मुक्तकें
5:19 am
ग़ैरों की बेटी पर तो - वीरेंद्र कौशल
ग़ैरों की बेटी पर तो
आप अपनी जान तक देते हो
लेकिन जब आपके
अपने बेटी होने लगती है
तो उसकी जान क्यों लेते हो।
सदा जी भर मुस्कुराएं खुशियां फैलाएं
अपनी जान तक भी सदा देश पर लुटाएं
ताकि सबकी झोलियां भी लबालब भर जाएं
जाति-धर्म के बंधन से क्यों न मुक्त हो जाएं
देश-भक्ति छोड़ सभी क्यों न देश-प्रेमी हो जाएं
लगता आज हर शाख पर जल्लाद बैठें हैं
कर रहे जो घिनौने कर्म वो बेऔलाद बैठें हैं
सीमा के दायरों से निकल बाहर दोस्त वरना
सब समझेंगे हम नाहक मज़बूरियां लाद बैठें हैं
शब्दों के नए भंवर के साथ
एक बार फिर आप के पास
देश की ताज़ा घटना ने आईना दिखा दिया
कद्र क्या बेटियों की ऐसा माईना बता दिया
किस गहराई तक रह चुप समाज गर्त जाएगा
कानून मज़ाक निर्भया वक़्त मुआईना बना दिया




































