हिंदी साहित्य वैभव

EMAIL.- Vikasbhardwaj3400.1234@blogger.com

Breaking

बुधवार, 29 जनवरी 2020

7:06 am

जॉन_एलिया साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर किये जा रहे हैं।
ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। उम्मीद है यह कोशिश आपको पसन्द आएगी।
आज पेश हैं #जॉन_एलिया साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी ...
जॉन एलिया का जन्म 1931 को अमरोहा में हुआ था और  2002 में वे दुनिया से रुखसत हो गये।
उनकी ज़िंदगी जज़्बाती संघर्ष और निराशा में डूबी रही, जो उनकी शायरी में बखूबी नज़र भी आता है। वे उर्दू अदब के बड़े और बेहतरीन शायर थे। शायरी में आसान लफ़्ज़ों के इस्तेमाल की वजह से वे सीधे दिल में उतर जाते हैं, इसीलिये वे आज भी लोगों के दिलों पर राज करते हैं।
...तो समाअत फ़रमाइये उनकी कुछ ग़ज़लें और कुछ शे'र ...

#ग़ज़लें

/ 01/

उम्र गुज़रेगी इम्तहान में क्या
दाग़ ही देंगे मुझको दान में क्या

मेरी हर बात बेअसर ही रही
नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या

मुझको तो कोई टोकता भी नहीं
यही होता है खानदान मे क्या

यूँ जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या

ये मुझे चैन क्यो नहीं पड़ता
एक ही शख्स था जहान में क्या

/ 02 /

एक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
सब के दिल से उतर गया हूँ मैं

कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ
सुन रहा हूँ के घर गया हूँ मैं

क्या बताऊँ के मर नहीं पाता
जीते जी जब से मर गया हूँ मैं

अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का
के यहाँ सब के सर गया हूँ मैं

तुम से जानां मिला हूँ जिस दिन से
इस तरह खुद से डर गया हूँ मैं

#चन्द_शेर


बिन तुम्हारे कभी नहीं आयी
क्या मेरी नींद भी तुम्हारी है

मैं ख़ुद नहीं हूं और कोई है मेरे अंदर
जो तुम को तरसता है, अब भी आ जाओ

कोई नहीं यहां खामोश, कोई पुकारता नहीं
शहर में एक शोर है और कोई सदा नहीं

अब हमारा मकान किस का है
हम तो अपने मकां के थे ही नहीं

जा रहे हो तो जाओ लेकिन अब
याद अपनी मुझे दिलाइयो मत

हम आंधियों के बन में किसी कारवां के थे
जाने कहां से आए थे, जाने कहां के थे

और तो हमने क्या किया अब तक
ये किया है कि दिन गुज़ारे हैं

मेरी जां अब ये सूरत है कि मुझ से
तेरी आदत छुड़ाई जा रही है

कभी-कभी तो बहुत याद आने लगते हो
कि रूठते हो कभी और मनाने लगते हो

मैं अब हर शख़्स से उकता चुका हूं
फ़क़त कुछ दोस्त हैं, और दोस्त भी क्या

आप बस मुझ में ही तो हैं, सो आप
मेरा बेहद ख़याल कीजिएगा

बहुत नज़दीक आती जा रही हो
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या

मुझ से बिछड़ कर भी वो लड़की कितनी ख़ुश ख़ुश रहती है
जिस लड़की ने मुझ से बिछड़ कर मर जाने की ठानी थी

तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ ये कैसी तन्हाई है
तेरे साथ तेरी याद आई क्या तू सचमुच आई है

बिन तुम्हारे कभी नहीं आई
क्या मेरी नींद भी तुम्हारी है

सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर
अब किसे रात भर जगाती है

कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया

ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम
7:04 am

कृष्ण_बिहारी_नूर साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली कुछ ग़ज़लें ...डॉ_निशान्त_असीम

#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर जारी है। इसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर किये जा रहे हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। उम्मीद है यह कोशिश आपको पसन्द आ रही होगी।
आज लेकर आये हैं #कृष्ण_बिहारी_नूर साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली कुछ ग़ज़लें ...

#ग़ज़लें ...

/ 1 /

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं,
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

ज़िन्दगी मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे,
झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं

ज़िन्दगी अब बता कहाँ जाएँ
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं

जिसके कारण फ़साद होते हैं
उसका कोई अता-पता ही नहीं

धन के हाथों बिके हैं सब क़ानून
अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं

चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो
आईना झूठ बोलता ही नहीं

अपनी रचनाओं में वो ज़िन्दा है
‘नूर’ संसार से गया ही नहीं

/ 2 /

नज़र मिला न सके उससे उस निगाह के बाद
वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बाद

मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता ख़ुद को
किसी की चाह न थी दिल में, तिरी चाह के बाद

ज़मीर काँप तो जाता है, आप कुछ भी कहें
वो हो गुनाह से पहले, कि हो गुनाह के बाद

गवाह चाह रहे थे, वो मिरी बेगुनाही का
जुबाँ से कह न सका कुछ, ख़ुदा-गवाह के बाद

/ 3 /

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझमें
और फिर मानना पड़ता है के ख़ुदा है मुझमें

मेरा ये हाल उभरती हुई तमन्ना जैसे,
वो बड़ी देर से कुछ ढूंढ रहा है मुझमें

जितने मौसम हैं सब जैसे कहीं मिल जायें,
इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझमें

आईना ये तो बताता है के मैं क्या हूँ लेकिन,
आईना इस पे है ख़मोश के क्या है मुझमें

अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ 'नूर'
मैं कहाँ तक करूँ साबित के वफ़ा है मुझमें

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम
7:00 am

निश्तर_ख़ानक़ाही साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी के साथ ... डॉ_निशान्त_असीम


#हिंदुस्तानी_ग़ज़ल  #ہندوستانی_غزل
की ये सीरीज फेसबुक अकाउन्ट पर प्रस्तुत है। जिसमें शायरों/ग़ज़लकारों की आसान हिन्दुस्तानी ज़बान में कही गयीं, उनकी चुनिंदा ग़ज़लें और शे'र हाज़िर हैं। ताकि वे एक आम हिन्दुस्तानी तक आराम से पहुँच सकें। उम्मीद है यह कोशिश आपको पसन्द आएगी।
आगाज़ कर रहे हैं #निश्तर_ख़ानक़ाही साहब की हिंदुस्तानी ज़बान वाली शायरी के साथ ...

#ग़ज़लें ...

/01/

बच्चे डरे-डरे से ये क्या पूछते हैं आज
अख़बार के हिसाब से कितने मरे हैं आज

हँस हँस के यूँ तो सबसे मिला हूँ मगर ये क्या
झूठी हँसी से होंठ बहुत दुख रहे हैं आज

चमका न अब भी मास के अन्तिम दिनों का चाँद
या हम समय से पहले ही सोने लगे हैं आज

टायर कहीं फ़टे तो ये लगता है कुछ हुआ
आहट भी हो ज़रा सी तो हम काँपते हैं आज

/02/

अपने ही खेत की मिट्टी से जुदा हूँ मैं तो ।
इक शरारा हूँ कि पत्थर से उगा हूँ मैं तो ।

मेरा क्या है कोई देखे या न देखे, मुझको
सुब्ह के डूबते तारों की ज़िया हूँ मैं तो ।

अब ये सूरज मुझे सोने नहीं देगा शायद
सिर्फ़ इक रात की लज़्ज़त का सिला हूँ मैं तो ।

कौन रोकगा तुझे दिन की दहकती हुई धूप
बर्फ़ के ढेर पे चुपचाप खड़ा हूँ मैं तो ।

/03/

रात एक पिक्चर में, शाम एक होटल में, बस यही बसीले थे
मेज़ के किनारे पर, चाय की पियाली में, उसकें होंठ रक्खे थे

दस्तख़त नहीं बाक़ी, बस हरुफ़ टाइप के क़ाग़ज़ों में ज़िंदा हैं
याद भी नहीं आता, प्यार के ये ख़त जाने, किसने किसको लिक्खे थे

दर्द-खानादारी का, हमको क्या पता क्या है, हम जवान शहरों के
होटलों में रहते थे, हॉट-डाग खाते थे, काकटेल पीते थे

आज का भी दिन गुज़रा, डाकतार वालों की कल से कामबंदी है
जाने किन उमीदों पर हमने रात काटी थी, गिन के पल गुजारे थे।

#चन्द_शेर ...

रूह के ज़ख़्मों से छनती रोशनी अच्छी लगी
थी बहुत बेदर्द लेकिन ज़िन्दगी अच्छी लगी

दिल किसी के दर्द में रोता नहीं पत्थर हुआ
आदमी अब आदमी के वास्ते बंजर हुआ

मीर कोई था मीरा कोई लेकिन उनकी बात अलग
इश्क न करना इश्क में प्यारे पागल बनना पड़ता है

घट के इतनी रह गयी है ज़िन्दगी
घर बसाया, घूस दी, नौकर हुए

कहता है आज दिन में उजाला बहुत है यार
शायद ये शख़्स रात में जागा बहुत है यार

दस्तक पे दोस्तों की भी खुलते नहीं हैं दर
हर वक़्त एक अजीब सी वहशत घरों में है

हाल शासन का लिखा जनता की लाचारी लिखी
अंत में बारूद पर माचिस की निगरानी लिखी

कुछ न पूछो क्या हुआ क्यों इतने दिन ग़ायब रहे
बात बस इतनी थी हम मर गये थे बीच में

प्रस्तुति
#डॉ_निशान्त_असीम

शनिवार, 25 जनवरी 2020

2:38 am

हम जहाँ भी मुहब्बत निभाने गए।

आदरणीय जी सादर नमन👏👏
*"हिंदी साहित्य वैभव "* मासिक  पत्रिका के लिए रचना स्वीकार करें।
         मैं ..चन्द्रभान सिंह 'चाँद'........ घोषणा करता/करती हूँ कि पत्रिका में प्रकाशन हेतु  भेजी गयी रचना मेरे द्वारा लिखित और पूर्णतः मौलिक हैं। इसके प्रकाशन से यदि कोप्पीराइट का उल्लंघन होता हैं तो इस दशा में उसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी होगी।

        ★★ग़ज़ल★★

हम जहाँ भी मुहब्बत निभाने गए।
लोग हमको वहाँ आजमाने गए।।

पीठ खंजर उसी ने दिया भौंक था।
राह जिसकी गुलों से सजाने गए।।

आज मिलती उसे यार बदनामियाँ।
मुल्क पर जान को जो लुटाने गए।।

मौत से आज पर्दा नहीं उठ सका।
देशहित जो लहू को बहाने गए।।

देश के ओ लुटेरों सुनो गौर से।
ख्याल उनका रखो सिर कटाने गए।।


आज उनको नमन आप करते नहीं।
जान पर खेल डायर उड़ाने गए।।

याद उनको करो साथ मिलकर सभी।
'चाँद' जो भी गुलों को खिलाने गए।।

 ✍🏻✍🏻


🌙🌙🌙🌙🌙🌙
◆◆◆स्व-परिचय◆◆◆

नाम - चंद्रभान सिंह 'चाँद'
पत्नी- श्रीमती पूनम शाक्य
पिता - श्री कालीचरन शाक्य
माता - श्रीमती महादेवी शाक्य
शैक्षिक योग्यता- M.A.(edu.),M.Sc.(chem.),B.T.C.&B.Ed.( edu.training course),DOAP (com.Dp.)
जन्मतिथि-05-09-1989
गाँव - अखतऊ
पत्रालय- सींगपुर
शहर- गंजडुंडवारा
तहसील-पटियाली
जनपद- कासगंज
पिन-207242 (उ. प्र.)
सम्पर्क सूत्र-9719815279
Fb id- चंद्रभान सिंह 'चाँद'
Fb page-  कवि सी.बी.सिंह गंजडुंडवारा
 प्रकाशित पुस्तक-'महफ़िल-ए-गज़ल' , त्रिवेणी , बज़्म-ए-हिन्द, वतन के रखवाले(साझा काव्य-संग्रह )
प्राप्त सम्मान- 
१-काव्य_सागर सम्मान(राजस्थान )
२- हिन्दी साहित्य सम्मान (बिहार)
३- हिन्दी साहित्य मंच सम्मान (बिहार)
४- वर्तमान अंकुर साहित्य सम्मान (नोएडा, उ. प्र.)
५- कलमवीर सम्मान अलीगढ़(उ. प्र.)
६- हिन्दी साहित्य समृध्दि रत्न सम्मान मुफ्फफरपुर(बिहार)
७- साहित्य साधना सम्मान बदायूँ (उ. प्र.)
८- हिन्दी साहित्य रत्न सम्मान मुजफ्फरपुर (बिहार)
९- हिन्दी साहित्य सरिता सम्मान अररिया (बिहार)
१०- हिन्दी साहित्य अँचल सम्मान अररिया (बिहार)
११- हिन्दी गौरव सम्मान अररिया (बिहार)
१२- साहित्य सारथी गौरव सम्मान-२०१९ ( नई दिल्ली  )

वर्तमान पद-जनता इंटर कॉलेज कैल्ठा,अलीगंज 'एटा (उत्तर-प्रदेश) में  रसायन विज्ञान के पद पर कार्यरत।

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

चंद्रभान सिंह 'चाँद'
कासगंज (उ. प्र.)

शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

10:33 pm

आजादी


आज़ादी

शहीद दिवस को याद करें उन वीरों का बलिदान है।
आजादी उनकी ही देन है, मेरा भारत देश महान है।

चल पड़े थे प्रगति पथ पर ना देखा पीछे मुड़कर,
ये थे भारत के वीर जवान, तर्पण उनके प्राण हैं।

शत शत नमन उन्हें रखते हमको जो महफूज़ हैं,
सुभाष,भगत,सुखदेव,राजगुरु हुए देश के लिए कुर्बान हैं।

उन वीर योद्धाओं को हम कभी भी भुला न पाएंगे,
वतन पर मिटने वालों का बस बाकी यही निशान हैं।

अपने देश के खातिर उन्होंने जान कर दी कुर्बान,
यही कहलाये अपने मुल्क के सच्चे वीर जवान हैं।

हँसते-हँसते वीर जवान फाँसी के फंदे पर झूल गए,
देश की आजादी इन्ही की देन है, ये इनकी पहचान हैं।

सुमन अग्रवाल "सागरिका"
        आगरा

Sent from Samsung Mobile

गुरुवार, 16 जनवरी 2020

6:34 am

पत्रिकाओं के ईमेल की एक और सूची

पत्रिकाओं के ईमेल की एक और सूची इनको सेव जरूर कर लें
==================

1. हंस, संजय सहाय (संपादक), editorhans@gmail.com

2 himprasthahpGmail.com

3. बया, गौरीनाथ (संपादक), rachna4baya@gmail.com
4. पहल, ज्ञानरंजन (संपादक), edpahaljbp@yahoo.co.in, editorpahal@gmail.com
5. अंतिम जन- दीपक श्री ज्ञान (संपादक)- antimjangsds@gmail.com, 2010gsds@gmail.com
6. समयांतर- पंकज बिष्ट (संपादक)- samayantar.monthly@gmail.com, samayantar@yahoo.com
7. लमही- विजय राय (संपादक)- vijayrai.lamahi@gmail.com
8. पक्षधर- विनोद तिवारी (संपादक)- pakshdharwarta@gmail.com
9. अनहद- संतोष कुमार चतुर्वेदी (संपादक)- anahadpatrika@gmail.com
10. नया ज्ञानोदय- लीलाधर मंडलोई (संपादक)- nayagyanoday@gmail.com, bjnanpith@gmail.com
11. स्त्रीकाल, संजीव चन्दन (संपादक), themarginalized@gmail.com,
12. बहुवचन- अशोक मिश्रा (संपादक)- bahuvachan.wardha@gmail.com
13. अलाव- रामकुमार कृषक (संपादक)- alavpatrika@gmail.com
14. बनासजन- पल्लव (संपादक)- banaasjan@gmail.com
15. व्यंग्य यात्रा, प्रेम जनमेजय (संपादक), vyangya@yahoo.com, premjanmejai@gmail.com
16. अट्टहास (हास्य व्यंग्य मासिक), अनूप श्रीवास्तव (संपादक), anupsrivastavalko@gmail.com
17. उद्भावना- अजेय कुमार (संपादक)- udbhavana.ajay@yahoo.com
18. समकालीन रंगमंच- राजेश चन्द्र (सम्पादक)- samkaleenrangmanch@gmail.com
19. वीणा-राकेश शर्मा,veenapatrika@gmail.com
20. मुक्तांचल-डॉ मीरा सिन्हा,muktanchalquaterly2014@gmail.com,
21. शब्द सरोकार-डॉ हुकुमचन्द राजपाल,sanjyotima@gmail.com,
22. लहक-निर्भय देवयांश,lahakmonthly@gmail.com
23. पुस्तक संस्कृति। संपादक पंकज चतुर्वेदी।editorpustaksanskriti@gmail.com
24. प्रणाम पर्यटन हिंदी त्रैमासिक संपादक प्रदीप श्रीवास्तव लखनऊ उत्तर प्रदेश
1. PRANAMPARYATAN@YAHOO.COM
25. समालोचन वेब पत्रिका, अरुण देव (सम्पादक), www.samalochan.com, devarun72@gmail.com
26. वांग्मय पत्रिका, डॉ. एम. फ़िरोज़. एहमद, (सम्पादक), vangmaya@gmail.com
27. साहित्य समीर दस्तक (मासिक), कीर्ति श्रीवास्तव (संपादक), राजकुमार जैन राजन (प्रधान सम्पादक), licranjan2003@gmail.com
28. कथा समवेत (ष्टमासिक), डॉ. शोभनाथ शुक्ल (सम्पादक), kathasamavet.sln@gmail.com
29. अनुगुंजन (त्रैमासिक), डॉ. लवलेश दत्त (सम्पादक), sampadakanugunjan@gmail.com
30. सीमांत, डॉ. रतन कुमार (प्रधान संपादक), seemantmizoram@gmail.com
31. शोध-ऋतु, सुनील जाधव (संपादक), shodhrityu78@yahoo.com
32. विभोम स्वर, पंकज सुबीर (संपादक), vibhomswar@gmail.com, shivna.prakashan@gmail.com
33. सप्तपर्णी, अर्चना सिंह (संपादक), saptparni2014@gmail.com
34. परिकथा, parikatha.hindi@gmail.com
35. लोकचेतना वार्ता, रवि रंजन (संपादक), lokchetnawarta@gmail.com
36. युगवाणी, संजय कोथियल (संपादक), Yugwani@gmail.com
37. गगनांचल,डॉक्टर हरीश नवल (सम्पादक), sampadak.gagnanchal@gmail.com
38. अक्षर वार्ता, प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा (प्रधान संपादक), डॉ मोहन बैरागी (संपादक) aksharwartajournal@gmail.com
39. कविकुंभ, रंजीता सिंह (संपादक), kavikumbh@gmail.com
40. मनमीत, अरविंद कुमार सिंह(संपादक), manmeetazm@gmail.com
41. पू्र्वोत्तर साहित्य विमर्श (त्रैमासिक), डॉ. हरेराम पाठक (संपादक), hrpathak9@gmail.com
42. लोक विमर्श, उमाशंकर सिंह परमार (संपादक), umashankarsinghparmar@gmail.com
43. लोकोदय, बृजेश नीरज (संपादक), lokodaymagazine@gmail.com
44. माटी, नरेन्द्र पुण्डरीक (संपादक), Pundriknarendr549k@gmail.com
45. मंतव्य, हरे प्रकाश उपाध्याय (संपादक), mantavyapatrika@gmail.com
46. सबके दावेदार, पंकज गौतम (संपादक), pankajgautam806@gmail.com
47. जनभाषा, श्री ब्रजेश तिवारी (संपादक), mumbaiprantiya1935@gmail.com, drpramod519@gmail.com
48. सृजनसरिता (हिंदी त्रैमासिक), विजय कुमार पुरी (संपादक), srijansarita17@gmail.com
49. नवरंग (वार्षिकी), रामजी प्रसाद ‘भैरव’ (संपादक), navrangpatrika@gmail.com
50. किस्सा कोताह (त्रैमासिक हिंदी), ए. असफल (संपादक), a.asphal@gmail.com, Kotahkissa@gmail.com
51. सृजन सरोकार (हिंदी त्रैमासिक पत्रिका), गोपाल रंजन (संपादक), srijansarokar@gmail.com, granjan234@gmail.com
52. उर्वशी, डा राजेश श्रीवास्तव (संपादक), urvashipatrika@gmail.com
53. साखी (त्रैमासिक), सदानंद शाही (संपादक), Shakhee@gmail.com
54. गतिमान, डॉ. मनोहर अभय (संपादक), manohar.abhay03@gmail.com
55. साहित्य यात्रा, डॉ कलानाथ मिश्र (संपादक), sahityayatra@gmail.com
56. भिंसर, विजय यादव (संपादक), vijayyadav81287@gmail.com
57. सद्भावना दर्पण, गिरीश पंकज (संपादक), girishpankaj1@gmail.com
58. सृजनलोक, संतोष श्रेयांस (संपादक), srijanlok@gmail.com
59. समय मीमांसा, अभिनव प्रकाश (संपादक), editor.samaymimansa@gmail.com
60. प्रवासी जगत, डॉ. गंगाधर वानोडे (संपादक), gwanode@gmail.com pravasijagat.khsagra17@gmail.com
61. शैक्षिक उन्मेष, प्रो. बीना शर्मा (संपादक), dr.beenasharma@gmail.com
62. पल प्रतिपल, देश निर्मोही (संपादक), editorpalpratipal@gmail.com
63. समय के साखी, आरती (संपादक), samaysakhi@hmail.in
64. समकालीन भारतीय साहित्य, ब्रजेन्द्र कुमार त्रिपाठी (संपादक), secretary@sahitya-akademi.gov.in
65. शोध दिशा, डॉ गिरिराजशरण अग्रवाल (संपादक), shodhdisha@gmail.com
66. अनभै सांचा, द्वारिका प्रसाद चारुमित्र (संपादक), anbhaya.sancha@yahoo.co.in
67. आह्वान, ahwan@ahwanmag.com, ahwan.editor@gmail.com
68. राष्ट्रकिंकर, विनोद बब्बर (संपादक), rashtrakinkar@gmail.com
69. साहित्य त्रिवेणी, कुँवर वीरसिंह मार्तण्ड (संपादक), sahityatriveni@gmail.com
70. व्यंजना, डॉ रामकृष्ण शर्मा (संपादक), shivkushwaha16@gmail.com
71. एक नयी सुबह (हिंदी त्रैमासिक), डॉ. दशरथ प्रजापति (संपादक), dasharathprajapati4@gmail.com
72. समकालीन स्पंदन, धर्मेन्द्र गुप्त 'साहिल' (संपादक), samkaleen.spandan@gmail.com
73. साहित्य संवाद , संपादक - डॉ. वेदप्रकाश, sahityasamvad1@gmail.com
74. भाषा विमर्श ( अपनी भाषा की पत्रिका), अमरनाथ (प्रधान संपादक), अरुण होता (संपादक), amarnath.cu@gmail.com
75. विश्व गाथा, पंकज त्रिवेदी (संपादक), vishwagatha@gmail.com
76. भाषिकी अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल, प्रो. रामलखन मीना (संपादक), prof.ramlakhan@gmail.com
77. समवेत, संपादक-डॉ.नवीन नंदवाना,
78-editordeskudr@gmail.com
79-hindipatahar@gmail.com

80-bajpaikailash51@gmail.com

81 बोहल शोध मंजूषा
सम्पादक डॉ नरेश सिहाग एडवोकेट
grsbohal@gmail.com






शनिवार, 4 जनवरी 2020

8:10 pm

राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मान 2019 हेतु बालकहानियां आमंत्रित

राष्ट्रीय बालसाहित्य सम्मान 2019 हेतु बालकहानियां आमंत्रित 
 सभी बाल साहित्यकारों से बालकहानी आमंत्रित है. बाल कहानी संदेशप्रद होनी चाहिए. मगर, संदेश या उपदेश सीधा व्यक्त न हो, इस बात का ध्यान रखते हुए दिनांक 25 फरवरी 2020 तक बाल कहानियाँ सादर आमंत्रित है.
1— बालकहानियां पशुपक्षी, जीवजंतु, मूर्तअमूर्त वस्तु के पात्र ले कर रची गई हो.
2— कहानी में सरस, सरल और सहज वाक्यों को समावेश हो, इस बात का ध्यान रखिएगा. वाक्य छोटेछोटे हो.
3— मंनोरंजक और उद्देश्यपरक कहानियों को प्राथमिकता दी जाएगी.
3— बालकहानी में कथातत्व का समावेश हो.
4— आप की सर्वश्रेष्ठ एक बालकहानी की तीन प्रतियां ए—4 आकार के कागज पर एक ओर लिख कर या टाईप करवा कर भेजे. उस में कहीं नाम,पता या कोई पहचान चिह्न अंकित न हो इस बात का ध्यान रखे. अपना संक्षिप्त परिचय व एड्रेस अलग से A-4 साइज कागज पर लिख भेजे जिसमे कहानी का शीर्षक लिखते हुए मौलिकता की घोषणा भी अंकित करें
5— इसे पंजीकृत डाक या कूरियर से — राजकुमार जैन राजन,
चित्रा प्रकाशन,
आकोला -312205 (चित्तौड़गढ़) राजस्थान
के पते पर अंतिमतिथि के पूर्व प्रेषित कर दें. ताकि समय सीमा में यह प्राप्तकर्ता को मिल सकें.
6— एक प्रति जिस में पूरा नाम, पता, मोबाइल नंबर और मेल आईडी लिखा हो. उसे
Rajkumarjainrajan@gmail.com  मेल  पर भेजे
के विषय में — राष्ट्रीय बालसाहित्य सम्मान 2019 हेतु बालकहानियां , लिख कर संलग्नक के साथ पहुंचा दे.
7- कहानी यूनीफॉण्ट या मंगलफोंट में  टाइप कर के वर्ड फ़ाईल में भेजे।
8- प्रतियोगिता में स्वीकृत और मापदंड पर खरी उतरी  बालकहानियों का एक संकलन प्रकाशित कर, उनके रचनाकारों को समारोह में स्मृति चिह्न, नगद राशि के साथ ससम्मान पुरस्कार के साथ प्रदान किया जाएगा। पुरस्कार प्रथम ₹. 3100/-, द्वितीय ₹.2100/-, तृतीय ₹.1100 एवम 5 प्रोत्साहन पुरस्कार देय होंगे।

संपादक/ संयोजक
-ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश
-राजकुमार जैन राजन


सूचना साभार :- स्वैच्छिक दुनिया समाचार पत्र
8:07 pm

ग़ज़ल - वीगा जमीन यूँ मकानों में बंट गया।


वीगा जमीन यूँ मकानों में बंट गया।
फिर यूँ हुआ चंद ठिकानों में बंट गया।

बेसबब मुझसे कोई आकर कह गया,
जमीन के टुकड़े विवादों में बंट गया।

भाई ही भाई का दुश्मन बन बैठा,
कोर्ट में पेश संवादों में बंट गया।

आपस में झगड़ते रहते थे नित रोज,
भाई का प्यार दीवारों में बंट गया।

आपसी मनमुटाव बढ़ गया इसकदर,
बड़ा सा गोदाम दुकानों में बंट गया।

सुमन अग्रवाल 'सागरिका'
         आगरा
5:39 am

दुख की बदली

छंद मुक्त कविता

मैं अक्सर भीग जाता हूँ ,
दुखों की बदली में,
उसके प्रवाह का आतप,
जब आफ़त बन जाता ,
मुश्किल हालात भी,
जब मुश्किल हो जाते ,
सिहर जाता तन-मन,
समस्या से भय खाता हूँ,
भूल जाता सुकूँ के पल,
बस सोचता ये ही,
हाय!जीवन, कैसा जीवन? 
मैं तुझसे हार गया ,
ये कहकर जीवन,
धिक्कार दिया, 
क्षुब्ध,लुब्ध, कुंठित हो,
स्वयं को कोसता हूँ ,
भूल जाता पतझड़ के बाद,
सावन तो आएगा,
बाद कोहरे के फिर ,
लालिमा भी आएगी,
अमावस-अंधेरे जीवन में,
पूर्णिमा का चंद्र भी होगा,
ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है,
दुख में धैर्य की परीक्षा होती,
सुख-दुख आना-जाना है,
ये बातें जब-जब सुनता हूँ,
पढ़ता हूँ, लिखता हूँ ।
तब सुख झरोखे से झाँकता,
कुछ इशारा करता हुआ,
मंद- मंद हँसी से खिलखिलाता,
और फिर कहता भी है,
तेरे संग रहकर दुख को,
कितना सुख मिला रे ।
धैर्य तेरा देखकर,
धैर्य और धीर बना,
ये देखकर मुग्ध हूँ मैं,
अब मैं भी आना चाहता,
दुख जैसा गले मिलकर तुझसे,
मैं भी मुस्काना चाहता,
पावन होना चाहता हूँ ,
आह! मुझे भी तो,
कितना प्यार मिलेगा? 
कितना सुख मिलेगा? 
कितना सम्मान मिलेगा? 

कवि - सुनील नागर " सरगम "

3:12 am

Re: chhod de nasha.....poem


मान्यवर  मित्रों ,
लो क्ल लो बात ...

मेरे  दिल से  निकले  नए  भाव ... आपके  साथ  साँझा कर रहा हूँ ...

छोड़  दे  नशा ...नई  इबादत लिख दे ....

नशे की  आड़ में  गुनाह  होते  देखें हैं 
फिर  जीवन भर अपने  आह  ढ़ोते  देखें हैं 
नशे की  गिर्रफत  में  होने का  कारण  तो  बता 
छोड़  दे  नशा एक  नया  वातावारण  बना 
कर  नशा  गर  करना  तो   किसी अच्छी  चीज़  का 
तरेगा  जीवन  गर  पीया  अमृत  सहित्य  बीज  का 
लिखना  हैं तो  लिख  दर्द  जवानी  का 
दूसरों के  ज़ुल्मों  की  मनमानी  का 
नशा  तो  नाश  और रास्ता  उदास  है 
लेकिन  जीवन में  फिर भी  आस  हैं 
छोड़ नशा  खेल  अपनी  तकदीर  से 
लिख अपनी  नई  कहानी अपनी  तदबीर से 
नशा  कर  खुलकर  तू  देश  भक्ति  रानी का 
गर्व  कर  पूरा  अपना होने  हिन्दुस्तानी  का 
बदल  देश की  तस्वीर  अपने  नेक इरादों  से 
छीन  दुख  दर्द  दुनियां  के सच्चे  वादों  से 
भर  दे  रंग नए  नई   तिज़ारत  लिख दे 
छोड़  दे  नशा  नई  इबादत  लिख दे 
छोड़  दे  नशा .......

आपका अपना ,
वीरेन्द्र  कौशल
3:11 am

Re: betian voh prindey......


मान्यवर  मित्रों ,

लो क्ल लो बात ......

बेटियां  वो  परिन्दे  हैं  ज़िनके  पर  नहीं  होते 
कहने  को  ठिकाने  दो  मगर  घर  नहीं  होते 

बेटे  माने नीव सदा और बेटियां  कमजोर  कड़ी 
बेटे  बांटे  जमीन  बेटियां  दर्द  में  पास  खड़ी 
सिक्का  एक  पेहलू  दो  कभी  जाना  मेरे दोस्त 
दिवारें  चाहे  कितनी  बिन  इनके  पूरे  घर  नहीं  होते 
बेटियां  वो  परिन्दें .......

कलाई  का बंधन ये  अटूट  हैं  ज़िनका  विश्वास 
रहती  सदा  अंगसंग  खुशियां  लिए  अपनें  साथ 
चाहे  कितनी  रहे  दूर  कभी  समझा  इन्हें  प्यारे 
यह  ऐसे  रिश्ते  हैं  जिन  में  ड़र  नहीं  होते 
बेटियां  वो  परिन्दे .......

प्यार से  जीते  जग सारा  ये  लक्ष्मी  रूप 
ममतामयी  मुरत  हमें  लगने  न  दे कभी   धूप 
स्वारें  जीवन  को  सदा  सोचा  कभी  क्या  तुमने 
कितनी कठिन  रहे परिस्तिथियां  हौंसले  कम नहीं  होते 
बेटियां  वो  परिन्दें ....

आपका अपना ,
वीरेंद्र  कौशल
3:09 am

Jaagte rahiye


मान्यवर  मित्रों ,

लो क्ल लो बात ....

चैंन  की नींद  सोना है तो  जागते  रहिये .....

कौन  कहता है कि  मौत  नहीं  बिकती ......

मौत के  तो  बड़े  बड़े  सौदे  होते हैं  और  वो भी  स्टेंप  पेपर  पर ...
ज़िन्दगी का  ड़र  दिखा कर  बीमें  वाले  बेहिसाब  कमा  रहें हैं ...
क्योंकि  आजकल ज़िन्दगी  ही  हारती  हैं  इसी लिए  मौत  बिकती  हैं  ......
यह  बता  कर  कि  ज़िन्दगी  रहते  किशत  भरो ...कुछ  अनहोनी  होने पर  भरी  हुई  किशत  नहीं  आपितु   पूर्ण बीमा  राशि  का  भुगतान  होगा ....

क्योंकि  चैन  की  नींद  सोना है तो  जागते  रहिये ....

आपका अपना ,
वीरेन्द्र  कौशल
3:09 am

Aapke aagan mein...



मान्यवर  मित्रों ,

लो क्ल लो बात ....

मेरे  नए  विचार  शब्दों  के  सहारे ...आपके  द्वारे ..

आपके  आंगन  में ...हमारे  आंगन  से ....

ख़ुशियां आपके  आंगन  में ..शुभकामनाएं हमारे  आंगन  से ....
ऊँचाईयां आपके  आंगन  में ...हौंसलें हमारे  आंगन  से ....
विचार आपके  आंगन  में ...प्रयास हमारे  आंगन  से ....
उड़ान आपके  आंगन  में ...ज़ज्बा हमारे  आंगन  से ....
पुष्प आपके  आंगन  में ...ख़ुशबू हमारे  आंगन  से ....
आपके  आंगन  में ...हमारे  आंगन  से ....

आपका अपना ,
वीरेन्द्र  कौशल
3:08 am

mubaarak nya saal. ...poem


मान्यवर  मित्रों ,


लो क्ल लो बात ......


मुबारक  हो  नया  साल ...


नया  साल 

रहे  सब  खुशहाल 

आने  वाला  हर  पल  हो लक्की 

करें  जीवन  में  खूब   तरक्की  

बच्चे  करे मौज़ 

वो  भी  हर  रोज़ 

युवा की  भी  हर  उम्मीद  हो  पूरी 

कोई   भी  इच्छा  न  रहे अधूरी 

बड़े  भी  खूब   करे  मस्ती 

हालात  महंगी  चीजें  करें  सस्ती 

बुजुर्गों  का  सिर  पर रहे आशिर्वाद  का  हाथ  

कोई  न  समझे  अपने  को  अनाथ 

सभी  मिलकर  रहे 

कोई  बुराई  न  पनपे 

न  निर्भया   या  फिर  कोई  हैदराबाद  

न  धर्म की चिंगारी या   दंगे    फसाद 

न कोई  दारिन्दगी  न  उन्नाव 

पुरंतया  सफल  हो  ध्येय    बेटी  बचाओ 

हर  तरफ  अमन  चैन  और  भाईचारा 

खूब    तरक्की करें  हिन्दुस्तान    हमारा 

हर  व्यक्ति   साधन  सम्पन  और  खुशहाल 

सभी  को  दिल  की  गहराईयों से सभी को 

मुबारक  हो  नया  साल .......

मुबारक  हो  नया  साल .......


आपका अपना ,

वीरेन्द्र  कौशल
3:07 am

New poem MEHNAT KAR...ROZI KMA. ...

लो  क्ल लो बात ...

एक बार फिर  ताज़ा अल्फाज़ सहारे .... आप के  द्वारे 

मेहनत  कर और   रोजी  कमा 
खुश  रह हर  त्योहार  मना 

हर  त्योहार  अपार खुशीयाँ  देता
गरीब का  पेटा भर  देता 
यही है  सब की  पुंजी 
हर  सफलता  की  खालिस कुंजी 
कर  भला  और फिर भूलजा 
चाहे  कोई  ख़ुशी  फिर  गुनगुना 
मेहनत  कर .......
खुश रह हर ......

आचरण  खातिर  बनवास  भी  प्यारा 
सीताहरण कारण  विद्वान  भी  मारा 
सदा  भाईयों  संग  बांटा प्यार 
त्याग  खातिर  सदा  रहे  तैयार 
संस्कारों  को  सदा  सार्वोपरि  माना 
फिर  चाहे होली -दीपवली  साथ  मना 
मेहनत  कर .......
खुश रह हर .......

सदा  अपनो  ही सहारे जीत 
न  कोई  दुशमन  सारे  मीत 
झूठ  फरेब  अपवाद  से  बच 
ईमानदारी  विश्वास ही  केवल  सच 
सभी  संग  अपना  व्यवहार  जता 
फिर  चाहे  मोहर्ररम   ईद  मना 
मेहनत  कर .....
खुश रह हर .....

सवा लाख से  एक  लड़ाया 
अपने  शेहजादों  को  भी  चिनवाया 
सदा खुशहाली खातिर  विनती कीती 
नहीं  बखारी  अपनी  आप  बीती 
गैरों खातिर  दिया  लंगर  लगा 
फिर  चाहे  शहीदीदिवस  गुरूपर्व  मना 
मेहनत  कर .....
खुश रह हर .....

सच्चाई  खातिर  सूली  पर  चढ़ 
नहीं  कबूला कभी  दूसरा  गढ़ 
प्रेम  संदेशा  ही  दिया  हर  लम्हां 
कभी  संता  बन  दिये  उपहार 
मन में  धारा  सदा  उपकार 
फिर  चाहे  गुड-फराईड़े  क्रिसमस  मना 
मेहनत  कर .....
खुश रह हर .....

कभी  न  कर  नीयत  खोटी 
हर  मेहनत  पर  मिले  रोटी 
नीयत  साफ  तो  डर  नहीं 
कोई भी  एक  आडम्बर नहीं 
सदा  सभी का  चाह  भला 
फिर  चाहे  कोई  उत्सव  मना 
मेहनत  कर .....
खुश रह हर .....

आपका अपना ,
वीरेन्द्र  कौशल
12:49 am

इक अजब सा है सिलसिला अपना

रचना प्रकाशन हेतु प्रमाण पत्र
सेवा में,
     सम्पादक महोदय
     हिंदी साहित्य वैभव पत्रिका
श्रीमान जी,
      सविनय निवेदन यह है कि मेरी यह रचना(ग़ज़ल) नितांत मौलिक,अप्रकाशित और अप्रसारित है और मैं इसके प्रकाशन का अधिकार हिंदी साहित्य वैभव पत्रिका को देता हूँ!आशा है मेरी इस रचना का यथासम्भव उपयोग आपकी पत्रिका में हो सकेगा!
           धन्यवाद
          भवदीय
         बलजीत सिंह बेनाम
        103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी
        हाँसी(हिसार)
        मोबाईल:9996266210
ग़ज़ल
इक अजब सा है सिलसिला अपना
मंज़िलें उसकी रास्ता अपना

रोकते भी किसी को क्या आख़िर
हर किसी का था देवता अपना

ज़िक्र जितना बयां किया हमने
दर्द उतना ही है बढ़ा अपना

ज़िंदगी पर बहुत भरोसा था
इसने भी ख़ूँ फ़क़त पिया अपना

हाँ ख़ुदा ने बहुत दिया लेकिन
फिर भी क्यों जी नहीं भरा अपना
12:21 am

ऊना (हिमाचल प्रदेश) में षटवदन शंखधार की कविता ने जगाई राष्ट्र भक्ति की अलख

राष्ट्रीय एकता शिविर में बदायूं से प्रतिभाग करने पहुंचे कवि षटवदन शंखधार ने *एक शाम विभिन्न प्रदेशों के नाम*
कार्यक्रम में काव्य पाठ किया तो उत्तर प्रदेश बदायूं की ओर से उनको बहुत सराहा गया |
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि आईएस संदीप कुमार (जिला उपायुक्त ऊना), आईपीएस अधिकारी शालिनी अग्निहोत्री , जिला समन्वयक डॉ लाल सिंह ने बदायूं की धरती को खड़े होकर अभिवादन किया |
और कहा आज समाज में तुम जैसे लाखों युवाओं की आवश्यकता है जो समाज में अपनी संस्कृति को बढ़ावा देने का काम कर सकते हैं बदलते हुए परिवेश में जहां युवा आज नशा खोरी,चोरी , डकैती में लगा है वहीं आप जैसे लोग समाज को जागरूक करने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर रहे हैं हमें इस बात की खुशी है कि आप समाज का आदर्श बने हुए हैं 
कार्यक्रम में 15 प्रदेशो ने प्रतिभागाता की जिसमें उत्तर प्रदेश की ओर से षटवदन शंखधार ने प्रतिनिधित्व किया और उनका सम्मान भी किया गया |

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

6:33 pm

धारावाहिक रामायण रामानन्द सागर ने उस समय इतिहास रचा जब उन्होंने टेलीविज़न धारावाहिक "रामायण" बनाया


रामानन्द सागर
रामानन्द सागर Ramanand Sagar, जन्म: 29 दिसम्बर, 1917; मृत्यु: 12 दिसम्बर, 2005) एक भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे। रामानन्द सागर सबसे लोकप्रिय धारावाहिक 'रामायण' बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। इनके कैरियर की शुरुआत "राइडर्स ऑफ़ द रैलरोड" (1936) नामक फ़िल्म के साथ हुई थी।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी रामानन्द सागर का जन्म अविभाजित भारत के लाहौर ज़िले के "असलगुरु" ग्राम नामक स्थान पर 29 दिसम्बर 1927 में एक धनी परिवार में हुआ था। उन्हें अपने माता-पिता का प्यार नहीं मिला, क्योंकी उन्हें उनकी नानी ने गोद ले लिया था। पहले उनका नाम चंद्रमौली चोपड़ा था लेकिन नानी ने उनका नाम बदलकर रामानंद रख दिया।
स्रोत- गूगल 

1947 में देश विभाजन के बाद रामानन्द सागर सबकुछ छोड़कर सपरिवार भारत आ गए। उन्होंने विभाजन की जिस क्रूरतम, भयावह घटनाओं का दिग्दर्शन किया, उसे कालांतर में "और इंसान मर गया" नामक संस्मरणों के रूप में लिपिबद्ध किया। यह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वे जब अपनी मातृभूमि से बिछुड़कर युवावस्था में शरणार्थी बन भारत आए, उनकी जेब में मात्र 5 आने थे, किन्तु साथ में था अपने धर्म और संस्कृति के प्रति असीम अनुराग-भक्तिभाव। शायद इसी का परिणाम था कि आगे चलकर उन्होंने रामायण, श्रीकृष्ण, जय गंगा मैया और जय महालक्ष्मी जैसे धार्मिक धारावाहिकों का निर्माण किया। दूरदर्शन के द्वारा प्रसारित इन धारावाहिकों ने देश के कोने-कोने में भक्ति भाव का अद्भुत वातावरण निर्मित किया।
स्रोत- गूगल 

मेधावी छात्र
16 साल की अवस्था में उनकी गद्य कविता श्रीनगर स्थित प्रताप कालेज की मैगजीन में प्रकाशित होने के लिए चुनी गई। युवा रामानंद ने दहेज लेने का विरोध किया जिसके कारण उन्हें घर से बाहर कर दिया गया। इसके साथ ही उनका जीवन संघर्ष आरंभ हो गया। उन्होंने पढ़ाई जारी रखने के लिए ट्रक क्लीनर और चपरासी की नौकरी की। वे दिन में काम करते और रात को पढ़ाई। मेधावी छात्र होने के कारण उन्हें पंजाब विश्वविद्यालय पाकिस्तान से स्वर्ण पदक मिला और फ़ारसी भाषा में निपुणता के लिए उन्हें मुंशी फ़ज़ल के ख़िताब से नवाज़ा गया। इसके बाद सागर एक पत्रकार बन गए और जल्द ही वह एक अखबार में समाचार संपादक के पद तक पहुंच गए। इसके साथ ही उनका लेखन कर्म भी चलता रहा।
स्रोत- गूगल 

सागर आर्ट कॉरपोरेशन
रामानंद सागर का झुकाव फ़िल्मों की ओर 1940 के दशक से ही था। लेकिन उन्होंने बाक़ायदा फ़िल्म जगत में उस समय एंट्री ली, जब उन्होंने राज कपूर की सुपरहिट फ़िल्म 'बरसात' के लिए स्क्रीनप्ले और कहानी लिखी। भारत के अंग्रेज़ों से स्वतंत्रता पाने के बाद वर्ष 1950 में रामानन्द सागर ने एक प्रोडक्शन कंपनी "सागर आर्ट कॉरपोरेशन" शुरू की थी और 'मेहमान' नामक फ़िल्म के द्वारा इस कंपनी की शुरुआत की। बाद में उन्होंने इंसानियत, कोहिनूर, पैगाम, आँखें, ललकार, चरस, आरज़ू, गीत और बग़ावत जैसी हिट फ़िल्में बनाईं। वर्ष 1985 में वह छोटे परदे की दुनिया में उतर गए। फिर 80 के दशक में रामायण टीवी सीरियल के साथ रामानंद सागर का नाम घर-घर में पहुँच गया।
स्रोत- गूगल 

धारावाहिक रामायण
रामानन्द सागर ने उस समय इतिहास रचा जब उन्होंने टेलीविज़न धारावाहिक "रामायण" बनाया और जो भारत में सबसे लंबे समय तक चला और बेहद प्रसिद्ध हुआ। जो भगवान राम के जीवन पर आधारित और रावण और उसकी लंका पर विजय प्राप्ति पर बना था।
स्रोत- गूगल 

निर्देशन और निर्माण
रामानन्द सागर ने कुछ फ़िल्मों तथा कई टेलीविज़न कार्यक्रमों व धारावाहिकों का निर्देशन और निर्माण किया। इनके द्वारा बनाए गए प्रसिद्ध टीवी धारावाहिकों में रामायण, कृष्णा, विक्रम बेताल, दादा-दादी की कहानियाँ, अलिफ़ लैला और जय गंगा मैया आदि बेहद प्रसिद्ध हैं। धारावाहिकों के अलावा उन्होंने आंखें, ललकार, गीत आरजू आदि अनेक सफल फ़िल्मों का निर्माण भी किया। 50 से अधिक फ़िल्मों के संवाद भी उन्होंने लिखे। कैरियर के शुरुआती दिनों में उन्होंने पत्रकारिता भी की। पत्रकार, साहित्यकार, फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, संवाद लेखक आदि सभी का उनके व्यक्तित्व में अनूठा संगम था। और तो और, रामायण धारावाहिक की प्रत्येक कड़ी में उनके द्वारा रामचरित मानस की घटनाओं, पात्रों की भक्तिपूर्ण, सहज-सरस और मधुर व्याख्या ने उन्हें एक लोकप्रिय प्रवचनकर्ता के रूप में भी स्थापित किया।
स्रोत- गूगल 

लेखन
उन्होंने 22 छोटी कहानियां, तीन वृहत लघु कहानी, दो क्रमिक कहानियां और दो नाटक लिखे। उन्होंने इन्हें अपने तखल्लुस चोपड़ा, बेदी और कश्मीरी के नाम से लिखा लेकिन बाद में वह सागर तखल्लुस के साथ हमेशा के लिए रामानंद सागर बन गए। बाद में उन्होंने अनेक फ़िल्मों और टेलीविज़न धारावाहिकों के लिए भी पटकथाएँ लिखी
सम्मान और पुरस्कार
सन् 2001 में रामानन्द सागर को उनकी इन्हीं सेवाओं के कारण पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें फ़िल्म 'आँखें' के निर्देशन के लिए फ़िल्मफेयर पुरस्कार और 'पैग़ाम' के लिए लेखक का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला।

निधन[सम्पादन
देश में शायद ही कोई ऐसा फ़िल्म निर्माता-निर्देशक हो जिसे न केवल अपने फ़िल्मी कैरियर में भारी सफलता मिली वरन् जिसे करोड़ों दर्शकों, समाज को दिशा देने वाले संतों-महात्माओं का भी अत्यंत स्नेह और आशीर्वाद मिला। डा. रामानन्द सागर ऐसे ही महनीय व्यक्तित्व के धनी थे। सारा जीवन भारतीय सिने जगत की सेवा करने वाले रामानन्द सागर शायद भारतीय फ़िल्मोद्योग के ऐसे पहले टी.वी. धारावाहिक निर्माता व निर्देशक थे, जिनके निधन की खबर सुनते ही देश के कला प्रेमियों, करोड़ों दर्शकों सहित हजारों सन्त-महात्माओं में शोक की लहर दौड़ गई। गत 12 दिसम्बर 2005 की देर रात मुंबई, महाराष्ट्र के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। 87 वर्षीय रामानंद सागर ने तीन महीने बीमार रहने के बाद अंतिम साँस ली। जूहु के विले पार्ले स्थित शवदाह गृह में उनके बड़े पुत्र सुभाष सागर ने उनके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी। इस अवसर पर उनके चाहने वाले सैकड़ों लोग, कलाकार, निर्माता- निर्देशक उपस्थित थे।

उनकी जनप्रियता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हरिद्वार में आयोजित धर्मसंसद में शोकाकुल संतों, देश के चोटी के धर्माचार्यों ने उनकी स्मृति में मौन रखा। उनके द्वारा निर्मित और निर्देशित धारावाहिक "रामायण" ने देश में अद्भुत सांस्कृतिक जागरण पैदा किया।
++++++
रामानंद की रामायण सीरियल से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
दुनिया के लाखों टेलीविजन पर छा जाने वाले रामानन्द सागर  के धारावाहिक "रामायण" को करीब 28 साल हो चुके हैं। मशहूर निर्माता निर्देशक रामानंद सागर 1987 में दूरदर्शन पर धाराविक 'रामायण' लेकर आए। रामानंद सागर ने जब रामायण का निर्माण किया था तो वह भी नहीं जानते थे कि रामायण लोगों के जीवन का अहम हिस्सा बन जाएगा। जानिए रामानंद सागर के जन्मदिन के मौके पर रामायण से जुड़ी दिलचस्प बातें।

सात्विक रहने का एग्रीमेंट
रामानंद सागर ने सीरियल शुरू करने से पहले ही सभी कलाकारों से सात्विक खान-पान, रहन-सहन का एग्रीमेंट किया था। सीरियल पूरे चार सालों में बना और कलाकारों को इस बीच नॉनवेज, स्मोकिंग, ड्रिंकिंग या अन्य दुव्र्यसनों से दूर रहना पड़ा। जो एक्टर इनके आदी थे, उन्हें रामानंद सागर के इस नियम से खीज होती थी। चार साल बाद वही एक्टर पूरी तरह सात्विक बनकर निकले और आज भी उन्हीं नियमों पर चल रहे हैं।

जाति के आधार पर किरदार
रामानंद सागर ने सीरियल को जीवंत बनाने के लिए मुख्य पात्रों के लिए जाति के अनुरूप किरदार तय किए थे। अरुण गोविल क्षत्रिय थे तो उन्हें राम बनाया गया। रावण ब्राह्मण कुल से थे, इसलिए इसके लिए अरविंद त्रिवेदी को चुना।
रोज़मरा के काम पर लग जाता था ब्रेक
रामायण देखने के लिए आलम यह होता था कि लोग रविवार की सुबह का बडी बेसब्री से इंतजार करते थे। एक टेलीविजन सेट पर गांव और मुहल्ले के लोगों का हुजूम उमड पडता था। बस और ट्रकों के ड्राइवर अपने वाहनों को ब्रेक लगाकर रामायण देखने के लिए किसी ढाबे में लगे टेलीविजन से चिपक जाते थे।

पवित्र बन गया सीरियल
निर्माता रामानंद सागर को एक महिला ने चिट्ठी लिखी कि जब भी 'रामायण' टी.वी. पर आता है, तो वह अपने अंधे बेटे को टी.वी. छूने को कहती है, इस विश्वास से कि उसकी आँखों की रोशनी लौट आएगी। यह सीरियल 'रामायण ग्रंथ' जैसा पवित्र माना जाने लगा।

विक्रम बना राम
टीवी पर इससे पहले रामानंद सागर 'विक्रम और बेताल' नाम का एक धाराविहक बना चुके थे। इसमें विक्रमादित्य की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल को उन्होंने 'रामायण' में राम के केंद्रीय पात्र के रूप में चुना।

सड़के और बस सुनसान
रामायण जब अपने लोकप्रियता के चरम पर था तो कहा जाता है कि प्रसारण के समय पूरा देश मानो रूक कर केवल रामायण देखता था। सड़कों पर बस नहीं चला करती थी क्योंकि उसके यात्री टीवी के सामने बैठकर रामायण देख रहे होते थे।

9:30 बन गया सबसे हिट
'रामायण' टीवी पर आने वाला ऐसा इकलौता धारावाहिक बना जिसे 45 मिनट का टीवी स्लॉट मिला। जबकि उन दिनों दूरदर्शन पर सिर्फ आधे घंटे और एक घंटे के स्लॉट ही कार्यक्रमों को मिला करते थे। दूरदर्शन ने रामानंद सागर को जब रविवार सुबह 9:30 बजे का टाइम दिया तो यह स्लॉट टीवी उद्योग में कम लोकप्रिय समय में गिना जाता था लेकिन रामायण के हिट होने के बाद इस स्लॉट को सबसे हिट स्लॉट के रूप में देखा जाता है।
निर्माताओं ने कहा था फ्लॉप
निर्देशक रामानंद सागर, रामायण बनाने का प्रस्ताव लेकर जिस भी निर्माता के पास गए उसने उन्हें वापसी का रास्ता दिखा दिया। टीवी के लिए 'रामायण' बनाने का सौदा किसी को फ़ायदा का नहीं लगा। इसपर पैसा लगाने से पैसा डूब जाएगा। हालांकि हुआ ठीक इसका उल्टा रामानंद सागर ने अपने ही प्रोडक्‍शन हाउस सागर आर्ट्स के बैनर तले इसका निर्माण किया ।

कमाई में अव्वल
एक अनुमान के मुताबिक रामायण के एक एपिसोड को बनाने का खर्च लगभग 1 लाख रुपये के आसपास था जो उस समय बहुत ज्यादा था। यह भारतीय टीवी इतिहास की सबसे कमाई करने वाली सीरियल में से एक है।

स्रोत- गूगल 

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

5:40 am

सभी गीतकार बन्धुओं को सूचित करते हुए अपार हर्ष

सभी गीतकार बन्धुओं को सूचित करते हुए अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है कि आदर्श सेवा संस्थानम् के तत्त्वावधान में 'राष्ट्रिय युवा गीत लेखन प्रतियोगिता' का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें प्रथम पुरस्कार विजेता को ₹ ५१००/-, द्वितीय पुरस्कार विजेता को ₹ २१००/-, तृतीय पुरस्कार विजेता को ₹ ११००/- की राशि प्रदान की जायेगी। ₹ ५०१/- के दो सान्त्वना पुरस्कार भी प्रदान किये जायेंगे। पुरस्कृत गीतकारों का सम्मान समारोह एवं काव्यपाठ लखनऊ में आयोजित कवि सम्मेलन में सम्पन्न होगा।

नियम एवं शर्तें

१. गीत २५ दिसम्बर २०१९ से १५ जनवरी २०२० के मध्य ही लिखा एवं फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट किया जाना आवश्यक है।
२. केवल एक प्रविष्टि ही स्वीकार्य है। गीत व्याकरण के मानक शिल्प के अनुरूप होना आवश्यक है।
३. निर्णायक मण्डल का निर्णय अन्तिम एवं मान्य होगा।
४. प्रतिभागी द्वारा किसी भी प्रकार की सिफ़ारिश या दबाव की स्थिति में प्रविष्टि तत्काल निरस्त कर दी जायेगी।
५. रचना यूनिकोड फ़ॉन्ट में dheerajkmish@gmail.com पर १५ जनवरी २०२० की मध्यरात्रि तक भेजना अनिवार्य है। विलम्ब से भेजी गयी प्रविष्टि को निरस्त कर दिया जायेगा।
६. प्रतिभागी की अधिकतम आयु ३० वर्ष होनी आवश्यक है।
७. किसी भी न्यायिक विवाद का क्षेत्र लखनऊ रहेगा।

निर्णायक मण्डल
श्री ज्ञान प्रकाश अवस्थी 'आकुल'
श्री राघव शुक्ल
श्री चन्द्रेश शेखर शुक्ल
श्री आदर्श सिंह 'निखिल'
श्री अमर नाथ 'ललित'
____________________________
हो सके तो पोस्ट साझा करते चलें।

सोमवार, 23 दिसंबर 2019

8:43 am

दिल जले मेरा धुआँ हो ये जरूरी तो नहीं

ग़ज़ल 1

दिल जले मेरा धुआँ हो ये जरूरी तो नहीं
दर्द भी सबको अयाँ हो ये जरूरी तो नहीं

हर सितम सह के भी चुपचाप रहें  हम यारा
जुल्म  का किस्सा बयाँ हो ये जरूरी तो नहीं

हर शजर को बचा लो आज तो कटने से तुम
बेजुबानों को जुवाँ हो ये जरूरी तो नह़ीं

मौसमे इश्क बदलता तो  है हर पल देखो
मेरे हिस्से में खिज़ाँ हो ये जरूरी तो नह़ीं

रात  रंगीन है अरमान भी तो हैं लाखों
दिल तो उनका भी जवाँ हो ये जरूरी तो नह़ीं

जिंदगी मत बिता देना तू खुराफातों में
मिलती खैरात वहाँ हो ये जरूरी तो नह़ीं

रब के हर फैसले पर सर को झुकाया मीना
सुनता मेरी वो यहाँ हो ये जरूरी तो नह़ीं

                    मीना भट्ट

मीना भट्ट

ग़ज़ल 2

प्यार के फेल सारे   गुमाँ  हो गये
और भी फासले दरमियाँ हो गये

कुछ  दिनों की है ये ज़िंदगानी सनम
जब सिकंदर के जैसे धुआँ हो गये

बोलने पर लगी इस क़दर बंदिशें
अब ज़ुबाँ वाले भी बेजुबाँ हो गये

आरजू इस फ़लक की हमें हैं कहाँ
इस ज़मीं पर तो हम कहकशाँ हो गये

आ गयी ज़िदगी की लगे शाम अब
हम जुदा होके भी कामराँ हो गये

हौसला चाहतों से हमें है मिला
फ़िक्रो ग़म अपने सारे धुआँ हो गये

ख़्वाब बेसुध पडे थे हमारे मगर
साथ मिलते ही सारे जवाँ हो गये

     मीना भट्ट

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

7:34 am

ग़ज़ल -मुहब्बत की पहचान है आज जनचेतना से -विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"


मुहब्बत  की  पहचान  है  आज  जनचेतना से  ।
ये  साहित्य  की  जान  है  आज  जनचेतना से ।।

नई आशा की इक किरण को जगाना है हमको,
हमारी तुम्हारी  बनी शान है आज जनचेतना से ।।

यूँ  नित रोज लेखन को हमने बढाया तभी तो ।
ये  अनमोल  वरदान  है  आज  जनचेतना से ।।

यूँ तो लफ्जों में दिल के एहसास हमने लिखे हैं,
मिला  हमको  सम्मान  है  आज  जनचेतना से ।।

नवाँकुर कलमकारों अब तुम जरा आगे आओ ।
मंजिल पाना  आसान  है  आज  जनचेतना से ।।

©विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"
    29  नवम्बर  2019



मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

8:18 am

बदायूं :पिछले कुछ समय पहले शहर मे एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन आयोजित किया गया -- षटवदन शंखधार

कुछ इधर कई पढी ---------------------------------
कुछ इधर की पढी कुछ उधर की पढ़ी !
कैसे लगती भला तालियो की झड़ी !
एक श्रोता उठा और कहने लगा !
तुमने जब भी पढ़ी बाप की ही  पढ़ी !!

बदायूं :पिछले कुछ समय पहले शहर मे एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमे कई राष्ट्रीय स्तर के कवियो ने काव्य पाठ किया मंच का संचालन एक ओजस्वी कवि ने किया जिसने मंच की कलाकारी चलते हुये उस रचनाकार को सबसे पहले ही बुला लिया जबकि कई बार पहले उसने हमेशा ऐसे मंचो पर अपने आपको बीच मे पढने का निवेदन करते हुये देखा गया है लेकिन कुछ कवि शातिर दिमाग होते है कही शहर का व्यक्ति हिट न हो जाये इसलिए पहली बार मे ही बुला लो और फिर बेइज्जती करा दो !
उधर उस अकवि ने भी ऐसी रचना पढी जिसका जिसका वर्तमान परिस्थिति से दूर दूर तक कोई संबध नही था इतने मे ही एक बुजुर्ग श्रोता पीछे से झल्ला पढे और यह कहते हुये उठ गये कि इसने जब पढी बाप की ही पढी!
इतनी जब शहर के युवा कवि षटवदन शंखधार के कान मे पढी तो यह मुक्तक गढ दिया जिसकी चर्चा बहुत दूर दूर तक है

© षटवदन शंखधार
     बदायूँ (उ०प्र०)

षटवदन शंखधार

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

9:29 pm

अच्छा था मेरे दर से मुकर जाना तेरा - सलिल सरोज

1.
अच्छा था मेरे दर से मुकर जाना तेरा
आसमाँ की गोद से उतर जाना तेरा

तू लायक ही नहीं था मेरी जिस्मों-जाँ के
वाजिब ही हुआ यूँ बिखर जाना तेरा

मेरी हँसी की कीमत तुमने कम लगाई
यूँ ही नहीं भा गया रोकर जाना तेरा

तुझे हासिल थी बेवजह दौलतें सारी 
अब काम आया सब खोकर जाना तेरा

क्या आरज़ू करूँ तेरी तंगदिली से मैं
क्या दे पाएगा बेवफा होकर जाना तेरा

मैं सोचती रही कि हो जाऊँ तेरी फिर से
बुत बना गया हर बात पे उखड़ जाना तेरा

2.
जो तुम चाहते हो बस वही मान लेते हैं
झूठ को सच,सच को झूठ जान लेते हैं

अब तक अक्सों में ढूँढते रहे इक दूजे को
चलो आज हम खुद को पहचान लेते हैं

तिनका तिनका जोड़ के आशिया बनाएँ 
थोड़ा सा ज़मीन,थोड़ा आसमान लेते हैं

माँगों में सजे तुम्हारे भरी भरी हरियाली
अहसासों में गीता और कुरआन लेते हैं

खुशी की लहरें दौड़ा करें हमारे आँगन में
क्षितिज के आसपास कोई मकान लेते हैं

3.
वो मेरे दिए दर्द भी सम्भाल के रखती है
देखें जिगर उसका, कमाल के रखती है

कोई क़तरा भी जाया न हो आँसुंओं के
वो तो सपने भी देख - भाल के रखती है

क्या माँगा मैंने, उसने क्या क्या दे दिया
हर बात पे कलेजा निकाल के रखती है

जो चाहिए मुझे तो वो खुदा भी ला के दे
अपनी मुट्ठी में आकाश-पाताल रखती है

मैंने देखा ही नहीं उसे जी भर के कभी
खुद ही में मेरे प्यार का गुलाल रखती है   

लिखना है तो बादलों पे इबारत लिखो कोई
कभी शबनम तो कभी क़यामत लिखो कोई

कोहरों के बीच से  रास्ता निकल के आएगा
मंज़िलों के ख़िलाफ़ भी बगावत लिखो कोई

फसलें नफरतों की सब कट जाएँगी खुद ही
धरती के सीने पे ऐसी मोहब्बत लिखो कोई

कितनी सदी तक यूँ ही पिसती रहा करेगी
माँ के थके चेहरे पे अब राहत लिखो कोई

तुम कहाँ गुम हो,किस ख़्यालात में गुम हो
दो पल को  अपने लिए चाहत लिखो कोई

कुछ अनछुए पल, कुछ अनछुए अहसास
दिल के करीब से बातें निहायत लिखो कोई

सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी
लोक सभा सचिवालय
संसद भवन ,नई  दिल्ली 

पता
मुखर्जी नगर
नई दिल्ली

9:23 pm

एक आदर्श माता -पिता

एक  आदर्श माता -पिता 

एक आदर्श  माता -पिता 
अपनी औलाद  के लिए 
सब कुछ  करता है 
कई बार  बस  अपना
ईमान छोड़
सब कुछ  बेचने को  तैयार 
यहाँ तक  कि  अपने आप को भी 
गिरवी रखनें  को हालात  के  हाथों  मज़बूर
ताकि 
उनके  बच्चे का  भविष्य 
और  आने  वाला  कल 
सुरक्षित सुनहरा व  उज्जवल हो 
बच्चों के हौसलों की  उड़ान 
कम  न  हो  और  वह 
बुलन्दियां छू  सके
इस  खातिर  उन्हें  चाहे  अपने ही  पंख 
क्यों  न  काटने  पड़े 
इतना  होने के  बाद भी 
अगर कोई  कमी  रह  गई 
तो वो  दोनों  वक्यी  ही 
बेबस  और  लाचार .....
बेबस और  लाचार ....
एक  आदर्श माता -पिता ........

आपका  प्यार 
वीरेंद्र  कौशल
9:21 pm

बेटियां मेरी बड़ी होनहार.....वीरेन्द्र कौशल

बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार  
रंजना छवि मानों  त्योहार 
दिल साफ  नीयत  साफ  
घर  आयी  ख़ुशियां अपार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

बचपन  खेला घर महकाया  
हर किसी  से प्यार  पाया 
सब  की वो राजदुलारी 
चंचल स्वाभाव महकायें  क्यारी 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

 हर पल  करती  सब  की  सेवा 
ऐसा  मिले  सबको  मेवा 
बड़ी  गुणकारी   करें  परोपकार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

पल में  माँ  सी  डांट पिलायें 
पर  कोई  चीज ना  बांट  पाये 
हर घर में हो  ऐसे त्योहार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

 
चुटकियों  में  समास्या  सुलझायें 
जादू  इनका  सब पर छाये  
हर  जगह  हों  ऐसे संस्कार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

पल में  सबका  मन  हर  लेती 
गैरों के  भी  पर  लगा  देती 
नानी  दादी  सी  त्योहार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

घर  की  हैं  अलबेली  शान 
बहना अपनी  की  प्यारी  जान 
सब  पर  लूटाती अपना  प्यार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

माँ  का  रूप पिता का  अंश  
रोशन  करेगी  नया  वंश 
एक नजर पहचानें सार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

आवलें सी  हैं  कल्याणकारी 
हल्दी  सी  बहुत  गुणकारी 
बड़ी  भोली लिये  प्यार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

सादा  जीवन  ऊँचे  ख़्वाब 
पार  किये  सभी  पडाव  
पूजा इबादत अरदास  गुलनार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

सहेलियां  जैसे  खुशबू  द्वारा 
दूर  करे सदा  अंधियारा 
मेहकायें  जग सारा अपार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

पिता  की जैसी मजबूरी 
पूरी  मानी  समझ  जरुरी
चेहरा सदा  प्रफुल्लित बारम्बार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

दुर्गा की टोली बिमला की फौज 
ईश्वर की हवेली इन्द्रजीत की मौज 
संस्कारों  को  दे नयी रफतार  
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

उम्मीद  नहीं  ये  आरजू 
हाथ  नहीं  मेरी  बाजू 
इन  सहारे  समय  की  धार 
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......
बेटियां  मेरी बड़ी  होनहार.......

आपका  प्यार 

वीरेन्द्र कौशल

9:17 pm

न दिल को जलाना अगर हो सके तो -बलजीत सिंह बेनाम

ग़ज़ल
न दिल को जलाना अगर हो सके तो
निग़ाहें मिलाना अगर हो सके तो

तुम्हे याद करते अगर मर भी जाऊँ
ख़बर को छुपाना अगर हो सके तो

तअल्लुक़ मिटाने से क्या फ़ायदा है
तअल्लुक़ बनाना अगर हो सके तो

जिसे है ख़ुदा पर बहुत ही अक़ीदत
उसे आज़माना अगर हो सके तो

किसी पर भी नेकी अगर तुम करो तो
न उसको जताना अगर हो सके तो

         बलजीत सिंह बेनाम
        103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी
        हाँसी(हिसार)
        मोबाईल:9996266210

विशिष्ट पोस्ट

सूचना :- रचनायें आमंत्रित हैं

प्रिय साहित्यकार मित्रों , आप अपनी रचनाएँ हमारे व्हाट्सएप नंबर 9627193400 पर न भेजकर ईमेल- Aksbadauni@gmail.com पर  भेजें.