हिंदी साहित्य वैभव

EMAIL.- Vikasbhardwaj3400.1234@blogger.com

Breaking

हिंदुस्तानी_ग़ज़ल - प्रस्तुति डॉ_निशान्त_असीम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिंदुस्तानी_ग़ज़ल - प्रस्तुति डॉ_निशान्त_असीम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 21 मार्च 2020

6:17 am

डॉ_वशीर_बद्र - पूरा इंटरव्यू यहाँ पढ़े - डा_निशान्त_असीम

#ग़ज़ल_की_भाषा_हिंदुस्तानी_है
#डॉ_वशीर_बद्र
( पूरा इंटरव्यू यहाँ पढ़े ) पद्मश्री बशीर साहब की शायरी अदब और आम-जनमानस में ख़ास मक़ाम रखती है। हिंदुस्तानी-भाषा के इस हरदिल-अजीज शायर को उर्दू वाले उर्दू का और हिन्दी वाले हिन्दी का समझते हैं, इतनी मुहब्बत शायद ही किसी शायर को मिली हो। वर्ष 2005 में वे बदायूँ-महोत्सव में मुशायरा पढ़ने आये थे, उस अवसर पर उन्हें फ़ानी-शकील अवार्ड से नवाजा गया था। उसी समय उनका यह इंटरव्यू मुझ नाचीज़ ने लिया था, जो संजय शर्मा जी के सम्पादन में लखनऊ से प्रकाशित  #वीक_एंड_टाइम्स  में 05 मार्च 2005 को प्रकाशित हुआ था।
तो चलिये मेरे साथ उन ऐतिहासिक लम्हों में ...


असीम : शायरी के गढ़ और शकील-फ़ानी की सरज़मीं पर, उन्हीं के नाम का अवार्ड पा कर कैसा लग रहा है ?

बद्र साहब : ... मैं इसे अल्फ़ाज़ों में बयां नहीं कर सकता। मुझे फ़क्र है कि बदायूँ-शरीफ़ के लोगों ने मुझे इस अवार्ड के क़ाबिल समझा। जिसके लिए मैं उनका शुक्रगुज़ार हूँ। यह इस ज़मी की कशिश ही है कि मैं यहाँ खिंचा चला आता हूँ।

असीम : शायरी के इस मक़ाम पर पहुँच कर कैसा महसूस करते हैं ?

बद्र साहब : ठीक वैसा ही जैसा एक आम आदमी महसूस करता है। ख़ुशी होती है कि मेरे चाहने वाले मुझसे इतनी मुहब्बत करते हैं।...मग़र अब ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गयीं हैं।

असीम : किस तरह की ज़िम्मेदारियाँ ?

बद्र साहब : यही कि जो भी लिखूँ उसके ज़रिये लोगों को कुछ न कुछ नसीहत या पैग़ाम मिले, उन्हें  ऐसा लगे जैसे कि मैंने उनकी बात कह दी।

असीम : ' उनकी बात ' से क्या मतलब है ?

बद्र साहब : ..... ( गम्भीरता से ) आज ज़िन्दगी की रफ़्तार बहुत तेज़ है। कल्चर, एटमॉस्फियर सब कुछ बदला है, जिसकी वजह से आदमी के न सिर्फ़ दुःख-दर्द बढ़े हैं बल्कि वो जज़्बाती भी हुआ है। ऐसे में उसे अगर एक शेर ऐसा मिल जाये जो उसे हार्डली टच करता हो तो यक़ीनन उसे सुकून मिलेगा और उसे वो याद रखेगा। फिर वो शेर मेरा हो, आपका हो या किसी और का हो।

असीम : एक्चुअल में आप शायरी किसे मानते हैं ?

बद्र साहब : एक शायर के नज़रिए से, जो हर तरह से ग्रामर का एहतराम करती हो और एक आम आदमी की नज़र से, वो बिना परेशानी या डिक्शनरी के सबकी समझ में आये और जो मैंने अभी कहा कि हार्डली टच करे।

असीम : मीर, दाग़, ग़ालिब, फ़ानी , जिगर में आप किसे पसन्द करते हैं ?

बद्र साहब : ये तो ऐसे ही हुआ जैसे कि आप कहें कि आसमान का कौन सा तारा आपको पसन्द है। ...सभी की शायरी का अपना मिजाज है, अपना मुकाम है। लेकिन लिट्रेचर की नज़र से ग़ालिब और मीर पर भारत और पाकिस्तान की यूनिवर्सिटीज में काफ़ी काम हुआ है।

असीम : पाकिस्तान का ज़िक्र हुआ तो, आप एक शायर के नाते भारत और पाकिस्तान के सम्बंधो को किस नज़र से देखते हैं ?

बद्र साहब : बिल्कुल एक आम हिंदुस्तानी की नज़र से, अभी तो उस दिन की शाम भी नहीं हुई है, जिसकी सुबह में हम साथ-साथ रहते थे। दोनों की अवाम चाहती है कि आपस में प्यार हो, अम्न हो, मैंने तो बहुत पहले ये शेर कहा था -
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों।

असीम : आज हिन्दी में भी ग़ज़ल कही जा रही है, हिन्दी वाले इसे दुष्यन्त कुमार की परम्परा मानते हैं। क्या ग़ज़ल को हिन्दी-उर्दू में बांटा जा सकता है ?

बद्र साहब : शायरी को जाति या भाषा के नाम पर नहीं बाँटा जा सकता है। ...सच तो ये है कि हिन्दी-उर्दू एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, यह तो दुष्यन्त साहब ने भी कहा था। ग़ज़ल की अपनी एक तहज़ीब है उसे भाषाओं के नज़रिये से नहीं बांट सकते। वास्तव में आज की, ग़ज़ल की भाषा हिंदुस्तानी है। भाषा की हिस्ट्री में पढ़े तो हमें पता चलेगा कि उर्दू-हिन्दी अलग नहीं हैं, बस लिखबट का फ़र्क है। यह दोनों संस्कृत भाषा की मुश्किल से नवीं-दसवीं पीढ़ी हैं। ...अब इसे थोड़ा माडर्न टच दे दिया गया है। यह हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी मिक्स हिंदुस्तानी ज़बान पूरे हिंदुस्तान में बोली और समझी जाती है। शायरी और कविता की भी यही भाषा है, मेरा यह शेर देखिये -
ये साहिल है यहाँ तो,
मछलियाँ कपड़े बदलती हैं।
बताइये इसे आप क्या कहेंगे, हिन्दी या उर्दू ?

असीम : आपके कुछ दीवान देवनागरी-लिपि में भी प्रकाशित हुये हैं, इसके पीछे कोई ख़ास वजह ?

बद्र साहब : वो इसलिए कि उसे हिन्दी-भाषी.....( रुकने के बाद कुछ देर सोच कर ) .... बल्कि हिन्दुस्तानी कहूँ तो अच्छा रहेगा... जानने वाले और देवनागरी-लिपि में लिखने-पढ़ने वाले भी उसे पढ़ सकें। क्योंकि देश में ऐसे लोगों की तादाद ज़्यादा है, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है।

असीम : आपने फ़िल्मों में गीत लिखने के प्रति दिलचस्पी क्यों नहीं दिखायी ?

बद्र साहब : क्योंकि वहाँ आज की तारीख़ में शायरी को शायरी रख पाना बहुत मुश्किल काम है। इसलिए मैंने ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई, ऑफ़र तो बहुत आये, आज भी आते हैं।

असीम : आज देश अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है, शायरी के जरिये आपने उन्हें उठाने या उनका हल देने की कोशिश की ?

बद्र साहब : सवाल अच्छा किया आपने... बिल्कुल कोशिश की। वैसे भी शायरी या लिट्रेचर को समाज और देश का आइना कहा जाता है। मैंने उसी आईने को दिखाने की लगातार कोशिश की है और कर रहा हूँ। चन्द अशआर देखिये-
जब भी बादलों में घिरता है,
चाँद लगता है आदमी की तरह।
रात का इंतज़ार कौन करे,
आजकल दिन में क्या नहीं होता।

असीम : आज आपको देश की सबसे बड़ी प्रॉब्लम कौन सी लगती है ?

बद्र साहब : मेरे ख़्याल से ग़रीबी और भ्रष्टाचार ही देश की मेन प्रॉब्लम हैं। यह खत्म हो जायें तो यक़ीनन हर तरफ़ अम्न होगा।

असीम : पद्मश्री पाने के बाद कुछ और पाने की तम्मना है ?

बद्र साहब : ... बस अपने सामईन से यूँ ही प्यार और इज्ज़त मिलती रहे, जिससे ज़िन्दगी का बाक़ी सफ़र मुहब्बत से कट जाये।

असीम : आमीन ! आखिर में कोई पैग़ाम देशवासियों के लिये ....

बद्र साहब : सभी देशवासी मिल-जुल कर अमन और प्रेम के दीपक जलाते रहें, जिससे न केवल हिंदुस्तान बल्कि सारी दुनियाँ मुहब्बत से जगमगा उठे।

साक्षात्कार
#डा_निशान्त_असीम
संस्थापक/अध्यक्ष : हिन्दुस्तानी ग़ज़ल अकादमी ( रजि.)

गुरुवार, 19 मार्च 2020

10:10 pm

हिन्दुस्तानी ग़ज़ल क्या है आइये समझते है -डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
हिंदुस्तानी-ग़ज़ल अलग से साहित्य की कोई बिधा नहीं है बल्कि उसमें हिन्दी-ऊर्दू की वे सभी ग़ज़लें शामिल हैं, जो आम बोलचाल की आसान हिंदुस्तानी ज़बान में कहीं गयीं हैं और उन ग़ज़लों की तहज़ीब हिन्दुस्तानी है।

आज जहाँ लोग भाषा और सम्प्रदाय में ख़ुद को बाँटे हुये बैठे हैं, वहाँ  ये " ग़ज़ल " ही है जो सदियों से समाज को जोड़ने का काम कर रही है।
ग़ज़ल लोगों की ज़बाँ पर रहते-रहते, कब सद्भावना की मिसाल बन गयी किसी को पता ही नहीं चला। वक़्त ने चलते-चलते जब अपने अतीत को अदब के आइने में देखा तो उसे अहसास हुआ है कि ग़ज़ल सिर्फ़ साहित्य की विधा ही नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग और हर उम्र के, लोगों के दिलों की धड़कन भी है।
दो समकालीन उर्दू और हिन्दी ग़ज़लकारों के शे'र देखिये-

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये,
और मैं था कि सच बोलता रह गया।
-प्रो. वसीम बरेलवी

दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए,
सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिये।
- डॉ. कुँअर बैचैन

अब अगर ये दोनों शे'र देवनागरी लिपि की जगह फ़ारसी लिपि में लिख दिए जायें, तो भी किसी शे'र  में कुछ भी नहीं बदलेगा। क्योंकि लिपि सदैव ही किसी भाषा की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं करती। जैसे कि जब हम सैलफोन पर  हिन्दी का कोई मैसेज रोमन लिपि में टाइप करते हैं तो वह मैसेज रोमन लिपि में टाइप होने के बाबजूद भी अंग्रेजी भाषा का नहीं कहलाता, वह हिन्दी-भाषा का ही कहलाएगा। अतः ये शे'र ज़बान के लिहाज से उर्दू-अदब के भी हैं और हिन्दी-साहित्य के भी हैं।
 ... अब चलो क्रिया-शब्दों (Verbs) से देखते हैं, क्योंकि किसी भाषा के क्रियापद उसके अपने होते हैं और वे भाषा को भी प्रमाणित करते हैं। जबकि संज्ञापदों (Noun) की स्थिति लिपि वाली ही होती है, इसलिए यहाँ उसकी चर्चा करने का कोई फ़ायदा नहीं है। अब ग़ौर करने वाली बात यह है कि हिन्दी और उर्दू के क्रियापद एक जैसे ही होते हैं। इसलिये इन शेरों में क्रियापद भी एक जैसे ही हैं। अर्थात यह अशआर हिन्दी-उर्दू दोनों के ही क़रीब हैं।
चलिए अब भाषा के लिहाज से देख लेते हैं, तो दोनों शेरों में न तो मुश्किल उर्दू/फ़ारसी के अल्फाज़ हैं और न क्लिष्ट हिन्दी/संस्कृतनिष्ठ शब्द हैं। अतः यह दोनों शे'र मिश्रित हिन्दी-उर्दू वाली आसान ज़बान में हैं। जो हम लोग सुबह से लेकर शाम तक बोलते हैं । ....जो सही मायने में हिंदुस्तानी ज़बान है। हिंदुस्तानी ज़बान में हिन्दी-उर्दू के अलावा भारत में बोली जाने वाली उन सभी भाषाओं और बोलियों के शब्द शामिल हैं, जो चलन में आ गये हैं और लोग बिना किसी भाषाई झमेले के बोलते हैं।
भाषाई कट्टरता किसी भी भाषा को संकीर्ण कर देती है जबकि  उदारता और सहिष्णुता भाषा को समृद्ध बनाती है। किसी भाषा या विधा को किसी जाति, क्षेत्र या धर्म की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता है। लेकिन इस स्थिति में एक चीज़ समझने की है, वो है संस्कृति। जिसकी विशेष भूमिका होती है,क्योंकि जब कोई विधा या शब्द दूसरी संस्कृति से आते है, तो हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि उस विधा या शब्द को  उसके मूल रूप में ही सम्मान दें, फिर चाहे अरूज़ (व्याकरण) का मामला जो या तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) का।
शुक्र है कि हिन्दी और उर्दू भाषाओं के बीच कोई भाषाई कट्टरता या भेदभाव नहीं है। दोनों सदियों से एक दूसरे के साथ हैं और यक़ीनन हर दिन और क़रीब आ रहीं हैं।
यूँ तो ग़ज़ल को ग़ज़ल कहना ही पर्याप्त है। ग़ज़ल के साथ कुछ भी जोड़ने की ज़रूरत नहीं है लेकिन क्या करें ग़ज़ल के साथ पहले से ही उर्दू और हिन्दी विशेषण जुड़े हुये हैं। इसलिये हम ज़बान के नजरिये से हिंदुस्तानी ग़ज़ल कह कर, हिन्दी और उर्दू ग़ज़ल के बीच की खाई पाट कर न केवल भाषाई सदभावना क़ायम करना चाहते हैं वल्कि ग़ज़ल को और भी ज़्यादा लोकप्रिय बनाना चाहते हैं। क्योंकि शायरी सुख-दुःख, आशा-निराशा हर हाल में सुकून देती है।
अब कुछ और बिंदुओं पर प्रकाश डालने से पहले भारत में ग़ज़ल के विकास पर मुख़्तसर सी चर्चा करते हैं-

【 1.】  ग़ज़ल

ग़ज़ल की शुरुआत अरब में हुई थी। ग़ज़ल का मतलब होता था- महबूब से बातचीत करना। यही कारण है कि आज भी ग़ज़ल लिखी नहीं बल्कि कही जाती है। 10 वीं शताब्दी में, विशेष रूप से ईरान और उसके आसपास फ़ारसी भाषा में खूब ग़ज़लें कहीं गयीं, वास्तव में ग़ज़ल को यहीं से पहचान मिली।
ग़ज़ल का अपना एक अरूज़ (व्याकरण) होता था, जिसके अंतर्गत निर्धारित बहरों (छन्दों) में एक ही वज़्न में सभी शे'र कहे जाते थे। साथ ही ग़ज़ल की अपनी एक तहज़ीब (संस्कृति) भी होती थी। ग़ज़ल का वो अरूज़ आज भी जस का तस प्रयोग होता है, चाहे ग़ज़ल किसी भी भाषा में क्यों न कही जाये। ऐसा न करना ग़ज़ल की सदियों पुरानी भव्य परम्परा की तौहीन मानी जाती है।

【 2. 】 ऊर्दू ग़ज़ल

भारत में 12 वीं शताब्दी में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के बाद, साहित्यिक और सांस्कृतिक सौहार्द के रूप में ग़ज़ल भारत में आई और फिर वो हमेशा के लिए यहीं की होकर रह गयी। दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत में ग़ज़ल को ज़्यादा लोकप्रियता मिली। दिल्ली और लखनऊ के रूप में उसे दो ऐसे शायरी के गढ़ मिले जिन्होंने ऊर्दू अदब को तमाम महान शायर दिये। भारत में ग़ज़ल फ़ारसी से उर्दू में आयी इसीलिए फ़ारसी का प्रभाव उस पर हमेशा बना रहा। उर्दू ग़ज़ल नें फ़ारसी के परम्परागत अरूज़ को न केवल ज्यों का त्यों स्वीकार किया बल्कि उसे ख़ासा सम्मान भी दिया। लेकिन बाद में ग़ज़ल की मूल बहरों से बनीं, कुछ नई बहरें भी उर्दू ग़ज़ल में प्रचलित हो गयीं। आज उर्दू-ग़ज़ल के दीवान  देवनागरी लिपि में भी प्रकाशित हो रहे हैं, जो भविष्य के लिये सुखद संकेत है।

【 3.】 हिन्दी ग़ज़ल

भारत में इमरजेंसी के दौरान 1975 में दुष्यन्त कुमार के ग़ज़ल-संग्रह ' साये में धूप ' के प्रकाशन के बाद हिन्दी में ग़ज़ल की परम्परा पड़ी। यहाँ हम अमीर ख़ुसरो, कबीर, निराला आदि का ज़िक्र हिंदी ग़ज़ल के जनक के रूप में नहीं कर रहे हैं। वास्तव में हिंदी-ग़ज़ल को धरातल पर आकार देने का क्रेडिट दुष्यंत कुमार को ही जाता है।
उर्दू से जब ग़ज़ल हिन्दी में आयी तो उसकी भाषा मिली-जुली उर्दू-हिन्दी थी जबकि लिपि देवनागरी थी, साथ ही उसमें नुक़्ते का चलन भी था। हिंदी ग़ज़ल ने भी फ़ारसी-उर्दू का ही शिल्प अपनाया। निःसन्देह हिन्दी-ग़ज़ल ने नये प्रतीक, बिम्ब और समसामायिक विषयों को छूकर उसे ऊँचाई प्रदान की और बहुत ही कम समय में उम्मीद से ज़्यादा ख्याति अर्जित की। इस बीच जब हिन्दी में ग़ज़ल कहने वालों की तादाद बढ़ी तो " ग़-ज़-ल " को " ग-ज-ल " बोलने वाले भी ग़ज़ल कहने लगे। कुछ लोगों ने शिल्प का कोई ध्यान नहीं रखा, तो कुछ ने हिन्दी ग़ज़ल के नाम पर संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग किया, जो ग़ज़ल में सहज नहीं थे और फ़ारसी-उर्दू की बहरों में भी आसानी से फिट नहीं होते थे। अतः ग़ज़लें बहर से ख़ारिज़ होने लगीं। ऐसे में जिस हिन्दी ग़ज़ल को लोग गंभीरता से लेने लगे थे, वहाँ हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो गयी। अतः हिन्दी ग़ज़ल वालों को व्याकरण और भाषा के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है।

【 4.】 हिन्दुस्तानी ग़ज़ल

हिन्दी/उर्दू मिश्रित आसान ज़बान में, परम्परागत शिल्प की कसौटी पर, हिन्दुस्तानी परिवेश में कही गयी ग़ज़ल को हिंदुस्तानी ग़ज़ल कहते हैं। 
इन हिन्दुस्तानी ग़ज़लों को समझने के लिये किसी डिक्शनरी या अन्य किसी माध्यम की ज़रूरत नहीं होती है। ये सीधे दिल में उतरतीं हैं और ज़ुबान पर चढ़ जातीं हैं।
हिंदी और उर्दू  सहित तमाम भाषाओं का साहित्य इस बात का गवाह है, कि उस भाषा की वही रचनाएँ कालजयी बनीं जो उस काल में आसान ज़बान में कहीं गयीं।
...तो आइये ! अब हिन्दुस्तानी ग़ज़ल के सफ़र में हसरत जयपुरी साहब के इस प्यारे से सन्देश के साथ आगे बढ़ते हैं ...
मुसाफिर हैं हम तो चले जा रहे हैं
बड़ा ही सुहाना ग़ज़ल का सफ़र है

आलेख
#डॉ_निशान्त_असीम

मंगलवार, 10 मार्च 2020

5:29 pm

हिंदुस्तानी-ग़ज़ल अलग से साहित्य की कोई विधा नहीं है

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल
हिंदुस्तानी-ग़ज़ल अलग से साहित्य की कोई विधा नहीं है बल्कि उसमें हिन्दी-ऊर्दू की वे सभी ग़ज़लें शामिल हैं, जो आम बोलचाल की आसान हिंदुस्तानी ज़बान में कहीं गयीं हों और उन ग़ज़लों की तहज़ीब हिन्दुस्तानी हो।

आज जहाँ लोग भाषा और सम्प्रदाय में ख़ुद को बाँटे हुये बैठे हैं, वहाँ  ये " ग़ज़ल " ही है जो सदियों से समाज को जोड़ने का काम कर रही है।
ग़ज़ल लोगों की ज़बाँ पर रहते-रहते, कब सदभावना की मिसाल बन गयी किसी को पता ही नहीं चला। वक़्त ने चलते-चलते जब अपने अतीत को अदब के आइने में देखा तो उसे अहसास हुआ है कि ग़ज़ल सिर्फ़ साहित्य की विधा नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग और उम्र के, लोगों के दिलों की धड़कन भी है।
दो समकालीन उर्दू और हिन्दी ग़ज़लकारों के शे'र देखिये-

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये,
और मैं था कि सच बोलता रह गया।
-प्रो. वसीम बरेलवी

दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए,
सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिये।
- डॉ. कुँअर बैचैन

अब यदि ये दोनों शे'र देवनागरी लिपि की जगह फ़ारसी लिपि में लिख दिए जायें, तो भी किसी शे'र  में कुछ भी नहीं बदलेगा। क्योंकि लिपि सदैव ही किसी भाषा की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं करती। जैसे कि जब हम सैलफोन पर  हिन्दी का कोई मैसेज रोमन लिपि में टाइप करते हैं तो वह मैसेज रोमन लिपि में टाइप होने के बाबजूद भी अंग्रेजी भाषा का नहीं कहलाता, वह हिन्दी-भाषा का ही कहलाएगा। अतः ये शे'र ज़बान के लिहाज से उर्दू-अदब के भी हैं और हिन्दी-साहित्य के भी हैं।
 ... अब चलो क्रिया-शब्दों (Verbs) से देखते हैं, क्योंकि किसी भाषा के क्रियापद उसके अपने होते हैं और वे भाषा को भी प्रमाणित करते हैं। जबकि संज्ञापदों (Noun) की स्थिति लिपि वाली ही होती है, इसलिए यहाँ उसकी चर्चा करने का कोई फ़ायदा नहीं है। अब ग़ौर करने वाली बात यह है कि हिन्दी और उर्दू के क्रियापद एक जैसे ही होते हैं। इसलिये इन शेरों में क्रियापद भी एक जैसे ही हैं। अर्थात यह अशआर हिन्दी-उर्दू दोनों के ही क़रीब हैं।
चलिए अब भाषा के लिहाज से देख लेते हैं, तो दोनों शेरों में न तो मुश्किल उर्दू/फ़ारसी के अल्फाज़ हैं और न क्लिष्ट हिन्दी/संस्कृतनिष्ठ शब्द हैं। अतः यह दोनों शे'र मिश्रित हिन्दी-उर्दू वाली आसान ज़बान में हैं। जो हम लोग सुबह से लेकर शाम तक बोलते हैं । ....जो सही मायने में हिंदुस्तानी ज़बान है। हिंदुस्तानी ज़बान में हिन्दी-उर्दू के अलावा भारत में बोली जाने वाली उन सभी भाषाओं और बोलियों के शब्द शामिल हैं, जो चलन में आ गये हैं और लोग बिना किसी भाषाई झमेले के बोलते हैं।
भाषाई कट्टरता किसी भी भाषा को संकीर्ण कर देती है जबकि  उदारता और सहिष्णुता भाषा को समृद्ध बनाती है। किसी भाषा या विधा को किसी जाति, क्षेत्र या धर्म की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता है। लेकिन इस स्थिति में एक चीज़ समझने की है, वो है संस्कृति। जिसकी विशेष भूमिका होती है,क्योंकि जब कोई विधा या शब्द दूसरी संस्कृति से आते है, तो हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि उस विधा या शब्द को  उसके मूल रूप में ही सम्मान दें, फिर चाहे अरूज़ (व्याकरण) का मामला जो या तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) का।
शुक्र है कि हिन्दी और उर्दू भाषाओं के बीच कोई भाषाई कट्टरता या भेदभाव नहीं है। दोनों सदियों से एक दूसरे के साथ हैं और यक़ीनन हर दिन और क़रीब आ रहीं हैं।
यूँ तो ग़ज़ल को ग़ज़ल कहना ही पर्याप्त है। ग़ज़ल के साथ कुछ भी जोड़ने की ज़रूरत नहीं है लेकिन क्या करें ग़ज़ल के साथ पहले से ही उर्दू और हिन्दी विशेषण जुड़े हुये हैं। इसलिये हम ज़बान के नजरिये से हिंदुस्तानी ग़ज़ल कह कर, हिन्दी और उर्दू ग़ज़ल के बीच की खाई पाट कर न केवल भाषाई सदभावना क़ायम करना चाहते हैं वल्कि ग़ज़ल को और भी ज़्यादा लोकप्रिय बनाना चाहते हैं। क्योंकि शायरी सुख-दुःख, आशा-निराशा हर हाल में सुकून देती है।
अब कुछ और बिंदुओं पर प्रकाश डालने से पहले भारत में ग़ज़ल के विकास पर मुख़्तसर सी चर्चा करते हैं-

【 1.】  ग़ज़ल

ग़ज़ल की शुरुआत अरब में हुई थी। ग़ज़ल का मतलब होता था- महबूब से बातचीत करना। यही कारण है कि आज भी ग़ज़ल लिखी नहीं बल्कि कही जाती है। 10 वीं शताब्दी में, विशेष रूप से ईरान और उसके आसपास फ़ारसी भाषा में खूब ग़ज़लें कहीं गयीं, वास्तव में ग़ज़ल को यहीं से पहचान मिली।
ग़ज़ल का अपना एक अरूज़ (व्याकरण) होता था, जिसके अंतर्गत निर्धारित बहरों (छन्दों) में एक ही वज़्न में सभी शे'र कहे जाते थे। साथ ही ग़ज़ल की अपनी एक तहज़ीब (संस्कृति) भी होती थी। ग़ज़ल का वो अरूज़ आज भी जस का तस प्रयोग होता है, चाहे ग़ज़ल किसी भी भाषा में क्यों न कही जाये। ऐसा न करना ग़ज़ल की सदियों पुरानी भव्य परम्परा की तौहीन मानी जाती है।

【 2. 】 ऊर्दू ग़ज़ल

भारत में 12 वीं शताब्दी में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के बाद, साहित्यिक और सांस्कृतिक सौहार्द के रूप में ग़ज़ल भारत में आई और फिर वो हमेशा के लिए यहीं की होकर रह गयी। दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत में ग़ज़ल को ज़्यादा लोकप्रियता मिली। दिल्ली और लखनऊ के रूप में उसे दो ऐसे शायरी के गढ़ मिले जिन्होंने ऊर्दू अदब को तमाम महान शायर दिये। भारत में ग़ज़ल फ़ारसी से उर्दू में आयी इसीलिए फ़ारसी का प्रभाव उस पर हमेशा बना रहा। उर्दू ग़ज़ल नें फ़ारसी के परम्परागत अरूज़ को न केवल ज्यों का त्यों स्वीकार किया बल्कि उसे ख़ासा सम्मान भी दिया। लेकिन बाद में ग़ज़ल की मूल बहरों से बनीं, कुछ नई बहरें भी उर्दू ग़ज़ल में प्रचलित हो गयीं। आज उर्दू-ग़ज़ल के दीवान  देवनागरी लिपि में भी प्रकाशित हो रहे हैं।

【 3.】 हिन्दी ग़ज़ल

भारत में इमरजेंसी के दौरान 1975 में दुष्यन्त कुमार के ग़ज़ल-संग्रह ' साये में धूप ' के प्रकाशन के बाद हिन्दी में ग़ज़ल की परम्परा पड़ी। यहाँ हम अमीर ख़ुसरो, कबीर, निराला आदि का ज़िक्र हिंदी ग़ज़ल के जनक के रूप में नहीं कर रहे हैं। वास्तव में हिंदी-ग़ज़ल को धरातल पर आकार देने का क्रेडिट दुष्यंत कुमार को ही जाता है।
उर्दू से जब ग़ज़ल हिन्दी में आयी तो उसकी भाषा मिली-जुली उर्दू-हिन्दी थी जबकि लिपि देवनागरी थी, साथ ही उसमें नुक़्ते का चलन भी था। हिंदी ग़ज़ल ने भी फ़ारसी-उर्दू का ही शिल्प अपनाया। निःसन्देह हिन्दी-ग़ज़ल ने नये प्रतीक, बिम्ब और समसामायिक विषयों को छूकर उसे ऊँचाई प्रदान की और बहुत ही कम समय में उम्मीद से ज़्यादा ख्याति अर्जित की। इस बीच जब हिन्दी में ग़ज़ल कहने वालों की तादाद बढ़ी तो " ग़-ज़-ल " को " ग-ज-ल " बोलने वाले भी ग़ज़ल कहने लगे। कुछ लोगों ने शिल्प का कोई ध्यान नहीं रखा, तो कुछ ने हिन्दी ग़ज़ल के नाम पर संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग किया, जो ग़ज़ल में सहज नहीं थे और फ़ारसी-उर्दू की बहरों में भी आसानी से फिट नहीं होते थे। अतः ग़ज़लें बहर से ख़ारिज़ होने लगीं। ऐसे में जिस हिन्दी ग़ज़ल को लोग गंभीरता से लेने लगे थे, वहाँ हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो गयी। अतः हिन्दी ग़ज़ल वालों को व्याकरण और भाषा के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है।

【 4.】 हिन्दुस्तानी ग़ज़ल

हिन्दी/उर्दू मिश्रित आसान ज़बान में, परम्परागत शिल्प की कसौटी पर, हिन्दुस्तानी परिवेश में कही गयी ग़ज़ल को हिंदुस्तानी ग़ज़ल कहते हैं। 
इन हिन्दुस्तानी ग़ज़लों को समझने के लिये किसी डिक्शनरी या अन्य किसी माध्यम की ज़रूरत नहीं होती है। ये सीधे दिल में उतरती हैं और असर भी करते हैं।
हिंदी और उर्दू  सहित तमाम भाषाओं का साहित्य इस बात का गवाह है, कि उस भाषा की वही रचनाएँ कालजयी बनीं जो उस काल में आसान ज़बान में कहीं गयीं।
...तो आइये ! अब हिन्दुस्तानी ग़ज़ल के सफ़र में हमसफर बनकर आगे बढ़ते हैं ...
मुसाफिर हैं हम तो चले जा रहे हैं
बड़ा ही सुहाना ग़ज़ल का सफ़र है
-हसरत जयपुरी

आपका अपना
#डॉ_निशान्त_असीम

सोमवार, 2 मार्च 2020

5:39 am

निदा_फ़ाज़ली साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। खुशी है कि यह कोशिश आपको पसन्द आ रही है।
आज पेश कर रहे हैं #निदा_फ़ाज़ली साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...
निदा फ़ाज़ली साहब ( 1938 - 2016 ) उर्दू-अदब के बेहतरीन और संजीदा शायर थे, लेकिन उनकी शायरी की भाषा आम हिंदुस्तानी ज़बान थी। यही उनकी पॉपलरटी की ख़ास वजह थी।
उनकी कुछ खूबसूरत ग़ज़लें और कुछ शे'र देखिये ...

#ग़ज़लें

/ 01 /

अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए

जिन चराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं
उन चराग़ों को हवाओं से बचाया जाए

ख़ुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन अभी औरों को सताया जाए

बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए

क्या हुआ शहर को कुछ भी तो दिखाई दे कहीं
यूँ किया जाए कभी ख़ुद को रुलाया जाए

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये

/ 02 /

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़बाँ मिली है मगर हम ज़बाँ नहीं मिलता

चराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता

/ 03 /

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है

अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है

आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आंगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछौना है

#चन्द_शेर_और_हाज़िर_हैं ...

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना

एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा

इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी
रात जंगल में कोई शमा जलाने से रही

अब किसी से भी शिकायत न रही
जाने किस किस से गिला था पहले

कहता है कोई कुछ तो समझता है कोई कुछ
लफ़्ज़ों से जुदा हो गए लफ़्ज़ों के मआनी

ख़ुदा के हाथ में मत सौंप सारे कामों को
बदलते वक़्त पे कुछ अपना इख़्तियार भी रख

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो

कुछ लोग यूँ ही शहर में हम से भी ख़फ़ा हैं
हर एक से अपनी भी तबीअ'त नहीं मिलती

बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में
छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया

बदला न अपने आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता

नक़्शा उठा के कोई नया शहर ढूँढिए
इस शहर में तो सब से मुलाक़ात हो गई

हर एक बात को चुप-चाप क्यूँ सुना जाए
कभी तो हौसला कर के नहीं कहा जाये

यक़ीन चाँद पे सूरज में ऐतबार भी रख
मगर निगाह में थोड़ा सा इंतज़ार भी रख

ग़म है आवारा अकेले में भटक जाता है
जिस जगह रहिए वहाँ मिलते-मिलाते रहिये

कुछ तबीअत ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत न हुई
जिस को चाहा उसे अपना न सकेजो मिला उस से मोहब्बत न हुई

ये शहर है कि नुमाइश लगी हुई है कोई
जो आदमी भी मिला बन के इश्तिहार मिला

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

10:02 am

उर्मिलेश जी की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...प्रस्तुति #डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। खुशी है यह कोशिश आपको पसन्द आ रही है।
आज लेकर आये हैं #उर्मिलेश जी की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...
डॉ उर्मिलेश ( 1951-2005 ) का ताल्लुक बदायूँ से था। वे मूलतः गीतकार थे लेकिन उनकी ग़ज़लें भी काफ़ी लोकप्रिय हुईं। उनकी ग़ज़लों में सामाजिक सम्बन्धों की न सिर्फ़ तस्वीर नज़र आती है बल्कि इन्सानी जज़्बात भी उभरते हैं।
उनकी चन्द ग़ज़लें और शे'र समआत फ़रमाये ...

#ग़ज़लें

/ 01 /

रिश्तों की भीड़ में भी वो तन्हा खड़ा रहा
नदियाँ थी उसके पास वो प्यासा खड़ा रहा

सब उसको देख देख के बाहर चले गए
वो आईना था घर में अकेला खड़ा रहा

इस दौर में उस शख्स की हिम्मत तो देखिये
अपनों के बीच रहके भी ज़िन्दा खड़ा रहा

मेरे पिता की उम्र से कम थी न उसकी उम्र
वो गिर रहा था और मैं हँसता खड़ा रहा

बारिश हुई तो लोग सभी घर में छुप गए
वो घर की छत था इसलिए भीगा खड़ा रहा

/ 02 /

अब बुज़ुर्गों के फ़साने नहीं अच्छे लगते
मेरे बच्चों को ये ताने नहीं अच्छे लगते

बेटियाँ जब से बड़ी होने लगी हैं मेरी,
मुझको इस दौर के गाने नहीं अच्छे लगते

उम्र कम दिखने के नुस्खे तो कई हैं लेकिन,
आइनों को ये बहाने नहीं अच्छे लगते

अब वो मँहगाई को फैशन की तरह लेता है,
अब उसे सस्ते ज़माने नहीं अच्छे लगते

अपने ही शोर में डूबा हुआ हूँ मैं इतना
अब मुझे मीठे तराने नहीं अच्छे लगते

/ 03 /

पूरी हिम्मत के साथ बोलेंगे
जो सही है वो बात बोलेंगे

साहिबों,हम क़लम के बेटे हैं
कैसे हम दिन को रात बोलेंगे

पेड़ के पास आँधियाँ रख दो
पेड़ के पात पात बोलेंगे

'ताज' को मेरी नज़र से देखो
जो कटे थे वो हाथ बोलेंगे

उनको कुर्सी पे बैठने तो दो
वो भी फिर वाहियात बोलेंगे

#चन्द_शेर_और_देखिए

बेवजह दिल पे कोई बोझ न भारी रखिये
ज़िन्दगी जंग है इस जंग को जारी रखिये

वो जिसका तीर चुपके से जिगर के पास होता है
वो कोई ग़ैर क्या अपना ही रिश्तेदार होता है

तू इन बूढ़े दरख्तों की हवाएँ साथ रख लेना
सफ़र में काम आयेंगी दुआएँ साथ रख लेना

चोट मौसम ने दी कुछ इस तरह गहरी हमको।
अब तो हर सुबह भी लगती है दुपहरी हमको।।

परिन्दों के यहाँ फ़िरकापरस्ती क्यों नहीं होती
कभी मन्दिर पे जा बैठे कभी मस्जिद पे जा बैठे

किसी से अपने दिल की बात कहना तुम न भूले से
यहाँ ख़त भी ज़रा सी देर में अखबार होता है

कितने दिन ज़िन्दा रहे इसको न गिनिये साहिब
किस तरह ज़िन्दा रहे इसकी शुमारी रखिये

देख कर बच्चों का फैशन वो भी नंगा हो गया
ये इज़ाफ़ा भी हुआ इस दौर की रफ़्तार में

मेरी टाँगे मांग कर मेरे बराबर हो गये,
यानी मेरे शेर पढ कर वो भी शायर हो गये

अपनी शादी पे छपाए उसने अंग्रेज़ी में कार्ड
वो जो हिन्दी बोलता था रोज़ के व्यवहार में

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

4:13 pm

राहत_इन्दौरी साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...प्रस्तुति #डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। हमें खुशी है कि यह कोशिश आपको पसन्द आ रही है।
आज हाज़िर है #राहत_इन्दौरी साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...
डॉ राहत इंदौरी साहब का उर्दू-अदब में खास मक़ाम है। उनकी ज़्यादातर शायरी आसान हिंदुस्तानी-ज़बान में है।
उनका शे'र कहने का अपना एक अलग अंदाज़ है जिसे दुनिया भर में पसन्द किया जाता है। उनकी शायरी में दौरे-हाज़िर की तस्वीर भी है और मुहब्बत की रवायत भी।
यही कारण है कि उनके शे'र हर प्रोफेशन का व्यक्ति कोड करता है।
तो आइये समाआत फ़रमाते हैं डॉ राहत इन्दौरी साहब की हिंदुस्तानी  ग़ज़लें ...

#ग़ज़लें

/ 01 /

दोस्ती जब किसी से की जाए
दुश्मनों की भी राय ली जाए

मौत का ज़हर है फ़ज़ाओं में
अब कहाँ जा के साँस ली जाए

बस इसी सोच में हूँ डूबा हुआ
ये नदी कैसे पार की जाए

अगले वक़्तों के ज़ख़्म भरने लगे
आज फिर कोई भूल की जाए

लफ़्ज़ धरती पे सर पटकते हैं
गुम्बदों में सदा न दी जाए

/ 02 /

हौसले ज़िंदगी के देखते हैं
चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं

नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है
ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं

रोज़ हम इक अँधेरी धुँद के पार
क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं

धूप इतनी कराहती क्यूँ है
छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं

टुकटुकी बाँध ली है आँखों ने
रास्ते वापसी के देखते हैं

/ 03 /

पुराने शहरों के मंज़र निकलने लगते हैं
ज़मीं जहाँ भी खुले घर निकलने लगते हैं

मैं खोलता हूँ सदफ़ मोतियों के चक्कर में
मगर यहाँ भी समन्दर निकलने लगते हैं

हसीन लगते हैं जाड़ों में सुबह के मंज़र
सितारे धूप पहनकर निकलने लगते हैं

बुरे दिनों से बचाना मुझे मेरे मौला
क़रीबी दोस्त भी बचकर निकलने लगते हैं

बुलन्दियों का तसव्वुर भी ख़ूब होता है
कभी कभी तो मेरे पर निकलने लगते हैं

#चन्द_शेर_समआत_फ़रमाइये


न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा

तूफ़ानों से आँख मिलाओ सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो तैर के दरिया पार करो

जुबां तो खोल, नजर तो मिला, जवाब तो दे
मैं कितनी बार लुटा हूँ, हिसाब तो दे

ये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था
मैं बच भी जाता तो एक रोज मरने वाला था

मेरा नसीब, मेरे हाथ कट गए वरना
मैं तेरी माँग में सिन्दूर भरने वाला था

दो गज सही ये मेरी मिलकियत तो हैं
ऐ मौत तूने मुझे ज़मीदार कर दिया

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है

हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे

नींद से मेरा ताल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख़्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यूं हैं

एक चिंगारी नज़र आई थी बस्ती में उसे
वो अलग हट गया आँधी को इशारा कर के

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए
कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

4:30 pm

कुँअर_बेचैन जी की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। हमें खुशी है कि यह कोशिश आपको पसन्द आ रही है।
आज लेकर आये हैं #कुँअर_बेचैन जी की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...
डॉ बेचैन मूलतः हिन्दी के कवि हैं और आजकल ग़ाज़ियाबाद में रहते हैं। यूँ तो उन्हें एक गीतकर के रूप में सारी दुनिया जानती है लेकिन उनकी हिन्दुस्तानी-ग़ज़लें भी खासी लोकप्रिय हैं। उन्होंने अपनी गज़लों में नई सोच के साथ नये प्रतीकों का प्रयोग करने में कभी संकोच नहीं किया।
 ...तो आइये पढ़ते हैं उनकी हिन्दुस्तानी-ज़बान वाली शायरी ....

#ग़ज़लें

/ 01 /

औरों के भी ग़म में ज़रा रो लूँ तो सुबह हो
दामन पे लगे दाग़ों को धो लूँ तो सुबह हो

कुछ दिन से मेरे दिल में नई चाह जगी है
सर रख के तेरी गोद में सो लूँ तो सुबह हो

पर बाँध के बैठा हूँ नशेमन में अभी तक
आँखों के साथ पंख भी खोलूँ तो सुबह हो

लफ़्ज़ों में छुपा रहता है इक नूर का आलम
यह सोच के हर लफ़्ज़ को बोलूँ तो सुबह हो

जो दिल के समुन्दर में है अंधियार की कश्ती
अंधियार की कश्ती को डुबो लूँ तो सुबह हो

खुश्बू की तरह रहती है जो जिस्म के भीतर
उस गन्ध को साँसों में समो लूँ तो सुबह हो

दुनिया में मुहब्बत-सा 'कुँअर' कुछ भी नहीं है
हर दिल में इसी रंग को घोलूँ तो सुबह हो

/ 02 /

हम कहाँ रुस्वा हुए रुसवाइयों को क्या ख़बर
डूबकर उबरे न क्यूँ गहराइयों को क्या ख़बर

ज़ख़्म क्यों गहरे हुए होते रहे होते गए
जिस्म से बिछुड़ी हुई परछाइयों को क्या ख़बर

क्यों तड़पती ही रहीं दिल में हमारे बिजलियाँ
क्यों ये दिल बादल बना अंगड़ाइयों को क्या ख़बर

कौन सी पागल धुनें पागल बनातीं हैं हमें
होंठ से लिपटी हुई शहनाइयों को क्या ख़बर

किस क़दर तन्हा हुए हम शहर की इस भीड़ में
यह भटकती भीड़ की तन्हाइयों को क्या ख़बर

कब कहाँ घायल हुईं पागल नदी की उँगलियाँ
बर्फ़ में ठहरी हुई ऊँचाइयों को क्या ख़बर

क्यों पुराना दर्द उठ्ठा है किसी दिल में कुँअर
यह ग़ज़ल गाती हुई पुरवाइयों को क्या ख़बर

/ 03 /

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया

जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए
ऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया

सूखा पुराना ज़ख्म नए को जगह मिली
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया

आतीं न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया

आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गया
नज़रों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया

अब यह हुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रिया

ग़म मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
यह बात है तो सारे ज़माने का शुक्रिया

अब मुझको आ गए हैं मनाने के सब हुनर
यूँ मुझसे `कुँअर' रूठ जाने का शुक्रिया

#चन्द_शेर_समात_फ़रमाइये

दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना
जैसे बहते हुए पानी पे हो पानी लिखना

ये लफ़्ज़ आईने हैं मत इन्हें उछाल के चल
अदब की राह मिली है तो देखभाल के चल

तुम जिन को कह रहे हो मिरे क़दमों के निशाँ
वो सब तो मेरे पाँव के छालों के दाग़ हैं

हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए
ज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए

इस वक़्त अपने तेवर पूरे शबाब पर हैं
सारे जहाँ से कह दो हम इंक़लाब पर हैं

कोई नहीं है देखने वाला तो क्या हुआ
तेरी तरफ़ नहीं है उजाला तो क्या हुआ

उस ने फेंका मुझ पे पत्थर और मैं पानी की तरह
और ऊँचा और ऊँचा और ऊँचा हो गया

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम
4:28 pm

मुनव्वर_राना साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। हमें खुशी है कि ये कोशिश आपको पसन्द आ रही है।
आज पेश है #मुनव्वर_राना साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...
#राना साहब बेशक उर्दू अदब का बेशक़ीमती नगीना हैं। लेकिन उस नगीने की चमक में हिन्दुस्तानी ज़बान की झिलमिल है।
यही कारण है कि उनकी शायरी दुनिया भर के लोगों के दिलों में मुनव्वर (रोशन) है।
राना साहब मानवीय-संवेदनाओं के शायर हैं, उनके यहाँ जज़्बातों का जो व्यवहार है वह कहीं और नहीं मिलता।
' माँ ' की ममता को जिस तरह राना साहब नें व्यक्त किया वह अकल्पनीय है ....

#माँ_पर_उनके_चन्द_मशूहर_शेर_पढ़िये

किसी को घर मिला, हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

जब तक रहा हूँ धूप में चादर बना रहा
मैं अपनी माँ का आखिरी ज़ेवर बना रहा

ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

हादसों की गर्द से ख़ुद को बचाने के लिए
माँ ! हम अपने साथ बस तेरी दुआ ले जायेंगे

ख़ुद को इस भीड़ में तन्हा नहीं होने देंगे
माँ तुझे हम अभी बूढ़ा नहीं होने देंगे

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती

मुझे कढ़े हुए तकिये की क्या ज़रूरत है
किसी का हाथ अभी मेरे सर के नीचे है

झुक के मिलते हैं बुजुर्गों से हमारे बच्चे
फूल पर बाग की मिट्टी का असर होता है

#ग़ज़लें

/ 01 /

मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता
अब इस से ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता

दहलीज़ पे रख दी हैं किसी शख़्स ने आँखें
रौशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता

बस तू मिरी आवाज़ से आवाज़ मिला दे
फिर देख कि इस शहर में क्या हो नहीं सकता

ऐ मौत मुझे तू ने मुसीबत से निकाला
सय्याद समझता था रिहा हो नहीं सकता

पेशानी को सज्दे भी अता कर मिरे मौला
आँखों से तो ये क़र्ज़ अदा हो नहीं सकता

/ 02/

भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है
मोहब्बत करने वाला इस लिए बरबाद रहता है

अगर सोने के पिंजड़े में भी रहता है तो क़ैदी है
परिंदा तो वही होता है जो आज़ाद रहता है

चमन में घूमने फिरने के कुछ आदाब होते हैं
उधर हरगिज़ नहीं जाना उधर सय्याद रहता है

लिपट जाती है सारे रास्तों की याद बचपन में
जिधर से भी गुज़रता हूँ मैं रस्ता याद रहता है

हमें भी अपने अच्छे दिन अभी तक याद हैं 'राना'
हर इक इंसान को अपना ज़माना याद रहता है

/ 03 /

अलमारी से ख़त उस के पुराने निकल आए
फिर से मिरे चेहरे पे ये दाने निकल आए

माँ बैठ के तकती थी जहाँ से मिरा रस्ता
मिट्टी के हटाते ही ख़ज़ाने निकल आए

मुमकिन है हमें गाँव भी पहचान न पाए
बचपन में ही हम घर से कमाने निकल आए

ऐ रेत के ज़र्रे तिरा एहसान बहुत है
आँखों को भिगोने के बहाने निकल आए

अब तेरे बुलाने से भी हम आ नहीं सकते
हम तुझ से बहुत आगे ज़माने निकल आए

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम
4:27 pm

गोपालदास_नीरज जी की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। खुशी है कि यह कोशिश आपको पसन्द आ रही है।
आज लेकर आये हैं #गोपालदास_नीरज जी की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...
नीरज जी का जन्म 1925 में अलीगढ़ में हुआ था और 92 वर्ष की अवस्था में 2018 में, वे संसार से विदा हो गये।
नीरज जी को एक गीतकार के रूप में खासी ख्याति मिली, लेकिन वे एक परिपक्व ग़ज़लकार भी थे। उनकी  कुछ ग़ज़लें जहाँ ख़ालिस उर्दू में हैं तो कुछ शुद्ध हिंदी में हैं।
लेकिन हम खासतौर से सिर्फ़ #हिन्दुस्तानी_ज़बान वाली कुछ ग़ज़लें और कुछ शे'र चुन कर लाये हैं ...

#ग़ज़लें

/ 01 /

ख़ुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की
खिड़की खुली है फिर कोई उन के मकान की

हारे हुए परिंद ज़रा उड़ के देख तू
आ जाएगी ज़मीन पे छत आसमान की

ज्यूँ लूट लें कहार ही दुल्हन की पालकी
हालत यही है आज कल हिन्दोस्तान की

'नीरज' से बढ़ के और धनी कौन है यहाँ
उस के हृदय में पीर है सारे जहान की

/ 02 /

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला
मेरे स्वागत को हर एक जेब से ख़ंजर निकला

डूब कर जिसमे उबर पाया न मैं जीवन भर,
एक आँसू का वो कतरा तो समंदर निकला

मेरे होठों पे दुआ उसकी ज़ुबाँ पे ग़ाली
जिसके अन्दर जो छुपा था वही बाहर निकला

ज़िंदगी भर मैं जिसे देख कर इतराता रहा
मेरा सब रूप वो मिट्टी की धरोहर निकला

रूखी रोटी भी सदा बाँट के जिसने खाई,
वो भिखारी तो शहंशाहों से बढ़ कर निकला ।

/ 03 /

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।

जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए

प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसु तेरी पलकों से उठाया जाए

/ 04 /

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई ।
मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई ।

आप मत पूछिये क्या हम पे सफ़र में गुज़री
था लुटेरों का जहाँ गाँव वहीं रात हुई ।

ज़िंदगी भर तो हुई गुफ़्तुगू ग़ैरों से मगर
आज तक हमसे हमारी न मुलाकात हुई

मैंने सोचा कि मेरे देश की हालत क्या है
एक क़ातिल से तभी मेरी मुलाक़ात हुई

#चन्द_शेर_और_समात_फ़रमाइये ...

हम तिरी चाह में ऐ यार वहाँ तक पहुँचे
होश ये भी न जहाँ हैं कि कहाँ तक पहुँचे


तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ।
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।


एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द ज़बाँ,
कल को शायद मेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचे


इतने मसरूफ़ थे हम जाने की तैयारी में,
खड़े थे तुम और तुम्हें देखने का वक्त न था।


अब दोस्त मैं कहूं या उनको कहूं मैं दुश्मन
जो मुस्कुरा रहे हैं,खंजर छुपा के अपने पीछे


है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए


जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा


जिस में मज़हब के हर इक रोग का लिक्खा है इलाज
वो किताब हम ने किसी रिंद के घर देखी है


उस को क्या ख़ाक शराबों में मज़ा आएगा
जिस ने इक बार भी वो शोख़ नज़र देखी है


बड़ा न छोटा कोई, फ़र्क़ बस नज़र का है
सभी पे चलते समय एक-सा कफ़न देखा

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम

4:25 pm

वशीर_बद्र साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। खुशी है कि ये कोशिश आपको पसन्द आ रही है।
इस बार पढ़िये #वशीर_बद्र साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...
पदमश्री डॉ बद्र साहब की ग़ज़लें सर्दी में खिली गुनगुनी धूप की तरह हैं जो सबको सुकून देतीं हैं। उनके शे'र किसी लिट्रेरी सोसाइटी के ड्राइंग-रूम की दीवार पर लिखे मिलते हैं तो कभी किसी रिक्शे के पीछे लिखे मिलते हैं तो कभी किसी जलसे में लोग बोलते दिख जाते हैं।
बद्र साहब का यही आम हिन्दुस्तानी ज़बान और नये ख्याल वाला अन्दाज़ उन्हें दुनिया भर में अपने दौर का सबसे कामयाब शायर बनाता है।
आज आप उनको पढ़ते-पढ़ते, उनकी सेहत के लिए दुआ  करना न भूलियेगा, क्योंकि वे आजकल गम्भीर बीमारी से जूझ रहे हैं। खुदा उन्हें शिफ़ा अता करे ...

#ग़ज़लें

/ 01 /

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता

बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समन्दर में मिला, दरिया नहीं रहता

हजारों शेर मेरे सो गये कागज की कब्रों में
अजब मां हूं कोई बच्चा मेरा ज़िन्दा नहीं रहता

तुम्हारा शहर तो बिल्कुल नये अन्दाज वाला है
हमारे शहर में भी अब कोई हमसा नहीं रहता

मोहब्बत एक खुशबू है, हमेशा साथ रहती है
कोई इन्सान तन्हाई में भी कभी तन्हा नहीं रहता

कोई बादल हरे मौसम का फ़िर ऐलान करता है
ख़िज़ा के बाग में जब एक भी पत्ता नहीं रहता

/ 02 /

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा

कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िन्दगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा, तो कोई दूसरा हो जाएगा

मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा

सब उसी के हैं हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा

/ 03 /

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो
मेरी तरह तुम भी झूठे हो

इक टहनी पर चाँद टिका था
मैं ये समझा तुम बैठे हो

उजले-उजले फूल खिले थे
बिल्कुल जैसे तुम हँसते हो

मुझ को शाम बता देती है
तुम कैसे कपड़े पहने हो

तुम तन्हा दुनिया से लड़ोगे
बच्चों सी बातें करते हो

#चन्द_शेर_और_देखिये

कुछ को मजबूरियाँ रहीं होंगी
यूँ कोई बेबफा नहीं होता


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये


दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिन्दा न हों


जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा


शौहरत की बुलन्दी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है


लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में


मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला


उसे किसी की मुहब्बत का एतिबार नहीं
उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है


गुलाबों की तरह शबनम में अपना दिल भिगोते हैं
मुहब्बत करने वाले ख़ूबसूरत लोग होते हैं


चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं से ज़मीं
ग़ज़ल के शेर कहां रोज़-रोज़ होते हैं


अबके आंसू आंखों से दिल में उतरे
रुख़ बदला दरिया ने कैसा बहने का


ज़हीन सांप सदा आस्तीन में रहते हैं
ज़बां से कहते हैं दिल से मुआफ़ करते नहीं


सात सन्दूकों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें
आज इन्सां को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत


खुले से लॉन में सब लोग बैठें चाय पियें
दुआ करो कि ख़ुदा हमको आदमी कर दे


लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुशबू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तेरी आवाज़ चूम लूं


इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझको मेरा महबूब समझते होंगे


इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया
ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे


मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत संवरती है
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतेराम करता हूं


सियासत की अपनी अलग इक ज़बाँ है
लिखा हो जो इक़रार, इनकार पढ़ना

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

10:04 pm

दुष्यन्त_कुमार जी की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। हमें ख़ुशी है कि ये कोशिश आपको पसन्द आ रही है।
आज लेकर आये हैं #दुष्यन्त_कुमार जी की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी  ...
दुष्यन्त जी बेहद संजीदा शायर थे, उन्हें हिन्दी और ऊर्दू का सेतु भी कहा जाता है। दुष्यन्त उन चंद ग़ज़लकरों में शामिल हैं जिन्हें पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा कोड किया जाता है।
दुष्यन्त जी का जन्म 1933 में बिजनौर के रजपुरा में हुआ था और अल्पायु में ही 1975 में वे संसार से विदा हो गये।
उनका एक मात्र ग़ज़ल संग्रह #साये_में_धूप प्रकाशित है। यक़ीनन उन्होंने ग़ज़ल को नये तेवर दिए और आज की जदीद और हिंदुस्तानी शायरी के वास्तविक प्रेरणाश्रोत दुष्यन्त जी ही थे।

#दुष्यन्त_जी_की_कुछ_ग़ज़लें

/ 01 /

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिये

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

/ 02/

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

/ 03 /

ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो
अब कोई ऐसा तरीका भी निकालो यारो

दर्दे दिल वक़्त पे पैग़ाम भी पहुँचाएगा
इस क़बूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो

आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे
आज संदूक से वो ख़त तो निकालो यारो

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

/ 04 /

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आप को धोखा हुआ होगा

यहाँ तक आते-आते सूख जाती है कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

ग़ज़ब ये है की अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परेशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम

बुधवार, 29 जनवरी 2020

7:10 am

वसीम_बरेलवी साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। उम्मीद है यह कोशिश आपको पसन्द आ रही होगी।
आज पेश कर रहे हैं  #वसीम_बरेलवी साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...
वसीम बरेलवी साहब का वास्तविक नाम ज़ाहिद हसन है, वे बरेली में फूटे दरवाज़े के पास रहते है।
उ0 प्र0 विधान परिषद के वे आजकल सदस्य भी हैं।
आप  बरेली कालेज, बरेली के उर्दू विभाग में प्रोफ़ेसर रहे हैं मगर उनकी शायरी हिंदुस्तानी ज़बान का प्रतिनिधित्व करती है। यही कारण है कि दुनिया में उन्हें और उनकी ग़ज़लों को बहुत प्यार मिलता है।

#ग़ज़लें

/ 01 /

आते आते मिरा नाम सा रह गया
उस के होंटों पे कुछ काँपता रह गया

वो मिरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया

झूट वाले कहीं से कहीं बढ़ गए
और मैं था कि सच बोलता रह गया

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया

उस को काँधों पे ले जा रहे हैं 'वसीम'
और वो जीने का हक़ माँगता रह गया

/ 02 /

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटें
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

/ 03 /

क्या ग़म है, समंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्या
हर शख़्स मेरा साथ, निभा भी नहीं सकता

प्यासे रहे जाते हैं जमाने के सवालात
किसके लिए ज़िन्दा हूँ, बता भी नहीं सकता

घर ढूँढ रहे हैं मेरा , रातों के पुजारी
मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता

वैसे तो एक आँसू ही बहा के मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता

#चन्द_शेर_और_समात_फ़रमाइये


अपने हर हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उस को छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है

ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी

ग़म और होता सुन के गर आते न वो 'वसीम'
अच्छा है मेरे हाल की उन को ख़बर नहीं

जो मुझ में तुझ में चला आ रहा है बरसों से
कहीं हयात इसी फ़ासले का नाम न हो

किसी ने रख दिए ममता भरे दो हाथ क्या सर पर
मेरे अंदर कोई बच्चा बिलक कर रोने लगता है

किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़ कर देखो
तो ये रिश्ता निभाना किस क़दर आसान हो जाए

कुछ है कि जो घर दे नहीं पाता है किसी को
वर्ना कोई ऐसे तो सफ़र में नहीं रहता

उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए

बहुत से ख़्वाब देखोगे तो आँखें
तुम्हारा साथ देना छोड़ देंगी

दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता
तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता

न पाने से किसी के है न कुछ खोने से मतलब है
ये दुनिया है इसे तो कुछ न कुछ होने से मतलब है

तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूँ मैं
कि तू मिल भी अगर जाए तो अब मिलने का ग़म होगा

हर शख़्स दौड़ता है यहाँ भीड़ की तरफ़
फिर ये भी चाहता है उसे रास्ता मिले

रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जायेगी
देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है

शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है

अपने अंदाज़ का अकेला था
इसलिए मैं बड़ा अकेला था

हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें
ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें

कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है
ये सलीक़ा हो तो हर बात सुनी जाती है

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम
7:08 am

दिवाकर_राही जी की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। उम्मीद है यह कोशिश आपको पसन्द आ रही होगी।
आज पेश है #दिवाकर_राही जी की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...
रामपुर से ताल्लुक रखने वाले #राही जी पेशे से वकील थे। हिन्दी और उर्दू पर उनका समान रूप से अधिकार था, अपितु उनकी पहचान एक शायर के तौर पर बनी और उर्दू अदब में उन्हें खासी तबज्जो मिली।
1984 में आयी फ़िल्म शराबी में जब अमिताभ बच्चन जी ने #राही जी का ये शे'र पढा, तो राही जी की पॉपुलरटी में चार चाँद लग गये -
अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मयख़ाने में
जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में

#ग़ज़ल_का_मतला_और_तीन_शेर_देखिए ...

ज़रा भी शोर मौजों का नहीं है
सफ़ीना तो कोई डूबा नहीं है

तुम्हारा हुस्न क्या है क्या नहीं है
तुम्हें ख़ुद इस का अंदाज़ा नहीं है

तिरी महफ़िल का किस से हाल पूछें
वहाँ जा कर कोई पल्टा नहीं है

वो इस पर हो गए हैं और बरहम
कि 'राही' को कोई शिकवा नहीं है

#चन्द_शेर_और_समाअत_फ़रमाइये ...


इस इंतिज़ार में बैठे हैं उन की महफ़िल में
कि वो निगाह उठाएँ तो हम सलाम करें


वो अपने हाथ से सागर न दे, शराब न दे
निगाह फेर ले लेकिन, हमें जवाब न दे


अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तस्कीन हो जाती
किनारों ने डुबोया है मुझे इस बात का ग़म है


ख़ुद को जो लोग समझते हैं सियासी
उनके ये बताने की ज़रूरत है सियासत क्या है


इस दौरे तरक़्क़ी के अंदाज़ निराले हैं
ज़ेहनों में अँधेरे हैं सड़कों पे उजाले हैं


हज़ारों बार कह कर बेवफ़ा को बा-वफ़ा मैंने
बताया है ज़माने को वफ़ा का रास्ता मैंने


कुछ आदमी समाज पे बोझल हैं आज भी
रस्सी तो जल गई है मगर बल हैं आज भी


सोचने की ये बात है 'राही'
सोचते ही रहे तो क्या होगा


इस से पहले कि लोग पहचानें
ख़ुद को पहचान लो तो बेहतर है


मैंने आवाज़ तुम्हे दी है बड़े नाज़ के साथ
अब तो आवाज़ मिलाओ मेरी आवाज़ के साथ


दोस्तों से बचाइये 'राही'
दुश्मनों से मैं ख़ुद निपट लूँगा

प्रस्तुति :
#डॉ_निशान्त_असीम
7:06 am

जॉन_एलिया साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर किये जा रहे हैं।
ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। उम्मीद है यह कोशिश आपको पसन्द आएगी।
आज पेश हैं #जॉन_एलिया साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...
जॉन एलिया का जन्म 1931 को अमरोहा में हुआ था और  2002 में वे दुनिया से रुखसत हो गये।
उनकी ज़िंदगी जज़्बाती संघर्ष और निराशा में डूबी रही, जो उनकी शायरी में बखूबी नज़र भी आता है। वे उर्दू अदब के बड़े और बेहतरीन शायर थे। शायरी में आसान लफ़्ज़ों के इस्तेमाल की वजह से वे सीधे दिल में उतर जाते हैं, इसीलिये वे आज भी लोगों के दिलों पर राज करते हैं।
...तो समाअत फ़रमाइये उनकी कुछ ग़ज़लें और कुछ शे'र ...

#ग़ज़लें

/ 01/

उम्र गुज़रेगी इम्तहान में क्या
दाग़ ही देंगे मुझको दान में क्या

मेरी हर बात बेअसर ही रही
नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या

मुझको तो कोई टोकता भी नहीं
यही होता है खानदान मे क्या

यूँ जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या

ये मुझे चैन क्यो नहीं पड़ता
एक ही शख्स था जहान में क्या

/ 02 /

एक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
सब के दिल से उतर गया हूँ मैं

कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ
सुन रहा हूँ के घर गया हूँ मैं

क्या बताऊँ के मर नहीं पाता
जीते जी जब से मर गया हूँ मैं

अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का
के यहाँ सब के सर गया हूँ मैं

तुम से जानां मिला हूँ जिस दिन से
इस तरह खुद से डर गया हूँ मैं

#चन्द_शेर


बिन तुम्हारे कभी नहीं आयी
क्या मेरी नींद भी तुम्हारी है

मैं ख़ुद नहीं हूं और कोई है मेरे अंदर
जो तुम को तरसता है, अब भी आ जाओ

कोई नहीं यहां खामोश, कोई पुकारता नहीं
शहर में एक शोर है और कोई सदा नहीं

अब हमारा मकान किस का है
हम तो अपने मकां के थे ही नहीं

जा रहे हो तो जाओ लेकिन अब
याद अपनी मुझे दिलाइयो मत

हम आंधियों के बन में किसी कारवां के थे
जाने कहां से आए थे, जाने कहां के थे

और तो हमने क्या किया अब तक
ये किया है कि दिन गुज़ारे हैं

मेरी जां अब ये सूरत है कि मुझ से
तेरी आदत छुड़ाई जा रही है

कभी-कभी तो बहुत याद आने लगते हो
कि रूठते हो कभी और मनाने लगते हो

मैं अब हर शख़्स से उकता चुका हूं
फ़क़त कुछ दोस्त हैं, और दोस्त भी क्या

आप बस मुझ में ही तो हैं, सो आप
मेरा बेहद ख़याल कीजिएगा

बहुत नज़दीक आती जा रही हो
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या

मुझ से बिछड़ कर भी वो लड़की कितनी ख़ुश ख़ुश रहती है
जिस लड़की ने मुझ से बिछड़ कर मर जाने की ठानी थी

तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ ये कैसी तन्हाई है
तेरे साथ तेरी याद आई क्या तू सचमुच आई है

बिन तुम्हारे कभी नहीं आई
क्या मेरी नींद भी तुम्हारी है

सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर
अब किसे रात भर जगाती है

कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया

ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम
7:04 am

कृष्ण_बिहारी_नूर साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली कुछ ग़ज़लें ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। इसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर किये जा रहे हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। उम्मीद है यह कोशिश आपको पसन्द आ रही होगी।
आज लेकर आये हैं #कृष्ण_बिहारी_नूर साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली कुछ ग़ज़लें ...

#ग़ज़लें ...

/ 1 /

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं,
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

ज़िन्दगी मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे,
झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं

ज़िन्दगी अब बता कहाँ जाएँ
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं

जिसके कारण फ़साद होते हैं
उसका कोई अता-पता ही नहीं

धन के हाथों बिके हैं सब क़ानून
अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं

चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो
आईना झूठ बोलता ही नहीं

अपनी रचनाओं में वो ज़िन्दा है
‘नूर’ संसार से गया ही नहीं

/ 2 /

नज़र मिला न सके उससे उस निगाह के बाद
वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बाद

मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता ख़ुद को
किसी की चाह न थी दिल में, तिरी चाह के बाद

ज़मीर काँप तो जाता है, आप कुछ भी कहें
वो हो गुनाह से पहले, कि हो गुनाह के बाद

गवाह चाह रहे थे, वो मिरी बेगुनाही का
जुबाँ से कह न सका कुछ, ख़ुदा-गवाह के बाद

/ 3 /

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझमें
और फिर मानना पड़ता है के ख़ुदा है मुझमें

मेरा ये हाल उभरती हुई तमन्ना जैसे,
वो बड़ी देर से कुछ ढूंढ रहा है मुझमें

जितने मौसम हैं सब जैसे कहीं मिल जायें,
इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझमें

आईना ये तो बताता है के मैं क्या हूँ लेकिन,
आईना इस पे है ख़मोश के क्या है मुझमें

अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ 'नूर'
मैं कहाँ तक करूँ साबित के वफ़ा है मुझमें

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम
7:00 am

निश्तर_ख़ानक़ाही साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी के साथ ... डॉ_निशान्त_असीम


#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर प्रस्तुत है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। उम्मीद है यह कोशिश आपको पसन्द आएगी।
आगाज़ कर रहे हैं #निश्तर_ख़ानक़ाही साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी के साथ ...

#ग़ज़लें ...

/01/

बच्चे डरे-डरे से ये क्या पूछते हैं आज
अख़बार के हिसाब से कितने मरे हैं आज

हँस हँस के यूँ तो सबसे मिला हूँ मगर ये क्या
झूठी हँसी से होंठ बहुत दुख रहे हैं आज

चमका न अब भी मास के अन्तिम दिनों का चाँद
या हम समय से पहले ही सोने लगे हैं आज

टायर कहीं फ़टे तो ये लगता है कुछ हुआ
आहट भी हो ज़रा सी तो हम काँपते हैं आज

/02/

अपने ही खेत की मिट्टी से जुदा हूँ मैं तो ।
इक शरारा हूँ कि पत्थर से उगा हूँ मैं तो ।

मेरा क्या है कोई देखे या न देखे, मुझको
सुब्ह के डूबते तारों की ज़िया हूँ मैं तो ।

अब ये सूरज मुझे सोने नहीं देगा शायद
सिर्फ़ इक रात की लज़्ज़त का सिला हूँ मैं तो ।

कौन रोकगा तुझे दिन की दहकती हुई धूप
बर्फ़ के ढेर पे चुपचाप खड़ा हूँ मैं तो ।

/03/

रात एक पिक्चर में, शाम एक होटल में, बस यही बसीले थे
मेज़ के किनारे पर, चाय की पियाली में, उसकें होंठ रक्खे थे

दस्तख़त नहीं बाक़ी, बस हरुफ़ टाइप के क़ाग़ज़ों में ज़िंदा हैं
याद भी नहीं आता, प्यार के ये ख़त जाने, किसने किसको लिक्खे थे

दर्द-खानादारी का, हमको क्या पता क्या है, हम जवान शहरों के
होटलों में रहते थे, हॉट-डाग खाते थे, काकटेल पीते थे

आज का भी दिन गुज़रा, डाकतार वालों की कल से कामबंदी है
जाने किन उमीदों पर हमने रात काटी थी, गिन के पल गुजारे थे।

#चन्द_शेर ...

रूह के ज़ख़्मों से छनती रोशनी अच्छी लगी
थी बहुत बेदर्द लेकिन ज़िन्दगी अच्छी लगी

दिल किसी के दर्द में रोता नहीं पत्थर हुआ
आदमी अब आदमी के वास्ते बंजर हुआ

मीर कोई था मीरा कोई लेकिन उनकी बात अलग
इश्क न करना इश्क में प्यारे पागल बनना पड़ता है

घट के इतनी रह गयी है ज़िन्दगी
घर बसाया, घूस दी, नौकर हुए

कहता है आज दिन में उजाला बहुत है यार
शायद ये शख़्स रात में जागा बहुत है यार

दस्तक पे दोस्तों की भी खुलते नहीं हैं दर
हर वक़्त एक अजीब सी वहशत घरों में है

हाल शासन का लिखा जनता की लाचारी लिखी
अंत में बारूद पर माचिस की निगरानी लिखी

कुछ न पूछो क्या हुआ क्यों इतने दिन ग़ायब रहे
बात बस इतनी थी हम मर गये थे बीच में

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम

विशिष्ट पोस्ट

सूचना :- रचनायें आमंत्रित हैं

प्रिय साहित्यकार मित्रों , आप अपनी रचनाएँ हमारे व्हाट्सएप नंबर 9627193400 पर न भेजकर ईमेल- Aksbadauni@gmail.com पर  भेजें.