हिंदी साहित्य वैभव

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रविवार, 16 सितंबर 2018

6:36 am

जो कहते हिन्दी मन की अभिव्यक्ति नहीं कर पाती - आदित्य तोमर

जो कहते हिन्दी मन की अभिव्यक्ति नहीं कर पाती
लंगड़ी है बैसाखी बिन यह शक्ति नहीं भर पाती

हिंदी पर आरोप लगाते हैं मिश्रित भाषा के
झूठे-झूठे दाग थोपते अक्षम परिभाषा के

शब्द व्यञ्जना हिंदी की माँगी उधार की बोलें
हिंदी का सौंदर्य विदेशी भाषाओँ से तोलें

वे निज पगड़ी अंग्रेजी जूतों पर धरने वाले
स्वाभिमान का सुविधाओं से सौदा करने वाले

क्या जाने निज भाषा को सम्मान दिलाना क्या है
क्या जाने निज भाषा हित जीना मर जाना क्या है

आँख खोलकर दुनिया का इतिहास टटोलो, देखो
अंग्रेजों का बल-पौरुष अंग्रेजी बीच परेखो

जिसने जग के इतिहासों, भूगोलों को बदला है
जिसने दुनिया भर के फूलों-शूलों को बदला है

छिन्द्रनवेषी दृष्टि लिए निज भूलों को बदला है
जहाँ तहाँ कितने ही नामाकूलों को बदला है

जग को विवश किया है संस्कृति अंग्रेजी अपना लो
या अन्धकार में मिट जाओ अपना अस्तित्व गँवा लो

ऐसा दुस्साहस जग में भाषा ही कर सकती है
जो प्रतिमानों की प्रति-परिभाषा को गढ़ सकती है

और तनिक देखो चीनी जापानी संस्कृति तोलो
निज भाषा के सम्मानों के परिणामों को खोलो

दोनों ने अपनी तकनीकी का परचम फहराया
कम्प्यूटर निज भाषा में हो सकते हैं दिखलाया

वहां अगर रहना है तो पहले सीखो भाषाएँ
पीछे रखना व्यापारों, विद्याओं की आशाएँ

सिंगापुर, इंडोनिशिया जितना आगे जाओगे
निज भाषा के वैभव के प्रतिमानों को पाओगे

लेकिन एक ओर हिंदी पुत्रों की करुण कहानी
कब तक गाई जानी है यह कब तक और सुनानी

जो परिवादों संवादों का अन्तर नहीं समझते
वादों और विवादों का बहिर्न्तर नहीं समझते

कालांतर क्या समझें जोकि चिरंतर नहीं समझते
जंतर-मन्तर का स्पष्ट  जो तंतर नहीं समझते

वे बलहीन भले हों यह हिन्दी बलहीन नहीं है
यह दाता भाषा है भाषाओँ में दीन नहीं है

भारत की ये भाषाएँ हिंदी की हैं संतानें
कुछ बहनें, कुछ बहनों की बेटियाँ, सभी हैं मानें

बड़े घरों में कपड़े लत्तों में यह चल जाता है
एक-दूसरी अदल-बदल से काम निकल जाता है

जब अपने घर में बंटवारे वाला भाव नहीं है
कोई फूट नहीं मनभेदी कोई ताव नहीं है

तब बाहर वालों को इस एका से पीड़ा होगी
टुकड़े-टुकड़े कर देने की क्रूर क्रीड़ा होगी

अब तक इन्हीं बैर भावों की परिणति होती आई
एक-एक पीढ़ी ने कुत्सित यही नीति दोहराई

हिंदी ने निज मर्यादा पर कितने वार सहे हैं
विद्वत्जन के राजनीति प्रेरित संहार सहे हैं

टूट-टूटकर बिखरी है यह बिखर-बिखर कर निखरी
देवनागरी लिपि में सँवरी हिन्दी की यह नगरी

इसके पग-रज-कण-अणु-अणु से क्षण-क्षण अटे रहेंगे
हम हिन्दी के बिछुए-बिंदी बनकर डटे रहेंगे।।

आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ


रविवार, 9 सितंबर 2018

8:24 pm

सुनो सुनो दुःशासन अब तो, साड़ी बाट रहा। - प्रदीप ध्रुवभोपाली

सुनो सुनो दुःशासन अब तो, साड़ी बाट रहा।
नयी नवेली देख परख के, उनको छाट रहा।

चीरहरण को भूल चला दुर्योधन से तकरार।
सुधर गया पड़ गयी है जबसे सौ कोड़ों की मार।

 धृतराष्ट्र के संग बैठा वो जड़ है काट रहा।
सबकी वो औकात देखकर उनको छाट रहा।

गर्ज पड़े जब जब उसको तो बाप कहे हर बार।
पाव पड़े और कहे कि अबकी कर दो बेड़ा पार।

धृतराष्ट्र किरपा से उसका हरदम ठाट रहा।
माल मसाला जमकर काटे सब को छाट रहा।

बरस पाच फिर मौसम आये सुन लो रे हर बार।
करे चरणस्पर्श कहे लाओ अपनी सरकार।

पलट चला पासा शकुनि का कल तक लाट रहा।
दुर्योधन का नहीं ठिकाना घर न घाट रहा।

★★★★★★★★★★★★
ओजकवि प्रदीप ध्रुवभोपाली,म.प्र
भोपाल,दिनाँक-31/08/2018
मो-09589349070
====================

8:21 pm

आरक्षण से देश सुलग रहा है - अनन्तराम चौबे

आरक्षण से
देश सुलग रहा है ।
देश के भविष्य में
गृह युद्ध दिख रहा है ।
देश में खतरा
विदेशी ताकतो
आतंकवादियो
से भी नही है  ।
आरक्षण की आग
से देश जल रहा है ।
नेताओ द्वारा बांटी
आरक्षण की रेवड़ियाँ
अब भारी पड़ रही है ।
आरक्षण की ये
बैसाखियाँ सबके
गले की फांस
बनकर रह गई हैं ।
नेता बोट बैंक की
राजनीति में फसे है ।
न्यायपालिका ही
कुछ हल निकाले
तभी देश की
समस्या का हल
हो सकता है ।
आरक्षण का कानून
अवैध हो सकता है ।

 अनन्तराम चौबे  * अनन्त *
 जबलपुर म प्र
1697/574
9770499027

8:17 pm

तेल का देखो खेल - राजेश पुरोहित

रोज - रोज तेल के भाव चढ़ रहे।
सियासत में तूफान भी मच रहे।।
विपक्ष के नेता हाहाकार कर रहे।
जनता के प्रदर्शन रोज ही हो रहे।।

आने वाले अब अगले  चुनाव पास है।
तेल जैसे मुद्दे भी बने आज खास है।।
सत्ताधारी व विपक्ष दोनों ही  हैरान है।
जनता का जीतना सबको विश्वास है।।

पेट्रोल डीजल आम जन की जरूरत है।
ये  महँगे तो जन  जीवन अस्त व्यस्त है।।
जनता के सामने किस मुँह जाये नेताजी।
देश की मंहगाई से आम जनता त्रस्त है।।

बढ़ती तेल कीमतों पर नियंत्रण कीजिये।
वरना अगले  चुनाव में हार मान लीजिए।।
जनता से झूंठे वादे अब तो मत  कीजिये।
पढ़ी लिखी जनता को सुविधाएं दीजिए।।

कवि राजेश पुरोहित

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

5:51 am

दिया है जख़्म ऐसा अब कहीं मरहम नही मिलता - नेहा नजाकत

दिया है जख़्म ऐसा अब कहीं मरहम नही मिलता ।
तुम्हारे  साथ  मेरा  कोई  भी तो गम नही मिलता ।।

यूँही  होती  हैं  बरसाते  ये  मौसम  यूँ ही   गुजरेगा ।
मरीज -ए इश्क़ को अकसर यहाँ हमदम नही मिलता ।।

तुम्हारी याद में ही ये समंदर हो गया खाली,
सबब है बस यही इसका कि सहरा नम नहीं मिलता |

मैं जानम जब कभी सोचूँ कि तुझसे राबता कर लूँ,
कभी तबियत नही मिलती, कभी आलम नही मिलता |

ये दुनिया हो गई वहशी दरिंदो से भरी आख़िर,
यहाँ हव्वा तो मिलती है मगर आदम नही मिलता |

- नेहा नज़ाकत

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

4:49 am

रोहिणी जो द्रोहिणी सी मदमाती हुई आई, लाई घेर-घेर चमू सारंग-सुनील के - आदित्य तोमर

जय श्रीकृष्ण

रोहिणी जो द्रोहिणी सी मदमाती हुई आई,
लाई घेर-घेर चमू सारंग-सुनील के.
कंस महलों में भीत था अतीत याद कर,
चूहा जैसे चोंच में दबा हुआ हो चील के.
कारा तोड़ कृष्ण को ले बढ़े वीर वसुदेव,
चढ़ी जलराशि वन, मार्ग, ग्राम लील के.
सोंधी-सोंधी गन्ध लिए हरषाई ब्रजधूल
फूल-फूल उठे पीत-पादप करील के.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ.

(अर्थात - कंस के अत्याचार के विरुद्ध रोहिणी (नक्षत्र) बग़ावती तेवरों के साथ घने काले बादलों की बड़ी सेना लेकर आई। जिनके कारण कंस को अपने महलों में भी अतीत की घटनाओं को याद कर मृत्यु का ऐसा भय होने लगा जैसे कोई चूहा चील की चोंच में दबा हुआ हो। उसी समय कृष्ण के जन्म के बाद उनके पिता वसुदेव उनको लेकर जेल से बाहर निकले और इसके साथ ही यमुना की भयंकर विशाल जलराशि वनों, मार्गों, और ग्रामों को निगलती हुई विकराल रूप में आगे बढ़ी। दूसरी ओर इन भयंकर परिस्थितियों से दूर ब्रज क्षेत्र में वहाँ की धूल कृष्ण के स्वागत में सोंधी-सोंधी महक उठी और निपट कँटीले करील जैसे वृक्ष भी फूलों से लद गए।)
आदित्य तोमर

रविवार, 2 सितंबर 2018

10:38 pm

कली कली से फूल बनता है फूलो से माला बनती है । बिना कली कोई फूल न होता बिना फूल नही माला बनती है

कली कली से फूल बनता है
फूलो से माला बनती है  ।
बिना कली कोई फूल न होता
बिना फूल नही माला बनती है ।
पेड़ पौधो से वाग  खिलते है ।
भंवरे गुन्जन उसमे करते है ।
फूल फूल का रस पीते है ।
भंवरे की गुंजन से वगिया के
फूल भी सहमें रहते है ।
फूलो का रस पान करना
भंवरो की आदत होती है ।
फूल और भवरे की जोडी
कुदरत का करिश्मा है ।
रस पान करे न फूलो का
भंवरा  नही रह सकता है  ।
कली कली का रस पान करे
भंवरा यही तो करता है
कली फूल और भंवरे का
आपस का यह रिश्ता है ।
रस पान करे न फूलो का
भंवरा जीवित नही
 रह सकता है ।

        अनन्तराम चौबे * अनन्त *
         जबलपुर म प्र
          1681/569
         9770499027

10:33 pm

पुस्तक समीक्षा :- खोजना होगा अमृत कलश (काव्य संग्रह)

पुस्तक समीक्षा
कृति :- खोजना होगा अमृत कलश (काव्य संग्रह)
कवि :- राजकुमार जैन "राजन"
पृष्ठ:- 120
मूल्य:- 240/-
प्रथम संस्करण:- 2018
प्रकाशक:- अयन प्रकाशन,1/20,महरौली, नई दिल्ली 110030
समीक्षक:- राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"
 कवि,साहित्यकार
    बाल साहित्यकार राजकुमार जैन "राजन "की कृति 'खोजना  होगा अमृत कलश" में कुल 50 कविताएँ हैं। अब तक कवि राजन की बाल साहित्य की 36 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। यह कृति उन्होंने अपने पिता श्री अम्बालाल जी हिंगड़ व माता श्रीमती इन्द्रा देवी हिंगड़ जी को समर्पित की है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी राजन जी आकोला जैसे गाँव से काव्य यात्रा प्रारम्भ करने वाले कवि एवम बाल साहित्यकार हैं। ये अंतराष्ट्रीय मंचों से सम्मानित है। प्रस्तुत कृति की भूमिका में पूर्व अध्यक्ष राजस्थान साहित्य अकादमी के वेदव्यास जी लिखते हैं कि राजन जी जैसे युवा कवि जैसी और समाज के प्रति ऐसी दीवानगी व बेचैनी आज बहुत कम दिखाई देती है। राजन जी संपादक ,प्रबंधक होने के साथ साथ राजस्थानी भाषा के एक अच्छे रचनाकार भी है।सुपरिचित साहित्यकार घनश्याम मैथिल अमृत ने इनकी रचनाओं के प्रति उपज अमूल्य अभिव्यक्ति दी है।
  इस कृति की प्रथम रचना लाखों संकल्प में कवि ने महाभारत के पात्रों को प्रतीक बनाते हुए कविता का सुन्दर सृजन किया है। मन का युद्ध का चित्रण देखते ही बनता है। वैचारिक शैली में है यह कविता जिसमें दुर्बल मन ही द्रोणाचार्य है। क्षुब्ध ह्रदय ही हस्तिनापुर है। शरशय्या पर पड़ा विवेक ही भीष्म है। मनुष्य की कल्पना ही अभिमन्यु है। कवि की अगली कविता "बन जायेगा इतिहास "में अर्वाचीन काल में बढ़ती दानवता पूर्ण घटनाओं पर पैनी कलम चलाई है। राजन की भावपूर्ण कविता व्यक्ति को सोचने के लिए विवश करती है। उनकी पंक्तियां देखिए-"दानवता के बीज बो मुस्कुरा रहा आदमी 
        ज़िंदगी का गीत कविता में लूट,हत्या, बलात्कार ,स्वार्थपरता ,भाईचारे की कमी, आज की मेहमाननवाजी का सजीव चित्रण किया है। अंतहीन अनुसंधान रचना में राजन लिखते है- जिंदगी एक अनुसंधान, अनवरत अंतहीन यात्रा, अंधकार के बीज में परम्परा ,संस्कृति ,संस्कार का समाज में धीरे धीरे समाप्त हो रहे विषयों पर लिखते हुए, वे कहते है अंधकार के बीज मत बोओ।
       तुम कौन हो ,हाथ में वसंत, नियति, हारा भी नही हूँ मैं, हाशिएं पर वह, अस्तित्व बोध, आशा की लो जलती रहेगी जैसी कविताएँ भी इस काव्य संकलन में कवि की आशावादी सोच को दर्शाती है। स्मृतिओं के पांव में कवि लिखता है मरु भूमि में भी खिलेगा अब आशा और विश्वास का गुलाब। व्यक्ति यदि ज़िंदगी में श्रम करे तो निश्चित रूप से रेगिस्तान भी हरा भरा हो सकता है। 
         अँधेरे के ख़िलाफ़ कविता में जुगनुओं के माध्यम से अज्ञान रूपी तिमिर के खिलाफ लड़ने की सीख देती हैं।'सभ्यता के सफर ' कविता में कवि ने गिरगिट की तरह आदमी को रंग बदलते हुए समाज में देखा है। वे लिखते है 'हर इंसान के चेहरे पर,एक नकली चेहरा है।
          खोजना होगा अमृत कलश इस संग्रह की शीर्षक कविता है इसमें कवि सत्यम शिवम सुंदरम का प्रकाश देश के हर व्यक्ति में देखना चाहता है। भारत की धरती पर सद्भाव व भाईचारे की भावना को संजोए वे लिखते है "खोजना होगा उस अमृत कलश को,भर दे धरा पर जो प्यार की ख़ुशबू"। सद्भाव के दीपक जलाएं,सत्यम शिवम सुंदरम का प्रकाश।
          राजन की कविताओं में आम बोल चाल की भाषा का प्रयोग किया गया है। कविता का उद्देश्य प्रत्येक रचना में स्पष्ट दिखाई देता है। इनकी कविताओं में सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषय के साथ साथ संस्कार, संस्कृति,आर्थिक,सामाजिक गतिविधियों एवं सियासत के गलियारों में अंतर्द्वंद्व पर लिखने का अलग ही कार्य किया है। कवि इस कृति के माध्यम से समाज में जीवन मूल्यों की स्थापना करना एवं संवेदनशीलता के साथ सामाजिक विसंगतियों के प्रति चिंता जाहिर करता है। राजन ने अपनी छन्दमुक्त रचनाओं में आम आदमी की बात आम भाषा में ही लिखी है।
        "पीड़ा के दुर्गमपथ "कविता में रिश्तों में पड़ रही दरारों का सच लिखा है। बोन्साई पेड़ों की तरह छोटे हो गए रिश्ते। "खण्ड खण्ड अस्तित्व" कविता में कवि कहता है- लक्ष्य की पगडंडियाँ स्वयं ही मंज़िल छूने लगी। सफल होने के लिए एक लक्ष्य रखकर आगे बढे तो निश्चित रूप से मंज़िल मिलती है। इसी प्रकार इस काव्य संग्रह की अन्य कविताएँ अर्थ युग का चमत्कार, हथेली पर सूरज उगाओ,अंधेरे के खिलाफ़, सूखे फूलों की गंध,बेरोजगार,अर्थ खोते रिश्ते,व्यामोह,जिजीविषा, बचपन की बरसातआ आदि कविताएँ भी प्रेरणास्पद लगी। इन कविताओं से जीवन में नई ऊर्जा,उमंग का संचार होता है। इस कृति की अंतिम कविता "जीवन का चक्रव्यूह" है,इसमें कवि कहता है- 'हर ख़्वाब सूरज बन चमकेगा एक दिन।' यथार्थतः व्यक्ति संकल्प के साथ शिखर पर पहुंच सकता है। 
 इस कृति के  मराठी,पंजाबी,नेपाली,गुजराती भाषा मे अनुदित संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। शीघ्र ही असमिया,राजस्थानी,अंग्रेजी भाषा में भी  इसके संस्करण प्रकाशित होंगें।
             मेरी और से युवा कवि राजकुमार राजन जी को बहुत बहुत बधाई, हार्दिक शुभकामनाएं, साहित्य जगत में यह कृति अपना स्थान बनाएं। खोजना होगा अमृत कलश सामाजिक समस्याओं के समाधान का गुलदस्ता है।

98,पुरोहित कुटी 
श्री राम कॉलोनी
भवानीमंडी

10:22 pm

सुन कान्हा , तू फिर से आना बुलाये संसार रे , कर दे तू , हमारा बेड़ापार रे ....

सुन कान्हा , तू फिर से आना
बुलाये  संसार रे ,
कर दे तू , हमारा  बेड़ापार रे ....

माँ धरती कहती है , कान्हा आजा
हो रहा , अत्याचार रे 
तू आजा और , करजा बेड़ा पार रे ...
सुन कान्हा..........

लड़किया कहती है , कान्हा आजा 
हो रहे  , बलात्कार रे , 
तू आके दिखलाजा चमत्कार रे ।।
सुन कान्हा .........

जनता कहती है , कान्हा आजा
हो रहे , अत्याचार रे 
तू आके दिलाजा इंसाफ रे
सुन कान्हा........

माई बाप कहते है कान्हा आजा
हो रहे हम , लाचार रे
तू आके समझा दे हमारा प्यार रे
सुन कान्हा...........

गरीब कहता है कान्हा आजा
हो रहे  , बेरोजगार रे
तू आके दिलाजा रोजगार  रे
सुन कान्हा ...........

नारी कहती है कान्हा आजा
करो ना , अब विचार रे
तू आके दिलाजा राधासा प्यार रे
सुन कान्हा.............

"जसवंत" कहता है कान्हा आजा
करता  सुदामा , जैसी आस रे
तू आके बना दे मुझे  यार रे
सुन कान्हा ................


जसवंत लाल खटीक
💐रतना का गुड़ा ,देवगढ़

10:05 pm

गाय बचाओ,गाय पालो !! गाय विश्व कि गौ माता है इसका तुम सब ध्यान धरो!

🐄गावो विश्वस्य मातर:
      🐂गाय विश्व कि माता है🐂
    ***********************
  !! गाय बचाओ,गाय पालो !!
-------------------------------------
गाय विश्व कि गौ माता है
इसका तुम सब ध्यान धरो!
हिन्दु आस्थाँ ईससे जुडि है
सुनलो तुम गौ हत्यारो!!

यह ऊपयोगि एक पशु है
वैग्यानिक,आध्यात्मिक भी!
दुध है ईसका,अमृत माना
रोगियो और बच्चो को भी!!

करोडो हिन्दु ईसको पुजते
श्रध्दा से रोटी खिलाते है!
जब भी रोते छोटे बच्चे
गाय का दुध ही पिलाते है!!

गाय हमारि सिधी-साधी
सब-कुछ हमको देति है!
बदले मे बस चारा खाति
कुछ और ना पाति है!!

हिन्दुओ के त्योहारे मे
गोबर से हि लिपते है!
हिन्दु संस्कृति मे लिपना
बडा ही पावन मानते है!!

गोबर से ही खांद बने जो
फसल के काम मे आता है!
स्वस्थ,स्वादिष्ट फसल ऊगाने
ऊपयुक्त माना जाता है!!

गाय के एक चम्मच ही घि से
एक टन आँक्सिजन बनता है!
ईसिलिये होम,यग्य,हवन मे
गाय का घि-ही चलता है!!

दुध,दही,पनिर और मख्खन
सब गाय से ही मिलते है!
जिस के बलपर कई परिवार के
आज भी जिवन चलते है!!

गौ-मुत्र भी एक कारगर
आज औषधि हो गई है!
अच्छि पँकिंग,और दामो मे
मेडिकल मे बिक रही है!!

गाय खुर से,ऊडि धुलिको
जो सिर धारण करता है!
चारो धाम के तिर्थो से वह
पावन स्नान को करता है!!

पिछले खुरो के दर्शन का
भी एक बडा ही महत्व है!
अकाल मृत्यू से बच जाए वो
यह एक अटल ही सत्य है!!

करे गाय कि परिक्रमा जो
हर बडे लाभ को पाता है!
जो भी प्रतिदिन करे परिक्रमा
समझो वह  पुण्यात्मा है!!

हर-घर मे एक गाय को पालो
हर घर पावन हो जाएगा!
गौ-सेवा का पुण्य कमा वह
मरने पर मोक्ष को पाएगा!!
--------------------------------------
     !! गौ-माता कि जय !!
---------------------------------------
 हास्य,व्यंग,ओज,पँरोडि कवि
 एवं गितकार-धनंजय सिते(राही)
    Mob-9893415829
----------------------------------------

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

4:07 am

बरसा की बूंदों ने तन को भिगोया । व्याकुल इस मन को थोड़ा गुदगुदाया । तन जब है भीगा मन भी हर्षाया । - अनन्तराम चौबे

बरसा की बूंदों ने
तन को भिगोया ।
व्याकुल इस मन को
थोड़ा गुदगुदाया ।
तन जब है भीगा
मन भी हर्षाया ।
बरसा का मौसम
सभी को है भाया ।
नदियाँ और झरने
कल कल करते ।
मस्ती में अपनी
मंजिल पर जाते ।
ताल और तलैया
नही है अब प्यासे
पोखर और कुऐ
भी नही है उदासे ।
बारिश ने सबकी
प्यास है बुझा दी ।
लबालब खेतो में
भर गया  है पानी
चारो तरफ है
हरियाली और पानी ।
बसुन्धरा खुश है
पेड़ पौधे,भी खुश है ।
सावन के महीने में
हर कोई खुश है ।
गोरी का तन भी
पानी से भीगा है ।
पहनी जो तन पर
चोली भी भीगी है ।
गीली ये चोली
तन से चिपक जाये ।
पिया बिन मन को
बहुत ही सताये ।
पपीहा सा प्यासा
मन तड़फता है  ।
स्वाति नक्षत्र के
पानी का वो प्यासा है ।
गोरी का मन भी
पिया बिन प्यासा है ।
बरसा की बूंदों ने
तन तो भिगोया है
मन तो अभी भी
उसका प्यासा है ।
व्याकुल मन गोरी का
पिया को मुरझाया है ।
बरसा की बूंदों ने
उसको तड़फाया है ।
चंचल मन करता ठिठोरी
मन ही मन सोचकर
पपीहे सी,ब्याकुल है गोरी ।

    अनन्तराम चौबे
       * अनन्त *
    जबलपुर म प्र
    1668/562
   9770499027

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

7:59 pm

हे आर्य भूमि भारत वसुन्धरा कोटि नमन तुमको - प्रदीप ध्रुवभोपाली

हे आर्य भूमि भारत वसुन्धरा कोटि नमन तुमको।

जहाँ उपजते रणबाँकुरे न्याय मिले सबको।

तपोभूमि ऋषियो की भारत जाने सकल भुवन,

जहाँ उपजते माणिक हीरा स्वर्ण मिले हमको।

यवन अनेक यहाँ आये नहिं हिला सके तृण को।

विजय मिले इस हेतु बनाया मीत भी छल बल को।

क्षमा दया का दान दिया पर भूल हुई हम से,

छुरा घोप कर पीठ सताया सब में निर्बल को.।

रौद्र रूप है बता दिया हमने सारे जग को।

परशुराम के अवतारी हम ज्ञात हुआ सबको।

मचा युद्ध तांडव जब भी आश्चर्य हुआ नभ को।

धर्म कार्य रक्षार्थ जन्म लेना है पड़ा रब को।









★★★★★★★★★★
ओजकवि प्रदीप ध्रुवभोपाली म.प्र.
भोपाल, दिनाँक.20/08/2018
मो.-09589349070
★★★★★★★★★★

सोमवार, 20 अगस्त 2018

4:59 pm

सैनिक सीना तान चला !! देखो-देखो अब सिमा पर! सैनिक सीना तान चला!! - धनंजय सिते


    !! सैनिक सीना तान चला !!
देखो-देखो अब सिमा पर!
सैनिक सीना तान चला!!
१)माँ कि ममता,आशिश पिता का
         भाई का,अभिमान चला!
                       देखो,देखो.....
२)चिंता रख परिवार कि दिलमे
      अश्क लेकर आखो मे चला!
                      देखो,देखो......
३)माँ भारती को रख दिल मे ले
       तिरंगे का सम्मान चला!
                देखो,देखो..........
४)ओंझल तक परिवार को देखा
        फिरभी हिम्मत बांध चला!
                    देखो देखो.........
५)वह जागता रहता है सिमा पर
    जब गहरि निंद का जोर चला!
                    देखो देखो ........
६)बनकर सरहद पर दश्मन का
       देखो कैसे काल चला!
                 देखो देखो...........
७)दुश्मन को है मार गिराना
     लक्ष जिगर मे पाल चला!
              देखो देखो..........
८)प्यार बहन कि राखी का ले
        पत्नी का श्रृंगार चला!
                 देखो देखो.........
९)मातृभुमी के रक्षा कि जीद
      लेकर जन-मन गान चला!
                देखो देखो...........
१०)देशभक्ती का जुनून है,सोचे
        लु दुश्मन कि जान चला!
                 देखो देखो..........
११)झेल मुसिबत को सरहद पर
       चाहे लडते दे दु जाँन चला!
                    देखो देखो.........
१२)बनकर हिंन्दुस्थानियो कि
          देखो कैसे ढाल चला!
                     देखो देखो......
१३)मातृभूमी को कर दु जिवन
          सोच के ये कुर्बान चला!
                  देखो देखो...........
----------------------------------------

हास्य,व्यंग,ओज,पँरोडि कवि
एवं गितकार-धनंजय सिते(राही)
लोधीखेडा,तह-सौसर जिला-छिंदवाडा(म.प्र.)
Mob-9893415829

रविवार, 19 अगस्त 2018

9:32 pm

कुछ ख्वाहिशें थी मेरी , जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी । - जसवंत लाल

कुछ ख्वाहिशें थी मेरी , 
जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।
कुछ अरमानों की झोपड़िया , 
मजबूरियों से ढ़ह गयी ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।।।

बचपन में देखे थे मैने , 
बड़े-बड़े और प्यारे सपने ।
लेकिन जवानी में आते-आते ,
सपनों की दुनिया बह गयी ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।।।

कोशिस बहुत की थी मैने ,
बड़ा अफसर बन जाने की ।
वक्त के आगे एक ना चली ,
बस घर की जिम्मेदारी रह गयी ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।।।

सपने में गड़गड़ाहट हुई ,
उम्मीदों की बिजलियां भी चमकी ।
लेकिन किस्मत की बारिश से जमीन ,
अंदर से सुखी रह गयी  ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।।।

कभी थी मरने की ख्वाहिश ,
कभी होती जीने की इच्छा ।
इस जिंदगी की कशमकश में ,
नैया , डूबती-डूबती रह गयी ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।।।

वो दिन भी देखे थे मैंने , 
जब यमराज मेरे पास से गुजरे ।
शायद कुछ उपकार किये थे हमने ,
तभी फिर से , ये जिंदगी रह गयी ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।।।

छोटी सी उम्र है लेकिन ,
छाछ , फूँक-फूँक कर पीता हूँ ।
तजुर्बों से आया  फ़न लेकिन ,
ख्वाहिश , अधूरी रह गयी ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।।।

सूट-बूट और पीए-सीए ,
सरकारी गाड़ी की ख्वाहिश ।
लेकिन किस्मत का खेल निराला ,
कलम हाथ में रह गयी ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।।।

थाम ले , "जसवंत" तू कलम ,
और निरन्तर लिखता जा ।
देख फिर सुहाने सपने  ,
ये कलम मुझसे कह रही ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।।।
                    जसवंत लाल खटीक
                   
                    रतना का गुड़ा ,देवगढ़


6:47 pm

ग़ज़ल - उम्रे रवाँ कटी है बड़ी बेवसी के साथ - कौसर गौसपुरी

उम्रे रवाँ कटी है बड़ी बेवसी के साथ ।
अच्छा नहीं हुआ है मेरी ज़िंदगी के साथ ।

हम पर जहाँ ने ज़ुल्मों सितम किस लिए किए
,
हमने बुरा किया भी नहीं है किसी के साथ।

मुद्दत के बाद खुशियों के लम्हात गर कभी,
मिलते भी हैं तो हमसे बड़ी बेरुखी केसाथ।

लगता है अपनापन सा बयाबाँ को देखकर,
कुछ ऐसा खास रिश्ता है आवारगी के साथ।

शर्माएँ क्यों न देख उन्हें चांद सितारे,
आए हैं सरे बाम वो बेपर्दगी के साथ ।

" कौसर "मैं परीशान हूं बस इतना सोंच कर,
 कैसे कटेगी उम्र किसी अजनबी के साथ।
कौसर गौसपुरी


             
6:40 pm

तिरंगे की कसम खा के यही ऐलान करता हूँ - प्रदीप ध्रुवभोपाली

तिरंगे की कसम खा के यही ऐलान करता हूँ ।
सिपाही मैं वतन का हूँ वतन पे आज मरता हूँ ।।
मेरे वीरो चले आओ पुकारे भारती माँ जब
मिटा दें पल में दुश्मन को रगों में जोश भरता हूँ ।।

★★★★★★★★★★★★
ओजकवि प्रदीप ध्रुवभोपाली.म.प्र
भोपाल, दिनाँक.14/08/2018
मो.09893677052
★★★★★★★★★★★★
6:29 pm

नहीं पूछो किसी से आज उन्हें किस किस ने खोया है - राजेश शर्मा

नहीं पूछो किसी से आज उन्हें किस किस ने खोया है ।
समर्पित है नमन उनको जिन्हें यह देश रोया है ।।
रहा किरदार तो यारो यहाँ अवतार जैसा था,
कि पूरे राष्ट्र को जिसने एक धागे में पिरोया है ।।

श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी को हार्दिक नमन!
राजेश शर्मा 









8:27 am

अटल अटल थे अभी अटल है । कल तक जो इस पृथ्वी पर थे । वही अटल आज व्रह्मविलीन हो गये । धरा पर जिसका नाम अटल था । आकाश में जाकर अटल हो गया है । - अनन्तराम चौबे "अनन्त"

अटल अटल थे
अभी अटल है ।
कल तक जो
इस पृथ्वी पर थे ।
वही अटल आज
व्रह्मविलीन हो गये ।
धरा पर जिसका
नाम अटल था ।
आकाश में जाकर
अटल हो गया है ।
तारो के संग हिल
मिल गया है ।
आज सभी के
दिलो में बसा है ।
खोने का तो
गम बहुत है ।
होनी को जो
करना था ।
अपने समय पर
वही हुआ है ।
अटल सत्य
यही है यारो ।
जीवन मृत्यु
अटल सत्य है ।
जीवन जिसको
यहाँ मिला है ।
मृत्यु उसकी
अटल सत्य है ।
यही सत्य है
यही सत्य है ।
जीवन का भी
यही सत्य है ।

अनन्तराम चौबे  अनन्त

जबलपुर म प्र
                                 1658/559
                              9770499027
7:25 am

देश अपना प्यारा, मिलकर हम इसे सजायेंगे। आओ झूमें गायें, गुण हम इसके सब गायेंगे - भुवन बिष्ट

देश अपना प्यारा, 
             मिलकर हम इसे सजायेंगे। 
आओ झूमें गायें, 
               गुण हम इसके सब गायें ।। 

आजादी की अलख जगी, 
               वीरों ने प्राण गवाये थे। 
रक्षा भारत भूमि की, 
               जो लौट के घर न आये थे।। 
बँधे एकता सूत्र में हम, 
                झलक यह दिखलायेंगे। 
देश अपना प्यारा, 
                 मिलकर हम इसे सजायेंगे। ........
शीश हिमालय मुकुट बना, 
                 सागर भी पाँव पखारे है। 
जो भारत से है टकराया, 
                 हम जीते वह हारे हैं।। 
भारत माँ की आन बान, 
                हमको प्राणों से प्यारे हैं। 
हर भारतवासी देखो अब, 
                इसको आज सवारे है।। 
भारत माँ की चरण धूलि से, 
                आओ तिलक लगायेंगे। 
देश अपना प्यारा, 
                  मिलकर हम इसे सजायेंगे। ........
सारे जग में देश अपना, 
                   भारत सबसे प्यारा है। 
हर जन जन इसको देखो, 
                    अपने हाथ सवाँरा है।। 
तोड़ न पायेगा कोई भी, 
                      एकता की जंजीरों को। 
नमन करें हम सदा सदा ही, 
                     देश के अपने वीरों को।। 
मिलकर आओ बगिया के हम, 
                      बनें पुष्प महकायेंगे। 
देश अपना प्यारा, 
                      मिलकर हम इसे सजायेंगे। ......


                      ............भुवन बिष्ट
                               (रानीखेत)उत्तराखण्ड 


3:12 am

ग़ज़ल- उमर घटती नही यूँ तो किसी के काम आने से - नेहा नजाकत

उमर घटती नही यूँ तो किसी के काम आने से,
मगर रब रूठ जाता है किसी का दिल दुखाने से ।

तुम्हें आना नही है जब हमे भी भूल जाना है,
सदा देने से क्या हासिल मिले क्या घर सजाने से |

चलो माना तड़प होगी गिला होगा सबब होगा,
कोई रिश्ता तो हो लेकिन तुम्हारा इस दिवाने से |

गिला इसका नहीं मुझको भुलाया किस लिए तुमने,
मगर ये तो बता दो  क्या मिला मुझको रूलाने से |

मनाना मत सनम को यूँ जरा सा रूठ जाने दो,
गवा दोगे सुकूं अपना किसी को सर चढाने से |

- नेहा नज़ाकत

2:40 am

सारे सपनों को छोड़ रहा हूँ , लो मैं बैशाखी तोड़ रहा हूँ - अंकित विशेष

सारे सपनों को छोड़ रहा हूँ ,
लो मैं बैशाखी तोड़ रहा हूँ  ,
हाथों में हाथ नही देना तुम ,
अब मेरा साथ नही देना तुम ,
मत देना कुछ दान नही करना ,
अब कोई अहसान नही करना ,
तुम कहते अनचाहा किस्सा हूँ ,
पर मैं भी तो घर का हिस्सा हूँ ,
कोना बेकार नही कहना तुम ।
मुझको लाचार नही कहना तुम ॥

मुझे कटे पंखों से उड़ना है ,
इस सारी दुनिया से जुडना है ,
मुझको भी मंजिल तक जाना है ,
अपनी हर चाहत को पाना है ,
अब हालातों से घबराऊँ क्यूँ
मैं याचक बन कर फैलाऊँ क्यूँ ,
मैं जैसा भी हूँ शरमाऊँ क्यूँ
इस जीवन को व्यर्थ गवाऊँ क्यूँ ,
जीवन धिक्कार नही कहना तुम ।
मुझको लाचार नही कहना तुम ॥

पथ मुश्किल मेरा आसान नही ,
गर डर जाये फिर इंसान नही ,
माना इन पैरों में जान नही ,
ऐसा नही है समाधान नही ,
ये निश्चय मेरा अब चलना है ,
कभी गिरना और सम्भलना है ,
हो मुमकिन अह़सास बचा लेना ,
थोडा़ तो विश्वास बचा लेना ,
बिन परखे हार नही कहना तुम ।
मुझको लाचार नही कहना तुम ॥

-:- अंकित विशेष

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

11:40 pm

तुलसी मानस प्रीत से,हृदय करे झंकार, राम सिया की भूमि पर,भाव करें शृंगार - डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

तुलसी मानस प्रीत से,हृदय करे झंकार ।
राम सिया की भूमि पर,भाव करें शृंगार ।।
मिथ्या जग की साधना,पढ़ें न मानस वेद,
धन्य हो गये छंद भी,मानस में साकार ।।

जाने अनजाने हमें,हो जाये अभिमान ।।
रोम रोम जब गा उठे, हिंदी हिंदुस्तान ।।
अनदेखे अहसास से,जब हो गर्वित भाल,
सच्चा प्रेमी  देश का,हृदय तिरंगा मान ।           
       
  डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

7:17 pm

जब तक दुनिया का पटल रहेगा, यशनाम अटल का अटल रहेगा - दिलीप कुमार पाठक

जनचेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति ~226 की ओर से भारतवर्ष की जनता के चहेते,पूर्वप्रधानमंत्री, भारतरत्न,कुशलवक्ता,ओजस्वी कविश्रेष्ठ, परमादरणीय अटलविहारी बाजपेई जी को भावभीनी विनम्र श्रद्धांजलि 🇮🇳🙏🏻🇮🇳🏆

ममता समता की नमिता में,
देखा है कर्मों की सविता में|
गाते राजनीति के गलियारे,
ओ युगपुरोधा! सखा हमारे|
तुमसे वह ओजस्वी कविता,
ज्यूँ फैली लाली हो सविता|
जीवन जीवट संघर्ष लिखा,
उत्कर्ष हर्ष नववर्ष लिखा|
प्रतिदर्श लिखा संदर्श लिखा,
अर्श फर्श का आदर्श लिखा|
कविता के अटल पटल को,
मेरा शत शत नमन अटल को||


दिलीप कुमार पाठक "सरस"
        संस्थापक
जनचेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति ~226

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

1:55 am

अपना कोई जा रहा लौट के नही आने वाले सफर से.......

मेरे प्रिय राजनीतिज्ञों में एक, अटल जी, कुशल रणनीतिकार, कवि, एक बेहद प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व...
जीवन मृत्यु के बीच हैं,...अभी नाज़ुक स्थिति में...

अटल जी की स्थिति बहुत गंभीर बनी हुई है। जीवन रक्षक प्रणाली पर है हम ईश्वर से प्रार्थना करते है कि वे सामान्य स्थिति में आयें  

आप यूँ तो छोड़ कर ऐसे हम - सबको जा नही सकते ।
अब उठ़ो भी हे जनप्रिय ये कैसी आपकी खामोशी है ।।

© विकास भारद्वाज सुदीप 

      उठो अटल अभी लड़ना है, ये देश सारा पुकार रहा ।
      योद्धा  हो  तुम  कुरुक्षेत्र के, काल से कैसे हार रहा ।।

                        © शीतल वोपचे 

      हे !   कवि  कुलश्रेष्ठ   उठो   यूँ   हार  न  मानो तुम,
      मौत तुम्हें हरा नहीं सकती, इस बात को मानो तुम ।।

                      © कुमार सागर 


दिये जैसा समर्पण हो वही नेता कहाता है|
सुहाने बोल से अपने विरोधी को झुकाता है|
अटल जी प्रेरणा बनकर जिएँगें कोटि बरसों तक|
वतन हित भाव का अच्छा सही सब को सुहाता है|

          © डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'

अटल जो रहा है,अटल सा रहेगा
फंसे बीच कीचड़ कमल सा रहेगा 

बुझा न सकेगी तुझे कोई आंधी
सदा तेरा दीपक ये जल ता रहेगा ।।

© स्वराक्षी स्वरा 


काश! तू हँसते हुए हाथ  उठाये ।
यूँ नाम अटल सार्थक हो जाये ।।

अटल नाम था अजब काम था ।

खामोशी से तुने सबको बताया ।।

© साधना कृष्णा 


बिजलियो कौधना आज बिलकुल नही ।

आँसमाँ   के   सितारे   बचाना   तुम्हे ।।

© बृजमोहन साथी 


जिंदगी जंग ही में काटी है।
अटल है जंग मेरी साथी है।।

© कौशल कुमार पाण्डेय 

सदा  सलामत की दुआ,  करूँ हाथ मैं जोड़ |
अटल रत्न तुम एक हो, कभी न जाना छोड़ ||

© दिलीप कुमार पाठक 

🇮🇳🇮🇳


उम्मीद न थी,जो हो गया वो भी देखना पड़ेगा,
एक  शाश्वत  प्राण को पाखंड सहना पड़ेगा,
इस  राजनीति  की  नीति  भी देखिए जनाब,
अटल महाप्रयाण को आधिकारिक पुष्ट होना पड़ेगा


© खुशीराम बाजपेई


कुटिल  विषैले  अट्टहास  से,
    काल  सदा  विजयी  बनकर।
दे जाता  अमिट घाव मन को,
    आज  काल  कल  में सनकर।।


    © शुभा शुक्ला मिश्रा 'अधर'


दीप सदा जलता रहे,    
                  होत सदा गुणगान। 
नमन सारा जगत करे ,
                   जय अटल जी महान ।।

अमर हो गए प्रिय कविवर, 
                    सुंदर वक्ता महान।
श्रद्धांजलि अटल जी को,  
                    हर मन में पाये स्थान।।
                   
           ©भुवन बिष्ट


तोड़ गए बन्धन सभी, हृदय गए वो चीर ।
जन -जन के नेता बने, अटल बनी तस्वीर।।


                            ©मुकेश शर्मा "ओम"


वो अटल अमर हो गए।
वो आज थे कल हो गए।
विखेर कर यादें  अपनी,
 वो आँखों में नम हो गए।

©विवेक दुबे "निश्चल"



 ताज़ा प्रेस रिलीज

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

8:16 pm

तिरंगा --- चन्द्रशेखर ,भगत सिंह की तिरंगा विश्व में पहचान है तिरंगा छोड़, मैं जाऊँ कहाँ तिरंगा मेरी जान है।। - मोहन राना "अभय"

चन्द्रशेखर ,भगत  सिंह की 
तिरंगा  विश्व  में  पहचान है
तिरंगा छोड़, मैं  जाऊँ कहाँ
तिरंगा    मेरी     जान     है।

                     हिन्दुस्तान तिरंगा की  इबादत
                      यहाँ    फिदा    आसमान   है
                      फिदाई  ने जब  फिदा   किया
                      आह  निकली  क्या  महान है।

कलाम हिन्दुत्व के अजीज है
सपनों  में   उडा़ई ,  उडा़न  है
किशोर अवस्था  सोचा ख्वाब
कलाम     एक     जबान     है।

                       फिगार  ने  हमको फै़ज  किया
                       इसका     हमें     अभिमान   है
                       द्रोही का धड़ अन्जाम दिया था
                       उसका     क्या     खानदान   है।

गाँधी, लाला और   नेहरू  की
विश्व     में        पहचान     है
तिरंगा   छोड़ , मैं  जाऊँ  कहाँ
तिरंगा       मेरी      जान     है।

                © आर्य मोहन राना "अभय"
                                  मथुरा
                           9458468826

12:15 am

माँ प्यारी, माँ कितनी प्यारी, माँ जग की तू है उजियारी - मोहन राना

माँ प्यारी, माँ कितनी प्यारी
माँ जग की तू है  उजियारी
                    माँ बचपन का झूला पलना
                    माँ नदियाँ और मीठा झरना।

माँ आशीष  हो, जैसे बातेंं
माँ बिन नही कटती है रातें
                    माँ  मोहन  ममता  की  धारा
                    जैसे   माँ  हो   गंग   किनारा।

माँ बिहबल नित ओझल होती
आँखें  पकड़  पकड़ माँ  रोती
                   दादी  की   माँ   पहली  पोती
                   माँ  की   गोदी   स्वर्ग  पिरोती।

माँ प्यारी,  माँ  कितनी  प्यारी
माँ   जग   की   है   अपसारी
                    माँ   मेरी   है    भोरी  - भारी
                    सबसे   सुन्दर  प्यारी - प्यारी।
माँ प्यारी, माँ  कितनी  प्यारी।।


     ©आर्य मोहन राना "अभय"
                 मथुरा
           9458468826

सोमवार, 13 अगस्त 2018

3:44 am

ग़ज़ल - आज भी क़ायम हमारे देश में है राजशाही - टिल्लन वर्मा

आज भी  क़ायम  हमारे  देश  में है  राजशाही
हर नगर,हर गाँव में मिल जाएंगे ज़िल्लेइलाही

जितने ख़ालाज़ाद थे पल में इकट्ठे हो गए सब
जब यकीं होने लगा छिन जाएगी अब बादशाही

हड्डियाँ भी जिन बुज़ुर्गों की भजन करने लगी हैं
वो  सियासतदां अभी  तक चाहते  हैं  वाहवाही

अस्पतालों में  पड़े  रोगी  मुसलसल चीख़ते हैं
मर  गईं  संवेदनाएं  हो  रही  खुलकर  उगाही

जांच भ्रष्टाचार की जब चाहें तब कर लीजियेगा
सिद्ध कर सकते  नहीं ये भ्रष्ट अपनी  बेगुनाही

हाथ में  हथियार  भी हैं और  पत्थर  खा रहे हैं
हैं विवश कितने हमारे देश के "टिल्लन" सिपाही

ख़ालाज़ाद = मौसेरे भाई
टिल्लन वर्मा  (स्रोत: फेसबुक)
                              उझानी (बदायूँ)


शनिवार, 11 अगस्त 2018

10:01 pm

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह से अकरम खान की कुछ ग़ज़लें

 ग़ज़ल 1
122  122   122   122

मुहब्बत  भी  करके मुहब्बत न जानी ।
मुहब्बत में निकली वो कितनी सयानी ।।

दिवाना बनाया हैं उसने भी मुझको ।
दिवाना  बनाया  न  बनती  दिवानी ।।

मेरे दिल के जख्मों को देखे तो कोई,
ज़फा ही ज़फा है उसी की निशानी।

वो लैला नहीं थी तो मजनूँ बनू क्यों,
समझ ही न पाया ये दिल भी कहानी।

हैं दिल में भी नफरत के शोले सुलगते,
है दुनियां के दिल में भी उल्फत जगानी।

जरूरी  नहीं  के  जवानी  में  ही  हो,
है बचपन बुढापा भी इसकी रबानी ।।

न समझा जो इसको तो मिट ही गया वो,
बिना इसके सबको पडी़ मात खानी।

अज़ब हैं रिवायत जमाने में देखो ।
दिवानों को मारो न मारो ज़वानी।।

मेरा मुल्क दुनियां में आगे रहा है ।
हमें और है इसकी इज्ज़त बढा़नी ।।

कहीं आज मातम कहीं पर खुशी है ।
मिटी तो नही हैं जो चाहीं मिटानी ।।

निशाना बना है मुहब्बत में 'अक़रम',
मुहब्बत में फिर भी मिली न निशानी।

अक़रम खान

ग़ज़ल 2
122      122    121  12
       
वफा  उनसे  माँगी  वफा  न  मिली ।
खता  हमने  ढूंढी  खता  न  मिली।।

बहुत  कच्चे  धागों  से  रिश्ते  बधें ।
रिश्तों  से  हमें  तो  सदा  न  मिली ।।
 
होठों  पे  तबस्सुम  हैं  उसके  यूं तो ।
मगर उस हुस्न को वो  अदा न मिली  ।।

 नहीं  कोई  ऐसा  जमाने  में  अब ।
जमाने  में  जिसको  दगा  न  मिली ।।

बना  हूँ  मैं  मुजरिम अदब जो किया ।
मेरे  इस  मरज  को  दवा  न  मिली ।।

मुझे  लग  रहा  था  वो  होगी  खफा ।
मगर  आज  तक  वो  खफा  न  मिली ।।

गिरेवाँ  में अपने झाँके जमाना,
सजा़वर को क्यों कर सजा न मिली ।

यूं नफरत मिटाने की कोशिशें की ।
मुहब्बत की हमको घटा न मिली ।।

अक़रम खान

ग़ज़ल 3
1222    1222   1222  1222

नहीं हैवान मुश्किल है, नहीं शैतान मुश्किल है ।
जमाने में जरा ढूढों भले इंसान मुश्किल है ।।

शहर में बन रही हैं रोज ही पत्थर की दीवारें ।
मुअज़्ज़िन की पहुँच आजा़न मुश्किल है।

खुदा क्यों बन रहा है तू खुदा तेरा भी मालिक है ।
जिसे चाहें मिटा डाले उसे सब कुछ ये हासिल है।

कश्ती साहिल पे आकर डूब ही जाती है दोस्तों ।
कहाँ मालूम होता है जरा सा दूर  साहिल है।।

जो सच्ची बात पर हर वक्त लड़ता औ' झगड़ता है ।
जमाने में वही इंसान देखो सबसे जाहिल है ।।

जहन्नुम क्यों बना डाला ये तो दुनियां की जन्नत थी ।
ये मेरा पहले भी दिल था ये मेरा आज भी दिल है ।।

अजी आतंक ने मुस्लिम का सर नीचा किया अकरम ।
अमन  को  चाहने  वाला  न  कोई  इसमें  शामिल  है ।।

अकरम खान

ग़ज़ल 4
212   212    212   212 

शान महफिल में अपनी जमाया करो ।
गीत  मेरे  तुम  अब  गुनगुनाया करो ।।

हम मिलेगें सनम शाम को आज  पर ।
ज़ाम आंखो से गर तुम पिलाया करो ।।

सब  गिले  दूर  हो जाय तुमसे सुनो ।
ग़र नज़र से नज़र तुम मिलाया करो ।।

उसकी यादों को दिल में बसाया मैंने ।
जख़्म  यूँ  दिल  के मत दुखाया करो ।।

छोटी सी बातों पर तुम जो नाराज हो ।
यूँ  सितम  दिल पे  मेरे , न ढाया करो ।।

अकरम खान

ग़ज़ल 5
2122     122    122 12

चोट  खाती   रही   मुस्कराती  रही ।
दूध दुनियां को अपना पिलाती रही ।।

फब्तियां  कस  रहा  था  जमाना मगर ।
फब्तियों  को  गले  वो  लगाती  रही ।।

बहन बेटी बनी पत्नी बन के वो माँ ।
सारे रिश्ते मुकम्मल निभाती रही ।।

कितने धोखे दिये हमने कोढे़ दिये ।
सारे जुल्मों के सदमें उठाती रही ।।

जुल्म सहने की आदत ने बुजदिल किया ।
फिर भी जिंदादिली वो बढा़ती रही ।।

पेट  में  ही  इसे  मारता  नादाँ  है ।
फिर भी खुद को तसल्ली दिलाती रही ।।

आँख को बंद करके जमाना सुने ।
बेबसी वो सभी को सुनाती रही ।।

देके ममता को वो खा़क में मिल गयी ।
पर जमाने का गुलशन सजाती रही ।।

ना  धुँआ  ही  उठा सांस गुम हो गई ।
अपनी साँसों को 'अकरम' दबाती रही।।


ग़ज़ल 6
212×4
चाँदनी   रात   भर  जग  मगाती  रही ।
फिर  बहारों  के  सपनें  सजाती  रही ।।
राह  ए  इश्क  में  तो  मिली ठोकरें ।
जिंदगी  हर  कदम आजमाती रही ।।
हिज्र  की  रातें  भी आँखों  में काटी हैं ।
जिंदगी   क्यूँ   मुझे   ही  रुलाती  रही ।।
जख्म  दामन  मे  अपने  समेंटें  हुऐ ।
जिंदगी   तीरगी  को   मिटाती  रही ।।
बर्षा पानी छायी बदली यूँ रात भर ।
फिर तेरी याद मुझको सताती रही ।।


अकरम 7 
 212×4
हम सनम तुझमें ही आज खोने लगे ।
बन गये हमसफर, साथ चलने  लगे ।।

जब से तुम जिंदगी में आयी हो सनम ।
प्यार  की  राहों  में  फूल  खिलने लगे ।।

जो मुझे साथ तेरा मिला तब से ही ।
फासले किस कदर देख घटने लगे ।।

अपनी भी जिंदगी खूबसूरत होगी ।
इश्क  में  यार के हम तो होने लगे ।।

संग चलने का वादा अभी कर लिया ।
देखकर लोग  हमको वो जलने लगे ।।


 8

122  122  122  12 
खुशियों भरी थी हर जिदंगी

वो मिलकर जुदा तो नहीं हो गया ।
सनम  वेवफा  तो  नही  हो  गया ।।

जाने कौन सी बात दिल को लगी ।
सनम गमज़दा तो  नही  हो  गया ।।

मैं सच बोला था और वो शक्की थे ।
कहीं  फासला  तो  नही  हो  गया ।।

 किसी  बात पर  वो  मुझे  छोडकर ।
 कहीं  वो  खफा  तो  नहीं  हो गया ।।

पराये   हुए   अपने   ऐसा   लगा ।
कहीं  हादसा  तो  नही  हो  गया ।।

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

7:39 am

जिला हरदोई स्वाधार गृह से 19 महिलाएं लापता ----राजेश मिश्र प्रयास

----शव्द प्रहार-----------

जिला हरदोई बीच
               महिला स्वाधार गृह
महिलाएं लापता हैं
               गिनती उन्नीस है
सुर्पनखा ताड़का भी
               गृहों में डटी पड़ीं हैं
बड़ा भाई कर रहा
               इकट्ठी ये फीस है
धीरे धीरे खुली पोल
             गपला था गोल मोल
मुझको दिखाई दिया
             जिन्दा दसशीस है
जाँच में खुलासा हुआ
             दुष्टों में इजाफा हुआ
खा रहा है नारियों को
               कौन सा खब्बीस है

💐💐💐💐💐💐💐💐
    राजेश मिश्र प्रयास
   बीसलपुर पीलीभीत
यदि सच लगे तो आप सभी का आशीर्वाद चाहता हूँ

7:26 am

ऐ अमर वीर बलिदानी भारत के सपूत - प्रदीप ध्रुवभोपाली


ऐ अमर वीर बलिदानी भारत के सपूत अंगार लिखो।
तुम मातृभूमि के लिए करो उत्सर्ग और तुम प्यार लिखो।


दुश्मन को कर दो तहस नहस औ धूल चटा दो तुम उनको
दुश्मन के लाखों शीश काट जय महाकाल जयकार लिखो।


जो लहू आग की तरह गर्म न हुआ लहू नहिं पानी है,
तुम महाप्रलय बन टूट पड़ो दुश्मन पे हाहाकार लिखो।


ऐ शूरवीर तुम बनो काल दुश्मन को मृत्यु दो अकाल,
तुम करो वार मरते हजार हो दुश्मन का संहार लिखो।


महाराणाप्रताप का है प्रताप लक्ष्मीबाई का तेज भी है,
बम तोप मिसाइल का गर्जन खूँ की प्यासी तलवार लिखो।


ये भगतसिंह आज़ाद राजगुरु का बलिदान नहीं भूलें,
हो पाक और नापाक कोई अब युद्ध हो आरोपार लिखो।

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प्रदीप ध्रुवभोपाली, म,प्र
भोपाल, दिनाँक-04/08/2018
मो.-09893677052
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