तन मन दुख क्यों देना सहना||
कह सुन लख पीड़ा जीवन की|
अब कुछ कर ले तू भी मन की||
कुछ हम कह लें आ जा सुन लें|
चल सुख दुख के साथी चुन लें||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
         संस्थापक सचिव
जनचेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति ~226

*'कलाधर छंद'*
•~•~•~•~•~•~•
विधान - गुरु लघु की पन्द्रह आवृत्ति और एक गुरु |
हिन्दवीर का प्रहार,शत्रु कौ उखाड़ देत|
नेति~नेति है प्रणाम, हिन्द के सुवीर कौ|
हंस~सा विवेक पास,हिन्द विश्व का विजेत|
जान लेत पास आयि, नीर और क्षीर कौ||
पाक~चीन रोज~रोज, आँख हैं दिखात आज|
दाँत तोड़ पेट फाड़,मेटि हौ लकीर कौ||
 आँख दोउ फोड़फाड़,हाथ~पाँव तोड़ताड़|
चीरफाड़ फेंकि देउ, शत्रु के शरीर कौ|
दिलीप कुमार पाठक सरस

*◆सुमति छंद◆*
विधान-नगण रगण नगण यगण
(111 212 111 122)
2, 2 चरण समतुकांत,4 चरण।
सरस हाथ जोड़ नत पुकारे|
धरत सोम छंद पद हमारे||
हृदय शब्द भाव  रचत आया|
सरल प्रीत को हृदय लगाया||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक सरस

लघुगति छंद
💐🙏🏻💐
रघुवरयश हँस हँस कहते|
रघुपति उर हनुमत रहते||
रघुवर प्रिय हनुमत रसना|
हनुमत मम तन मन बसना||
सरस रमत प्रभु घर घर जी|
अँखियन बतियन रघुवर जी||
रघुवर रघुपति चख चखना|
रघुवर रघुवर नित रटना||
 रघुपति हर पल दुख हरते|
 हनुमत सब सुखमय करते||
जब-जब भजत अवधपति को|
हरत तुरत दुख दुरमति को||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक सरस
लघुगति छंद
धड़कन धड़कत सम धड़कें|
रघुवर हनुमत तन फड़कें||
भजत रटत गुण रघुवर के|
रहत हृदय नित हरि हर के||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक सरस
तिन्ना छंद~222 2
😄🙏🏻😄🙏🏻😄🙏🏻😄
लल्ला आ जा|
टॉफी खा जा||
ऐसी वैसी|
दूरी कैसी??
टिल्ली टूला|
झूलो झूला|
मिट्ठू गोलू|
आजा भोलू||
बोली म्याऊँ|
आऊँ खाऊँ||
बिल्ली आई|
जागी माई||
भिन्डी तोरी|
गोरी छोरी||
मोटा कद्दू|
लाये दद्दू||
फाड़ा कुर्ता|
आलू भुर्ता ||
चोखा बाटी|
खा ले नॉटी||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक सरस
तिन्ना छंद~222 2
बोलो भाई |
पाटो खाई||
प्यारा न्यारा|
भाईचारा||
तिन्ना मन्ना|
मीठा गन्ना||
आओ खाओ|
खेलो जाओ|
चीजें पाओ|
पैसा लाओ||
खाऊँ केला|
देखूँ मेला||
चाचा चच्ची
बातें सच्ची|
दादा दादी|
लाये खादी||
गर्मी आयी|
कुल्फी खायी||
दूल्हे राजा|
बाजे बाजा||😄😄😄😄😄
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक सरस
क्रीड़ा छंद~122 2
लला प्यारे|
हमारे रे||
सँवारे हूँ|
सहारे हूँ||
चले आना|
नहीं जाना||
रहा प्यासा|
बँधी आशा||
सुरीला~सा
रँगीला~सा
कि गा लेना|
सुना देना||
न आयेगा |
न जायेगा||
वही जीता|
पढी गीता||
दिलीप कुमार पाठक सरस
   बीसलपुर (पीलीभीत) उ. प्र.

  
*सुजान छंद*
[14,9मात्राओं पर यति,अंत में गुरु लघु]
कहीं खुशी है दुःख कहीं,कैसा संयोग|
करे प्रतीक्षा मिलन खड़ा,योग या वियोग||
तू तू मे मे घर घर है, खा ठोकर रोज|
छल बल से नित मिले यहाँ,छप्पन खा भोग||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

◆ वीर/आल्हा छंद [सम मात्रिक]◆

 

विधान –[ 31 मात्रा, 16,15 पर यति,

चरणान्त में वाचिक भार 21 या गाल,

कुल चार चरण,

क्रमागत दो-दो चरणों पर तुकांत]

 

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

 धूप कहूँ नहिं देय दिखाई,

पाले की चहुँतरफा मार।

थर-थर,थर-थर तन है काँपै,

ठंडी-ठंडी चलै बयार।।

 

साँझ भई सब तापन बैठे,

बीड़ी हुक्का लियो उठाय।

पहले मसली है तम्बाकू,

फिर फटकारी दई लगाय।।

 

कुछ तौ सेंकत हाथ-पाँव हैं,

कुछ की होतीं आँखैं चार।

दद्दा बैठे गप्पैं हाँकैं,

होय ठहाकन की बौछार ।।

 

बहुत देर से भरकन कौ जौ,

ठंडो बिस्तर रहो बुलाय।

शीत लहर को झोंका आओ,

आगी सारी दई बुझाय।।

1:15 am

मत्त सवैया ~छंद ~ हृदयताल जब सूख गये फिर ~ दिलीप कुमार पाठक "सरस"

◆राधेश्यामी छंद या मत्त सवैया◆
शिल्प~[16,16मात्राओं पर यति
          चरणान्त में 2(गुरु),
         4 चरण ,दो दो चरण समतुकांत]
हृदयहार मैं हार गया सब,
       कर विहार जीत उपहार लो|
हार गले में डाल प्रिये तुम,
     निहार सरस कर गलहार लो||
बहार की फुहार है भीनी,
      आ जाओ यही मनुहार है|
समाहार हो मम जीवन का,
         हार हार करता गुहार है||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

*मत्त सवैया ~छंद*
16,16 पर यति, चार चरण, दो दो समतुकान्त|
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
कागज सबको लुभा रहा है,
        कागज सबको नचा रहा है|
कागज में सब सिमट गया है,
     कागज सब कुछ पचा रहा है||
दोषारोपण अस्त्र शस्त्र सह,
             जंगी बैठे सब ट्वीटर में|
वही पुराना छलिया कागज,
       अब घुस आया कम्प्यूटर में||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

मत्त सवैया ~छंद
विषय~हार
हृदयताल जब सूख गये फिर,
आनंद कमल कैसे खिलते|
उथले पानी की डुबकी में,
हाथों को कब मोती मिलते||
थकित पथिक की प्यास बुझाकर,
तैयार उसे बस करना है |
मीठे पानी का झरना तुम,
तुमको तो प्रतिपल झरना है||
मन टूटा या हारे मन से,
या कह लो जीते जी मरना|
आगे बढ़के कुछ कर देखो,
पथ बाधा से कैसा डरना||
सब कुछ सम्भव है इस जग में,
कुछ करने की मन में पालो|
हार बुरी है हार न मानो,
लो खुशियों की जीत सँभालो||
बीत रहा है समय सुनहरा,
पल पल का कोई मोल नहीं है|
समझ रहा सब संकेतों को,
आत्मशक्ति की जीत यहीं है||
काम करो कुछ ऐसा जग में,
भोर अरुण~सा नित वंदन हो|
पग पग पर सब पलक बिछायें,
प्रतिपल अभिनव अभिनंदन हो||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

*मत्त सवैया ~छंद*
16,16 पर यति, चार चरण, दो दो समतुकान्त|
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
कागज सबको लुभा रहा है,
        कागज सबको नचा रहा है|
कागज में सब सिमट गया है,
     कागज सब कुछ पचा रहा है||
दोषारोपण अस्त्र शस्त्र सह,
             हर जंगी बस ट्वीटर में है|
वही पुराना छलिया कागज,
       घुस आया कम्प्यूटर में है||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

मत्त सवैया ~छंद
विषय~हार
हृदयताल जब सूख गये फिर,
आनंद कमल खिलते कैसे|
उथले पानी की डुबकी में,
हाथों मोती मिलते कैसे|
थकित पथिक की प्यास बुझाकर,
तैयार उसे बस करना है |
मीठे पानी का झरना तुम,
तुमको तो प्रतिपल झरना है||
मन टूटा या हारे मन से,
है जीते जी मरने जैसा|
आगे बढ़के कुछ कर देखो,
पथ बाधा से डरना कैसा||
सब कुछ सम्भव है इस जग में,
कुछ करने की मन में पालो|
हार बुरी है हार न मानो,
लो खुशियों की जीत सँभालो||
बीत रहा है समय सुनहरा,
पल पल का कोई मोल नहीं है|
समझ रहा सब संकेतों को,
आत्मशक्ति की जीत यहीं है||
भोर अरुण~सा नित वंदन हो,
जग में कुछ ऐसा कर जायें|
प्रतिपल अभिनव अभिनंदन हो,
पग पग पर सब पलक बिछायें||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
मत्त सवैया ~छंद
विषय~हार
फिर हृदयताल जब सूख गये,
कैसे आनंद कमल  खिलते|
उथले पानी की डुबकी में,
कब हाथों को मोती मिलते||
है थकित पथिक प्यासा आया,
बस प्यास मिटा दुख हरना है |
तुम मीठे पानी का झरना,
प्रतिपल तुमको तो झरना है||
मन टूटा या हारे मन से,
या कह लो जीते जी मरना|
आगे बढ़के कुछ कर देखो,
पथ बाधा से कैसा डरना||
सब कुछ सम्भव है इस जग में,
कुछ करने की मन में पालो|
है हार बुरी हार न मानो,
लो खुशियों की जीत सँभालो||
पल पल बीते धीरे धीरे,
पल पल का कोई मोल नहीं है|
सब समझ रहा संकेतों को,
है आत्मशक्ति की जीत यहाँ||
कुछ काम करो ऐसा जग में,
नित भोर अरुण~सा वंदन हो|
पग पग पर सब पलक बिछायें,
प्रतिपल अभिनव अभिनंदन हो||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
राधेश्यामी/मत्त सवैया~छंद
☘☘☘☘☘☘☘☘
दिन अति प्यारा अक्षय तृतीया,
लीन्हो परशुराम अवतारा|
है तेज धार फरसा हाथों,
जब तब दुष्टों को संहारा||
फरसाधारी तेजवान अति,
खलबल का रक्त बहाया था|
जो ऋषि मुनि को करे प्रताड़ित,
वह फरसा नीचे आया था||
वह दिन सबको याद अभी तक,
जब शिवधनु योद्धा देख रहे|
था सिया वरण का दिन प्यारा,
सब देख भाग्य की रेख रहे||
शिवधनु तो वह शिवधनु ही था,
सब लज्जित होकर बैठ गये|
सबकी मूछें झुकी झुकी सब,
जलके रस्सी सम ऐंठ गये||
सीता देख राम मुस्कायीं,
फिर देखा है उस शिवधनु को|
फिर देखा है पिता जनक को,
मानो यहु वर मेरे मनु को||
फिर छुअत राम के धनु टूटा,
फिर फरसाधारी आ धमके|
 फिर खचाखची थी फरसा की,
फिर लखन क्रोध में आ चमके||
क्रमशः ---------
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
राधेश्यामी /मत्त सवैया छंद
💐🙏🏻💐🙏🏻💐🙏🏻💐
बारह वर्ष गये कब कैसे,
 दूल्हा दुलहिन द्वय मिलवाये|
थीं एक घटा वह सावन की,
घनकेश सरस मुख पर छाये||
मम प्यास हृदय की बढ़ आयी,
फिर तन मन ने ली अँगड़ाई |
वह अधरों पर बूँद सोम की,
जाने कब की तृषा बुझाई||
वह विवाह की सरस रात थी,
थी एक छुअन पहली पहली|
जब नैन मिले नैनों से आ,
साँसों ने साँसों से कह ली||
 दोनों के हाथों जय माला,
धड़कन में थी तेजी आयी|
थी कभी परायी सकुचायी,
वह मम जीवन में मुस्कायी||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
: राधेश्यामी /मत्त सवैया छंद

कब कैसे बारह वर्ष गये,
दूल्हा दुलहिन द्वय मिलवाये|
थीं एक घटा वह सावन की,
घनकेश सरस मुख पर छाये||
मम प्यास हृदय की बढ़ आयी,
फिर तन मन ने ली अँगड़ाई |
वह अधरों पर ज्यों बूँद सोम
तन में खिलती अति तरुणाई||
थी वह विवाह की सरस रात,
थी एक छुअन पहली पहली|
जब नैन मिले नैनों से आ,
साँसों ने साँसों से कह ली||
 दोनों के हाथों जय माला,
धड़कन में थी तेजी आयी|
थी कभी परायी सकुचायी,
वह मम जीवन में मुस्कायी||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

राधेश्यामी/मत्त सवैया ~छंद
राधेश्यामी छंद मनोहर,
यति सोलह सोलह पर होती|
समतुक वाले दो चरणों से,
जलती राधेश्यामी जोती||
यदि समकल से प्रारम्भ करो,
तो सुन्दर लय बन जाती है |
चार चरण में अंत गुरू हो,
राधेश्यामी कहलाती है ||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
1:10 am

माँ तेरी ममता छाया को,सरस करे नित-नित वंदन ~ दिलीप कुमार पाठक "सरस"

माँ तेरी ममता छाया को,सरस करे नित-नित वंदन।
मेरी माता तुम्हें समर्पित,रोम-रोम के स्पन्दन।।
ज्ञात नहीं, क्या ज्ञात मुझे?सब कुछ ही आभास करातीं।
लगाके छाती,ढाँक के आँचल,थपकी देके सदा सुलातीं।।
तुम न सुनोगी,कौन सुनेगा?इस जग में मेरा क्रन्दन।।
माँ तेरी ममता--------------
सदा-सदा से ही मैंने,ममता छाया सुख पाया।
कभी न रोना लाल मेरे,आशीष सदा तुमसे पाया।।
तेरी शीतल गोद में बैठूँ,बनूँ सभी का अभिनंदन।
माँ तेरी ममता-------------
बालक की बस एक खुशी,सर्वस्व सदा न्यौछावर करतीं।
शिशु के हित सब सह लेतीं,रंचमात्र न उफ्फ करतीं।।
अपनी माँ को गोद उठाऊँ, बिठाऊँ,निज हृदय के स्यन्दन।।
माँ तेरी ममता------------
मुझ अबोध को बोध तुम्हारा,स्नेहिल शोध कराता है।
वात्सल्य भरा हर रोष तुम्हारा,ममता कोष लुटाता है।।
बँधा हुआ है माता तुमसे,तेरे इस नंदन का बंधन।।
माँ तेरी ममता छाया को,सरस करे नित-नित वंदन।।

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

12:52 am

दिलीप कुमार पाठक की घनाक्षरी

मनहरण घनाक्षरी

तार तार तारतम्य,
गीत गान का गगन|
गन्धिला गोधूलि गोरी,
भाव भौंन भान में||
चमचमाती चाँदनी,
कामिनी सी कुमुदिनी|
उनींदी है उन्मादिनी,
धुन धरे ध्यान में||
अलसायी अँगड़ाई,
बाती बात से बड़ाई|
मंद मंद मुस्कायी,
मनमीत मान में||
प्रेम की पवन पाय,
सजनी सजन साथ |
साँझ शयन सेज सज ,
मगन मुस्कान में ||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"


मनहरण~घनाक्षरी
तंग है बिछौना और ,पैर चादर निकाल|
खाली बैठ मत कुछ, काम धाम कर ले||
सुरसा-सी बढ़ रही, मँहगाई आज मीत|
काम धाम कर ले कि ,ऊँचा दाम कर ले|
आन वान शान गान, देश प्रेम है महान|
ऊँचा दाम कर ले कि,जग नाम कर ले||
तन पञ्च तत्त्व में से, उड़ जायेगा पखेरू|
जग नाम कर ले कि, राम राम कर ले||

©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

मनहरण घनाक्षरी
तार तार तारतम्य,
गीत गान का गगन|
गन्धिला गोधूलि गोरी,
भाव भौंन भान में||
चमचमाती चाँदनी,
कामिनी सी कुमुदिनी|
उनींदी है उन्मादिनी,
धुन धरे ध्यान में||
अलसायी अँगड़ाई,
बाती बात से बड़ाई|
तम तमतमाता सा ,
मनमीत मान में||
प्रेम की पवन पाय,
सजनी सजन साथ |
साँझ शयन सेज सज ,
मगन मुस्कान में ||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

मनहरण घनाक्षरी
अत्याचारी जब सिर, चढ़ बोलने लगी तो|
दाँत-पीस क्रान्तिकारी,लोहा लेने आ गया|
धरा-धानी, रक्त-सनी, अलफ्रेड पार्क बनी|
आँखों का उभर खून, तन में समा गया||
टप टप गिरे गोरे,और झटपटाये कई|
तड़ातड़ गोलियों का,ताण्डव दिखा गया||
सतत नमन मेरा,तुमको आजाद वीर|
स्वाभिमान-परिभाषा, हमको सिखा गया||

मनहरण-घनाक्षरी

करने शृंगार बैठी, आज मेरी प्राण प्यारी|
बिंदिया सुभाल लाल, होंठ लाली लाल है||
लाल लाल परिधान,लाल चूड़ियाँ हैं|
गंधवाली हिना हाथों,रची लाल लाल है||
हाथ में गुलाब लाल, लिए चकाचौंध लाल|
लालिमा निहार मन,हुआ लाल लाल है||
गाल लाल होंठ लाल,अंग-अंग लाल लाल|
 लाल लाल परिदृश्य, देख लाल लाल है ||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

विधा-मनहरण-घनाक्षरी
विषय-सावन
तन-मन कौ जलाय,अंग-अंग झुलसाय,
बिन तेरे कहाँ जाय,जिया अकुलात है||
सावनी फुहार झरै,झरै झकझोरै मोहिं|
झूला पींग पींगने कौ,हेरि-हेरि जात है||
कारे-कारे मेघा नभ, उमड़-घुमड़ आये|
रैन भई है अँधेरी, मन सकुचात है||
सावन न जाये बीत,आजा पाऊँ तेरी प्रीत|
बोल परदेशी-मीत,काहे नहीं आत है||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

विधा-मनहरण-घनाक्षरी
विषय-हमारे जवान

सीमा के प्रहरी आज, सीना ताने डटे सब |
देश बेटे सभी अब, सीना तान तनिए||
हो अनीति समझौता, छल-बल भ्रष्टाचारी |
शत्रु सदा शत्रु होता, शत्रु सदा हनिए||
स्वच्छ जल के समान, हैं हमारे ये जवान|
आन वान शान हेतु, पर्वतों से छनिए||
भारत सपूत बीर, आओ शत्रु-सीना चीर|
दुष्ट के दलन हेतु, नरसिंह बनिए||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

मनहरण-घनाक्षरी
जय हनुमान

असुर पिशाच आदि ,नाम सुन काँपते हैं।
नाम लेता जो भी, बाधा आती नहीं मग में।।
रामराम रटते हैं,राम राम जपते हैं।
राम राम राम राम,राम रग रग में।।
करें दुष्ट का दलन ,रहें प्रेम में मगन।
प्रेम से पुकारेंगे तो,हैं हमारे संग में।।
गुणवान दयावान,ज्ञानवान बलवान।
हनुमान के समान,नहीं कोई जग में।।

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

विधा-मनहरण घनाक्षरी।

पढ़ो छंद प्यार भरा,नेह व दुलार भरा।
शब्द-शब्द भाव भरी,जहाँ बात करते।।
हरते हैं ताप सब,दिल का गुबार सब।
जहाँ एक दूसरे पे,हम आप मरते।।
तन मन को भिगोते,झरते फुहार-सम।
प्रेम पगे भाव हम,मिल साथ भरते।।
हँसते हँसाते खूब,दूब जैसे हरषाते।
आप होते साथ तब, हम नहीं डरते।।
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

शहीद~ए~आजम भगत सिंह को  भावभरी श्रद्धांजलि समर्पित करते हुए ~
मनहरण घनाक्षरी

हिन्द देश की है शान, भगत महान वीर|
धूल ही चटायी सदा, बैरियों की चाल को||
जिसने छठी का दूध , गोरों को दिलाया याद|
खूब है छकाया ,काटा,जिय के जंजाल को||
चढ़ गया फाँसी फंदा,मातृभूमि हित हेतु|
 ललकारा ताल ठोक, हँस~हँस काल को||
हो गया शहीद वीर, किन्तु हार नहीं मानी|
नमन हजार बार ,भारती के लाल को ||

दिलीप कुमार पाठक सरस

विधा-मनहरण घनाक्षरी
पढ़ो छंद प्यार भरा,नेह व दुलार भरा।
शब्द-शब्द भाव भरी,जहाँ बात करते।।
हरते हैं ताप सब,दिल का गुबार सब।
जहाँ एक दूसरे पे,हम आप मरते।।
तन मन को भिगोते,झरते फुहार-सम।
प्रेम पगे भाव हम,मिल साथ भरते।।
हँसते हँसाते खूब,दूब जैसे हरषाते।
आप होते साथ तब, हम नहीं डरते।।

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

कलाधर घनाक्षरी छंद
     •~•~•~•~•~•~•~•~•
शिल्प - यह ऐक वार्णिक छंद है, इस में चार चरण होते हैं,
           प्रत्येक चरण में गुरु लघु  की पन्द्रह आवृत्ति और
         और अंत में एक गुरु मिलाकर ३१वर्ण होते हैं |
    
शत्रुमुण्ड काट-काट, माल डाल के विशाल|
चण्ड क्रोध में प्रचण्ड, रक्त की पिपासिनी||
दुष्ट दैत्य चीरफाड़, प्रेमभाव का प्रसार|
आदि शक्ति मातु आपु ,दम्भद्वेष की विनाशिनी||
लाल की सुनो पुकार, शेर पे सवार होय|
शैल छोड़ पास आउ,शैल की निवासिनी||
हाथ शीश फेरि मातु ,देउ लाल कौ दुलार|
बोल है अमोल मातु, आपु हैं सुभाषिनी||

दिलीप कुमार पाठक सरस


कलाधर घनाक्षरी छंद

फूल फूल से सुगन्ध, आ रही बयार बीच|
गन्धिला हुई बहार, प्रेमभाव खोलता||
डोलता सदैव पास ,भासमान है समीर|
मीत साथ की मिठास,प्यास मध्य घोलता||
प्रीत रीत है पुनीत,गीतगान बातचीत |
गूँजता सदैव छंद, शब्द शब्द बोलता||
एक सत्य और मीत, मौन साध लेत आज|
दर्द आह की कराह, कौन है टटोलता||

दिलीप कुमार पाठक सरस


शहीद~ए~आजम भगत सिंह को  भावभरी श्रद्धांजलि समर्पित करते हुए ~

मनहरण घनाक्षरी

हिन्द देश की है शान, भगत महान वीर|
धूल ही चटायी सदा, बैरियों की चाल को||
जिसने छठी का दूध , गोरों को दिलाया याद|
खूब है छकाया ,काटा,जिय के जंजाल को||
चढ़ गया फाँसी फंदा,मातृभूमि हित हेतु|
 ललकारा ताल ठोक, हँस~हँस काल को||
हो गया शहीद वीर, किन्तु हार नहीं मानी|
नमन हजार बार ,भारती के लाल को ||

दिलीप कुमार पाठक सरस

 हनुमत भक्ति
छंद~मनहरण घनाक्षरी

राम मेरे मन रमे, राम मेरे तन रमे|
रोम रोम पल पल,हुआ मेरे राम का||
राम को जो भजता है, राम को जो पूजता है|
वही मेरे काम का है, वही मेरे काम का||
श्रीराम वाल्मीकि प्यारे , तुलसी के न्यारे राम|
राम नाम प्यारा अति, अवध ललाम का||
राम नाम जपना है, राम नाम रटना है|
एक नाम राम राम, नाम सत्य धाम का||

दिलीप कुमार पाठक सरस


12:50 am

वंदना के स्वर ; ~ रात-दिवस और प्रातः शाम ~ दिलीप कुमार पाठक "सरस"

वंदना के स्वर
रात-दिवस और प्रातः शाम|
तेरी वंदना आठों याम||
ज्ञानदायिनी मेरी माता|
मेरी तुम हो भाग्यविधाता||
तुमसे जीवन-रस पाता|
नतमस्तक हो तुमको ध्याता||
तेरी कृपा से माता मैं तो|
चलता दुर्गम पथ अविराम|
तेरी वंदना------
मेरा जीवन सार तुम्हीं हो|
सांँसों का अधिकार तुम्हें हो||
ज्ञानदीप आधार तुम्हीं हो|
चँहूओर जयकार तुम्हीं हो||
वंदनवार सजाये बैठे|
मनमंदिर मम अक्षरधाम||
तेरी वंदना ------
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

12:45 am

दिलीप कुमार पाठक जी के कुछ छंद लिस्ट 1

विधाता छंद~
1222 1222 1222 1222
गुरूजी सोम प्यारे हैं हमारे हैं तुम्हारे हैं|
अनूठा गान गाते हैं लिखे जो छंद न्यारे हैं||
लुभाया प्रेम शब्दों से पिरोया छंद माला-सा|
सँवारा है निखारा है अँधेरे में उजाला-सा||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

*इन्दवज्रा -छंद*
शिल्प~समवर्ण, चार चरण,  
प्रत्येक चरण में दो तगण एक जगण 
और अन्त में दो गुरु /११ वर्ण
( 221  221  121  22 )
आके मुझे नेह दुलार दे माँ|
हूँ आपका ही सुत शारदे माँ||
शब्दों भरे भाव लिए खड़ा हूँ |
माता उठा लो चरणों पड़ा हूँ||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

*इन्दवज्रा छंद*
विधान ~ तगण,तगण,जगण,गुरु गुरु]
             (221 ,221, 121, 22)
११वर्ण,४चरण,२-२ समतुकांत]
राधा~
नैनों सजाये रसना रटाये|
राधा बुलाये रटना लगाये||
ओ साँवरे मोहन धाय आओ|
आँसू बहें पोछ गले लगाओ||
कृष्ण ~
वंशी सजायी अधरों लगायी|
आयी न तू क्यों धुन वो बजायी||
बैठा रहा मैं यमुना किनारे|
राधा सु राधा हम टेर हारे||
राधा ~
काँटे चुभे पैरन वेदना पी|
दौड़ी सुनी जो धुन मोहना जी||
मेरे कन्हैया सुध भूल भागी|
 हाँ चेतना मैं पथ माहिं त्यागी||
कृष्ण ~
रोता रहा हूँ छलकात नैना|
ले नाम राधा पुलकात बैना||
मैं हूँ तुम्हारा तुम हो हमारी|
हो मोहिनी-सी मम प्राण प्यारी||
राधा~
हारी थकी थी सब दर्द खींचा|
आ मोहना ने जब अंक भींचा||
सींचा सदा नेह दुलार बोला|
छायी खुशी नैनन प्यार डोला|
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
*भक्ति छंद*
221 122 2
आजा सजनी आजा|
होती रजनी आजा||
कान्हा मुरली प्यारी|
राधा लगती न्यारी||
ओ मोहन की राधा|
मेरी हर लो व्याधा||
वंशी धुन है प्यारी|
सारी वसुधा हारी||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
*◆भक्ति छंद◆*
विधान~[तगण यगण गुरु ]
( 221  122  2 ) 7 वर्ण, 4 चरण
[दो-दो चरण समतुकांत]
प्यारी हर क्यारी है|
फूली फुलवारी है ||
मेरे नयनों सोहे|
मेरे मन को मोहे||
पंखों उड़के आती|
आती तितली भाती||
छूना मन को भाता |
मैं चंचल हो जाता||
फूलों मडराता है|
भौंरा नित गाता है||
आ प्रीत निभाता है|
मीठी धुन गाता है||
गा लें मृदु रागों में|
आ जा अब बागों में||
जो हो सतरंगी हो|
वो जीवन संगी हो||
है एक दिना जाना |
गाना नित मुस्काना||
पंछी उड़ जायेगा |
वो भी दिन आयेगा||

©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

राधेश्यामी छंद
जय जय सोम छंद की शाला,
पल पल निर्मल छंद रचैया|
नित ही खेलैं छंद खेल कौ,
हैं छंद रचैया भगत गवैया||
राजेन्द्र भुवन का तेज सरस,
हैं सरल सोम से ओम खड़े|
नैना साहिल विशेष शास्त्री,
अनुभूति साधना दिव्य बड़े||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"


*◆ कनक मंजरी छंद ◆*
शिल्प~ 4 लघु+ 6भगण (211)+1गुरु] = 23 वर्ण
[चार चरण समतुकांत]
                     या
{1111+211+211+211
                      211+211+211+2}
कर नित सुन्दर छंदन वंदन,
भावत आवत जावत है|
मन भर देखत टेरत सोचत,
जागत सो अब पावत है||
सजकर लागत नायक गायक,
गूँजत आवत भावत है|
जब तब पूछत जूझत सूझत ,
छंदन वंदन गावत है||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

*◆ कनक मंजरी छंद ◆*
शिल्प~
[4 लघु+ 6भगण (211)+1गुरु] = 23 वर्ण
 चार चरण समतुकांत]
                     या
 {1111+211+211+211
                      211+211+211+2}
यह मति मूढ़ रही प्रभुजी अति,
सीख रहे कर जोड़ यहाँ|
सब धन आप रहे प्रभुजी मम,
आप जहाँ हम साथ वहाँ||
शिशु विनती इतनी सुन लो अब,
छोड़ हमें अब जात कहाँ||
सिर धुनता गुनता किसको नित|
शीश झुका करतार जहाँ||
नयनन आप बसे मम आकर,
मोहन आकर पीर हरौ|
सजकर बैठ गये किन देशन,
होत अँधेर उजास भरौ||
नटखट चंचल है मन मोहन,
पास रहो मत दूर करौ|
चरनन आप बसा अघ लो यह,
हस्तकृपा मम शीश धरौ||
जय जय भोर करे नित मोहन,
नाथ सनाथ सदा करना|
तन मन आप बसे मुरलीधर,
लो निज आप बसा चरना|
पथ नित हेरत टेरत-टेरत,
हार गया दुख आ हरना|
नटवर नागर तारण कारण,
आप बिना दुख है भरना||
अँखियन सूजन रोवत-रोवत,
हे करुणाकर आस लगी|
दरसन नैनन की हिय चाहत,
हे नटनागर प्यास लगी|
लख मनमोहन मोहक रूपक,
चन्द्रकलानि उजास लगी|
धड़कन साँसन नैनन प्रानन
भाखन सूँ अरदास लगी||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

*◆ कनक मंजरी छंद ◆*
शिल्प~
[4 लघु+ 6भगण (211)+1गुरु] = 23 वर्ण
 चार चरण समतुकांत]
                     या
 {1111+211+211+211
                      211+211+211+2}
नयनन आप बसे मम आकर,
मोहन आकर पीर हरौ|
सजकर बैठ गये किन देशन,
होत अँधेर उजास भरौ||
नटखट चंचल है मन मोहन,
पास रहो मत दूर करौ|
चरनन आप बसा अघ लो यह,
हाथ कृपा को मम शीश धरौ||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस

*◆ कनक मंजरी छंद ◆*
शिल्प~
[4 लघु+ 6भगण (211)+1गुरु] = 23 वर्ण
 चार चरण समतुकांत]
                     या
 {1111+211+211+211
                      211+211+211+2}
यह मति मूढ़ रही गुरुजी अति,
सीख रहे कर जोड़ यहाँ|
सब धन आप रहे प्रभुजी मम,
आप जहाँ हम साथ वहाँ||
शिशु विनती इतनी सुन लो अब,
छोड़ हमें अब जात कहाँ||
सिर धुनता गुनता किसको नित|
शीश झुका करतार जहाँ||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

विद्धुल्लेखा/शेषराज छंद
शिल्प:- [मगण मगण(222 222),
दो-दो चरण तुकांत,6वर्ण]
मेरे प्यारे दादा |
पानी पीते सादा||
छंदों को मैं गाता|
गाने में क्या जाता||
छोटा मेरा बेटा|
बेटा सोता लेटा|
बोलेगा ओ पापा|
खोओ नाहीं आपा||
भारी गर्मी आयी|
ऊबी देखो माई|
पेंड़ों की है छाया|
पानी मेघा लाया||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

*◆मकरन्द छंद◆*
विधान~
[नगण यगण नगण यगण नगण नगण नगण नगण गुरु गुरु]
(111122,  111122,  11111111,  111122)
26 वर्ण,4 चरण, यति 6,6,8,6,वर्णों पर
[दो-दो चरण समतुकांत]
सरपट छा जा, दधि अब खा जा,
धड़म धड़म धम, मत कर आ जा|
मन स्वर वंशी, तुम यदुवंशी,
नटवर नटखट , दधि चख ताजा||
विरहन राधा, तन मन व्याधा,
दरपन निरखत,नयनन तृष्ना|
पटु बनवारी, नट गिरिधारी,
तन मन सब धन, गिरिवर  कृष्ना||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

*अहीर छंद*
*विधान - प्रति चरण 11 *मात्राएँ ,चरणान्त जगण(121)से ।(दो-दो चरण समतुकान्त)
नैना रहे निहार|
देना सोम दुलार||
काहे हमें सतात|
आते क्यों नहिं तात||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
*◆मंजुभाषिणी छंद◆*
विधान~[ सगण जगण सगण जगण+गुरु]
(112  121   112  121 2)
13 वर्ण, 4 चरण
[दो-दो चरण समतुकांत]
मन में बसा सरस धाम को सदा|
रसना पुकार प्रभु नाम को सदा||
भज ले सदैव जप ले हरीहरौ|
प्रभु आप नेह कर शीश पै धरौ||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
*◆मंजुभाषिणी छंद◆*
विधान~[ सगण जगण सगण जगण+गुरु]
(112  121   112  121 2)
13 वर्ण, 4 चरण
[दो-दो चरण समतुकांत]
उर में खटास नहिं कौन काम हैं|
मत तोड़ मीत लघु आज आम हैं||
रख तोष कोष उर में मिठास है|
फुलगी सुवास बस आस पास है||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

गजपति छंद
1112 1112
कमल फूल खिलता|
सरस कूल मिलता||
चरण धूल प्रभु की|
पकड़ मूल विभु की||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
गजपति छंद ~
1112 1112
अवध पालक बने|
भरत चालक बने|
लखन बालकपना|
चलत शत्रुघनघना||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

मधुभार छंद▪*
[तगण,भगण,नगण,जगण]
{221,21         1,111,121}
12 वर्ण, 4 चरण (5,7 पर यति,)
दो-दो चरण समतुकांत
अंगार ,फाँकत ,चलत ,बयार|
आ पास, छेंड़न ,हृदय, सितार||
गा गीत, चाहत ,सजत ,निखार|
रूपाभ ,नैनन, करत ,शिकार||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
विष्णु पद ~छंद
जीवन बड़ा कठिन है प्रियवर,
           दौड़ा भागी है|
कुछ करने की इस जीवन में,
           इच्छा जागी है||
किन्तु हाय कैसा परिवर्तन,
         मारामारी है |
छलबल दम्भ लोभ से,
          मति मम हारी है||😀🙏🏻😀
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
विष्णु पद😀🙏🏻😀
कौसल ओम सोम सब भाई,
नैना देख रहे|
कौन बनेगा सच्चा झूठा,
लिख हम लेख रहे|
आस सरल साहिल सम,
कम मिल पाते हैं |
सौम्य विशेष बनाने वाले,
छंदों को गाते हैं ||
सरस🖊
मोटनक छंद
221 121 121 12
माना सब आप किया करते|
माँगे बिन आप दिया करते||
काहे मन दीन करूँ अपना|
प्यारा मम जीवन का सपना||
देखूँ नित नैनन फूल खिले|
प्यासा बन तो जल कूप मिले||
मीठा रस पास चखो अब तो|
लाया सब साथ रखो कब को||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
मोटनक~छंद
221 121 121 12
मीरा भजती मनमोहन को|
राधा रटती मन के धन को||
पाया जिसने उसके मन को|
तारा उसने उस जीवन को||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
तू सोवत में अरु जागत में|
गा आगत के नित स्वागत में||
बातें दुख दें उनसे बचना|
गाएँ सब नूतन~सी रचना||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
*◆ सोमराजी / शंखनादी छंद ◆*
शिल्प~[यगण यगण(122 122)
           [दो-दो चरण तुकांत, 6 वर्ण]
हमें भी जिला दो|
दिखा दो पिला दो|
यही सोम सारा|
लगा विश्व न्यारा||
पिया ओम ने है|
दिया व्योम ने है||
गुरू सोम ऐसे|
मिली साँस जैसे||
जय जय
✒सोमराजी/शंखनादी छंद✒
शिल्प - [यगण यगण (१२२  १२२)]
[दो-दो चरण तुकांत, ६ वर्ण]
😀🙏🏻😀
तुम्हीं ने सँवारा|
तुम्हीं ने निखारा|
दिखा आ विभा दो|
मुझे भी निभा लो||
सभी आप तारें|
हमें भी उबारें||
कृपा आज भी है|
दया आपकी है||
तुम्हें है सँजोया|
फले बीज बोया||
बनूँ मैं विनोदी|
सदा बैठ गोदी||
सदा ही हँसाके|
गया पास आके||
हँसी मैं सजाऊँ|
सभी को हँसाऊँ||
सखा आप प्यारे|
बँधे तार सारे||
सखा प्रीत पाऊँ|
चला आ रिझाऊँ||
भरा भाव तेरा|
कटे फंद फेरा||
लगा छंद टेरा|
हुआ है सवेरा||
सदा छंद गाता|
तुम्हीं को मनाता||
सखा नाथ भ्राता|
पिता हो व माता||
बँधे बंध सारे|
हुए हैं तुम्हारे ||
निहारूँ पुकारूँ|
सँवारूँ निखारूँ||
सहारा हमारा|
सुधा प्रेम धारा||
चलो जी सुनायें|
नये छंद गायें||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
गजपति~
1112 1112
सहज होकर कहें|
चुप नहीं अब रहें||
कड़क हो कड़कते|
हृदय में धड़कते||
जलद हैं बरसते|
सरस हैं तरसते||
धड़क जा हृदय में|
हृदय के निलय में||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"
12:39 am

दिलीप कुमार पाठक जी के कुछ छंद लिस्ट 4

*◆ मंदाक्रान्ता छंद ◆* 
विधान~
[{मगण भगण नगण तगण तगण+22}
( 222  2,       11  111  2,      21  221 22)
17 वर्ण, यति 4, 6, 7 वर्णों पर, 4 चरण
[दो-दो चरण समतुकांत]
प्यारी प्यारी ,नित प्रति सजे, छंदशाला हमारी|
गंधवाही, पवन चलती,प्रीत लागै सुखारी||
मंदाक्राता, सरस बहता, भाव संसारसारा|
जीते हारे, बरबस सभी, प्रेम का है सहारा||

दिलीप कुमार पाठक "सरस"
*उल्लाला छंद*
दीन हीन बनकर कभी ,होत न कोई काम जी|
काम बिना होता नहीं, कभी जगत में नाम जी||
प्रीत रीत की जीत में, मीत गीत संगीत है|
होत सरस क्यों बोल तू, आज यहाँ भयभीत है ||

©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
*उल्लाला छंद*
दीन हीन बनकर कभी ,होत न कोई काम जी|
काम बिना होता नहीं, कभी जगत में नाम जी||
प्रीत रीत की जीत में, मीत मान का गीत है|
गीत गान के मान में,मीत मिलन की प्रीत है||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

तिलका छंद
112 112
प्रभु नाम रटा|
हर पाप घटा||
मन पीर हरी|
नहिं देर करी||
गुणगान लिखा|
हरि ध्यान लिखा|
गुरु ज्ञान लिखा|
दिनमान लिखा||
रसने !सज ले |
भज ले भज ले||
गति कौन कहे|
प्रभु मौन रहे||
जय जोत यहीं|
भय होत नहीं||
कब कौन सुखी|
सब मौन दुखी||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
तिलका छंद
112 112
सुन जून कहे|
हम गर्म रहे|
तुम कर्म करो|
मम ताप हरो||
तरु कोंपल को |
जलते जल को||
मन दाह दहे|
मुख आह कहे||
तरु पीत पड़े|
जल रीत पड़े||
घन देखत हैं|
मन देखत हैं||
सुर मंद हँसें|
सब छंद हँसें||
मन फंद कटें|
जब राम रटें||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
तिलका छंद
112 112
सुन ग्रीष्म कहे|
हम गर्म रहे|
तुम कर्म करो|
मम ताप हरो||
तरु कोंपल को |
जलते जल को||
मन दाह दहे|
मुख आह कहे||
तरु पीत पड़े|
जल रीत पड़े||
घन देखत हैं|
मन देखत हैं||
सुर मंद हँसें|
सब छंद हँसें||
मन फंद कटें|
जब राम रटें||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
*◆रसाल छंद◆*
विधान~ [भगण नगण जगण भगण जगण जगण+लघु]
(211  111  121     211  121 121  1)
19 वर्ण,  9, 10 वर्णों पर यति,
(4 चरण, दो-दो चरण समतुकांत।)
साँझ सजत मन पुष्प ,शोभित सुगंधित सौरभ|
रीझत नयनन बैन,शब्द अनुबंधित ज्यों नभ||
मोहक मधुकर गूँज, छंद मुरलीधर गावत|
नाचत नटवर संग, ताल सुर साथ सुहावत||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
🐍नाग छंद🐍
हे मुरलीधारी ,हे बनवारी ,रखना ध्यान|
मम प्राणन प्यारे, कृष्ण हमारे, कृपा निधान ||
हम तुम्हें बुलाते,तुम्हें मनाते,आओ नाथ|
जीवन के तट पर,रस के घट पर खेलौ साथ||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
◆नरहरि छंद◆
विधान-
प्रतिचरण19 मात्राएँ,चरणान्त1112,
यति-14,5 मात्रिक
दो-दो चरण  समतुकांत, चार चरण।
ओ कान्हा वंशी वाले, धुन सुना|
मुझको जो भाये आके,गुनगुना||
तीनों लोकों के स्वामी, मन बसो|
फूल कली के अधरन पर,नित हँसो||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
सार छंद~16,12,चरणान्त~दो गुरु

मैं करूँ नमन स्वीकार करो,मेरे प्रियवर आओ|
मन मेरा नित चंचल होता, छंद सरस गा जाओ||
तुम बिन सब है सूना सूना, फूलों सम मुस्काओ|
छंदों में भर प्रेम सोम को, तुम आकर छलकाओ||
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

🔶भालचंद्र छन्द🔶
विधान~~~
जगण रगण जगण रगण जगण+गुरु लघु
१२१,२१२,१२१,२१२,१२१,२१
💐🙏🏻💐🙏🏻💐🙏🏻💐
सजा वितान सा विधान भालचन्द्र छंद गान|
कृपा निधान सोम ओम दिव्यदृष्टि के समान ||
बने प्रमाण भावसाम्य शब्द ज्ञान पाग पाग|
निखार को निहार नैन हो सदा नवीन राग||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

¶ *भालचंद्र छंद* ¶
विधान-
[जगण रगण जगण रगण जगण+गुरु लघु]
121  212  121  212 121 21
17 वर्ण चार चरण समतुकांत
*************************
सखा प्रताप आपका  सदैव सूर्य के समान|
मिला सुजान आसमान के समान भासमान||
सजी हुई सुचन्द्रिका निखारती निहार नैन |
निहारती सँवारती विहारती पुकार बैन||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

भुजंगी छंद
^^^^^^^^^^
विधान ~
[ यगण  यगण  यगण + लघु  गुरु ]
( 122   122   122     1     2 ) ,
11 वर्ण , 4 चरण , दो - दो चरण समतुकांत  ।
🌹🌹🌹माँ🌹🌹🌹
हमारी तुम्हारी कहानी बनी|
उसी ने सदा नेहश्रद्धा जनी||
वही है हँसी सर्व पूजा वही|
वही है हवा सोमधारा मही||
वही शक्ति है भक्ति बोती वही|
वही युक्ति है दिव्य जोती वही||
पुरानी कहानी परी है वही|
वही कृष्ण माता खिलाती दही||
यशोदा कहे लाल भूखा अभी|
कन्हैया सखा संग भूखे सभी||
मथूँगी दही लाल नैनी चखो|
थके आ रहे घूम वंशी रखो||
चलो आ नहा लो बड़ी धूप है|
सजाया कन्हैया लला भूप है||
नहीं मात जैसा मिला है कभी|
सदा शीश पैरों झुकाते सभी||
वही सृष्टि दात्री विधात्री वही|
सभी सार झूठा वही है सही||
वही एक सौम्या विचारी बनी|
लला दर्श पाने को हारी धनी||

©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
12:20 am

वाणी वंदना ~ नेह की गंध लुटायें ~ दिलीप कुमार पाठक

वाणी वंदना

नेह की गंध लुटायें।
हवायें चलती जायें।।
माँ वाणी के गीतों को।
तुम गाओ हम गायें।।
हवायें------------
कर दें सब कुछ अर्पण।
मनभावन मन- दर्पण।।
मातु शारदे का सुंदर ।
आओ एक चित्र सजायें।।
हवायें------------
तू मेरी भाग्यविधात्री।
आयी पावन नवरात्री।।
तेरी साधना रोज करूँ।
तेरे दर पर दीप जलायें।।
हवायें----------
छंदोमयी है तेरी वाणी।
एक तू ही जगकल्याणी।।
भाव मेरे तू छंद बना दे।
तेरी हम महिमा गायें।।
हवायें चलती जायें।।
नेह की गंध लुटायें।।

दिलीप कुमार पाठक "सरस"
12:06 am

हम चलि आये द्वार तुम्हार ~ दिलीप कुमार पाठक

चौपई छंद 🌹
विधान - चार चरण, प्रत्येक में १५ मात्राएं।
अंत गुरू एवं लघु।
दो दो चरण  समतुकांत।
😀🙏🏻😀🙏🏻😀
हम चलि आये द्वार तुम्हार|
खट खट करना कितनी बार||
ड्यूढ़ी पर चढ़ आयी साँझ|
कुण्डी खोलौ नैना आँझ||
नैना जाने क्यों लजियात|
अधरा बदरा से गरमात||
छूनी प्रेमभरी बरसात|
पुलकित होते मेरे गात||
होती जाने किससे बात|
सजते सजते हैं बतियात||
कुण्डी खोलत हैं सकुचात|
बीती जाती सारी रात||

©दिलीप कुमार पाठक 
12:04 am

नयनन आप बसे मम आकर ~ दिलीप कुमार पाठक

*◆ कनक मंजरी छंद ◆*
शिल्प~
[4 लघु+ 6भगण (211)+1गुरु] = 23 वर्ण
 चार चरण समतुकांत]
                     या
 {1111+211+211+211
                      211+211+211+2}
नयनन आप बसे मम आकर,
मोहन आकर पीर हरौ|
सजकर बैठ गये किन देशन,
होत अँधेर उजास भरौ||
नटखट चंचल है मन मोहन,
पास रहो मत दूर करौ|
चरनन आप बसा अघ लो यह,
हाथ कृपा को मम शीश धरौ||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
12:03 am

गीत ;~ गहराई में जल मिलता है ~ दिलीप कुमार पाठक

विषय~फल

गहराई में जल मिलता है |
एक सुनहरा कल मिलता है|
आज जरा कुछ करके देखें|
श्रम का खुद ही फल मिलता है ||
बड़े बड़े हैं प्रश्न घनेरे|
खड़े हुए हैं जब तब घेरे||
प्रश्न अगर है तो उत्तर भी|
हर सवाल का हल मिलता है||
श्रम का खुद ही फल मिलता है ~2
चलो भोर की करें बन्दगी|
आओ जी लें बची ज़िन्दगी||
हँस लें गा लें मस्ती कर लें|
पल पल कब यह पल मिलता है||
श्रम का खुद ही फल मिलता है ~2
सरस सरल है अन्तस् गहरी|
साहिल पर चंचल स्वर लहरी||
नवल कमल~सा दर्श तुम्हारा|
तुमसे ही तो बल मिलता है||
श्रम का खुद ही फल मिलता है~2

दिलीप कुमार पाठक सरस

12:01 am

चौपाई ; ~ गयी बीत रतिया अँधियारी ~ दिलीप कुमार पाठक

गयी बीत रतिया अँधियारी|
भोर काल की है उजियारी|
सूरज अँखियाँ खोल रहा है|
मंद पवन भी डोल रहा है||
जागो-जागो खगकुल बोला|
मीठा-मीठा रस है घोला|
पूजा वंदन स्वागत गाना|
ईश चरण में शीश झुकाना|
रोग दोष भय शोक नशाये|
ईश वंदना जो कोई गाये||
सारे जग में है अति प्यारी
प्रभु की लीला सबसे न्यारी||


दिलीप कुमार पाठक सरस


चौपाई
गयी बीत रतिया अँधियारी|
भोर काल की है उजियारी|
सूरज अँखियाँ खोल रहा है|
मंद पवन भी डोल रहा है||
जागो-जागो खगकुल बोला|
मीठा-मीठा रस है घोला|
पूजा वंदन स्वागत गाना|
ईश चरण में शीश झुकाना|
रोग दोष भय शोक नशाये|
ईश वंदना जो कोई गाये||
सारे जग में है अति प्यारी
प्रभु की लीला सबसे न्यारी||

दिलीप कुमार पाठक सरस

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

11:59 pm

गीत ~ भीगी अँखियाँ,अँसुअन जल से ~ दिलीप कुमार पाठक

तन्त्री छंद आधारित एक गीत
विधान~8,8,6,10 पर यति, 32मात्राएँ|
दो चरण समतुकान्त, चरणान्त~दो गुरु|
--------------💐------------------
भीगी अँखियाँ,अँसुअन जल से,
थक हारे, पग घर लौटाये|
उस दिन तुमने, कहा कि आना,
हम पहुँचे, तुम क्यों नहिं आये||
नैनन अंजन, आँझ प्रिये जब,
बन ठन के,मिलने तुम आतीं|
पैर पैंजनी,करती छम छम,
कुछ सुनतीं,कुछ तुम कह जातीं||
फूल मिलन के, खिलते गंधिल,
पथ लख थक, मन में मुरझाये|
उस दिन तुमने,कहा कि आना,
हम पहुँचे, तुम क्यों नहिं आये||
मन में सोचा, जब आयेगी,
खायेगी, है चाट चटोरी|
चार समोसा, मिर्च पकौड़ी,
लीं टिक्की, दो तीन कटोरी||
गरम गरम थीं, फिर सब ठंडी,
ठगे खड़े, कुछ समझ न पाये|
उस दिन तुमने, कहा कि आना,
हम पहुँचे, तुम क्यों नहिं आये||
फूल खिले सब, झरने लागे,
झूठे~से,मन टूटे वादे|
प्यास हृदय की ,घुट घुट बोली,
चल घर अब, सिर बोझा लादे||
मौन बुलाये,कौन सुनाये,
छंदों में, सरस गुनगुनाये|
उस दिन तुमने, कहा कि आना,
हम पहुँचे,तुम क्यों नहिं आये||

©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

11:57 pm

गर्मी खाती आज दुपहरी ~ दिलीप कुमार पाठक

गीत~16,16

डोरे डाल रहीं सुन्दरियाँ|
खाली बादल नैन लड़ाते||
बरसारानी सजकर आजा|
मिलके गर्मी दूर भगाते||
ये हवा चलत फिर मरी मरी|
गर्मी खाती आज दुपहरी~2
चुए पसीना झिलमिल बूँदें|
गर्म हवा के चाँटे खाकर||
सूखे अधरों जीभ फिराकर|
सूरज सिर बैठा खिसियाकर||
पाकड़ छाया राही पकरी|
गर्मी खाती आज दुपहरी~2
रात रात भर तारे गिनते|
हवा कैद सूरज के घर में||
धूप विरह में जलती देखी|
जीवन लगता आज अधर में||
झुलसे मन धरती हरी~भरी|
गर्मी खाती आज दुपहरी~2
©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
10:35 pm

लोकगीत :- चंचल मन - दिलीप पाठक


हमकौ दइ दे थोड़ो प्यार|~2
अब तू नाहीं कर इन्कार||
हमकौ दइ दे थोड़ो प्यार|~2
 
साहिल दूर खड़ो मुस्कावत|
चंचल उर्मि देख ललचावत||
फैलो केतो है विस्तार|
मेरी नैया है मझधार ||
हमकौ दइ दे थोड़ो प्यार|~2
 
कहीं किसी ने नाम पुकारा|
आस पास ही है वह तारा||
मन में श्रद्धा जगी अपार|
होता तुझसे ही उजियार||
हमकौ दइ दे थोड़ो प्यार|~2
 
सरस-सरल-सी प्रीत हमारी|
फूली सुकुमारी फुलवारी||
आ जा गन्धिल हुई बयार|
अब तो डाल गले में हार||
हमकौ दइ दे थोड़ो प्यार||~2
 
खेल खिलौने चंचल मन के|
सुख दुख तो साथी जीवन के||
मेरा तू ही तो संसार|
जीवन जीना है दिन चार||
हमकौ दइ दे थोड़ो प्यार||~2
 

दिलीप कुमार पाठक सरस

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