बुधवार, 29 जनवरी 2020
शनिवार, 25 जनवरी 2020
हम जहाँ भी मुहब्बत निभाने गए।
शुक्रवार, 24 जनवरी 2020
आजादी
शहीद दिवस को याद करें उन वीरों का बलिदान है।
आजादी उनकी ही देन है, मेरा भारत देश महान है।
चल पड़े थे प्रगति पथ पर ना देखा पीछे मुड़कर,
ये थे भारत के वीर जवान, तर्पण उनके प्राण हैं।
शत शत नमन उन्हें रखते हमको जो महफूज़ हैं,
सुभाष,भगत,सुखदेव,राजगुरु हुए देश के लिए कुर्बान हैं।
उन वीर योद्धाओं को हम कभी भी भुला न पाएंगे,
वतन पर मिटने वालों का बस बाकी यही निशान हैं।
अपने देश के खातिर उन्होंने जान कर दी कुर्बान,
यही कहलाये अपने मुल्क के सच्चे वीर जवान हैं।
हँसते-हँसते वीर जवान फाँसी के फंदे पर झूल गए,
देश की आजादी इन्ही की देन है, ये इनकी पहचान हैं।
सुमन अग्रवाल "सागरिका"
आगरा
गुरुवार, 16 जनवरी 2020
पत्रिकाओं के ईमेल की एक और सूची
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1. हंस, संजय सहाय (संपादक), editorhans@gmail.com
2 himprasthahpGmail.com
3. बया, गौरीनाथ (संपादक), rachna4baya@gmail.com
4. पहल, ज्ञानरंजन (संपादक), edpahaljbp@yahoo.co.in, editorpahal@gmail.com
5. अंतिम जन- दीपक श्री ज्ञान (संपादक)- antimjangsds@gmail.com, 2010gsds@gmail.com
6. समयांतर- पंकज बिष्ट (संपादक)- samayantar.monthly@gmail.com, samayantar@yahoo.com
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10. नया ज्ञानोदय- लीलाधर मंडलोई (संपादक)- nayagyanoday@gmail.com, bjnanpith@gmail.com
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20. मुक्तांचल-डॉ मीरा सिन्हा,muktanchalquaterly2014@gmail.com,
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23. पुस्तक संस्कृति। संपादक पंकज चतुर्वेदी।editorpustaksanskriti@gmail.com
24. प्रणाम पर्यटन हिंदी त्रैमासिक संपादक प्रदीप श्रीवास्तव लखनऊ उत्तर प्रदेश
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25. समालोचन वेब पत्रिका, अरुण देव (सम्पादक), www.samalochan.com, devarun72@gmail.com
26. वांग्मय पत्रिका, डॉ. एम. फ़िरोज़. एहमद, (सम्पादक), vangmaya@gmail.com
27. साहित्य समीर दस्तक (मासिक), कीर्ति श्रीवास्तव (संपादक), राजकुमार जैन राजन (प्रधान सम्पादक), licranjan2003@gmail.com
28. कथा समवेत (ष्टमासिक), डॉ. शोभनाथ शुक्ल (सम्पादक), kathasamavet.sln@gmail.com
29. अनुगुंजन (त्रैमासिक), डॉ. लवलेश दत्त (सम्पादक), sampadakanugunjan@gmail.com
30. सीमांत, डॉ. रतन कुमार (प्रधान संपादक), seemantmizoram@gmail.com
31. शोध-ऋतु, सुनील जाधव (संपादक), shodhrityu78@yahoo.com
32. विभोम स्वर, पंकज सुबीर (संपादक), vibhomswar@gmail.com, shivna.prakashan@gmail.com
33. सप्तपर्णी, अर्चना सिंह (संपादक), saptparni2014@gmail.com
34. परिकथा, parikatha.hindi@gmail.com
35. लोकचेतना वार्ता, रवि रंजन (संपादक), lokchetnawarta@gmail.com
36. युगवाणी, संजय कोथियल (संपादक), Yugwani@gmail.com
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39. कविकुंभ, रंजीता सिंह (संपादक), kavikumbh@gmail.com
40. मनमीत, अरविंद कुमार सिंह(संपादक), manmeetazm@gmail.com
41. पू्र्वोत्तर साहित्य विमर्श (त्रैमासिक), डॉ. हरेराम पाठक (संपादक), hrpathak9@gmail.com
42. लोक विमर्श, उमाशंकर सिंह परमार (संपादक), umashankarsinghparmar@gmail.com
43. लोकोदय, बृजेश नीरज (संपादक), lokodaymagazine@gmail.com
44. माटी, नरेन्द्र पुण्डरीक (संपादक), Pundriknarendr549k@gmail.com
45. मंतव्य, हरे प्रकाश उपाध्याय (संपादक), mantavyapatrika@gmail.com
46. सबके दावेदार, पंकज गौतम (संपादक), pankajgautam806@gmail.com
47. जनभाषा, श्री ब्रजेश तिवारी (संपादक), mumbaiprantiya1935@gmail.com, drpramod519@gmail.com
48. सृजनसरिता (हिंदी त्रैमासिक), विजय कुमार पुरी (संपादक), srijansarita17@gmail.com
49. नवरंग (वार्षिकी), रामजी प्रसाद ‘भैरव’ (संपादक), navrangpatrika@gmail.com
50. किस्सा कोताह (त्रैमासिक हिंदी), ए. असफल (संपादक), a.asphal@gmail.com, Kotahkissa@gmail.com
51. सृजन सरोकार (हिंदी त्रैमासिक पत्रिका), गोपाल रंजन (संपादक), srijansarokar@gmail.com, granjan234@gmail.com
52. उर्वशी, डा राजेश श्रीवास्तव (संपादक), urvashipatrika@gmail.com
53. साखी (त्रैमासिक), सदानंद शाही (संपादक), Shakhee@gmail.com
54. गतिमान, डॉ. मनोहर अभय (संपादक), manohar.abhay03@gmail.com
55. साहित्य यात्रा, डॉ कलानाथ मिश्र (संपादक), sahityayatra@gmail.com
56. भिंसर, विजय यादव (संपादक), vijayyadav81287@gmail.com
57. सद्भावना दर्पण, गिरीश पंकज (संपादक), girishpankaj1@gmail.com
58. सृजनलोक, संतोष श्रेयांस (संपादक), srijanlok@gmail.com
59. समय मीमांसा, अभिनव प्रकाश (संपादक), editor.samaymimansa@gmail.com
60. प्रवासी जगत, डॉ. गंगाधर वानोडे (संपादक), gwanode@gmail.com pravasijagat.khsagra17@gmail.com
61. शैक्षिक उन्मेष, प्रो. बीना शर्मा (संपादक), dr.beenasharma@gmail.com
62. पल प्रतिपल, देश निर्मोही (संपादक), editorpalpratipal@gmail.com
63. समय के साखी, आरती (संपादक), samaysakhi@hmail.in
64. समकालीन भारतीय साहित्य, ब्रजेन्द्र कुमार त्रिपाठी (संपादक), secretary@sahitya-akademi.gov.in
65. शोध दिशा, डॉ गिरिराजशरण अग्रवाल (संपादक), shodhdisha@gmail.com
66. अनभै सांचा, द्वारिका प्रसाद चारुमित्र (संपादक), anbhaya.sancha@yahoo.co.in
67. आह्वान, ahwan@ahwanmag.com, ahwan.editor@gmail.com
68. राष्ट्रकिंकर, विनोद बब्बर (संपादक), rashtrakinkar@gmail.com
69. साहित्य त्रिवेणी, कुँवर वीरसिंह मार्तण्ड (संपादक), sahityatriveni@gmail.com
70. व्यंजना, डॉ रामकृष्ण शर्मा (संपादक), shivkushwaha16@gmail.com
71. एक नयी सुबह (हिंदी त्रैमासिक), डॉ. दशरथ प्रजापति (संपादक), dasharathprajapati4@gmail.com
72. समकालीन स्पंदन, धर्मेन्द्र गुप्त 'साहिल' (संपादक), samkaleen.spandan@gmail.com
73. साहित्य संवाद , संपादक - डॉ. वेदप्रकाश, sahityasamvad1@gmail.com
74. भाषा विमर्श ( अपनी भाषा की पत्रिका), अमरनाथ (प्रधान संपादक), अरुण होता (संपादक), amarnath.cu@gmail.com
75. विश्व गाथा, पंकज त्रिवेदी (संपादक), vishwagatha@gmail.com
76. भाषिकी अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल, प्रो. रामलखन मीना (संपादक), prof.ramlakhan@gmail.com
77. समवेत, संपादक-डॉ.नवीन नंदवाना,
78-editordeskudr@gmail.com
79-hindipatahar@gmail.com
80-bajpaikailash51@gmail.com
81 बोहल शोध मंजूषा
सम्पादक डॉ नरेश सिहाग एडवोकेट
grsbohal@gmail.com
शनिवार, 4 जनवरी 2020
राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मान 2019 हेतु बालकहानियां आमंत्रित
1— बालकहानियां पशुपक्षी, जीवजंतु, मूर्तअमूर्त वस्तु के पात्र ले कर रची गई हो.
2— कहानी में सरस, सरल और सहज वाक्यों को समावेश हो, इस बात का ध्यान रखिएगा. वाक्य छोटेछोटे हो.
3— मंनोरंजक और उद्देश्यपरक कहानियों को प्राथमिकता दी जाएगी.
3— बालकहानी में कथातत्व का समावेश हो.
4— आप की सर्वश्रेष्ठ एक बालकहानी की तीन प्रतियां ए—4 आकार के कागज पर एक ओर लिख कर या टाईप करवा कर भेजे. उस में कहीं नाम,पता या कोई पहचान चिह्न अंकित न हो इस बात का ध्यान रखे. अपना संक्षिप्त परिचय व एड्रेस अलग से A-4 साइज कागज पर लिख भेजे जिसमे कहानी का शीर्षक लिखते हुए मौलिकता की घोषणा भी अंकित करें
5— इसे पंजीकृत डाक या कूरियर से — राजकुमार जैन राजन,
चित्रा प्रकाशन,
आकोला -312205 (चित्तौड़गढ़) राजस्थान
के पते पर अंतिमतिथि के पूर्व प्रेषित कर दें. ताकि समय सीमा में यह प्राप्तकर्ता को मिल सकें.
6— एक प्रति जिस में पूरा नाम, पता, मोबाइल नंबर और मेल आईडी लिखा हो. उसे
Rajkumarjainrajan@gmail.com मेल पर भेजे
के विषय में — राष्ट्रीय बालसाहित्य सम्मान 2019 हेतु बालकहानियां , लिख कर संलग्नक के साथ पहुंचा दे.
7- कहानी यूनीफॉण्ट या मंगलफोंट में टाइप कर के वर्ड फ़ाईल में भेजे।
8- प्रतियोगिता में स्वीकृत और मापदंड पर खरी उतरी बालकहानियों का एक संकलन प्रकाशित कर, उनके रचनाकारों को समारोह में स्मृति चिह्न, नगद राशि के साथ ससम्मान पुरस्कार के साथ प्रदान किया जाएगा। पुरस्कार प्रथम ₹. 3100/-, द्वितीय ₹.2100/-, तृतीय ₹.1100 एवम 5 प्रोत्साहन पुरस्कार देय होंगे।
संपादक/ संयोजक
-ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश
-राजकुमार जैन राजन
ग़ज़ल - वीगा जमीन यूँ मकानों में बंट गया।
वीगा जमीन यूँ मकानों में बंट गया।
फिर यूँ हुआ चंद ठिकानों में बंट गया।
बेसबब मुझसे कोई आकर कह गया,
जमीन के टुकड़े विवादों में बंट गया।
भाई ही भाई का दुश्मन बन बैठा,
कोर्ट में पेश संवादों में बंट गया।
आपस में झगड़ते रहते थे नित रोज,
भाई का प्यार दीवारों में बंट गया।
आपसी मनमुटाव बढ़ गया इसकदर,
बड़ा सा गोदाम दुकानों में बंट गया।
सुमन अग्रवाल 'सागरिका'
आगरा
दुख की बदली
छंद मुक्त कविता
मैं अक्सर भीग जाता हूँ ,
दुखों की बदली में,
उसके प्रवाह का आतप,
जब आफ़त बन जाता ,
मुश्किल हालात भी,
जब मुश्किल हो जाते ,
सिहर जाता तन-मन,
समस्या से भय खाता हूँ,
भूल जाता सुकूँ के पल,
बस सोचता ये ही,
हाय!जीवन, कैसा जीवन?
मैं तुझसे हार गया ,
ये कहकर जीवन,
धिक्कार दिया,
क्षुब्ध,लुब्ध, कुंठित हो,
स्वयं को कोसता हूँ ,
भूल जाता पतझड़ के बाद,
सावन तो आएगा,
बाद कोहरे के फिर ,
लालिमा भी आएगी,
अमावस-अंधेरे जीवन में,
पूर्णिमा का चंद्र भी होगा,
ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है,
दुख में धैर्य की परीक्षा होती,
सुख-दुख आना-जाना है,
ये बातें जब-जब सुनता हूँ,
पढ़ता हूँ, लिखता हूँ ।
तब सुख झरोखे से झाँकता,
कुछ इशारा करता हुआ,
मंद- मंद हँसी से खिलखिलाता,
और फिर कहता भी है,
तेरे संग रहकर दुख को,
कितना सुख मिला रे ।
धैर्य तेरा देखकर,
धैर्य और धीर बना,
ये देखकर मुग्ध हूँ मैं,
अब मैं भी आना चाहता,
दुख जैसा गले मिलकर तुझसे,
मैं भी मुस्काना चाहता,
पावन होना चाहता हूँ ,
आह! मुझे भी तो,
कितना प्यार मिलेगा?
कितना सुख मिलेगा?
कितना सम्मान मिलेगा?
कवि - सुनील नागर " सरगम "
Re: chhod de nasha.....poem
मान्यवर मित्रों ,लो क्ल लो बात ...मेरे दिल से निकले नए भाव ... आपके साथ साँझा कर रहा हूँ ...छोड़ दे नशा ...नई इबादत लिख दे ....नशे की आड़ में गुनाह होते देखें हैंफिर जीवन भर अपने आह ढ़ोते देखें हैंनशे की गिर्रफत में होने का कारण तो बताछोड़ दे नशा एक नया वातावारण बनाकर नशा गर करना तो किसी अच्छी चीज़ कातरेगा जीवन गर पीया अमृत सहित्य बीज कालिखना हैं तो लिख दर्द जवानी कादूसरों के ज़ुल्मों की मनमानी कानशा तो नाश और रास्ता उदास हैलेकिन जीवन में फिर भी आस हैंछोड़ नशा खेल अपनी तकदीर सेलिख अपनी नई कहानी अपनी तदबीर सेनशा कर खुलकर तू देश भक्ति रानी कागर्व कर पूरा अपना होने हिन्दुस्तानी काबदल देश की तस्वीर अपने नेक इरादों सेछीन दुख दर्द दुनियां के सच्चे वादों सेभर दे रंग नए नई तिज़ारत लिख देछोड़ दे नशा नई इबादत लिख देछोड़ दे नशा .......आपका अपना ,वीरेन्द्र कौशल
Re: betian voh prindey......
मान्यवर मित्रों ,लो क्ल लो बात ......बेटियां वो परिन्दे हैं ज़िनके पर नहीं होतेकहने को ठिकाने दो मगर घर नहीं होतेबेटे माने नीव सदा और बेटियां कमजोर कड़ीबेटे बांटे जमीन बेटियां दर्द में पास खड़ीसिक्का एक पेहलू दो कभी जाना मेरे दोस्तदिवारें चाहे कितनी बिन इनके पूरे घर नहीं होतेबेटियां वो परिन्दें .......कलाई का बंधन ये अटूट हैं ज़िनका विश्वासरहती सदा अंगसंग खुशियां लिए अपनें साथचाहे कितनी रहे दूर कभी समझा इन्हें प्यारेयह ऐसे रिश्ते हैं जिन में ड़र नहीं होतेबेटियां वो परिन्दे .......प्यार से जीते जग सारा ये लक्ष्मी रूपममतामयी मुरत हमें लगने न दे कभी धूपस्वारें जीवन को सदा सोचा कभी क्या तुमनेकितनी कठिन रहे परिस्तिथियां हौंसले कम नहीं होतेबेटियां वो परिन्दें ....आपका अपना ,वीरेंद्र कौशल
Jaagte rahiye
मान्यवर मित्रों ,लो क्ल लो बात ....चैंन की नींद सोना है तो जागते रहिये .....कौन कहता है कि मौत नहीं बिकती ......मौत के तो बड़े बड़े सौदे होते हैं और वो भी स्टेंप पेपर पर ...ज़िन्दगी का ड़र दिखा कर बीमें वाले बेहिसाब कमा रहें हैं ...क्योंकि आजकल ज़िन्दगी ही हारती हैं इसी लिए मौत बिकती हैं ......यह बता कर कि ज़िन्दगी रहते किशत भरो ...कुछ अनहोनी होने पर भरी हुई किशत नहीं आपितु पूर्ण बीमा राशि का भुगतान होगा ....क्योंकि चैन की नींद सोना है तो जागते रहिये ....आपका अपना ,वीरेन्द्र कौशल
Aapke aagan mein...
मान्यवर मित्रों ,लो क्ल लो बात ....मेरे नए विचार शब्दों के सहारे ...आपके द्वारे ..आपके आंगन में ...हमारे आंगन से ....ख़ुशियां आपके आंगन में ..शुभकामनाएं हमारे आंगन से ....ऊँचाईयां आपके आंगन में ...हौंसलें हमारे आंगन से ....विचार आपके आंगन में ...प्रयास हमारे आंगन से ....उड़ान आपके आंगन में ...ज़ज्बा हमारे आंगन से ....पुष्प आपके आंगन में ...ख़ुशबू हमारे आंगन से ....आपके आंगन में ...हमारे आंगन से ....आपका अपना ,वीरेन्द्र कौशल
mubaarak nya saal. ...poem
मान्यवर मित्रों ,लो क्ल लो बात ......मुबारक हो नया साल ...नया सालरहे सब खुशहालआने वाला हर पल हो लक्कीकरें जीवन में खूब तरक्कीबच्चे करे मौज़वो भी हर रोज़युवा की भी हर उम्मीद हो पूरीकोई भी इच्छा न रहे अधूरीबड़े भी खूब करे मस्तीहालात महंगी चीजें करें सस्तीबुजुर्गों का सिर पर रहे आशिर्वाद का हाथकोई न समझे अपने को अनाथसभी मिलकर रहेकोई बुराई न पनपेन निर्भया या फिर कोई हैदराबादन धर्म की चिंगारी या दंगे फसादन कोई दारिन्दगी न उन्नावपुरंतया सफल हो ध्येय बेटी बचाओहर तरफ अमन चैन और भाईचाराखूब तरक्की करें हिन्दुस्तान हमाराहर व्यक्ति साधन सम्पन और खुशहालसभी को दिल की गहराईयों से सभी कोमुबारक हो नया साल .......मुबारक हो नया साल .......आपका अपना ,वीरेन्द्र कौशल
New poem MEHNAT KAR...ROZI KMA. ...
लो क्ल लो बात ...एक बार फिर ताज़ा अल्फाज़ सहारे .... आप के द्वारेमेहनत कर और रोजी कमाखुश रह हर त्योहार मनाहर त्योहार अपार खुशीयाँ देतागरीब का पेटा भर देतायही है सब की पुंजीहर सफलता की खालिस कुंजीकर भला और फिर भूलजाचाहे कोई ख़ुशी फिर गुनगुनामेहनत कर .......खुश रह हर ......आचरण खातिर बनवास भी प्यारासीताहरण कारण विद्वान भी मारासदा भाईयों संग बांटा प्यारत्याग खातिर सदा रहे तैयारसंस्कारों को सदा सार्वोपरि मानाफिर चाहे होली -दीपवली साथ मनामेहनत कर .......खुश रह हर .......सदा अपनो ही सहारे जीतन कोई दुशमन सारे मीतझूठ फरेब अपवाद से बचईमानदारी विश्वास ही केवल सचसभी संग अपना व्यवहार जताफिर चाहे मोहर्ररम ईद मनामेहनत कर .....खुश रह हर .....सवा लाख से एक लड़ायाअपने शेहजादों को भी चिनवायासदा खुशहाली खातिर विनती कीतीनहीं बखारी अपनी आप बीतीगैरों खातिर दिया लंगर लगाफिर चाहे शहीदीदिवस गुरूपर्व मनामेहनत कर .....खुश रह हर .....सच्चाई खातिर सूली पर चढ़नहीं कबूला कभी दूसरा गढ़प्रेम संदेशा ही दिया हर लम्हांकभी संता बन दिये उपहारमन में धारा सदा उपकारफिर चाहे गुड-फराईड़े क्रिसमस मनामेहनत कर .....खुश रह हर .....कभी न कर नीयत खोटीहर मेहनत पर मिले रोटीनीयत साफ तो डर नहींकोई भी एक आडम्बर नहींसदा सभी का चाह भलाफिर चाहे कोई उत्सव मनामेहनत कर .....खुश रह हर .....आपका अपना ,वीरेन्द्र कौशल
इक अजब सा है सिलसिला अपना
सेवा में,
सम्पादक महोदय
हिंदी साहित्य वैभव पत्रिका
श्रीमान जी,
सविनय निवेदन यह है कि मेरी यह रचना(ग़ज़ल) नितांत मौलिक,अप्रकाशित और अप्रसारित है और मैं इसके प्रकाशन का अधिकार हिंदी साहित्य वैभव पत्रिका को देता हूँ!आशा है मेरी इस रचना का यथासम्भव उपयोग आपकी पत्रिका में हो सकेगा!
धन्यवाद
भवदीय
बलजीत सिंह बेनाम
103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी
हाँसी(हिसार)
मोबाईल:9996266210
इक अजब सा है सिलसिला अपना
मंज़िलें उसकी रास्ता अपना
हर किसी का था देवता अपना
दर्द उतना ही है बढ़ा अपना
इसने भी ख़ूँ फ़क़त पिया अपना
फिर भी क्यों जी नहीं भरा अपना
ऊना (हिमाचल प्रदेश) में षटवदन शंखधार की कविता ने जगाई राष्ट्र भक्ति की अलख
शनिवार, 28 दिसंबर 2019
धारावाहिक रामायण रामानन्द सागर ने उस समय इतिहास रचा जब उन्होंने टेलीविज़न धारावाहिक "रामायण" बनाया
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रामानन्द सागर Ramanand Sagar, जन्म: 29 दिसम्बर, 1917; मृत्यु: 12 दिसम्बर, 2005) एक भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे। रामानन्द सागर सबसे लोकप्रिय धारावाहिक 'रामायण' बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। इनके कैरियर की शुरुआत "राइडर्स ऑफ़ द रैलरोड" (1936) नामक फ़िल्म के साथ हुई थी।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी रामानन्द सागर का जन्म अविभाजित भारत के लाहौर ज़िले के "असलगुरु" ग्राम नामक स्थान पर 29 दिसम्बर 1927 में एक धनी परिवार में हुआ था। उन्हें अपने माता-पिता का प्यार नहीं मिला, क्योंकी उन्हें उनकी नानी ने गोद ले लिया था। पहले उनका नाम चंद्रमौली चोपड़ा था लेकिन नानी ने उनका नाम बदलकर रामानंद रख दिया।
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| स्रोत- गूगल |
1947 में देश विभाजन के बाद रामानन्द सागर सबकुछ छोड़कर सपरिवार भारत आ गए। उन्होंने विभाजन की जिस क्रूरतम, भयावह घटनाओं का दिग्दर्शन किया, उसे कालांतर में "और इंसान मर गया" नामक संस्मरणों के रूप में लिपिबद्ध किया। यह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वे जब अपनी मातृभूमि से बिछुड़कर युवावस्था में शरणार्थी बन भारत आए, उनकी जेब में मात्र 5 आने थे, किन्तु साथ में था अपने धर्म और संस्कृति के प्रति असीम अनुराग-भक्तिभाव। शायद इसी का परिणाम था कि आगे चलकर उन्होंने रामायण, श्रीकृष्ण, जय गंगा मैया और जय महालक्ष्मी जैसे धार्मिक धारावाहिकों का निर्माण किया। दूरदर्शन के द्वारा प्रसारित इन धारावाहिकों ने देश के कोने-कोने में भक्ति भाव का अद्भुत वातावरण निर्मित किया।
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| स्रोत- गूगल |
मेधावी छात्र
16 साल की अवस्था में उनकी गद्य कविता श्रीनगर स्थित प्रताप कालेज की मैगजीन में प्रकाशित होने के लिए चुनी गई। युवा रामानंद ने दहेज लेने का विरोध किया जिसके कारण उन्हें घर से बाहर कर दिया गया। इसके साथ ही उनका जीवन संघर्ष आरंभ हो गया। उन्होंने पढ़ाई जारी रखने के लिए ट्रक क्लीनर और चपरासी की नौकरी की। वे दिन में काम करते और रात को पढ़ाई। मेधावी छात्र होने के कारण उन्हें पंजाब विश्वविद्यालय पाकिस्तान से स्वर्ण पदक मिला और फ़ारसी भाषा में निपुणता के लिए उन्हें मुंशी फ़ज़ल के ख़िताब से नवाज़ा गया। इसके बाद सागर एक पत्रकार बन गए और जल्द ही वह एक अखबार में समाचार संपादक के पद तक पहुंच गए। इसके साथ ही उनका लेखन कर्म भी चलता रहा।
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| स्रोत- गूगल |
सागर आर्ट कॉरपोरेशन
रामानंद सागर का झुकाव फ़िल्मों की ओर 1940 के दशक से ही था। लेकिन उन्होंने बाक़ायदा फ़िल्म जगत में उस समय एंट्री ली, जब उन्होंने राज कपूर की सुपरहिट फ़िल्म 'बरसात' के लिए स्क्रीनप्ले और कहानी लिखी। भारत के अंग्रेज़ों से स्वतंत्रता पाने के बाद वर्ष 1950 में रामानन्द सागर ने एक प्रोडक्शन कंपनी "सागर आर्ट कॉरपोरेशन" शुरू की थी और 'मेहमान' नामक फ़िल्म के द्वारा इस कंपनी की शुरुआत की। बाद में उन्होंने इंसानियत, कोहिनूर, पैगाम, आँखें, ललकार, चरस, आरज़ू, गीत और बग़ावत जैसी हिट फ़िल्में बनाईं। वर्ष 1985 में वह छोटे परदे की दुनिया में उतर गए। फिर 80 के दशक में रामायण टीवी सीरियल के साथ रामानंद सागर का नाम घर-घर में पहुँच गया।
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| स्रोत- गूगल |
धारावाहिक रामायण
रामानन्द सागर ने उस समय इतिहास रचा जब उन्होंने टेलीविज़न धारावाहिक "रामायण" बनाया और जो भारत में सबसे लंबे समय तक चला और बेहद प्रसिद्ध हुआ। जो भगवान राम के जीवन पर आधारित और रावण और उसकी लंका पर विजय प्राप्ति पर बना था।
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| स्रोत- गूगल |
निर्देशन और निर्माण
रामानन्द सागर ने कुछ फ़िल्मों तथा कई टेलीविज़न कार्यक्रमों व धारावाहिकों का निर्देशन और निर्माण किया। इनके द्वारा बनाए गए प्रसिद्ध टीवी धारावाहिकों में रामायण, कृष्णा, विक्रम बेताल, दादा-दादी की कहानियाँ, अलिफ़ लैला और जय गंगा मैया आदि बेहद प्रसिद्ध हैं। धारावाहिकों के अलावा उन्होंने आंखें, ललकार, गीत आरजू आदि अनेक सफल फ़िल्मों का निर्माण भी किया। 50 से अधिक फ़िल्मों के संवाद भी उन्होंने लिखे। कैरियर के शुरुआती दिनों में उन्होंने पत्रकारिता भी की। पत्रकार, साहित्यकार, फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, संवाद लेखक आदि सभी का उनके व्यक्तित्व में अनूठा संगम था। और तो और, रामायण धारावाहिक की प्रत्येक कड़ी में उनके द्वारा रामचरित मानस की घटनाओं, पात्रों की भक्तिपूर्ण, सहज-सरस और मधुर व्याख्या ने उन्हें एक लोकप्रिय प्रवचनकर्ता के रूप में भी स्थापित किया।
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| स्रोत- गूगल |
लेखन
उन्होंने 22 छोटी कहानियां, तीन वृहत लघु कहानी, दो क्रमिक कहानियां और दो नाटक लिखे। उन्होंने इन्हें अपने तखल्लुस चोपड़ा, बेदी और कश्मीरी के नाम से लिखा लेकिन बाद में वह सागर तखल्लुस के साथ हमेशा के लिए रामानंद सागर बन गए। बाद में उन्होंने अनेक फ़िल्मों और टेलीविज़न धारावाहिकों के लिए भी पटकथाएँ लिखी
सम्मान और पुरस्कार
सन् 2001 में रामानन्द सागर को उनकी इन्हीं सेवाओं के कारण पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें फ़िल्म 'आँखें' के निर्देशन के लिए फ़िल्मफेयर पुरस्कार और 'पैग़ाम' के लिए लेखक का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला।
निधन[सम्पादन
देश में शायद ही कोई ऐसा फ़िल्म निर्माता-निर्देशक हो जिसे न केवल अपने फ़िल्मी कैरियर में भारी सफलता मिली वरन् जिसे करोड़ों दर्शकों, समाज को दिशा देने वाले संतों-महात्माओं का भी अत्यंत स्नेह और आशीर्वाद मिला। डा. रामानन्द सागर ऐसे ही महनीय व्यक्तित्व के धनी थे। सारा जीवन भारतीय सिने जगत की सेवा करने वाले रामानन्द सागर शायद भारतीय फ़िल्मोद्योग के ऐसे पहले टी.वी. धारावाहिक निर्माता व निर्देशक थे, जिनके निधन की खबर सुनते ही देश के कला प्रेमियों, करोड़ों दर्शकों सहित हजारों सन्त-महात्माओं में शोक की लहर दौड़ गई। गत 12 दिसम्बर 2005 की देर रात मुंबई, महाराष्ट्र के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। 87 वर्षीय रामानंद सागर ने तीन महीने बीमार रहने के बाद अंतिम साँस ली। जूहु के विले पार्ले स्थित शवदाह गृह में उनके बड़े पुत्र सुभाष सागर ने उनके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी। इस अवसर पर उनके चाहने वाले सैकड़ों लोग, कलाकार, निर्माता- निर्देशक उपस्थित थे।
उनकी जनप्रियता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हरिद्वार में आयोजित धर्मसंसद में शोकाकुल संतों, देश के चोटी के धर्माचार्यों ने उनकी स्मृति में मौन रखा। उनके द्वारा निर्मित और निर्देशित धारावाहिक "रामायण" ने देश में अद्भुत सांस्कृतिक जागरण पैदा किया।
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रामानंद की रामायण सीरियल से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
दुनिया के लाखों टेलीविजन पर छा जाने वाले रामानन्द सागर के धारावाहिक "रामायण" को करीब 28 साल हो चुके हैं। मशहूर निर्माता निर्देशक रामानंद सागर 1987 में दूरदर्शन पर धाराविक 'रामायण' लेकर आए। रामानंद सागर ने जब रामायण का निर्माण किया था तो वह भी नहीं जानते थे कि रामायण लोगों के जीवन का अहम हिस्सा बन जाएगा। जानिए रामानंद सागर के जन्मदिन के मौके पर रामायण से जुड़ी दिलचस्प बातें।
सात्विक रहने का एग्रीमेंट
रामानंद सागर ने सीरियल शुरू करने से पहले ही सभी कलाकारों से सात्विक खान-पान, रहन-सहन का एग्रीमेंट किया था। सीरियल पूरे चार सालों में बना और कलाकारों को इस बीच नॉनवेज, स्मोकिंग, ड्रिंकिंग या अन्य दुव्र्यसनों से दूर रहना पड़ा। जो एक्टर इनके आदी थे, उन्हें रामानंद सागर के इस नियम से खीज होती थी। चार साल बाद वही एक्टर पूरी तरह सात्विक बनकर निकले और आज भी उन्हीं नियमों पर चल रहे हैं।
जाति के आधार पर किरदार
रामानंद सागर ने सीरियल को जीवंत बनाने के लिए मुख्य पात्रों के लिए जाति के अनुरूप किरदार तय किए थे। अरुण गोविल क्षत्रिय थे तो उन्हें राम बनाया गया। रावण ब्राह्मण कुल से थे, इसलिए इसके लिए अरविंद त्रिवेदी को चुना।
रोज़मरा के काम पर लग जाता था ब्रेक
रामायण देखने के लिए आलम यह होता था कि लोग रविवार की सुबह का बडी बेसब्री से इंतजार करते थे। एक टेलीविजन सेट पर गांव और मुहल्ले के लोगों का हुजूम उमड पडता था। बस और ट्रकों के ड्राइवर अपने वाहनों को ब्रेक लगाकर रामायण देखने के लिए किसी ढाबे में लगे टेलीविजन से चिपक जाते थे।
पवित्र बन गया सीरियल
निर्माता रामानंद सागर को एक महिला ने चिट्ठी लिखी कि जब भी 'रामायण' टी.वी. पर आता है, तो वह अपने अंधे बेटे को टी.वी. छूने को कहती है, इस विश्वास से कि उसकी आँखों की रोशनी लौट आएगी। यह सीरियल 'रामायण ग्रंथ' जैसा पवित्र माना जाने लगा।
विक्रम बना राम
टीवी पर इससे पहले रामानंद सागर 'विक्रम और बेताल' नाम का एक धाराविहक बना चुके थे। इसमें विक्रमादित्य की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल को उन्होंने 'रामायण' में राम के केंद्रीय पात्र के रूप में चुना।
सड़के और बस सुनसान
रामायण जब अपने लोकप्रियता के चरम पर था तो कहा जाता है कि प्रसारण के समय पूरा देश मानो रूक कर केवल रामायण देखता था। सड़कों पर बस नहीं चला करती थी क्योंकि उसके यात्री टीवी के सामने बैठकर रामायण देख रहे होते थे।
9:30 बन गया सबसे हिट
'रामायण' टीवी पर आने वाला ऐसा इकलौता धारावाहिक बना जिसे 45 मिनट का टीवी स्लॉट मिला। जबकि उन दिनों दूरदर्शन पर सिर्फ आधे घंटे और एक घंटे के स्लॉट ही कार्यक्रमों को मिला करते थे। दूरदर्शन ने रामानंद सागर को जब रविवार सुबह 9:30 बजे का टाइम दिया तो यह स्लॉट टीवी उद्योग में कम लोकप्रिय समय में गिना जाता था लेकिन रामायण के हिट होने के बाद इस स्लॉट को सबसे हिट स्लॉट के रूप में देखा जाता है।
निर्माताओं ने कहा था फ्लॉप
निर्देशक रामानंद सागर, रामायण बनाने का प्रस्ताव लेकर जिस भी निर्माता के पास गए उसने उन्हें वापसी का रास्ता दिखा दिया। टीवी के लिए 'रामायण' बनाने का सौदा किसी को फ़ायदा का नहीं लगा। इसपर पैसा लगाने से पैसा डूब जाएगा। हालांकि हुआ ठीक इसका उल्टा रामानंद सागर ने अपने ही प्रोडक्शन हाउस सागर आर्ट्स के बैनर तले इसका निर्माण किया ।
कमाई में अव्वल
एक अनुमान के मुताबिक रामायण के एक एपिसोड को बनाने का खर्च लगभग 1 लाख रुपये के आसपास था जो उस समय बहुत ज्यादा था। यह भारतीय टीवी इतिहास की सबसे कमाई करने वाली सीरियल में से एक है।
स्रोत- गूगल
बुधवार, 25 दिसंबर 2019
सभी गीतकार बन्धुओं को सूचित करते हुए अपार हर्ष
नियम एवं शर्तें
१. गीत २५ दिसम्बर २०१९ से १५ जनवरी २०२० के मध्य ही लिखा एवं फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट किया जाना आवश्यक है।
२. केवल एक प्रविष्टि ही स्वीकार्य है। गीत व्याकरण के मानक शिल्प के अनुरूप होना आवश्यक है।
३. निर्णायक मण्डल का निर्णय अन्तिम एवं मान्य होगा।
४. प्रतिभागी द्वारा किसी भी प्रकार की सिफ़ारिश या दबाव की स्थिति में प्रविष्टि तत्काल निरस्त कर दी जायेगी।
५. रचना यूनिकोड फ़ॉन्ट में dheerajkmish@gmail.com पर १५ जनवरी २०२० की मध्यरात्रि तक भेजना अनिवार्य है। विलम्ब से भेजी गयी प्रविष्टि को निरस्त कर दिया जायेगा।
६. प्रतिभागी की अधिकतम आयु ३० वर्ष होनी आवश्यक है।
७. किसी भी न्यायिक विवाद का क्षेत्र लखनऊ रहेगा।
निर्णायक मण्डल
श्री ज्ञान प्रकाश अवस्थी 'आकुल'
श्री राघव शुक्ल
श्री चन्द्रेश शेखर शुक्ल
श्री आदर्श सिंह 'निखिल'
श्री अमर नाथ 'ललित'
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हो सके तो पोस्ट साझा करते चलें।
सोमवार, 23 दिसंबर 2019
दिल जले मेरा धुआँ हो ये जरूरी तो नहीं
दिल जले मेरा धुआँ हो ये जरूरी तो नहीं
दर्द भी सबको अयाँ हो ये जरूरी तो नहीं
हर सितम सह के भी चुपचाप रहें हम यारा
जुल्म का किस्सा बयाँ हो ये जरूरी तो नहीं
हर शजर को बचा लो आज तो कटने से तुम
बेजुबानों को जुवाँ हो ये जरूरी तो नह़ीं
मौसमे इश्क बदलता तो है हर पल देखो
मेरे हिस्से में खिज़ाँ हो ये जरूरी तो नह़ीं
रात रंगीन है अरमान भी तो हैं लाखों
दिल तो उनका भी जवाँ हो ये जरूरी तो नह़ीं
जिंदगी मत बिता देना तू खुराफातों में
मिलती खैरात वहाँ हो ये जरूरी तो नह़ीं
रब के हर फैसले पर सर को झुकाया मीना
सुनता मेरी वो यहाँ हो ये जरूरी तो नह़ीं
मीना भट्ट
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| मीना भट्ट |
प्यार के फेल सारे गुमाँ हो गये
और भी फासले दरमियाँ हो गये
कुछ दिनों की है ये ज़िंदगानी सनम
जब सिकंदर के जैसे धुआँ हो गये
बोलने पर लगी इस क़दर बंदिशें
अब ज़ुबाँ वाले भी बेजुबाँ हो गये
आरजू इस फ़लक की हमें हैं कहाँ
इस ज़मीं पर तो हम कहकशाँ हो गये
आ गयी ज़िदगी की लगे शाम अब
हम जुदा होके भी कामराँ हो गये
हौसला चाहतों से हमें है मिला
फ़िक्रो ग़म अपने सारे धुआँ हो गये
ख़्वाब बेसुध पडे थे हमारे मगर
साथ मिलते ही सारे जवाँ हो गये
मीना भट्ट
शुक्रवार, 29 नवंबर 2019
ग़ज़ल -मुहब्बत की पहचान है आज जनचेतना से -विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"
ये साहित्य की जान है आज जनचेतना से ।।
हमारी तुम्हारी बनी शान है आज जनचेतना से ।।
ये अनमोल वरदान है आज जनचेतना से ।।
मिला हमको सम्मान है आज जनचेतना से ।।
नवाँकुर कलमकारों अब तुम जरा आगे आओ ।
मंजिल पाना आसान है आज जनचेतना से ।।
मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019
बदायूं :पिछले कुछ समय पहले शहर मे एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन आयोजित किया गया -- षटवदन शंखधार
कुछ इधर की पढी कुछ उधर की पढ़ी !
कैसे लगती भला तालियो की झड़ी !
एक श्रोता उठा और कहने लगा !
तुमने जब भी पढ़ी बाप की ही पढ़ी !!
बदायूं :पिछले कुछ समय पहले शहर मे एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमे कई राष्ट्रीय स्तर के कवियो ने काव्य पाठ किया मंच का संचालन एक ओजस्वी कवि ने किया जिसने मंच की कलाकारी चलते हुये उस रचनाकार को सबसे पहले ही बुला लिया जबकि कई बार पहले उसने हमेशा ऐसे मंचो पर अपने आपको बीच मे पढने का निवेदन करते हुये देखा गया है लेकिन कुछ कवि शातिर दिमाग होते है कही शहर का व्यक्ति हिट न हो जाये इसलिए पहली बार मे ही बुला लो और फिर बेइज्जती करा दो !
उधर उस अकवि ने भी ऐसी रचना पढी जिसका जिसका वर्तमान परिस्थिति से दूर दूर तक कोई संबध नही था इतने मे ही एक बुजुर्ग श्रोता पीछे से झल्ला पढे और यह कहते हुये उठ गये कि इसने जब पढी बाप की ही पढी!
इतनी जब शहर के युवा कवि षटवदन शंखधार के कान मे पढी तो यह मुक्तक गढ दिया जिसकी चर्चा बहुत दूर दूर तक है
© षटवदन शंखधार
बदायूँ (उ०प्र०)
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| षटवदन शंखधार |
बुधवार, 2 अक्टूबर 2019
अच्छा था मेरे दर से मुकर जाना तेरा - सलिल सरोज
देखें जिगर उसका, कमाल के रखती है
कोई क़तरा भी जाया न हो आँसुंओं के
वो तो सपने भी देख - भाल के रखती है
क्या माँगा मैंने, उसने क्या क्या दे दिया
हर बात पे कलेजा निकाल के रखती है
जो चाहिए मुझे तो वो खुदा भी ला के दे
अपनी मुट्ठी में आकाश-पाताल रखती है
मैंने देखा ही नहीं उसे जी भर के कभी
खुद ही में मेरे प्यार का गुलाल रखती है
एक आदर्श माता -पिता
बेटियां मेरी बड़ी होनहार.....वीरेन्द्र कौशल
न दिल को जलाना अगर हो सके तो -बलजीत सिंह बेनाम
न दिल को जलाना अगर हो सके तो
निग़ाहें मिलाना अगर हो सके तो
ख़बर को छुपाना अगर हो सके तो
तअल्लुक़ बनाना अगर हो सके तो
उसे आज़माना अगर हो सके तो
न उसको जताना अगर हो सके तो
103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी
हाँसी(हिसार)
मोबाईल:9996266210
मंगलवार, 9 जुलाई 2019
हिंदी और उर्दू
अच्छी सोच बुरी सोच
.. के एक दूसरी बुज़ुर्ग अम्मा जंगल आई है। चलो इन से पूछते हैं के कोन सा मौसम अच्छा है और कोन सा बुरा.. पहले सर्दी गई और उसने पूछा के अम्मा सर्दी का मोसम कैसा है हुस्ना अम्मा ग़ुस्से से बोली सर्दी का भी कोई मोसम है हर वक़्त नज़ला ज़ुकाम और खांसी, कांपते और धूझते रहो.. दांत बजने लग जाते हैं, सलीम के अब्बा को सर्दी में ही हवा (फ़ालिज,पेरालाईसिस) पड़ी थी,चल चल दूर हट। सर्दी नाराज़ होकर वापस चली गई। हुस्ना अम्मा के पास अब गर्मी पहुंची और सलाम कर के पूछा अम्मा गर्मी का मोसम कैसा है..अम्मा बड़बड़ाते हुई बोली गर्मी में तो बस परेशानी ही परेशानी है.. बदन जलने लगता है हर वक़्त पसीना पोंछते रहो,रात को मच्छर सोने भी ना देवें हैं,कभी दूध फट जावे तो कभी सालन ख़राब हो जावे है..नदी तालाब सूख जाने से पानी की क़िल्लत..गर्मी तो अज़ाब होवे है। गर्मी मूंह बनाती हुई वापस चली गई। अब अम्मा के पास बरसात पहुंची और पूछा के अम्मा बरसात का मोसम कैसा है..हुस्ना अम्मा बोली बरसात का मतलब हर तरफ़ कीचड़ कीचड़ है, कभी छत टपक रही है तो कभी घर में पानी घुसा चला आवे..कभी ख़बर आवे है के फ़लां गांव बाड़ में घिर गया तो फ़लां गांव बह गया। पिछली बरसात में ही रसूलपुर में बहुत से लोग बाढ़ में बह गए थे। चल भाग यहां से कमबख़त मारी।
शुक्रवार, 5 जुलाई 2019
गमों को गले से लगाना पड़ेगा
जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा।
चिंता की तपन में जलते रहे हम,
दर्द-ए-हाल दिल का भुलाना पड़ेगा।
तेरे मेरे प्यार के चर्चे पूरे शहर में,
अब मम्मी-पापा को मनाना पड़ेगा।
चाहत की लौं कुछ ऐसी लगी कि,
शान-ए-शोहरत दिखाना पड़ेगा।
तेरे नाम की मैं सुंदर मेंहदी रचाऊँ,
पलकों को झुकाकर शर्माना पड़ेगा।
आईने में देख अपना अक्स निहारुँ,
चेहरे पर हँसी, मुस्कराना पड़ेगा।
बातों-बातों में तुम रुठ जाते कभी,
रुठे दिल को मनाऊँ हँसाना पड़ेगा।
तेरी वफाओं के चर्चे मेरी जुबां पर,
तेरे बिन जी न पाऊँ बताना पड़ेगा।
मेरे लवों पर बस तेरा ही नाम है,
तुम्हें अपने दिल में बसाना पड़ेगा।
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सुमन अग्रवाल "सागरिका"
आगरा (यू.पी.)
स्वरचित
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गुरुवार, 4 जुलाई 2019
ग़ज़ल :- जीवन का सफर यूँ ही कट जाएगा
जिंदगी में हर पल मुस्कराते रहो।
जीवन का सफर यूँ ही कट जाएगा,
स्वर ताल व लय से गुनगुनाते रहो।
कल कहाँ होंगे हमें कुछ नही पता,
सब के दिल में जगह बनाते रहो।
ये जिंदगी क्या खबर कब तक रहे,
मिल जुलकर वक़्त बिताते रहो।
जिंदगी में गम बहुत फिक्र न कर,
ग़मों के पलों को सब भुलाते रहो।
बीते हुए इन लम्हों को याद रखना,
डायरी में यादों को सजाते रहो।
मन में हो लगन कामयाब होंगे जरूर,
निरतंर कदम से कदम बढ़ाते रहो।
सुमन अग्रवाल "सागरिका"
स्वरचित
विशिष्ट पोस्ट
सूचना :- रचनायें आमंत्रित हैं
प्रिय साहित्यकार मित्रों , आप अपनी रचनाएँ हमारे व्हाट्सएप नंबर 9627193400 पर न भेजकर ईमेल- Aksbadauni@gmail.com पर भेजें.































