सुमित शर्मा 'पीयूष'
11:07 am
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रविवार, 12 अप्रैल 2020
सुमित शर्मा 'पीयूष'
11:06 am
मैं उनकी दोहरी नीति - सुमित शर्मा
मैं उनकी दोहरी नीति,
पकड़ बैठा तो अपराधी।
जबदस्ती पिता की गोद,
चढ़ बैठा तो अपराधी।
वो हक से बोलते थे कि,
तुम्हारा हक बराबर का।
मैं अपना हक भी पाने को,
जो लड़ बैठा तो अपराधी।
मैं शाखा जिस तरु का था,
उसे चंदन समझता था।
मेरी बगिया भले छोटी,
इसे नंदन समझता था।
लिपट कर भ्रात की भाँति,
यहाँ एक साँप बैठा था।
मैं उसके दंश को बेशक,
कोई चुम्बन समझता था।
के पहले विषवमन के, फन
जकड़ बैठा तो अपराधी।
मैं अपना हक बचाने को,
जो लड़ बैठा तो अपराधी।
✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻
~पं०. सुमित शर्मा 'पीयूष'
अध्यक्ष : विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत, बिहार
संपर्क : 7992272252
सुमित शर्मा 'पीयूष'
11:04 am
आस न रखना - सुमित शर्मा
अब कोई अहसास न रखना,
गलतफहमियां पास न रखना।
धैर्य तुम्हें न लेने दूँगा।,
अंदर गहरी साँस न रखना।
तुम कृतघ्न थे, छुपकर बैठे,
मानवता का ओढ़ लबादा।
हर अवसर पर, हरेक हाल में,
तुमने बस अपना हित साधा।
तुम अवसर पर काम न आये,
मैं भी काम नहीं आऊँगा।
तुमने स्वार्थ को साधा, फिर
मुझसे ईमान की आस न रखना।
तुम साजिश के तीर पजाते,
हमने भी तूणीर सजाया।
आओ दो-दो हाथ करें अब,
अपना पहलू बहुत बचाया।
छद्म रूप से वार करो तो,
फिर बिन-बाधा वृष्टि करना।
मैं भी अपना दाँव चलूँगा,
तुम थोड़ा अवकाश न रखना।
✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻
~पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
अध्यक्ष : विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत (बिहार इकाई)
संपर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
11:03 am
रोई घर की रोटी थी - सुमित शर्मा
सिसक रही डब्बों में भरकर
आई बोटी-बोटी थी।
चीख रहा था घर का चूल्हा,
रोई घर की रोटी थी।
रोती थी चीत्कार संगिनी,
धड़ से पृथक भुजाओं पर।
रोते थे सब बाल-सखा,
हर गलियों पर, चौराहों पर।
रोती थी संतान कि जिसने,
मुख ना ढंग से खोला था।
रोते सभी खिलौने थे,
रोता सुनसान हिंडोला था।
लिए अंजुरी में बेटे का
मांस, वो मइया रोई थी।
टुकड़ों में, व्याकुल हो ढूंढती
सांस, वो मइया रोई थी।
दिल के सौ उद्गार छिपे थे,
बेबस पिता की आंखों में।
कितने ही चीत्कार दबे थे,
बेबस पिता की आंखों में।
बहना ने कमरे में खुद को,
बंद कर लिया भीतर से।
और दहाड़ें मार-मारकर,
रोने लगी वो भीतर से।
दो ही टुकड़ों में अपना,
अवतार ये कैसा भेज दिया?
राखी के बदले भइया,
उपहार ये कैसा भेज दिया?
तब समाज के रोम-रोम में,
क्रोध अतुल भर आया था।
जब उनका बेटा टुकड़ों में,
बंट कर के घर आया था।
पुरखों की परिपाटी पर,
औ पुलवामा की माटी पर।
घर का सुत कुर्बान हो गया,
काश्मीर की छाती पर।
✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻
~पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
अध्यक्ष : विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत (बिहार)
संपर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
11:02 am
शिव ही ज्ञानी, शिव कल्याणी - सुमित शर्मा
शिव ही ज्ञानी, शिव कल्याणी,
शिव जोगी, शिव औघड़दानी,
शिव संचालक, शिव परिपालक,
शिव ही पालनहार... कर ले शिवरात्रि त्योहार!!
शिव ही सुंदर, शिव ही सनातन,
शिव ही नूतन, शिव ही पुरातन,
शिव ही सृजन हैं, शिव ही पोषण,
शिव ही स्वयं "संहार"... कर ले शिवरात्रि त्योहार!!
शिव ही वाणी, शिव ही वंदन,
शिव करुणा और, शिव ही क्रंदन,
शिव ही अश्रु, शिव ही प्रमोदित,
शिव ही हर्ष अपार... कर ले शिवरात्रि त्योहार!!
शिव ही कामना, शिव ही प्रयोजन,
शिव ही क्षुधा, शिव-नाम ही भोजन,
शिव ही समन्वय, शिव ही समागम,
शिव ही सुखों के सार... कर ले शिवरात्रि त्योहार!!
शिव ही कथा और शिव ही कथानक,
शिव कविता, और शिव रस-कारक,
शिव साहित्य की सृजन-शिला हैं,
शिव संगीत के तार... कर ले शिवरात्रि त्योहार!!
मात-पिता शिव, और सखा शिव,
संकटक्षण में साथ सदाशिव,
शिव ही सरलतम समाधान हैं,
एक शिव ही उद्धार... कर ले शिवरात्रि त्योहार!!
~पं० सुमित शर्मा "पीयूष"
रचना : ७ मार्च २०१६
सुमित शर्मा 'पीयूष'
11:00 am
पाठकों पर छोड़ दो, खुद की - सुमित शर्मा
पाठकों पर छोड़ दो, खुद की
समीक्षा का जरा दायित्व तुम।
स्वयं का लिक्खा हुआ, गर
स्वयं को ही भा गया, तो दोष है।
रच दिया यौवन, तो फिर तन के
उभारों की तनिक चिंता न कर।
'मैं ही मूर्त्तिकार हूँ', यह अहम्
मति को खा गया, तो दोष है।
सृजन से वात्सल्यता का बोध हो,
तबतलक इस प्रेम का रसपान कर।
श्रेष्ठता के भान का चिथड़ा चंदोआ,
खुल के सर पे आ गया, तो दोष है।
पाठकों का भी बड़ा दायित्व है, उन
का समीक्षा से ही बस अभिप्राय हो
मन समीक्षा से उतर कर, अप-
हरण पर आ गया, तो दोष है।
क्षम्य है, जबतक निहारा जाय
कवियों की तरह सौंदर्य को।
नज़र का टाँका लुढ़क कर,
स्तनों पर आ गया तो दोष है।
पुत्र की तरह सृजन को
पोषता है, हर सृजनकर्त्ता सुनो।
हर के मौलिकता किसी की
कोई दूजा खा गया तो दोष है।
✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻
~पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
अध्यक्ष : विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत (बिहार)
संपर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
10:56 am
आखिर देखो सीख लिया, हमने ये सबक जमाने से - सुमित शर्मा
आखिर देखो सीख लिया, हमने ये सबक जमाने से।
सत्य पराजित हो सकता है, बार बार झुठलाने से।
यहाँ खून के रिश्ते मौका देख दगा कर देते हैं।
ये कलयुग है यहां दुआं भी, जहर मिलाकर देते हैं।
रिश्तों की बेबस टहनी जब, काट जला दी जाती है।
उसपर भी स्वारथ की खुली हथेली सेंकी जाती है।
झोंकी जाती है मर्यादा, ईर्ष्या की चिंगारी में।
धुआँ-धुआँ हो जाते रिश्ते, 'लिहाज' की लाचारी में।
बड़ी बेरुखी से फिर भी, ये कह देती भन्सारी है।
"अगिये के है शौक तपाना, टहनी दांव के यारी है।"
अजी! दम्भ के आसमान पर, इतराते मंडराते हैं।
उन्हें गर्व है, धरा के लिये, बादल पूजे जाते हैं।
सर्व विदित है धरती का ही, जल बादल को जाता है।
इसी का हिस्सा खाकर बादल, जगह जगह बरसाता है।
बड़ी बेशर्मी से फिर भी, कहती "कुदरत महतारी" है।
"बदरे के है शौक बरसना, धरती दांव के यारी है।"
~पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
सुमित शर्मा 'पीयूष'
10:52 am
हम प्रकृति का उभय अपवाद हैं - सुमित शर्मा
आज समाज के उस हिस्से की तरफ से लिखने का प्रयास कर रहा हूँ जिसे हम समाज का हिस्सा नहीं मानते। यद्यपि उनकी कोई गलती नहीं और न ही उन्हें इस बात का कोई अफसोस है परंतु हमारी हेय दृष्टि उन्हें कैसा सोचने पर मजबूर कर देती है? एक किन्नर की नज़र से पढ़ें।
रूप से कुरूप हैं, विद्रूप हैं।
हम स्वयं संताप का स्तूप हैं
न सुबह की ओस, न रुत शाम की,
हम दिवा की चिलचिलाती धूप हैं।
नर हैं, नारी, क्या बताएँ हम तुम्हें?
हम तो कुदरत का जना अवसाद हैं।
हम त्रिशंकु हैं गति और कर्म का।
ठोकरें खाती हुईं फरियाद हैं।
हम बिना अग्नि के ही जलती हुई,
राख में लिपटी हुई उन्माद हैं।
आस हैं अस्तित्व की, अधिकार की,
हेय से मुक्ति के हम मोहताज हैं।
खाक में मिलता कोई हम ख्वाब हैं।
हम प्रकृति का उभय अपवाद हैं।
हम जनन के हक से भी वंचित यहाँ।
हम नपुंसकता के बस पर्याय हैं
दोष क्या दें कुदरती कुंठा को हम?
हम तो बेमन से लिखा अध्याय हैं।
हम विधाता का भरे बाजार में
जानकर थोपा गया अन्याय हैं
यूँ कहो कि लाश हैं चलती हुई,
औ लतीफों का असल अभिप्राय हैं।
मुस्कुराहट बाँटते हैं, गम छुपा
हम तो अभिनय के प्रचुर भंडार हैं।
कोढ़ हैं सृष्टि के मानव जात की,
खुद में ही दबती कोई चीत्कार हैं।
हम बिना अपराध के अपराध हैं।
हम प्रकृति का उभय अपवाद हैं।
✍✍✍✍✍✍✍✍
~ पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
अध्यक्ष : विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत (बिहार)
संपर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
10:50 am
दीमक - बड़े जतन से द्वेष मिटाकर, हम संपर्क में आये थे - सुमित शर्मा
**** दीमक ***
---------------
बड़े जतन से द्वेष मिटाकर, हम संपर्क में आये थे।
हम अतीत के घाव भुला कर, प्रेम निभाने आये थे।
हमने फिर बुनियाद थमा दी, कब्र खोदने वालों को।
जज्बातों की डोर सौंप दी, रूह रौंदने वालों को।
छल का छद्म-वस्त्र डालकर, वो मन-घर मे उतर गए।
'अपना' 'अपना' कहकर सारे, घर के पाये कुतर गए।
इनकी नजर लगी थी मेरे हिस्से के अंगूरों पर।
बेवजह विश्वास कर लिया, इन कपटी लंगूरों पर
पता नहीं था ये अजगर जिह्वा निकाल कर बैठे थे।
संतों की पोशाक में इतना जहर पालकर बैठे थे।
हम जबतक सुध लेते तबतक वो कमाल कर बैठे थे।
हम दो कौर न खाए, वो थाली खंगाल कर बैठे थे।
अपने कपट की कैंची से, विश्वास का धागा काट गए।
मेरे हिस्से की चौखट भी, 'दीमक' देखो चाट गए।
✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
~पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
अध्यक्ष : विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत (बिहार)
संपर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
10:43 am
स्तनों में क्षीर न थी आज भी रुखसार की - सुमित शर्मा
*विषय : भूख*
दिनांक : 13 जुलाई 2019
स्तनों में क्षीर न थी आज भी रुखसार की,
औ कदाचित् हद नहीं थी अहद के किलकार की।
किस तरह से वह मिटाती भूख फिर परिवार की,
रोटियां ना शेष थीं भंसार में उधार की।
कोई कुंठा नहीं, वह बस क्षुधा का अनुराग थी।
पीर थी इतनी कि बच्चों के उदर में आग थी।
और शाहिद भी नहीं था सिर टिकाकर रोने को,
दर्द का संचय ही थी वह, शून्य का संभाग थी।
सौ टके की सांस थी और तीन दिन का फासला,
भूख की ज्वाला पे इख्तियार उसका न चला।
औ किसी ने दो टके की मदद तक बख्शी नहीं,
तो विवश नारी अजी बतलाओ करती क्या भला?
भूख का जब खेल न था, खेल अपने हाथ का,
तम ने गर्दन धर लिया फिर चौदसी की रात का
कंपकंपाते करों से ममता ने माया तोड़ दी,
घोंट ही डाला अजी उसनेे गला नवजात का।
बिलबिलाते भूख से कितने अहद मरते यहाँ,
ऐसी ही स्थिति है अजी सैंकड़ों रुखसार की।
जब कोई युक्ति न सूझी क्षुधा के प्रतिकार की
तो कहानी खत्म कर दी भूख के आधार की।
✍✍✍✍✍✍✍✍
~पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
अध्यक्ष : विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत (बिहार)
संपर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
10:41 am
आज उषा में ऊर्जा भर दो - सुमित शर्मा
आज उषा में ऊर्जा भर दो,
सकल - सधन कर दो।
आ हो दिवाकर! आ हो प्रभाकर!
मंगल - मन कर दो।।2।।
तम का एक-एक तार हटा दो,
हर लो निशा की माया।।2।।
तुम प्रकृति पर दिव्य-विभा कर,
मिटा दो छल की छाया।।2।।
आ हो हुताशन, हे तमनाशन!
सकल किरण कर दो।
आ हो दिवाकर! आ हो प्रभाकर!
मंगल मन कर दो।।2।।
तुम दीप्ति से जग सिञ्चित कर,
सत्य की राह दिखा दो।।2।।
हम भी उज्ज्वल बनकर उभरें,
ऐसा कुछ सिखला दो।।2।।
जड़ता को हर, विद्या विभा कर,
तुम पूरण कर दो।
आ हो दिवाकर! आ हो प्रभाकर!
मंगल मन कर दो।।2।।
✍✍✍✍✍✍✍
~पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
अध्यक्ष : वि.ज.ट्र. भारत (बिहार)
संपर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
10:39 am
लज्जा को दरड़ कर, हया को घिसड़ कर - सुमित शर्मा
लज्जा को दरड़ कर, हया को घिसड़ कर,
वासना की गाढ़ी-गाढ़ी, दाल घांटने लगे।
मिट्टी में मिलाके मान, गटर में आन-बान,
बड़े-बड़े कुंठितों के, कान काटने लगे।
खुद की किवाड़ियों में, कामना की कील ठोंक,
नित ही हवस वाली, भूख पाटने लगे।
खुद के गिरेबाँ में ही, अनगिन दाग लगे,
भँड़वे चरित्र का, प्रमाण बाँटने लगे।
बेटियाँ-वधू न दीखीं, बेटियाँ-वधू सरीखी।
उनको भी कामुकी, नज़र ताकने लगे।
बेच खाई हया सारी, वासना की मारामारी,
स्त्री के शरीर का, स्तर आँकने लगे।
कामना की प्यास में ये, तन की तलाश में ये,
बेटे-बेटी-बहुओं के, घर झाँकने लगे।
खुद के गिरेबाँ में ही, अनगिन दाग लगे।
भँड़वे चरित्र का, प्रमाण बाँटने लगे।
✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
~पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
संपर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
10:38 am
जिनपर जख्म दिया अपनों ने, मैं वो हिस्से भूल रहा हूँ - सुमित शर्मा
जिनपर जख्म दिया अपनों ने, मैं वो हिस्से भूल रहा हूँ।
जिनसे यदा-कदा विचलित था, मैं वो किस्से भूल रहा हूँ।।
भूल रहा हूँ उन लोगों को, जिसने अवसर खूब भुनाया।
जिन्हें रास मैं न आ पाया, मैं वो रिश्ते भूल रहा हूँ।।
भूल रहा हूँ उन यादों को, जिनके घाव नहीं भर पाते।
शनै:-शनैः सब भूल रहा हूँ, सने-स्वार्थ-में रिश्ते-नाते।।
चमक रहे थे सिर पर आकर, उनकी भी सच्चाई देखी।
गोधुल में सूरज को मद्धम, देख रहा हूँ मैं उतराते।।
प्रतिदिवस, प्रतिपहर चुकाई, सारी किस्तें भूल रहा हूँ।
जिन्हें रास मैं ना आ पाया, मैं वो रिश्ते भूल रहा हूँ।।
उन बंदों को भूल रहा हूँ, जिसने खंजर पीठ-पजाया।
मेरे नाम का इतर लगाकर, जिसने अपना हित चमकाया।।
जिसने बीज द्वेष के बो-कर, नैतिकता का दम्भ भरा है।
खाद खिन्नता के दे-देकर, अजी क्लेश का पौध उगाया।।
छल के सभी छुहाड़े और, प्रपंची-पिस्ते भूल रहा हूँ।
जिन्हें रास मैं न आ पाया, मैं वो रिश्ते भूल रहा हूँ।।
जिनसे मेरा हित न साधा, मैं वो बातें भूल रहा हूँ।
जिसने सुबह रोक रखी थी, मैं वो रातें भूल रहा हूँ।।
भूल रहा हूँ उस सर्दी को, जिसमें ठिठुर रही थी साँसें।
सब कीचड़-कीचड़ कर डाला, वो बरसातें भूल रहा हूँ।।
कल की बीती सारी बातें, आज, अभी-से भूल रहा हूँ।
जिन्हें रास मैं न आ पाया, मैं वो रिश्ते भूल रहा हूँ।।
✍✍✍✍✍✍✍
~पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
अध्यक्ष : विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत (बिहार)
संपर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
10:36 am
हाँ माना, मैंने ना कर दी, मुझको इस निर्णय का हक था - सुमित शर्मा
हाँ माना, मैंने ना कर दी, मुझको इस निर्णय का हक था।
लेकिन तुम्हारा मुझ पर यूँ, इस तरह भड़कना नाहक था।
तुम एक तरफ़ा थे डूब गए, मेरे तन की सुंदरता पर।
इस चेहरे के गोरेपन पर, इस देह की स्निग्ध सुघड़ता पर।
वह रोज मेरा पीछा करना, उस कॉलेज के दरवाजे तक।
बेढंगा सा लगता था सब, तुम जो समझो उसको बेशक।
मैं नजर झुकाकर चलती थी, उसे प्यार समझते थे न तुम?
मेरे दिल पर एक अपना ही, अधिकार समझते थे न तुम?
अपने मित्रों को दिखला कर, तुम मोल लगाते थे मेरा।
वह माल मेरी है, यह कहकर, सम्मान बढ़ाते थे मेरा।
एक सीमा होगी, यह विचार, चुपचाप मैं ये सब सहती थी।
हर-रोज पीड़ित बन जाती थी,पर किसी से कुछ न कहती थी।
उस दिन तो तुमने हद कर दी, जब हाथ सड़क पर पकड़ लिया।
मेरा झटका दे देने पर, तुमने मुझको ही जकड़ लिया।
तुमसे बचने का पास मेरे, न दूजा कोई सहारा था।
तब ना कहकर मजबूरी में ही तुम्हें तमाचा मारा था।
मैं मान रही थी तब तुमको, तो अक्ल जरा आई होगी।
मैं क्षमा माँग लूँगी फिर से, नुकसान की भरपाई होगी।
पर मद में चूर थे मर्द बड़े, तुम हार भला कैसे जाते?
अपना पौरुष दिखलाये बिना, बिसार भला कैसे जाते।
मैं ही तो बड़ी अभागी थी, अपनी किस्मत से छली गई।
जो तुम्हें समझ कर शर्मिंदा, मैं क्षमा माँगने चली गई।
तब वक्ष-वीथिका धरकर तुमने, मुझको परे धकेल दिया।
कुछ कहने से पहले तुमने, मुँह पर तेजाब उड़ेल दिया।
मैं लहर गई, हाँ लहर गई, औ कतरा-कतरा कतर गई।
मैं छुपा रही थी चेहरे को, चमड़ी हाथों में उतर गई।
मैं समझ सकी षड्यंत्र नहीं, अग्नि में मेरा अतीत गया।
मैं भौंचक सी जल रही थी बस, पुरुषार्थ तुम्हारा जीत गया।
अब देखो विकृत शक्ल लिए, मैं दर-दर ठोकर खाती हूँ।
जब करूँ सामना दर्पण का, मैं खुद से ही डर जाती हूँ।
जो पा न सके तो जला दिया, यह प्यार तुम्हारा कैसा था?
यह शक्ल मेरी, शरीर मेरा, अधिकार तुम्हारा कैसा था?
तुमने तो हमको जीते-जी, एक लाश बना कर छोड़ दिया।
हर पल ही घुटते रहने का, अहसास बना कर छोड़ दिया।
सब गई नीलिमा आँखों की, अधरों की स्निग्धता बिसर गई।
भौंहें टेढ़ी, नथुना टेढ़ा, चेहरे की चमड़ी सिकुड़ गई।
इस जलन की पीड़ा क्या लिक्खूँ? हर रोज ही तिल-तिल मरती हूँ।
शक्ल की अपनी देख विकृति, हर एक शाम हहरती हूँ।
मैं नहीं अकेली धरती पर, लाखों ने इसको झेला है।
सबपर बस एक ही मकसद से, नर ने तेजाब उड़ेला है।
है प्रेम उसे बस काया से, मिथ्या का प्यार जताता है।
जबरन अधिकार जताता है, फिर हमें शिकार बनाता है।
नर जो चाहे कर सकता है, उसके पौरुष का तोल नहीं।
नारी उपभोग की वस्तु है, उसकी पसंद का मोल नहीं।
अब सब्र की सीमा टूट गई, सब टूट गया है धैर्य मेरा।
तुमने किस हक से छीन लिया, प्रकृति मेरी, सौंदर्य मेरा?
गर अभी तुम्हें मैं हाँ कर दूँ! क्या रज में रस कर सकते हो?
इस बिगड़े शक्ल की आकृति, क्या तुम वापस कर सकते हो?
पर नहीं! तुम्हें तो बस जबरन, अधिकार जताना आता है।
औ पा न सके जबरदस्ती, तो उसे मिटाना आता है।
ईश्वर न करे, कि अनुभव हो, एक दिन ऐसी ही जलन तुम्हें।
तेजाब से जली दिखलाए, जब शक्ल तुम्हारी बहन तुम्हें।
🙏🌸🙏🌸🙏🌸🙏🌸🙏
✍✍✍✍✍✍✍
रचनाकार : पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
संपर्क : 7992272251
अध्यक्ष : ज.सा.सा.समिति (बिहार)
सुमित शर्मा 'पीयूष'
10:35 am
एक फूल खिला बरसों के बाद, घर के बंजर ओसारे में - सुमित शर्मा
विषय : पुष्प
एक फूल खिला बरसों के बाद, घर के बंजर ओसारे में।
माँ की ममतामय मिट्टी में, बाबा की बाँहों के क्यारे में।
उस फूल की सुंदरता ऐसी, जैसे रति ने हो स्वांग भरा।
ज्यों भरी स्निग्धता कूट-कूट, पंखुड़ियों तक में पराग भरा।
अधरों पर स्मित सी लकीर, ऐसा कुदरत ने खींचा था।
लज्जा औ लरज की डाली को, खुद शील-स्नेह ने सींचा था।
इस डर से कि न सूख सके, औ रहे सुरक्षित डाली में।
माँ-बाप लगे रहते नित-दिन, उस बेटी की रखवाली में।
ज्यों-ज्यों पौधा वह बड़ा हुआ, औ तने पे अपने खड़ा हुआ।
तब सख्त-पना था टहनी में, स्वभाव पुष्प का कड़ा हुआ।
माँ-बाप का नित सौगुण सिंचन अब तो न तनिक सुहाता था।
घर की ड्योढ़ी से झाँक उसे, बाहर का पथिक लुभाता था।
एक रोज वह सूर्योदय से पूर्व, अन्तस् पीड़ा से जाग गई।
छुप-छुप कर के अपनों से ही, वह पथिक संग फिर भाग गई।
माँ-बाप बिलखते थे निशि-दिन, अपनी उस पुष्प की करनी पर।
पत्ते तक करते थे विलाप, सौंदर्य बचा न टहनी पर।
बीत गए दिन शनै: शनै:, इस बात के अरसे गुजर गए।
उस पुष्प के अल्हड़ बचपन के, यादें यादों से उतर गए।
तब एक रोज माँ ने देखा, कुछ तितलियों की आहट पर।
वह फूल विक्षत हो बिखरी थी, अपने ही घर की चौखट पर।
बेजान हुई, निष्प्राण हुई वह, अब चौखट पर लेटी थी।
था वेश भिखारन सा उसका, जो इस घर की ही बेटी थी।
माँ चीख उठी कर हाय-हाय, यों पीट वक्ष को करतल से।
निर्वस्त्र पुष्प की काया को, ढँक दिया सुलगते आँचल से।
उस ममता की शक्ति से ऐसी, पुष्प-देह में आग उठी।
कब तक बेसुध सोई रहती वह? सिसक-सिसक कर जाग उठी।
वह बोली, माँ मैं छली गई, इस जगत के मिथ-आकर्षण से।
झूठे विश्वास के धागे से, मिथ्या के प्रेम-प्रदर्शन से।
मैं तो अपनी ही करनी से, माँ रोज मौत-एक मरती थी।
नित पथिक की बाहें निष्ठुरता से मेरे पंख कतरती थी।
एक रोज तो हद हो गई कि जब उसने भारी मदिरा-मय में।
एक पशु की भाँति बेच दिया, मुझको जबरन वेश्यालय में।
ज्यों-ज्यों लिबास कतरा जाता, मैं भी कतरन हो जाती थी।
हर रोज उर्वशी सी सजती, औ फिर उतरन हो जाती थी।
मैं कतरा-कतरा हुई थी माँ, एक रोज जो आई शामत थी।
उस होनी का होना सचमुच माँ मेरे लिए कयामत थी।
उस कोठे की एक कोठर में, मुझको बेहोश कर चले गए।
दस-बीस भेड़ियों के सम्मुख, मुझको परोस कर चले गए।
उन भूखे सभी दरिंदों ने, सब हदें पार कर डाली माँ।
कर गए चीथड़े अस्मत के, सब तार-तार कर डाली माँ।
दस दिन भूखा-प्यासा रक्खा, जब अदा बची न करवट पर।
तब मार-पीट कर फेंक गए, मुझको मेरे ही चौखट पर।
किस मुँह से अब माफी माँगूँ, माँ शब्द मेरे लड़खड़ा रहे।
माँ छोड़ दो मेरी लाश यहीं, यह चौखट पर ही पड़ा रहे।
मैंने खुद का तक न सोचा, मैं कितनी बड़ी अभागी हूँ?
अब सदा के लिये सोने दो, सौ बार तो मरकर जागी हूँ।
कुछ बोलो माँ आखिरी बार, अब तुम्ही को सुनना चाहूँ मैं।
लोरी ही चलो सुना दो न, एक नींद ही बुनना चाहूँ मैं।
कुछ पल तक न आवाज हुई, न हुआ हवा का कोई असर।
दो लाशें अब थी पड़ी हुई, दोनों चौखट के इधर-उधर।
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रचनाकार : पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
संपर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
10:33 am
माँ सरस्वती के सादर चरणों में :- सुख-समृद्धि-सुसंस्कृति भरकर - सुमित शर्मा
सुख-समृद्धि-सुसंस्कृति भरकर
तुम पूरन कर दो।
हे ज्ञानदायिनी, वीणावादिनी
मंगल मन कर दो।
हम खाली है अंतस् खाली,
ज्ञान की ज्योत जला दो।
मन निर्मल, मस्तिष्क शुचित
कर, ज्ञान का नीर बहा दो।
मार्ग विमल कर,विद्या-विभा दो,
पथ रोशन कर दो।
हे ज्ञानदायिनी, वीणावादिनी
मंगल मन कर दो।
नेह के पुष्प खिला दो माते,
स्नेहासव से भर दो।
नीरसता जीवन में न जकड़े,
अब ऐसा कुछ कर दो।
वीणा की झंकार से मैया,
मस्त मगन कर दो।
हे ज्ञानदायिनी, वीणावादिनी,
मंगल मन कर दो।
~पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
अध्यक्ष : ज. सा. सा. समिति (बिहार)
संपर्क : 7992272251
सोमवार, 6 अप्रैल 2020
सुमित शर्मा 'पीयूष'
12:12 pm
कौन सी दौलत भरूँ - सुमित शर्मा
उफ! जलन बाती के तन की, दीये को दिखती नहीं।
लौ तो अंदर तक जली, पर पेंद को दीप्ति नहीं।
कौन सी दौलत भरूँ अब, बिन तली की टोकरी में।
फट गया बादल यहाँ, और नदी को तृप्ति नहीं।
घिस गए जूते मगर, मंजिल ने रक्खा फासला।
हम कदम कैसे बढ़ाते? होश था, न हौसला।
फिर भी अपना खूँ जलाकर, हम सुलगते चल पड़े।
राख होकर जब बढ़े तो, सामने था जल-जला।
हो चुकी जो राख रोटी, दुबारा सिंकती नही।
यह हकीकत जलजले को, क्यों भला दिखती नहीं?
कौन सी दौलत भरूँ अब बिन तली की टोकरी में?
फट गया बादल यहाँ, औ' नदी को तृप्ति नहीं।
मैं अभी तक होश में हूँ, प्यास हो तो फिर कहो।
बुझ रही पावक, तपन की आस हो तो फिर कहो।
लाश में भी श्वास का, अनुप्रास जो तुम ढूँढते हो।
मृत्यु-क्षण के दर्द का, अहसास हो तो फिर कहो।
हाँ! कृत्रिम संवेदना, बाज़ार में बिकती नहीं।
ये हकीकत ग्राहकों को, क्यों भला दिखती नहीं
कौन सी दौलत भरूँ अब बिन तली की टोकरी में?
फट गया बादल यहाँ, औ' नदी को तृप्ति नहीं।
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पं० सुमित शर्मा 'पीयूष'
अध्यक्ष : जनचेतना सा. सा. समिति (बिहार)
संपर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
12:11 pm
सतह देखकर भ्रम मत पालो - सुमित शर्मा
अधरों पर मुस्कान भी है, और माथे पड़ता बल भी है।
आँखें चमक रहीं हैं, भीतर मेंड़ काटता जल भी है।।
अपना हुनर बड़ा पक्का है, हर तकलीफ छुपाने का।
सतह देखकर भ्रम मत पालो, अंदर उथल-पुथल भी है।।
मेरे हृदय की व्यथा, अहो! तुमने जरा सी कम आँकी।
तुमने अड़ियल पर्वत देखे, उड़ती धूल नहीं फाँकी।।
यही काल का मारा पर्वत, अंदर-अंदर रोता है।
जब उसके पोषित जल से ही, मृदा-अपरदन होता है।।
बाहर दिखता समतल समतल, भीतर कुछ हलचल भी है।
सतह देखकर भ्रम मत पालो, अंदर उथल-पुथल भी है।
भीग रही है धरती देखो, बारिश कोने-कोने में।
संचय करती जाती है जल, छोटे-बड़े भगोने में।
यही धरा जब फटकर पपड़ी पपड़ी बस रह जाती है।
बादल की दुहरी नीति, हाँ तभी समझ में आती है।
इसी धरा पर जंगल भी है, यहीं पड़ा मरुथल भी है।
सतह देखकर भ्रम मत पालो, अंदर उथल-पुथल भी है।।
किसी मनुज के चेहरे से ही, हाल आँकना उचित नहीं।
उसको खाने दो जो खाये, थाल ताकना उचित नहीं।
जीवन की सच्चाई सुन लो, बात बहुत ही छोटी है।
हर कोई मजदूर यहाँ है, सबका ध्येय ही रोटी है।।
दो कौर जुटाना कल भी था, दो कौर जुटाना कल भी है।
सतह देखकर भ्रम मत पालो, अंदर उथल-पुथल भी है।।
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~पं० सुमित शर्मा "पीयूष"
अध्यक्ष : ज.सा.सा.समिति (बिहार)
सम्पर्क : 7992272251
सुमित शर्मा 'पीयूष'
12:09 pm
जिस माली ने सींचा मुझे, उस माली का भी शुक्रिया - सुमित शर्मा
अपने पिता-तुल्य गुरु (श्रीमान जी) श्री सत्येंद्र प्रसाद सिंह, 'प्रधानाध्यापक : ज्ञान भारती, विज्ञान क्लब, बाढ़ (पटना)' एवं माता-तुल्य गुरुमाता श्रीमती ममता देवी (दीदीजी) को समर्पित मेरी यह नूतन रचना।
(तर्ज : ये तो सच है कि भगवान है)
जिस डाली में बचपन खिला, उस डाली का भी शुक्रिया।
जिस माली ने सींचा मुझे, उस माली का भी शुक्रिया।।
संस्कृति सींचकर, जिसने पोषण दिया।
ज्ञान के पुंज से, जिसने रोशन किया।
उंगलियाँ थामकर, शब्द जिसने गढ़े,
सत्य की खाद का, जिसने भोजन दिया।
दोपहर की वो "ममता" भरी, उस "थाली" का भी शुक्रिया।
जिस माली ने सींचा मुझे, उस माली का भी शुक्रिया।।
शिष्टता संचयन, प्रेम का पल्लवन,
ज्ञान-गंगा के गोमुख का सु-प्रस्फुटन।
ऐसी भागीरथी, को मेरा सौ नमन,
उनके पग-तल के प्रालेय का आचमन।
धार को जिसने दे दी दिशा, उस कुदाली का भी शुक्रिया।
जिस माली ने सींचा मुझे, उस माली का भी शुक्रिया।।
हम तो बे-पैर थे, उन्होंने पाँव दी,
अक्षरों की नदी में, हमें नाव दी
झुर्रियाँ गाल पर अब जताती हैं ये,
धूप उसने सही, पर हमें छाँव दी।
खुद जलीं पर, हमें रच गईं, उस पराली का भी शुक्रिया।
जिस माली ने सींचा मुझे, उस माली का भी शुक्रिया।।
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~पं० सुमित शर्मा "पीयूष"
सुमित शर्मा 'पीयूष'
12:07 pm
आकाश है जनचेतना - सुमित शर्मा 'पीयूष'
बिलखते शब्दों की अंतिम आस है जनचेतना।
सिकुड़ते साहित्य की हर साँस है जनचेतना।
युग-तिमिर में भोर का प्रकाश है जनचेतना।
सबका ही तो साथ औ' विकास है जनचेतना।
हर कड़ी में काव्य का अनुप्रास है जनचेतना।
उन्मुक्त सा अहसास है, "आकाश" है जनचेतना।
शिल्प औ सर्जन की सु-सत्कार है जनचेतना।
काव्य से क्रीड़ा का इक अधिकार है जनचेतना।
भाव के बहाव की धारा प्रणोदित जो करे,
सृजन के संगम में वह जलधार है जनचेतना।
वारिधि का उरनिहित-उल्लास है जनचेतना।
उन्मुक्त सा अहसास है, "आकाश" है जनचेतना।
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~पं० सुमित शर्मा "पीयूष"
अलंकरण प्रमुख :
ज० सा० सा० समिति - 226
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