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शनिवार, 9 मई 2020

4:06 am

महाराणा प्रताप :- मात्रभूमि पर मिटने वाला


मात्रभूमि पर मिटने वाला
वीर प्रताप महाराणा था
चेतक जिसका घोड़ा
चित्तौड़गढ़ का महाराजा था
हाथ में जिसके रहता भाला
शूरवीर वो मस्त मतवाला था
महा प्रतापी राजा वो
शूरवीर राज्य का रखवाला था
हल्दीघाटी की युद्धभूमि में
जो लड़ा वो महा प्रतापी था
जय भवानी जिसका नारा
हिन्दू शिरोमणि वो राणा था

शिवम् मिश्रा
मुंबई महाराष्ट्र 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

12:01 pm

भारत जिसका शौर्य सूर्य है दीप्तिमान सदियों से - आदित्य तोमर

भारत जिसका शौर्य सूर्य है दीप्तिमान सदियों से।
झलका जिसका गर्व पहाड़ों से, ममता नदियों से।।

कण-कण में छविचित्र राम के, पग पग तीर्थ अटे हैं।
जोकि समय के झंझावातों से भी नहीं मिटे हैं।।

इसने स्वर्णमयी वैभव भी, काला युग भी देखा।
उस वर्णन से भरा पड़ा है इतिहासों का लेखा।।

उन लेखों में परम पूज्य है नाम एक बलिदानी।
जोकि कभी स्वातन्त्र्य समर का रहा प्रथम सेनानी।

बेड़ी में जकड़ी जब भारत माँ की नर्म कलाई।
क्रूर अनय अत्याचारों की खिली वेल, लहराई।।

बर्बर चोर लुटेरे ही जब सत्तासीन हुए थे।
सच के नीति-नियन्ता सब उनके आधीन हुए थे।।

झूठे को झूठा, पापी को पापी कौन कहे फिर।
सच्चाई के साथ अडिग होकर भी कौन रहे फिर।।

चारो ओर भयंकर अत्याचार दिखाई देते।
शहर-गाँव में भीषण नरसंहार दिखाई देते।।

भारतीय योद्धाओं ने पहले भी युद्ध लड़े थे।
इतने अत्याचार न पहले होते दीख पड़े थे।।

तिल-तिल कर मरवाये जाते थे रणवीर अभागे।
आम हो गए थे जौहर के दृश्य दृष्टि के आगे।।

शिशुओं को भालों के नेज़ों पर उछालते थे वे।
खड़ी फसल के साथ गाँव को जला डालते थे वे।।

उस कुसमय में बढ़ प्रताप ने पूजा थाल उठाया।
तब माँ ने भी झुका हुआ सदियों का भाल उठाया।।

दे अगणित आशीष शीश को स्नेहमयी ने चूमा।
रोम-रोम राणा प्रताप का आनन्दित हो झूमा।।

पगरज से कर तिलक वीर ने तब तलवार उठा ली।
कहा समझ ले मात, रात अब बीत चुकी है काली।।

माँ-बहनों की लाज न जीते जी मैं लुटने दूँगा।
और चोटियाँ भी न हिन्दुओं की मैं कटने दूँगा।।

तेरे सुत का देखेंगे अब कायर मुग़ल जड़ाका।
मैं बतलाऊँगा उनको क्या होता है रण साका।।

यही वचन राणा प्रताप आजीवन रहे निभाते।
भर देता है हृदय नाम जिव्हा पर आते-आते।।

सहे घाव पर घाव, घाव को भले न मिली दवाई।
कभी न झुक पाई लेकिन रण में तलवार उठाई।।

कभी न दरवाज़ा देखा अकबरशाही महलों का।
कभी न लगने दिया दाग़ भी घोड़ों पर मुग़लों का।।

ढहा दिया गढ़ आतताईयों के बलशाली डर का।
सपना पूरा कभी न होने दिया मुग़ल अकबर का।।
-
आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)

11:17 am

महाराणा प्रताप भारत का परमवीर बलिदानी - विकास भारद्वाज


महाराणा प्रताप भारत का परमवीर बलिदानी ।
दुश्मनों को मारा था लेकर नाम जय माँ भवानी ।।
चले राणा का चेतक सामने कोई रुक न सका ।
चली तेज तलवार तो गद्दार कोई टिक न सका ।।

अकबर ने खेली थी चाल हल्दीघाटी के मैदान ।
राजपूत, मनला दिये थे, धोखा युद्ध के दौरान ।।
कई हजार मुगलसेना से लोहा लिया था प्रताप ।
उठा भाला भोंगे तो अकबर का बड़ा रक्तचाप ।।

देशहित के लिए कभी जीते जी संधि नही की ।
वीरयोद्धा महाराणा ने गद्दारों को धूल चटा दी ।।
जिसने माटी की रक्षा से कभी सौदा नही किया ।
ऐसा महान प्रतापी राजा  वीर भूमि को जिया ।।

देशभक्त महाराणा जैसा दूसरा प्रताप नही हुआ ।
हल्दी घाटी का युद्ध मानों महाभारत युद्ध हुआ ।।
घास की रोटी खाकर भी देश के लिए लडते रहे ।
युद्ध के बाद अकबर की आँखों से भी आँसू बहे ।।

विकास भारद्वाज
बदायूँ
23 अप्रेल 2020 


बुधवार, 22 अप्रैल 2020

7:58 am

आक्रोश :- फख्र से उठती वर्दी का तुमने सिर गिरवाया हैं - सत्यदेव श्रीवास्तव

.#आक्रोश# 

फख्र से उठती वर्दी का तुमने सिर गिरवाया हैं 
वसन सिंह के लेकिन तुम पर गीदड़ का साया हैं 
सिंहो की टोली में तुम श्रगाल बने बैठे थे 
जो सबका हित चाहें उनका काल बने बैठे थे

अब तुमको जब सब सच्चा  इंसान मानते हैं 
वर्दी में छुपा हुआ तुमको भगवान मानते हैं 
ऐसे समय में तुमने खुद से ही गद्दारी की हैं 
लगता है तुमने जाहिल लोगो से यारी की हैं

करके गद्दारी तुम बच जाओगे ये सोचा हैं 
अरे जाहिलो बतला दो खुद को कितने में बेचा हैं 
बिषधर की भांति तुमने फिर से अब फुफकारा हैं 
लेकिन अबकी दिल्ली में बैठा मोदी बाप तुम्हारा हैं

मांबलिचिंग का रोना रोने वाले नहीं दिखाई दिये 
पुरस्कार लौटाने वाले स्वर भी नहीं सुनाई दिये 
देश फसा संकट में तुमने ये कैसा शोर मचा ड़ाला 
सर्वस्व त्यागने वाले को तुमने चोर बता ड़ाला

शासन प्रशासन क्यो ये सभी विवेक खो बैठे 
जिनको था रक्षक समझा वो ही भक्षक बन बैठे 
वीर शिवा की धरती पर कैसा कृत्य रचाया हैं 
देख तुम्हारी कायरता को बैरी मन में हर्षाया हैं

नही अगर सुधरे तो एक-एक कर छांटे जाओगे 
राष्ट्रद्रोहियो सुन लो बुरी तरह तुम काटे जाओगे 

सत्यदेव श्रीवास्तव
 बदायूँँ
 8630446679..8923088669

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

11:59 am

है अजीब सा मौन यहाँ पर! किस भाँति यह क्रंदन है - सुमित शर्मा "पीयूष"

है अजीब सा मौन यहाँ पर! किस भाँति यह क्रंदन है?
दृश्य बड़ा वीभत्स यहाँ, निर्जनता का अभिनंदन है।

एक नार सदा को सोई है, घर के रजयुक्त ओसारे पर।
कैसी धूसरित सी लेटी है! निश्तेज, निठुर, निश्चल होकर।

क्या बेसुध होकर सीख रही वह, मृत्यु-बाद सलीकों को?
या सूनेपन से सींच रही है, मन में उठती चीखों को?

अधर-स्निग्धता तार-तार, आंखों में शुष्क समाया है।
अध-खुले उरोजों पर उसने, आँचल तक नहीं चढ़ाया है।

कैसी यह पाँवों में जकड़न? दुस्तर जंघाओं का मुड़ना।
भयभीत करे हैं, भृकुटि पर, निष्प्राण से केशों का उड़ना।

अब देह में उसकी गति नहीं, मानस में उसके मति नहीं।
मृत्यु का तो आलिंगन है, पर जीवन से सहमति नहीं।

वह सँवर रही आखिरी बार, दूजों के दिये सहारे से।
है आज विदा होना उसको, इस आंगन से, ओसारे से।

मर कर भी उसके आनन पर, चिंता की कई लकीरें हैं।
कोई तो मजबूरी उसकी, कुछ तो अफसोस की पीरें हैं।

दो पल समेट रख लेने को, मातृत्व के उन अहसासों को।
करने नवजात का आलिंगन, वह तड़प रही है साँसों को।

थी आज बनी, क्षणभर जननी, पर लख न सकी दुलारे को।
एक जीवन रचकर धरती पर, वह लौट चली यम-द्वारे को।

कैसा कुदरत का नियम, हाय! कैसी "नियति का ढलना" है?
पलने में भूखा "ललना" है, और उसको "कफ़न बदलना" है!!

✍✍✍✍✍
~पं० सुमित शर्मा "पीयूष"
संपर्क : 8541093292
11:49 am

क्रंदन है उद्यानों में, पौधे अब न महफूज रहे - सुमित शर्मा 'पीयूष'

क्रंदन है उद्यानों में, पौधे अब न महफूज रहे!
उपवन में दो फूल मगर, माली कुल्हाड़ी पूज रहे।

पुष्प की अनदेखी कर, देखो,तना काटने चले गए।
अपने सुत की लाश लाँघ कर, प्रेम बाँटने चले गए।

चर्चा कर शत्रु से अपने, लश्कर के सब भेदों का।
तरस रहे गठबंधन को वह, ज्ञान जलाकर वेदों का।।

मेरी चिता की लकड़ी से, वह भँवर पाटने चले गए।
अपने सुत की लाश लाँघ कर, प्रेम बाँटने चले गए।।

जिसने सरे-राह गाली दी, मात-पिता और बहनों को।
उसके सिर पर खूब सजाया, रिश्ते वाले गहनों को।

अपना ही स्तर नीचा कर, थूक चाटने चले गए।
अपने सुत की लाश लाँघ कर, प्रेम बाँटने चले गए।।

खुद की बगिया उजड़ रही है, भान नहीं है माली को,
सींच रहे हैं लहू झाँककर, किसी पड़ोसिन-डाली को।।

हम तो थे निरवंश, उधर वो फसल काटने चले गए।
अपने सुत की लाश लाँघ कर, प्रेम बाँटने चले गए।

✍✍✍✍✍
~पं० सुमित शर्मा "पीयूष"

रविवार, 5 अप्रैल 2020

6:02 pm

वीरता के साथ ही गम्भीरता का थामो हाथ - आदित्य तोमर

वीरता के साथ ही गम्भीरता का थामो हाथ,
ताकि मार हम इस महामारी को सकें.
आपदा के बीच आपाधापी नहीं ठीक, सभी -
- से कहो कि सभी इस सीख को संजो सकें.
लहरें विनाशकारी हावी होना चाहती हैं,
सावधान, ये हमारी नाव न डुबो सकें.
दुनिया में गर्व से सदैव जो तनी रही हैं,
मूँछें कभी भारत की नीची नहीं हो सकें.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)

5:50 pm

नरकुल में ले जन्म देह पर घाव अनेकों खाके - आदित्य तोमर

नरकुल में ले जन्म देह पर घाव अनेकों खाके
तपी आग में कितनी तब यह बनी बांसुरी जाके
तब जग-रास-रचैया मोहन ने अधरों पर लाके
किये अनोखे कार्य इसी बंशी को बजा-बजा के
शहनाई, बांसुरी, नफ़ीरी क्या-क्या रूप गए धर
मन के झंझा को न कहीं स्नेहिल आयाम मिले पर
गहन पीर से बंकिम होकर जब-जब तन जाती थी
यही नफ़ीरी रणरागी रणभेरी बन जाती थी
तब उसकी ध्वनि पर प्रतिध्वनि करती थीं दसों दिशाएं
थिरक-थिरक भैरवी नाच उठती लेकर ज्वालायें
*******
एक दिवस का भले किन्तु पूर्णत्व चाह है जिसकी
अंदर-अंदर ज्वालायें छवि बाहर रहे शिशिर की
शनैः शनैः पूर्णत्व प्राप्त कर शनैः शनैः खोता है
किन्तु एक क्षण भी निराश राकापति कब होता है
यद्यपि विधि के विधि-विधान से ठगा-ठगा रहता है
भीषण भले यातनाओं में पगा-पगा रहता है
सोये सारी सृष्टि किन्तु वह जगा-जगा रहता है
सतत निरत उद्यम में योगी लगा-लगा रहता है
इसी लगन को मान जगत में भोलेनाथ दिलाते 
बंकिम छवि का चंद्र धार वे चंद्रमौलि बन जाते
******
ऐसा ही बंकिम था जग में बंकिमचन्द्र चटर्जी
जिसके आगे चली नहीं गोरों के मन की मर्जी
जब अंग्रेजों ने भारत पर बंकिम दृष्टि धरी थी
गोद-भारती की सूखी जो रहती हरी-भरी थी
बलिदानों का भी न कहीं कोई उबाल दिखता था
हर कोने में लूट-पाट का ही बवाल दिखता था
चारों ओर हताशाओं का ही सवाल दिखता था
भारत का लोहू अम्बर पर लाल-लाल दिखता था
जो-जो सर उठते थे वो-वो कटा दिए जाते थे
आज़ादी के सपने जड़ से मिटा दिए जाते थे
********
ऐसे में आभारत भारत बुझता दीख पड़ा जब
कलम-बाँकुरे बंकिम का कवि भीतर चीख पड़ा तब
बोला कवि अब गहो कलम यह स्वर ललाम कर जाओ
जीते-जी इन अंग्रेजों का इंतजाम कर जाओ
फूट पड़े धमनी से जिसको सुन लोहू की धारा
बुझी-बुझी आँखें यौवन की हो जाएँ अंगारा
जिसको गाकर मिट जाए यह क़ौमों का बंटवारा
बन जाये स्वातन्त्र्य समर का जो अनन्यतम नारा
गहन चिन्तना में कवि का मन रह-रह रहा खौलता
कई दिवस तक शब्दों की ताक़त को रहा तौलता
********
पृथक-पृथक अब कितने वीरों का मैं आश्रय धारूँ
नायकहीन हुआ भारत है किसका नाम पुकारूँ
कौन एक वह तत्व कि जिसकी ख़ातिर बैर भुलाकर
जुड़े राष्ट्र सम्पूर्ण एक ध्वज की छाया में आकर
कितने ही नामों पर चिन्तन हुआ एक ही क्षण में 
भाव यथेष्ट न भर पाया पर कोई भी कवि प्रण में
सहसा एक उजाला फूटा छवि वह पड़ी दिखाई
सबसे बड़ी प्रेरणादायक भारत माता पाई
उठा प्रभंजन ऐसा थर-थर काँप उठा यह अम्बर
तब वन्देमातरम गीत अवतरित हुआ धरती पर
********

आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ
29 जून 2017
5:48 pm

क्या लखा किसी ने ऋतु बसन्त का अरुणोदय - आदित्य तोमर

क्या लखा किसी ने ऋतु बसन्त का अरुणोदय ?
क्या कहीं किसी ने गुनी चाप उसके पग की.?
क्या हुआ भास जन-मन को सुरभि झकोरों का ?
मुंद सकीं आँख क्या आह्लादित होकर जग की.?

क्या सुमन किसी डाली पर थिरके इतराये ?
भौंरों की गुँजन ध्वनि निद्रा को तोड़ सकी ?
भद्रा के योग हटे क्या ? भरणी धरिणी यह
श्रंगार हेतु तंद्रिल मुद्रा को छोड़ सकी ?

हैं कहाँ असंख्य छत्रपों की वे सेनाएँ
जो कभी सेम की हरकारा बन आती थीं,
बरसातों को जो देख-देख मुसकाती थीं,
चढ़ती आँधी को आँख दिखा धमकाती थीं,

यह क्या बसन्त जब तेजहीन रवि रश्मिरथी
विरथी हो हार रहे कोहरे से बिना लड़े.

वे भी दिन थे जब कविता में यह ऋतु बसन्त,
ऋतुराज नाम पाकर किरीट तक जा पहुँची,
ये भी दिन हैं जब मंजुल कोमलता खोकर,
कल्पना काव्य की कंकरीट तक आ पहुँची.
-
आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
5:45 pm

शहीद औरंगजेब-- वक़्त जब आता तब खड़े होते हैं सपूत - आदित्य तोमर


वक़्त जब आता तब खड़े होते हैं सपूत,
दिखा देते हैं कि हिन्दुस्तानी अभी ज़िन्दा है.
हँस-हँस मृत्यु को वरण करने लेने वाली,
परम्परा वही ख़ानदानी अभी ज़िन्दा है.
हवाओं में विष घोलने वाले भी जान जाते
गंगा-जमुना का कहीं पानी अभी ज़िन्दा है.
सिद्ध कर देते हैं औरंगज़ेब जैसे वीर,
अब्दुल हमीद की निशानी अभी ज़िन्दा है।
*
सिर से कफ़न बाँध लहू से जो सींचते हैं,
आज़ादी का वीर वे चमन जीत लेते हैं.
देश की सुरक्षा हेतु अग्नि की परीक्षा देके
जीते-जी वे मृत्यु की दुल्हन जीत लेते हैं.
पद प्राप्त होता इतिहास में अनन्यता का,
धन्यता का बहुमूल्य क्षण जीत लेते हैं.
ऐसे मतवाले रखवाले ही वतन के तो
तन हार के करोड़ों मन जीत लेते हैं।
*
भारतीय वीर दिखा जाते ऐसे जौहर हैं,
यकायक विश्व हक्का बक्का कर जाते हैं.
शातिरों के पत्ते पत्ते-पत्ते हो बिखर जाते
ऐसा एक तुरुप का इक्का धर जाते हैं.
जानता जहान है उफान मारता है जोश 
रगों में जवानी का वो धक्का भर जाते हैं।
रोक न सकें जटायु रावणों को भले, किन्तु
राक्षसों का मृत्यु पथ पक्का कर जाते हैं.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
09368656307
5:44 pm

अब तक उल्टा सीधा जो कुछ लिख पाया - आदित्य तोमर

अब तक उल्टा सीधा जो कुछ लिख पाया 
अगर वही कविता है तो मैं भी कवि हूँ.
वेदों में जो सदियों से पूजा गया यहाँ
बहुचर्चित अर्चित उस रवि की मैं भी छवि हूँ.

मैं भले न निराला, बच्चन और महादेवी
की कोई भी शेष निशानी देख सका.
मुझे न दिनकर के प्रचण्डतम शब्द मिले,
मैं न सुभद्रा की चौहानी देख सका.

काका हाथरसी बाबा निर्भय के युग में
उन आशीषों के तले न मैंने किये शोध.
मैं नीरज के मंचों पर कविता पढ़ न सका.
मुझको न मिले जीवन में कोई मुक्तिबोध.

दो-दो वटवृक्ष रहे थे पर, दुर्भाग्यपूर्ण
मैंने उनकी भी कभी न छायाएँ पायीं.
हा ! उर्मिलेश के बाद अवस्थी चले गए
उनकी स्मृतियाँ ही शेष बदायूँ में गायीं.

मैं नहीं किसी गर्वीले कविकुल का वंशज
मैं हूँ न महान परम्पराओं का अधिकारी.
जैसी भी है मिट्टी है इसी बदायूँ की.
जिस मिट्टी में रहती सदैव कविता ज़ारी.

हाँ भले नहीं उत्तराधिकार मिला कोई
हो भले न मेरे पीछे कहीं खड़ा कोई
लड़ने को मेरे साथ कभी न लड़ा कोई
इससे तो होता छोटा या न बड़ा कोई

मैं चन्द्रगुप्त की परम्परा गढ़ने वाला
वनसुमन समान बिन देखभाल बढ़ने वाला
दिनकर हूँ दिन पर दिन ऊपर चढ़ने वाला
मैं हूँ इस माटी की कविता पढ़ने वाला

आपने निमंत्रण दिया चला आया मैं भी
आपके प्रेम का चाहक हूँ, आभारी हूँ.
अनवरत दहकते इस साहित्यिक यज्ञ हेतु
आहुति तो एक चढ़ाने का अधिकारी हूँ.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ
5:40 pm

सोमनाथ :- जब भारत में सोमनाथ का मंदिर गया ढहाया - आदित्य तोमर


जब भारत में सोमनाथ का मंदिर गया ढहाया
महालिंग के टुकड़ों को सीढ़ी में गया चुनाया
मंदिर का दरवाजा गजनी मस्ज़िद में लगवाया
तब क्या कोई वीर देवता धरती पर था आया ?

नगरकोट देवी की मूरत के टुकड़े करवाकर
बांटी गयी कसाइयों में थी उसके बाट बनाकर
फिर जब बाटों से मासों के टुकड़े गए थे तोले
तब क्या महाकाल धरती पर रौद्र रूप ले डोले ?

मथुरा, काशी कहाँ नहीं ये दृश्य निरंतर दौड़े !
भारत की अस्मत के टुकड़े किसने नहीं भंभोड़े !
ऐसे में भी किसी देव ने भारत नहीं बचाया
बोलो कौन देव ने कोई पापी राख बनाया ?

धर्मो रक्षति रक्षितः का भूल गए संदेशा
अपने मन में भ्रम लेकर पाले झूठा अंदेशा
भूल गए हम धर्म उसी का जो नित कर्म करे है
रक्षा करने वाले की ही रक्षा धर्म करे है

एक-एक मंदिर की शुचिता नष्ट हुई भारत में
सकल सनातन संस्कृति अपनी भ्रष्ट हुई भारत में
और आँख मूँदे भारत के सोते रहे बहादुर
इसी बात पर रहे म्लेच्छ भारत आने को आतुर

अब तुम सोचो महादेव खुद इनसे लड़ने आएं ?
अपने मंदिर, अपने भक्तों के हित शस्त्र उठायें ?
प्रकृति नहीं करती है कोई हस्तक्षेप कभी भी
होना शेष दीखता भ्रम का पट-आक्षेप अभी भी

धर्मयुद्ध में सारथि बनकर आये कृष्ण भलें हों
और बाण उनकी भी प्रतिज्ञाओं पर खूब चले हों
किन्तु यही था मर्म धर्म हित नर ही आगे आएं
बलिदानों के पथ पर बढ़ कर कुल का मान बढ़ाएं

अरे हिन्दुओ कब तक भेड़ों जैसे कटे रहोगे
आपस में बिन बात अहम की खातिर बंटे रहोगे
बलबानों से धर्म सदा होता आया परिभाषित
वे जबरन ढोते हैं इसको जो होते हैं शासित

क्यों भक्तों पर हमले शिव को डिगा नहीं पाते हैं
इनके चीत्कार क्यों उनको जगा नहीं पाते हैं
भीषण नरसंहार शूल को उठा नहीं पाते हैं
उनके संहारक को भोले मिटा नहीं पाते हैं

कोई प्रलयानल शंकर का कहीं न धधका अब तक
देवराज का वज्र भक्तहित कहीं न फड़का अब तक
साफ़ यही सन्देश स्वयं इस धर्मयुद्ध को तोलो
हर-हर-बम-बम महादेव के जय-जयकारे बोलो

आग वही तीसरे नेत्र की तुममें धधक उठेगी
इंद्रदेव की वज्र शक्ति बाजू में फड़क उठेगी
लड़ते-लड़ते राम नाम ध्वनि होंठों पर आएगी
तो बजरंगबली की ताक़त तुमको मिल जायेगी

यही सीख मिलती है सिख गुरुओं के बलिदानों में
पूजो अपने इष्टदेव को अपनी किरपानों में
कोरे आह्वान से कोई देव नहीं आएगा
भीषण हमलावर के आगे भक्त न बच पायेगा

उठो धर्मभीरुओ, भैरवों जैसा रंग बनाओ
अगर काल से भी लड़ना पड़ जाए तो लड़ जाओ
कब तक हम इस कायरता को ढोते और रहेंगे
कब तक वीर योद्धा अपने सोते और रहेंगे

आज पुनः दत्तात्रेय के महापन्थ पर आओ
अपने अपने पिंड दान कर धर्म युध्द में धाओ
अन्यथा श्वेत पथ अमरनाथ का रक्तिम-रक्तिम होगा
यही इशारा हिन्दूधर्म की खातिर अंतिम होगा.

विधि क्या विधिना के ही सारे योग पलट जायेंगे
और सनातन होने के भ्रम में हम मिट जायेंगे.
-
©
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
11 जुलाई,2017
संपर्क सूत्र - 9368656307
5:25 pm

बाहर भले ही कितना ही झगड़ें ये नेता - आदित्य तोमर

चार नीतियाँ हैं मित्र - साम, दाम, दण्ड, भेद 
चारों का ही नेतागिरी से घनिष्ट नाता है.
बाहर भले ही कितना ही झगड़ें ये नेता,
भीतर सदैव इन्हें साम भाव भाता है.
काम धेला भर का न करते हों किन्तु आम-
-बात है कि दाम निर्विवाद बढ़ा जाता है.
नित्य ही समाज में बढ़ाते आये हैं ये भेद,
और दण्ड मात्र जनता के हिस्से आता है.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ.
11:20 am

यदि आज राम राजा होते, यदि होता अब-तक राम-राज - आदित्य तोमर

यदि आज राम राजा होते, यदि होता अब-तक राम-राज.
रावण के अधिवक्ता बनकर, उठते न कहीं फिर प्रश्न आज.
जनता न व्याभिचारी होती, शासक यदि होते धर्मनिष्ठ.
तब शिष्य राम से भी मिलते, यदि होते कोई गुरु वशिष्ठ.

दर्पण, अर्पण की मूर्तिमान छवि होते हैं शासक, गुरुजन.
उनके ही बिम्ब झलकते हैं जनता में सच्चरित्रता बन.
वीरता-धीरता उनसे ही, सत्यता उन्हीं से फलती है.
जैसे चलते हैं ये दोनों, जनता भी वैसे चलती है.

यदि राजा कर्म-धर्म साधक, जनपालक, न्यायहितैषी हो.
प्रगति गति उसके शासन की क्या कहें भला फिर कैसी हो.
व्यापार फला-फूला रहता, जनता में भरता रोष नहीं.
धन-धान्य अतुल्य उपजते हैं खाली होते हैं कोष नहीं.

बादल भी उमड़-घुमड़कर नित जलराशि अपार लुटाते हैं.
हरियाकर हर्षाती धरती, धरती से मन हर्षाते हैं.
झरझर झर-झर बहते रहते, नदियों की धार नहीं रुकती.
स्वाभिमान के प्रश्नों पर जनता फिर कभी नहीं झुकती.

वैसे ही सच्चे गुरुओं से, गुरुता परिभाषित होती है.
शासक अनुशासित होते हैं, जनता अनुशासित होती है.
फिर गुरु का तो दायित्व नित्य शासक से कहीं अधिक होता.
गुरु का प्रभाव सदियों चलता, शासक का भले क्षणिक होता.

यह सृजन और संहार शक्ति उसके ही खेल अनूठे हैं.
है एकमात्र गुरु सत्य और सब दृश्य यहाँ के झूठे हैं.
जगती की ऐसी राह कौन, जिस पर पग पहले धरे नहीं.
क्या युद्धपंथ, क्या शान्तिमन्त्र, गुरु से तो कुछ भी परे नहीं.
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
11:15 am

एक हाथ लेखनी है एक हाथ अंकुश है - आदित्य तोमर

श्री गणेश

एक हाथ लेखनी है एक हाथ अंकुश है,
शस्त्र और शास्त्र दोनों साधते हैं कर में.
लोक-क्षेत्र-दिक्पाल रहते हैं बाँधे हाथ,
माथ को झुकाए सदा आपकी डगर में.
कहते हैं, आप कभी भक्तों को भुलाते नहीं,
भक्त भूल जाएँ भले भ्रम के भँवर में.
ऋद्धि-सिद्धि, क्षेत्र-लाभ सहित पधारो प्रभु,
मुझ बुद्धि-बलहीन याचक के घर में.
-
आपकी प्रशंसा हेतु सिद्ध मुनियों के बीच,
आशा है कि मेरी भाव-भाषा अनुमन्य है.
परहित हेतु आप करते सदैव कार्य,
आपका औदार्य तो सदेह पर्जन्य है.
आपसे ही शब्द चेतना को लब्ध होते प्रभु,
कवि सारी सृष्टि में ही आपसा न अन्य है.
आपके लिखे की धन्यता को तौल पाया कौन,
आप पर लिखा शब्द-शब्द धन्य-धन्य है.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)

सोमवार, 20 अगस्त 2018

4:59 pm

सैनिक सीना तान चला !! देखो-देखो अब सिमा पर! सैनिक सीना तान चला!! - धनंजय सिते


    !! सैनिक सीना तान चला !!
देखो-देखो अब सिमा पर!
सैनिक सीना तान चला!!
१)माँ कि ममता,आशिश पिता का
         भाई का,अभिमान चला!
                       देखो,देखो.....
२)चिंता रख परिवार कि दिलमे
      अश्क लेकर आखो मे चला!
                      देखो,देखो......
३)माँ भारती को रख दिल मे ले
       तिरंगे का सम्मान चला!
                देखो,देखो..........
४)ओंझल तक परिवार को देखा
        फिरभी हिम्मत बांध चला!
                    देखो देखो.........
५)वह जागता रहता है सिमा पर
    जब गहरि निंद का जोर चला!
                    देखो देखो ........
६)बनकर सरहद पर दश्मन का
       देखो कैसे काल चला!
                 देखो देखो...........
७)दुश्मन को है मार गिराना
     लक्ष जिगर मे पाल चला!
              देखो देखो..........
८)प्यार बहन कि राखी का ले
        पत्नी का श्रृंगार चला!
                 देखो देखो.........
९)मातृभुमी के रक्षा कि जीद
      लेकर जन-मन गान चला!
                देखो देखो...........
१०)देशभक्ती का जुनून है,सोचे
        लु दुश्मन कि जान चला!
                 देखो देखो..........
११)झेल मुसिबत को सरहद पर
       चाहे लडते दे दु जाँन चला!
                    देखो देखो.........
१२)बनकर हिंन्दुस्थानियो कि
          देखो कैसे ढाल चला!
                     देखो देखो......
१३)मातृभूमी को कर दु जिवन
          सोच के ये कुर्बान चला!
                  देखो देखो...........
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हास्य,व्यंग,ओज,पँरोडि कवि
एवं गितकार-धनंजय सिते(राही)
लोधीखेडा,तह-सौसर जिला-छिंदवाडा(म.प्र.)
Mob-9893415829

रविवार, 19 अगस्त 2018

7:25 am

देश अपना प्यारा, मिलकर हम इसे सजायेंगे। आओ झूमें गायें, गुण हम इसके सब गायेंगे - भुवन बिष्ट

देश अपना प्यारा, 
             मिलकर हम इसे सजायेंगे। 
आओ झूमें गायें, 
               गुण हम इसके सब गायें ।। 

आजादी की अलख जगी, 
               वीरों ने प्राण गवाये थे। 
रक्षा भारत भूमि की, 
               जो लौट के घर न आये थे।। 
बँधे एकता सूत्र में हम, 
                झलक यह दिखलायेंगे। 
देश अपना प्यारा, 
                 मिलकर हम इसे सजायेंगे। ........
शीश हिमालय मुकुट बना, 
                 सागर भी पाँव पखारे है। 
जो भारत से है टकराया, 
                 हम जीते वह हारे हैं।। 
भारत माँ की आन बान, 
                हमको प्राणों से प्यारे हैं। 
हर भारतवासी देखो अब, 
                इसको आज सवारे है।। 
भारत माँ की चरण धूलि से, 
                आओ तिलक लगायेंगे। 
देश अपना प्यारा, 
                  मिलकर हम इसे सजायेंगे। ........
सारे जग में देश अपना, 
                   भारत सबसे प्यारा है। 
हर जन जन इसको देखो, 
                    अपने हाथ सवाँरा है।। 
तोड़ न पायेगा कोई भी, 
                      एकता की जंजीरों को। 
नमन करें हम सदा सदा ही, 
                     देश के अपने वीरों को।। 
मिलकर आओ बगिया के हम, 
                      बनें पुष्प महकायेंगे। 
देश अपना प्यारा, 
                      मिलकर हम इसे सजायेंगे। ......


                      ............भुवन बिष्ट
                               (रानीखेत)उत्तराखण्ड 


शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

7:26 am

ऐ अमर वीर बलिदानी भारत के सपूत - प्रदीप ध्रुवभोपाली


ऐ अमर वीर बलिदानी भारत के सपूत अंगार लिखो।
तुम मातृभूमि के लिए करो उत्सर्ग और तुम प्यार लिखो।


दुश्मन को कर दो तहस नहस औ धूल चटा दो तुम उनको
दुश्मन के लाखों शीश काट जय महाकाल जयकार लिखो।


जो लहू आग की तरह गर्म न हुआ लहू नहिं पानी है,
तुम महाप्रलय बन टूट पड़ो दुश्मन पे हाहाकार लिखो।


ऐ शूरवीर तुम बनो काल दुश्मन को मृत्यु दो अकाल,
तुम करो वार मरते हजार हो दुश्मन का संहार लिखो।


महाराणाप्रताप का है प्रताप लक्ष्मीबाई का तेज भी है,
बम तोप मिसाइल का गर्जन खूँ की प्यासी तलवार लिखो।


ये भगतसिंह आज़ाद राजगुरु का बलिदान नहीं भूलें,
हो पाक और नापाक कोई अब युद्ध हो आरोपार लिखो।

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प्रदीप ध्रुवभोपाली, म,प्र
भोपाल, दिनाँक-04/08/2018
मो.-09893677052
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मंगलवार, 24 जुलाई 2018

9:33 pm

सात सौ हिन्दू शिक्षा मित्र मर चुके लेकिन सरकार मौन

कैसे मानू कट्टर हिन्दू मर रहे आज हिन्दू भाई
तुम ढोल पीटते छाती पर औ बजा रहे हो सहनाई
इनके घर में मातम पसरा सन्नाटा मुझे दिखा भारी
इन मासूमों पर जुल्म ढहा करते उन्नीस की तैयारी
गंगा पर बसे बनारस में रैली में तुमने वोला था
जुम्मेदारी अब मेरी भाषण में शव्द ये तोला था
माँ गंगा ने भी सुने शव्द वह सोच रही मन में होगी
माँ से भी झूठ वोलते हैं बदनामी जन जन में होगी
मर चुके उन्हीं की लाशों पर सत्ता लेकर इठलातें हैं
इनके घर जाकर देखो तो भूखे बच्चे चिल्लाते है
जब जब कोई बेबस रोकर दिल ही दिल में जलता है
चाहे जो सत्ता भोगी हो सिंहासन उसका हिलता है
कौरव दल में सब योद्धा थे फिर कुरूक्षेत्र क्यों हार गये
वनवास भले ही भोगा हो पर पाण्डव बाजी मार गये
सत्य सनातन सनातनी परिभाषा नही दिखी मुझको
जख्मों पर मरहम लगा सके वो आशा नही दिखी मुझको
जो खुद को कहते रामभक्त वो झूठ बोलते दिखे मुझे
पाँच साल तक अपनों की ही पोल खोलते दिखे मुझे
महिला भी मरी ये पुरुष मरे बच्चों ने चिता जलायी है
सत्ता के चौकीदारों का एक शव्द न पड़ा दिखाई है
बड़े बड़े फनकारों ने दो शव्द नही वोले इन पर
दाताओं ने आकांओ के दिल रहम नही डोले इन पर
नीति राम की नही दिखी मर्यादा नही दिखाई दी
सूर्य वंश जैसी कोई परिभषा नही दिखाई दी
जो नीति नही अपना सकते वो राम को क्या अपनायेगें
जो पड़ा अयोध्या में तम्बू उसको कैसे हटबायेंगें
जिसके भगवान हो तम्बू में वह सोते दिखे कोठियों में
उसके न कलेजा दिखा शेर है पानी भरा बोटियों में
बेबस मजबूर दुखी का जो जमकर उपहास उडाते हैं
वो गीदड ही रह जाते हैं वो शेर नहीं कहलाते हैं
घर घर का शिक्षा मित्र जगा तो सत्ता को हिलवायेगा
अभी समझ रहे जिसको लल्लू इतिहास बदल कर जायेगा
💐💐💐💐💐💐💐💐
जय हिन्द जय भारत
राजेश मिश्र

बुधवार, 11 जुलाई 2018

10:06 am

वीर सपूत मंगल पाण्डे की शहादत पर प्रस्तुत रचना - राजेश मिश्र प्रयास

देश भक्त बलवीरों का झरना प्रताप का वहता है
वतन की खातिर मिट जाते बस नाम अमर वो रहता है
मंगल पाण्डे भड़क गये थे उस अग्रेजी वर्दी से
कारतूस बनवाते गोरे गाय सुअर की चर्बी से
यूरोपी रेजीमेन्ट बनी थी भारतीयों की भर्ती से
भूमिदेव अंगार उगा यू पी बलिया की धरती से
बीस बर्ष की आयु युवा इस बटालियन का हिस्सा था
बढ रही छावनी बैरकपुर कुछ दिलदारी का किस्सा था
गोरे अफसर रोज नये कुछ पत्ते खोला करते थे
भारत के वीर सपूतों को देहाती वोला करते थे
मिलकर के सब सैनिक वोले जो कारतूस चलवाते हो
तुम गाय सुअर का लेप चढा नापाक हमें करवाते हो
यदि सभी चाहते आजादी तो कोई तो मृगराज बनो
मिलकरके जान लुटा देंगे बस तुम पहली आवाज बनो
बस पवनपुत्र बन जाओ तुम हम सब अंगद बन जायेंगे
इन गद्दारों की लंका में अब लंका दहन मचायेंगें
भारतीय बलिदानों से बंगाल की धरती पावन थी
विद्रोह उठा था जब पहला सन अठरह सौ सत्तावन थी
केहरि बन करता सिंसनाद वह अद्भुत योद्धा मंगल था
थीं लोड रायफल हाथों में वो इतिहासों का दंगल था
ललकार रहे साथी आओ मिलकर यह फर्ज निभाना है
भारत की लाज बचानी है हमें अपना धर्म बचाना है
आक्रोश भरा था हृदय में वो वगावती तेवर में थे
थीं पिस्टल लोड रायफल भी सब शस्त्र रुप जेवर में थे
जनरल हर्से ने फोर्स सहित फिर आगे जाकर घेर लिया
मंगल को करलो गिरफ्तार ईश्वर पाण्डे को आदेश दिया
उसने आदेश नही माना ऐसा कैसे कर सकता हूँ
यदि मंगल कुर्बानी देगा मैं साथ साथ मर सकता हूँ
कर्नल बाँग बढा आगे मंगल ने उस पर बार किया
लेकर तलवार भिडे दोनों कर्नल मुँह के बल डार दिया
भारतीय सिपाही था पलटू थी सेखी बडी कमीने में
धोखे से बार किया उसने तलवार भोक दी सीने में
पल्टू ने ही कर गिरफ्तार अपनों को फसवाया है
गद्दार कमीना दगाबाज वो मन ही मन हर्षाया है
उन फिरंगियों ने मिलकरके फाँसी का हुक्म सुनाया है
राजेश मिश्र इस वर्णन को रोते रोते लिख पाया है
जो दर्द दबे हैं सीने में वो दर्द लिखा हम करते हैं
हसते फाँसी जो झूल गये वो मर्द लिखा हम करतें हैं

राजेश मिश्र प्रयास 
कोषाध्यक्ष जनचेतना साहित्यिक साँस्कृतिक समिति रजि0 226
जिलाध्यक्ष राष्ट्रीय ब्राह्मण महासंघ ---जिला (पीलीभीत)

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कश्मीर का साढे तीन साल के गठबंधन पर रचना पढे  - राजेश मिश्र


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