हिंदी साहित्य वैभव

EMAIL.- Vikasbhardwaj3400.1234@blogger.com

Breaking

बलजीत सिंह बेनाम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बलजीत सिंह बेनाम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

7:17 pm

मोहब्बत की दुनिया बसाने से पहले

रचना प्रकाशन हेतु प्रमाण पत्र
सेवा में,
       सम्पादक महोदय
        हिंदी साहित्य वैभव वेब पत्रिका
        
        

श्रीमान जी,
         सविनय निवेदन यह है कि मेरी यह ग़ज़ल नितांत मौलिक,अप्रकाशित और अप्रसारित है और मैं इसके प्रकाशन का अधिकार हिंदी साहित्य वैभव वेब पत्रिका को देता हूँ! आशा है मेरी इस रचना का यथासंभव उपयोग आपकी पत्रिका में हो सकेगा!
           धन्यवाद
          भवदीय
         बलजीत सिंह बेनाम
       जन्म तिथि:23/5/1983
       शिक्षा:स्नातक
        सम्प्रति:संगीत अध्यापक
        उपलब्धियां:विविध मुशायरों व सभा संगोष्ठियों में काव्य पाठ
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
विभिन्न मंचों द्वारा सम्मानित
सम्पर्क सूत्र: 103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी, हाँसी
ज़िला हिसार(हरियाणा)
मोबाईल नंबर:9996266210

ग़ज़ल

मोहब्बत की दुनिया बसाने से पहले
न लेंगे इजाज़त ज़माने से पहले

बहुत बदतमीज़ी से वो पेश आया
अदब के तरीके सिखाने से पहले

अमीरों का दिल काँपता ही नहीं है
ग़रीबों की हस्ती मिटाने से पहले

किसी शख्स को खोने का खौफ़ भी है
उसे अपने जीवन में लाने से पहले

कभी मैं बशर सीधा साधा बहुत था
जहां की निग़ाहों में आने से पहले

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

12:34 am

ग़ज़ल :- मुहब्बत की तड़प कितनी बुरी है

रचना प्रकाशन हेतु प्रमाण पत्र
सेवा में,
     सम्पादक महोदय
     हिंदी साहित्य वैभव पत्रिका
श्रीमान जी,
      सविनय निवेदन यह है कि मेरी यह रचना(ग़ज़ल) नितांत मौलिक,अप्रकाशित और अप्रसारित है और मैं इसके प्रकाशन का अधिकार हिंदी साहित्य वैभव पत्रिका को देता हूँ!आशा है मेरी इस रचना का यथासम्भव उपयोग आपकी पत्रिका में हो सकेगा!
           धन्यवाद
          भवदीय
         बलजीत सिंह बेनाम
        103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी
        हाँसी(हिसार)
        मोबाईल:9996266210
ग़ज़ल
मुहब्बत की तड़प कितनी बुरी है
वही है जानता जिसको हुई है

जियो तुम ज़िंदगी को इस तरह से
लगे यूँ एक पल में उम्र जी है

बता सकते नहीं खुल कर जहां को
अजब इन मुफ़लिसों की बेबसी है

तुम्हे देखा है बरसों बाद अब तक
तुम्हारे हुस्न में वो ताज़गी है

फ़क़त कहने को हैं इक छत के नीचे
क़दूरत सबके दिल में पल रही है

शनिवार, 4 जनवरी 2020

12:49 am

इक अजब सा है सिलसिला अपना

रचना प्रकाशन हेतु प्रमाण पत्र
सेवा में,
     सम्पादक महोदय
     हिंदी साहित्य वैभव पत्रिका
श्रीमान जी,
      सविनय निवेदन यह है कि मेरी यह रचना(ग़ज़ल) नितांत मौलिक,अप्रकाशित और अप्रसारित है और मैं इसके प्रकाशन का अधिकार हिंदी साहित्य वैभव पत्रिका को देता हूँ!आशा है मेरी इस रचना का यथासम्भव उपयोग आपकी पत्रिका में हो सकेगा!
           धन्यवाद
          भवदीय
         बलजीत सिंह बेनाम
        103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी
        हाँसी(हिसार)
        मोबाईल:9996266210
ग़ज़ल
इक अजब सा है सिलसिला अपना
मंज़िलें उसकी रास्ता अपना

रोकते भी किसी को क्या आख़िर
हर किसी का था देवता अपना

ज़िक्र जितना बयां किया हमने
दर्द उतना ही है बढ़ा अपना

ज़िंदगी पर बहुत भरोसा था
इसने भी ख़ूँ फ़क़त पिया अपना

हाँ ख़ुदा ने बहुत दिया लेकिन
फिर भी क्यों जी नहीं भरा अपना

विशिष्ट पोस्ट

सूचना :- रचनायें आमंत्रित हैं

प्रिय साहित्यकार मित्रों , आप अपनी रचनाएँ हमारे व्हाट्सएप नंबर 9627193400 पर न भेजकर ईमेल- Aksbadauni@gmail.com पर  भेजें.