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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

5:19 am

ग़ैरों की बेटी पर तो - वीरेंद्र कौशल

ग़ैरों की बेटी पर तो 
आप अपनी जान तक देते हो
लेकिन जब आपके 
अपने बेटी होने लगती है
तो उसकी जान क्यों लेते हो।

सदा जी भर मुस्कुराएं खुशियां फैलाएं
अपनी जान तक भी सदा देश पर लुटाएं
ताकि सबकी झोलियां भी लबालब भर जाएं
जाति-धर्म के बंधन से क्यों न मुक्त हो जाएं
देश-भक्ति छोड़ सभी क्यों न देश-प्रेमी हो जाएं


लगता आज हर शाख पर जल्लाद बैठें हैं
कर रहे जो घिनौने कर्म वो बेऔलाद बैठें हैं
सीमा के दायरों से निकल बाहर दोस्त वरना
सब समझेंगे हम नाहक मज़बूरियां लाद बैठें हैं


शब्दों के नए भंवर के साथ
एक बार फिर आप के पास

देश की ताज़ा घटना ने आईना दिखा दिया
कद्र क्या बेटियों की ऐसा माईना बता दिया
किस गहराई तक रह चुप समाज गर्त जाएगा
कानून मज़ाक निर्भया वक़्त मुआईना बना दिया

आपका प्यारा
वीरेंद्र कौशल


बुधवार, 3 जुलाई 2019

7:53 pm

बदलते रंग

गिरगिट और गिरहकिट दोनों रंग बदलते हैं।
कीड़े और लोग उनके झांसे में आ जातें हैं।
इस तरह असतर्क बेचारे बेमौत मारे जाते है।
क्या आप भी ऐसे तत्वों से सावधान रहते हैं।


मूलतः देव रचित
देवानंद सहा प्राध्यापक शासकीय महाविद्यालय लवन 
जिला बलौदाबाजार छत्तीसगढ़ पिन 493332
9669575823
9:15 am

ग़ज़ल :- ज़िंदगानी इक सज़ा है सोचिए

ज़िंदगानी इक सज़ा है सोचिए ।
दर्द  ही  इसकी दवा है सोचिए ।।

दुश्मनों  से  दोस्ती क्योंकर हुई ।
दोस्तों से क्या गिला है सोचिए ।।

सदियों से ही मज़हबी इस वैर में ।
ख़ूँ तो इन्सां का बहा है सोचिए ।।

उम्र भर की क़ुर्बतों का ये सिला ।
हर क़दम पर फ़ासला है सोचिए ।।

सब निग़ाहों से तो हमने कह दिया ।
और  क्या  बाक़ी  बचा  है सोचिए ।।

बलजीत सिंह बेनाम

बलजीत सिंह बेनाम

103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी
       हाँसी(हिसार)
  मोबाईल:9996266210

9:04 am

कविता:- माता

धरती हमारी माता है
गाय हमारी माता है
नदी हमारी माता है
हमारी माता भी हमारी माता है
जब तक इनके और हमारे बीच
पैसा नहीं आता है
उसके बाद कौन किसकी माता है
कौन किसका पुत्र!
कौन गाता
माँँ की महिमा कुत्र !

हम नहीं तो आख़िर कौन 
जो इनसे लाभ पाता
इनसे कमाता
इन्हें बेच खाता
वृद्धाश्रम भेज आता !
_______________
                                      केशव शरण
23-08-1960 
प्रकाशित कृतियां-
तालाब के पानी में लड़की  (कविता संग्रह)
जिधर खुला व्योम होता है  (कविता संग्रह)
दर्द के खेत में  (ग़ज़ल संग्रह)
कड़ी धूप में (हाइकु संग्रह)
एक उत्तर-आधुनिक ऋचा (कवितासंग्रह)
दूरी मिट गयी  (कविता संग्रह)
क़दम-क़दम ( चुनी हुई कविताएं ) 
न संगीत न फूल ( कविता संग्रह)
गगन नीला धरा धानी नहीं है ( ग़ज़ल संग्रह )
संपर्क एस2/564 सिकरौल
वाराणसी  221002
मो.   9415295137
9:00 am

विकास, भूख और प्यास

सिक्स लेन की
सड़कों के ऊपर से
गुज़र गए बादल
निकल गये जनपद से बाहर
बिन बरसे

वही सिक्स लेन सड़कें
जिनके लिए हज़ारों पेड़
हलाक हुए
और हो रहे हैं

बादलों के न टिकने से
जनपद सूखा है
विकास हो रहा है 
मगर धरती प्यासी
जन भूखा है
_______________
                                        केशव शरण
23-08-1960 
प्रकाशित कृतियां-
तालाब के पानी में लड़की  (कविता संग्रह)
जिधर खुला व्योम होता है  (कविता संग्रह)
दर्द के खेत में  (ग़ज़ल संग्रह)
कड़ी धूप में (हाइकु संग्रह)
एक उत्तर-आधुनिक ऋचा (कवितासंग्रह)
दूरी मिट गयी  (कविता संग्रह)
क़दम-क़दम ( चुनी हुई कविताएं ) 
न संगीत न फूल ( कविता संग्रह)
गगन नीला धरा धानी नहीं है ( ग़ज़ल संग्रह )
संपर्क एस2/564 सिकरौल
वाराणसी  221002
मो.   9415295137

रविवार, 30 जून 2019

7:13 pm

वाराणसी :- विश्व जनचेतना ट्रस्ट वाराणसी जिला ईकाई ने किया काव्य गोष्ठी का आयोजन

दिनांक 30.06.2019 को जिला पुस्तकालय मे काव्य गोष्ठी का आयोजन विश्व जनचेतना ट्रस्ट वाराणसी जिला ईकाई ने किया तथा ग़ज़ल संग्रह"मोहब्बत" का पुन: विमोचन हुआ। इससे पहले यह ग़ज़ल संग्रह छतरपुर मध्यप्रदेश में आयोजित कवि सम्मेलन एवं विमोचन समारोह  में 3 फरवरी 2019 को पाठकों के सामने आया


शुक्रवार, 21 जून 2019

6:41 pm

ग़म की घटा न घटती सी कहीं दीख रही -आदित्य तोमर

ग़म की घटा न घटती सी कहीं दीख रही,
अपना बिहार हार मृत्यु से छला गया.
उन परिवारों पर कैसी बीती होगी भला,
दूसरे के पीछे-पीछे पुत्र पहला गया.
"बम की भी धमकी से डरेंगे न" बोला जहाँ,
वहीं हाथ पर हाथ धर के मला गया.
दमकी सितम की तड़ित ऐसी यम की कि
चमकी ले चमकीले तारों को चला गया.
                         आदित्य तोमर,
                        वज़ीरगंज, बदायूँ.

5:40 am

योग दिवस पर योग करके बताये योग के फायदे

बदायूं जनपद के कस्बा खितौरा के पी.ओ.एच.चिल्ड्रेन स्कूल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं पतंजलि योगपीठ के सँयुक्त तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
योग का प्रशिक्षण दे रहे योगाचार्य श्री दलवीर सिंह ने सभी लोगो को योग कराया और योग के फायदे बताए । योगाचार्य ने बताया कि योग हमारे शरीर को एक औषधि का काम करता है। योग करने से हमारे शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती है व शरीर निरोगी बनाता है। योग हमारे जीवन में बहुत उपयोगी हैं। योग करने से हमारे शरीर में स्फूर्ति बनी रहती। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन योग करना चाहिए ।
  • इस मौके पर गौरव कुमार सिंह गुरु, आर डी शर्मा ,अरुण कुमार सिंह,सचिन,हेमन्त,संजीव भारद्वाज, विकास भारद्वाज, सुरेंद्र भारद्वाज ,अनिल शर्मा, रवि शंकर , रोहित भूपाल वन , प्रतीक, रिंकू भारद्वाज, रानू , उदित गुप्ता, मेघराज सिंह, सहित सैकड़ों लोग ने योग किया ।

मंगलवार, 4 जून 2019

सोमवार, 20 मई 2019

2:54 am

युद्ध की विभ्रान्तियाँ कब तक रहेंगी

हे सखे,
युद्ध की विभ्रान्तियाँ कब तक रहेंगी.
ये निरर्थक क्रान्तियाँ कब तक रहेंगी.
यह अथक मन्थन हमें क्या दे सकेगा.
अंततः संसार जिस पथ पर चलेगा.
वह सुनिश्चिततः हमारा प्रेम होगा.
सार इस संसार का फिर क्षेम होगा.
युद्ध का यह वृक्ष सदियों तक फले पर,
क्रोध का उन्माद यह वर्षों चले पर,
एकदिन आख़िर हमें झुकना पड़ेगा.
हारकर उस मोड़ पर रुकना पड़ेगा.
तब अनर्गल चाहना तजनी पड़ेगी.
प्रीति की दुनिया नई रचनी पड़ेगी.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ.

बुधवार, 24 अप्रैल 2019

12:16 am

जख्म भर जाये मेरा....

ग़ज़ल क्र० 66

मारना   चाहता   है   खुशी  के  लिए ।
शत्रु  है  आदमी,  आदमी   के   लिए ।।

कत्ल कर मेरा कातिल छुपा है अभी ।
कोई  तो  दे  पता  बन्दगी  के   लिए ।।

जख्म  भर  जाये  मेरा  सुनो  आपकी ।
बस  दुआ  चाहिए   जिंदगी  के  लिए ।।

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

11:40 pm

मेरी छतरपुर मध्य प्रदेश यात्रा - दिलीप कुमार पाठक "सरस"

मेरी छतरपुर मध्य प्रदेश यात्रा

मित्रों!

3 फरवरी 2019 दिन रविवार को छत्रशाल स्मारक न्यास, चौक बाजार छतरपुर में मुहब्बत साझा ग़ज़ल संग्रह का विमोचन एवं सम्मान समारोह के साथ अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का कार्यक्रम सुनिश्चित हुआ|कार्यक्रम की तैयारी प्रिय अनुज सुमित शर्मा पीयूष जी और प्रिय नीतेन्द्र परमार सिंह भारत जी के सहयोग से कई दिनों की कड़ी मेहनत से पूर्ण हो चुकी थी|

अब कार्यक्रम प्रकाश में आना था, सब अपने अपने घरों से एक दूसरे से मिलने के लिए आतुर हो घरों से निकल चुके थे|प्रिय अनुज विकास भारद्वाज 'सुदीप' जी जो कि मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह के प्रधान सम्पादक हैं, खुशी के मारे 31 जनवरी को ही घर से चल पड़े|सबसे पहले छतरपुर पहुँचे भी वही|
झाँसी के किले की प्राचीर पर 
मेरा जाना एक फरवरी को सुनिश्चित था पर साथियों की और खुद की समस्याओं का बजह से 2 फरवरी की शाम को ही घर से निकलना हो पाया|मेरे साथ पहले तो सात साथी चलने को तैयार थे, जिसमें आ.  सुशीला धस्माना मुस्कान दीदी, आ.  अमित शर्मा जी, आ. अभयराज जी, आ. कौशल पाण्डेय आस दादाश्री, आ. राजेश मिश्र प्रयास जी ,आ. विकास भारद्वाज 'सुदीप' जी और मैं|सोंचा कि बड़ी गाड़ी कर लेंगे|परन्तु आ. अमित जी की रिश्तेदारी में किसी का स्वर्गवास हो गया, अभयराज जी भी मना कर गये, आ. सुशीला धस्माना मुस्कान दीदी का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण साथ न चल सकीं, यद्यपि मन तो बहुत था जाने का |विकास जी को मैंने बोल दिया आप उल्टा क्यों आओगे ,उधर से ही सीधे निकलो |
अब बचे प्रयास जी, मैं और आस दादा|प्रिय मित्र आलोक सैनी जी को राजी किया साथ चलने को, सहर्ष तैयार हो गये पर 2 फरवरी को चलने की शर्त थी, विद्यालय कार्य पूर्ण करके|
 

प्रिय भाई आलोक सैनी जी तय समय पर गाड़ी लेकर घर पर आ गये |प्रयास जी और आस दादा को मँगाना पड़ा उनके घर से|शाम पाँच बजे घरर से निकल पड़े, हँसते हँसाते ,गाल बजाते, रास्ता भटकते, पूछते पाँछते, कोहरे से जूझते सुबह तड़के छतरपुर के बस स्टैण्ड पर हमारी गाड़ी पायी गयी |बाइक लिए मुँह पर मफलर लपेटे प्रिय अनुज नीतेन्द्र जी प्रकट हुए उनके एक साथी साथ में थे, मैं दुकान पर पान खा रहा था, ऐसा लगा कि प्रिय नीतेन्द्र जी हमारी किडनैपिंग करने आये हैं |खैर जैसे-तैसे एक निर्धारित स्थान पर पहुँचे, शटर खोला गया, जीना दिखा और ऊपर पहुँचा दिए गये|बिस्तर बिछाकर अन्य सभी साथियों को लिटा दिया गया, मुझे नीतेन्द्र जी अपने साथ ले गये अपने घर पर वहाँ घर के सभी सदस्यों से मिला|आपके पिता जी के स्वभाव ने बहुत प्रभावित किया, खूब बातें हुईं हम लोगों के मध्य |इसी बीच दैनिक क्रिया से निपटा, बहिन सुधा तब तक चाय जे आयी, चाय पी, बातों बातों में पता चला कि अनुज नीतेन्द्र जी का नाम छोटे राजा भी है|पापा जी स्नेह पगी बातें करते रहे और हाँ यहीं विकास जी भी प्राप्त हुए सोते हुए, जैसे तैसे जगाया |




फिर अतिथि ग्रह पर लाया गया |सब दैनिक क्रिया करते नज़र आये, मैं भी नहा लिया, कपड़े ही पहन पाया कि तब तक दूसरी खेंप भी नीतेन्द्र जी किडनैंप कर लाये, इस खेंप में आ. लियाकत अली जलज दादाश्री, आ. संतोष कुमार प्रीत दादाश्री, प्रिय अनुज सुमित शर्मा पीयूष जी, आ. राजेन्द्र प्रसाद बावरा दादाश्री , आ. बिजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश दादाश्री |
एेसा लगा कि मजा चलकर आ गया हो|सब पानी बहाने पर डट गये, आगरे गूँज आ रही थी और बनारस की खुशबू |
  

तब तक चाय भी तैयार होकर आ गयी और नाश्ता भी, बिहार बनारस और छतरपुर का नाश्ता हम सबने छका, मस्तियों को कैद किया मोबाइल में और खुजराहो का मंदिर देखने के लिए दो खेंपों में रबाना हो गये, आ. शैलेन्द्र खरे सोम दादाश्री से फोन पर बात हो गयी कि अनुज थोड़ी देर में आता हूँ |
मंदिर पहुँच गये, मंदिर की चित्रकारी पत्थरों पर देख मन रोमांचित होकर उठा|हम सब फोटो पर फोटो ले रहे थे |तीन बजे वापस आ गये थे,

सबसे पहले आ. सोम दादाश्री मिले, गले से लगा लिया और कहा कि मेरा अनुज शरीर में मेरी तरह ही है|
तब तक खाना तैयार हो गया था, सबने भोजन किया और कार्यक्रम स्थल पर पहुँचे|सबके स्नेह और सहयोग में कार्यक्रम सम्पन्न हुआ, भव्यतम् कार्यक्रम, मंच पर सुशोभित सोम दादाश्री के साथ अन्य स्थानीय वरिष्ठ साथी |संचालन का गुरुभार मुझे ही उठाना पड़ा|एक एक कर सभी को सम्मानित किया गया व काव्य पाठ हुआ|सबके स्नेह से पगी मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह का विमोचन हुआ |
 


मुहब्बत साझा ग़ज़ल संग्रह को अपने स्नेह से ओतप्रोत करने हेतु प्रिय अनुज सुमित जी को 500₹ का पुरस्कार प्रदान किया गया, प्रधान सम्पादक प्रिय अनुज विकास भारद्वाज सुदीप जी को 500 ₹ की धनराशि पुरस्कार के रूप में नकद प्रदान की गयी |इसी बीच सुमित जी की ट्रेन थी, सो विदा लेकर अपने गन्तव्य की ओर बढ़ गये|
9:30 बजे कार्यक्रम समाप्त हो गया था|कार्यक्रम जल्दी समाप्त करने का कारण छतरपुर के एक वरिष्ठ बी. जे. पी नेता का निधन रहा|जिसे गोपनीय रखा गया|


फिर रुकने के स्थान पर आये, सारा समान प्रिय अनुज जयकांत जी, प्रिय अनुज अनंतराम जी और कई साथी से आये थे|थकान होने के बावजूद भी मैं और आलोक सैनी जी घूमने निकल गये |एक घण्टे बाद लौटकर आया, भोजन हो चुका था |वार्तालाप वर्षा हो रही थी|
पेट में गैस बन जाने के कारण भोजन न किया, कुछ खाकर भी आये थे|
 

 

आ. सोम दादाश्री और मैं देर रात तक बतलाते रहे|आ.शैलेश दादा की कविता सुनते रहे|आ.बावरा जी रात भर कुछ ढूँढ़ते रहे, जाने क्या खो गया था, मिला कि नहीं राम जानें|
कमरे की लाइट बुझा दी थी और फिर निद्रा की गोद में सब चले गये |आस दादाश्री सोये कि नहीं, पता ही नहीं |
सुबह उठा, दैनिकक्रिया का अभिवादन कर चाय नाश्ता किया, अन्य सभी साथियों को उनके हाल पर छोड़ ,आ. सोम दादाश्री और प्रिय अनुज नीतेन्द्र जी के साथ सभी से विदा ले हम निकल आये|



महोबा में चाय पकौड़ी ठूँसीं|फिर आगे बढ़े कबरई का बन्धा देखा, फिर आगे बढ़े, एक ढाबे पर खाना खाया,फिर आगे बढ़े |
हँसी मजाक, ठहाके के बीच, अँधेरा पाँव पसार चुका था|
अब कोहरे से जूझना था, रात के 1:00 बजे घर ने दर्शन दिए|
विकास जी साथ में थे, गाड़ी गैराज में खड़ी कराकर, घर आये, विकास जी का विस्तर तैयार था और मेरा विस्तर थकान खुद बिछा रहा था, सो झट से सो गया|
सुबह विकास जी को बस पर बिठाया और फिर मैं अपने कामधन्धे में लग गया|

जय जय
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

2:21 am

वाराणसी :- कवि सम्मेलन एवं मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह का सफल आयोजन छतरपुर (म०प्र०) में

ज्ञान शिखा टाइम्स समाचार पत्र के वरिष्ठ संपादक, सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत की वाराणसी इकाई के अध्यक्ष आ. लियाकत अली 'जलज' जी को मुहब्बत भरी हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ

2:13 am

कवि सम्मेलन एवं मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह का भव्य विमोचन छतरपुर (म०प्र०) में हुआ

विश्व जनचेतना ट्रस्ट, भारत के संस्थापक दिलीप कुमार पाठक 'सरस' जी के अद्भुत संचालन में और नीतेंद्र सिंह परमार "भारत" के संयोजन में कवि सम्मेलन का आयोजन छत्रसाल स्मारक न्यास चौक बाजार, छतरपुर(म०प्र०) में आयोजित किया गया ।
इस सुअवसर पर 'मुहब्बत' साझा ग़जल संग्रह का विमोचन भी किया गया, जिसके प्रधान सम्पादक विकास भारद्वाज "सुदीप" ने विमोचनोपरांत कहा कि ग़ज़ल वह लफ्ज है जो कानों में पड़ते ही मुहब्बत का अहसास करता है, तो नश्तर सा दिल में चुभ भी सकता है, जिंदगी के हालात और अनचाहे फैसले से लेकर दिल की कशिश, कच्ची नींद के ख़्वाब सा नाज़ुक तो कभी बेवा की टूटी चूडियों सा भूखे के लिए रोटी सा उक्त भावों से यह 'मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह' लबालब है तथा सम्पादक शैलेन्द्र खरे"सोम" ने कहा कि ग़ज़ल संग्रह में ग़ज़लकारों ने अपनी ग़ज़लें संग्रह में दी है साहित्यिक एवं प्रेमयुक्त सुपठनीय और सभी रसों का समागम है, विभिन्न प्रान्तों से पधारे कवियों के क्रम में संजीव खरे"समर्थ"जी, विकास भारद्वाज "सुदीप", लियाक़त अली'जलज'जी,कौशल कुमार पाण्डेय'आस'जी, बृजेन्द्र नारायण द्विवेदी'शैलेष'जी, राजेन्द्र प्रसाद बावरा जी,सन्तोष कुमार"प्रीत"जी,दिलीप पाठक 'सरस', आलोक सैनी जी, राजेश कुमार मिश्रा 'प्रयास'जी, शैलेन्द्र खरे 'सोम', तुलाराम अनुरागी"व्योम' विश्वेश्वर शास्त्री'विशेष',सुमित शर्मा 'पीयूष' की उपस्थिति ने इस आयोजन को अविस्मरणीय बना दिया।
इस अवसर वरिष्ठ विशिष्ट साहित्यकार शिवभूषण सिंह गौतम जी (कार्यक्रम अध्यक्ष),नवलकिशोर मायूस जी (विशिष्ट अतिथि),डॉ.राघवेंद्र उदेनिया सनेही जी रहे ।

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

5:56 pm

मुहब्बत (ग़ज़ल संग्रह) - का विमोचन -- साहित्यिक आमंत्रण


🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁
       🙏 *साहित्यिक आमंत्रण* 🙏
आदरणीय कवि बंधुओं एवं प्रबुद्धजनों को अवगत कराते हुए हर्ष हो रहा है कि विश्व जनचेतना ट्रस्ट छतरपुर मध्यप्रदेश द्वारा *दिनांक 03 फरवरी को शाम 04 बजे* काव्य संकलन *_मुहब्बत (ग़ज़ल संग्रह)_* का विमोचन, सम्मान समारोह एवं काव्यपाठ का आयोजन सम्पन्न होगा|
स्थान:- बुन्देलखण्ड केशरी छत्रसाल स्मारक न्याय (ट्रस्ट) चौक बाजार छतरपुर मध्यप्रदेश
*कृपया आने वाले सभी साहित्यकार अपना नाम,पता तथा नंबर अंकित करें ~ ~*
नोट~~ विश्राम हेतु स्थान एवं समुचित जलपान की व्यवस्था हेतु कृपया *निम्नलिखित लिस्ट में अपना नाम अंकित करें -------*
कार्यक्रम संबंधी एवं आवागमन हेतु जानकारी के लिए कृपया 
  नीतेन्द्र सिंह परमार 'भारत' से मो० नं०
~ ```8109643725``` ~
पर सम्पर्क करें ~~
विकास भारद्वाज मो० न० 9627193400


गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

4:50 pm

बटेसर की चक्की - आशा शैली जी

‘‘कहाँ उतरिएगा? टिकट...? कण्डेक्टर के बात पूरी करने से पहले ही
सुमित्रा ने एक रुपये का सिक्का उसकी ओर बढ़ा दिया।’’
‘‘मुझे पुलिया के पास उतार देना, चक्की पर।’’
‘‘वो...ऽ...ऽ...? अरे बहन जी, बटेसर की चक्की कहो न? एक रुपया और दो।’’
सुमित्रा दो साल बाद इधर आई थी। माँ के खत से उसे यह भी पता चला था कि
चक्की बिक चुकी है इसीलिए उसने पुलिया वाली चक्की कहा था। यूँ भी लम्बे
सफ़र के बाद उसका सिर घूम सा रहा था पर यहाँ आ कर उसे लोकल बस तो लेनी ही
थी। घर तक जाने का और तो कोई साधन ही नहीं था, न कोई रिक्शा न थ्री
व्हीलर न कोई और साधन। मजबूरी में लोकल बस ही लेनी पड़ती थी। दुनिया बदल
गई पर इस कस्बे के लोग अभी तक वहीं के वहीं पड़े हैं। इतनी ही गनीमत थी कि
सड़क पक्की हो गई थी।
‘हूँ! तो किराया भी दुगना हो गया है।’ सोचा उसने। फिर पर्स से चुपके से
निकाल कर एक रुपया और कण्डेक्टर को दे दिया।
माँ का खत मिलते ही वह अम्बाला से चल पड़ी थी। अम्बाला उसका बड़ा बेटा तरुण
बैंक में कार्यरत था।
पिता की मृत्यु के बाद जाने क्यों सुमित्रा ने इस छोटे से कस्बे के कई
चक्कर लगा लिये थे। चक्की की चर्चा पर उसने माँ को लिखा भी था कि
उन्हांने गलत कर दिया है’’ किन्तु माँ भी विवश थी सो....।
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बस एक झटके से रुकी। सुमित्रा विचारों में इतना खो गई थी कि उसे कण्डक्टर
की सीटी भी सुनाई न दी, चक्की आ गई।
बस को रुकता देख दोनों भाभियाँ बाहर निकल आईं। उन्होंने बस से सुमित्रा
को उतरते देख लिया था। घर के सामने ही खुले आँगन में एक ओर बान की चारपाई
पर बैठी माँ ने हाथ में पकड़ी गोभी और छुरी एक तरफ़ रख दी और हाथ से नाक पर
झुक आई ऐनक को सही किया। फिर तीनों ही आगे बढ़ आइंर्। भाभियों ने पाँव
छुये, माँ गले मिली और फिर साथ ही बिछी बान की दूसरी खटिया पर सब जम गये।
चाय आदि के दौर से निबट कर भाभियाँ अपने-अपने काम में लग गईं तो सुमित्रा
टहलते-टहलते माँ को साथ लेकर चक्की की ओर जा निकली।
‘‘माँ! आखिर तुमने चक्की बेची क्यों? यही तो तुम्हारा सहारा थी। चार पैसे
हाथ में रहने पर सब ही तो तुम्हें पूछते।’’
‘‘ठीक कहती हो बेटी, लेकिन एक बात भूलती हो।’’ सुमित्रा प्रश्नवाचक
दृष्टि से माँ को देखने लगी।
‘‘उमर!’’ माँ का स्वर बेहद ठंडा था।’’ जब उमर बढ़ जाए तो सहारे की
आवश्यकता होती है। पैसा दे कर मर्द तो होटल में खा सकता है, कपड़े धोबी से
धुला सकता है, लेकिन औरत वह भी नहीं कर सकती, उसे तो उसके लिए भी सहारा
चाहिए।’’ माँ ने ठण्डी साँस ली, ‘‘वक्त ही ऐसा आ गया है? एक बेटा चाहता
था कि चक्की उसे दे दूँ, तो दूसरा चाहता उसे, तंग आकर बेच ही दी। रोज-रोज
का झगड़ा भी तो नहीं न झेला जा सकता। झगड़े से भी तंग आ चुकी थी।
‘‘और पैसा.........?
‘‘वह बाँट दिया दोनों को।’’
‘‘फिर....अब क्या परेशानी है?’’
‘‘फिर? परेशानी यह है कि अब इनके पास रोटी नहीं है मेरे लिए। कहते हैं
पैसे तो खतम हो गये। छोटा कहता है बड़े के पास जाकर रहूँ और बड़ा कहता है,
छोटे के पास।’’
‘‘तुम क्या चाहती हो?’’
‘‘मैं क्या चाहूँगी अब? अब तो दो रोटी आराम से मिल जाएँ वही बहुत है।’’
‘‘हूँ! चक्की किसे बेची है?’’
‘‘तुम नहीं जानती उसे, नया है शहर में वह।’’
बातों ही बातों में दोनों को पता ही नहीं चला कब वे चक्की के सामने पहुच गई थीं।
‘‘देखो माँ? पिता जी कितने भले लगते थे, यहाँ बैठे हुए।’’ अनायास ही
सुमित्रा की नज़र उस ओर उठी जहाँ एक बड़े से मूढ़े पर उसके पिता बटेसर बैठा
करते थे। आज उस मूढ़े पर एक मोटे से आदमी को बैठा देख कर सुमित्रा को न
जाने क्या सूझी कि वह माँ के पुकारते रहने पर भी उधर को झपटी। तब तक उस
मोटे आदमी को भी खबर लग चुकी थी कि बटेसर सेठ की बड़ी बेटी आई है, पर उसे
यह पता नहीं था कि वह इस तरह इधर आ धमकेगी।
‘‘नमस्ते दीदी!’’ उसे देख वह एकदम हकबका कर खड़ा हो गया।
‘‘हूँ। तो तुमने खरीदी है यह चक्की क्यों?’’
‘‘जी दीदी!’’ उसे परिस्थति समझने में उलझन हो रही थी। सुमित्रा का पूरा
चेहरा सुर्ख लाल हो गया था।
‘‘सुनो! तुम्हें क्या चक्की के साथ यह मूढ़ा भी बेचा गया है?’’
‘‘नहीं तो!’’ वह हक्का-बक्का सुमित्रा का मुँह तक रहा था।
‘‘फिर हटो यहाँ से।’’ और सुमित्रा ने झपटकर मूढ़ा उठा लिया। मूढ़े को
बरामदे में रखकर वह फर्श पर बैठ गई और सिर उस पर रख कर फूट-फूट कर रो
पड़ी। रोती रही-रोती रही। दोनों भाभियाँ दूर खड़ी तमाशा देख रहीं थीं,
उन्हें निकट आने का साहस नहीं हुआ। मोटे आदमी की आँखें भी भीग गईं।
सुमित्रा को लगा जैसे उसके पिता का वात्सल्य भरा हाथ उसके सर को सहला रहा
हो। माँ ने दुपट्टे से आँखें पोंछ मोटे शीशे वाली ऐनक को फिर से आँखों पर
जमा लिया।
‘‘दीदी........,’’ सुमित्रा ने सिर उठाया तो वह पास ही खड़ा था। उसने सिर
को फिर से मूढ़े पर रख दिया, और सुबकती रही।
‘‘उठिए दीदी। अब मैं कभी इस पर नहीं बैठूँगा। मुझे आज समझ में आया, बेटी
कैसे हमेशा बेटी ही रहती है।
चुपचाप उठ कर सुमित्रा अन्दर चली गई। उसे कुछ भी कहने की हिम्मत किसी की
न थी। बस औंधी पड़ी बेटी की पीठ को उसकी माँ सहलाती रही।
रात देर तक माँ बेटी बतियाती रहीं। अधिकतर माँ ही बोल रही थी, सुमित्रा
तो बस हूँ, हाँ या एकाध छोटा सा प्रश्न दाग देती। अचानक वह बिस्तर पर उठ
बैठी।
‘‘क्यों क्या हुआ? ऐसे क्यों चौंक रही है?’’ माँ ने उसे इस तरह उठते देख
कर हैरानी से पूछा ।
‘‘माँ! इसे कितनी आमदनी हो जाती है इस चक्की से?’’
‘‘पता नहीं।’’ लग रहा था कि  माँ कुछ खीज गई थी, ‘‘अच्छा अब सो जा, सफ़र
की थकी है।’’ और माँ करबट बदल कर लेट गई। थोड़ी देर में उनकी नाक बजने
लगी, लेकिन सुमित्रा को नींद कहाँ?
जहाँ उसके पिता बटेसर मूढ़ा डालकर बैठा करते थे और जहाँ से आज वह उस मूढ़े
को उठा लाई थी। यह जगह कभी उसने माँ से अपने लिए माँगी थी लेकिन माँ ने न
सिर्फ इनकार किया वरन् उसे बुरी तरह से दुत्कार भी दिया था।
फिर न जाने कहाँ से रात के सन्नाटे में उसे अल्हड़ और खिलन्दड़ी सुमित्रा
के कहकहे सुनाई देने लगे। उसकी कमसिन पायल खनकती सुनाई देने लगी। चारपाई
से उठ कर वह खिड़की में जा खड़ी हुई।
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सुमित्रा को याद आ रहा था कि इसी कमरे में जहाँ वह आज माँ के साथ सोने का
प्रयत्न कर रही है, कभी ढोलक पर गाँव की औरतों ने सुहाग के गीत गाये थे।
सोलह वर्ष की अल्हड़ सुमित्रा के हाथों में लाल-लाल मेंहदी रचायी गई थी।
मामा ने लाल चूड़ा पहनाया था और तीखे गुलाबी रंग का गोटे वाला सूट पहने
सुमित्रा अकेले-अनाथ मुरारी के एक कमरे वाले कच्चे घर में चली गई।
मुरारी देखने में भला चंगा था। उसी कस्बे के पैट्रोल पंप पर नौकरी करता
था। कभी-कभार वह बटेसर की चक्की के लिए गैलन में दो नम्बर का डीज़ल भी
लेकर आता और तब उसे ही मुरारी को खाना देना होता था, इसीलिए मुरारी के
साथ जाना उसे बुरा नहीं लगा।
छः मास गुजरते सुमित्रा को पता भी नहीं चला। इसी बीच एक दिन मुरारी जब
शाम को घर आया तो बहुत उास था, सुमित्रा के पूछने पर उसने उसे बताया कि
‘दोपहर को जब वह खाना खाने आया था तो पम्प मालिक के आवारा बेटे ने सेफ़ से
सारा पैसा निकाल लिया और चोरी पम्प के तीन चौकीदारों के सिर लगा दी गई
है।’
रात भर दोनों एक दूसरे को दिलासा देते रहे और ईश्वर पर भरोसा रखने की बात
दोहराते रहे लेकिन ईश्वर ने साथ न दिया और मालिक ने उनकी एक न सुनी।
सुमित्रा के पास एक सोने की अँगूठी थी और दो जेवर चाँदी के क्योंकि तब
बटेसर के साथ सेठ शब्द नहीं जुड़ा था। रहा मुरारी, तो वह तो यूँ भी अनाथ
था। कुछ थोड़ा सा जोड़-तोड़ कर गुजारा चल रहा था, सो जब मालिक ने पाँच हजार
के गबन का केस बनाया तो बर्तन-भाण्डे के साथ उसका एक कमरे का कच्चा मकान
भी जब्त कर लिया। वे दोनों पहनने के कपड़े और बिस्तर लेकर बटेसर की चक्की
पर आ गए।
पैट्रोल पम्प की नौकरी में मुरारी की ड्राइवरों से दोस्ती होना एक साधारण
सी घटना थी, अपने उन्हीं ड्राइवर दोस्तों से उसने भी गाड़ी चलाने की
विद्या भी सीख ली थी, इसलिए इधर-उधर से कुछ न कुछ कमा ही लेता। गबन का
आरोप था सो नौकरी मिलने में थोड़ी कठिनाई हो रही थी फिर भी जो लोग मालिक
के आवारा बेटे को जानते थे वे मुरारी के निर्दोष होने को भी मानते थे, सो
उसे रोटी का जुगाड़ करने में अधिक कठिनाई नहीं हो रही थी। छनन...। बिल्ली
ने रसोई में कोई बर्तन गिरा दिया दिया था। सुमित्रा को लगा उसका गला सूख
रहा है, सिरहाने रखे गिलास को उठाकर एक ही साँस में सारा पानी पी गई और
फिर आकर खिड़की में खड़ी हो गई, खिड़की से अष्टमी का चाँद अपनी पूरी आभा
कमरे में बिखेर रहा था। उजली चाँदनी में चक्की का वह भाग भी दिखाई दे रहा
था जहाँ से आज वह मूढ़ा उठा लाई थी। वह दिन उसे फिर पैनी सुइयों सा छेद
गया था जब उसे इस छोटे से टुकड़े के लिए माँ ने दुत्कार दिया था।
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पिछले कई दिनों से मुरारी के पास कोई काम नहीं था। रात सुमित्रा ने विचार
किया कि कहीं से एक भैंस का प्रबन्ध किया जाए, इस पर मुरारी बोला, अपने
रहने के लिए तो यह छोटा सा कमरा है इसी में खाना, नहाना, सोना तो सब है
भैंस कहाँ बंधेगी?
‘‘क्यों? चक्की के बगल में इतनी जगह तो खाली पड़ी है।’’
‘‘अपनी माँ से पूछा है?’’ मुरारी के प्रश्न में व्यंग्य स्पष्ट था।
‘‘मैं सुबह ही पूछ लूँगी, माँ भला क्यों मना करेगी, खाली जगह के लिए?’’
और सुबह जब उसने माँ से बात की तो माँ एकदम बिफर गई, अरे......., बेटी
ब्याह कर लोग चैन की साँस लेते हैं। तू तो पहले ही भाइयों के गले पर बैठी
है उस पर अब जमीन भी माँग रही है।’’ थोड़ा दम लेकर माँ फिर बोली, ‘‘अपने
खसम से कह कर अपना प्रबन्ध करो। मैं कब तक तुम्हें घर पर बैठाकर
रखूँगी?’’ माँ के तीखे बोल सुमित्रा के कलेजे तक उतर गए थे, क्यों कहा
माँ ने ऐसा? कैसे कह दिया उसने, वह क्या भाइयों से प्यार नहीं करती?
सुमित्रा का मन खिन्न हो गया था, उस दिन सुमित्रा ने खाना भी नहीं बनाया।
रो-रोकर मुरारी से कहीं और चलने को कहा....लेकिन कहाँं? हालांकि पिता
बटेसर एक दम बेलाग रहते थे फिर भी वह माँ से डरते अवश्य थे। इसलिए मुरारी
से लगाव होते हुए भी वह कुछ नहीं बोल सके। मुरारी का तो कोई भी नहीं था
परन्तु यह भी तो सच है कि जिसका कोई नहीं होता, उसका ईश्वर होता है। यही
उक्ति मुरारी के साथ चरितार्थ हुई।
उन्हीं दिनों मुरारी का एक दोस्त, जो जगाधरी किसी सेठ के पास ड्राईवरी
करता था, घर आया हुआ था। वह मुरारी से मिलने आया तो सारी बात जानकर वह उन
दोनों को अपने साथ जगाधरी ले आया। वह जिस सेठ की कार चलाता था, उनका घर
के साथ ही सुन्दर सा बाग भी था। वहीं कुछ क्वार्टस् नौकरों के लिए भी बने
हुए थे। मुरारी का वह मित्र भी वहीं रहता था, उसने मुरारी और सुमित्रा को
अपने साथ रहने के लिए कहा। सेठ के पारिवारिक मित्र कभी-कभी उधर भी घूमने
आ निकलते। वहीं, उसी बाग में हुई सुमित्रा की मुलाकात ठकुराइन दीदी से।
उन्हें अपनी कार के लिए ड्राईवर चाहिए था। शहर के बाहर बाग में महल जैसा
मकान और ठकुराइन दीदी के साथ रहती बस एक नौकरानी। ठाकुर साहब बरसों पहले
परलोकवासी हो गये थे।  उनका इकलौता बेटा उच्च शिक्षा हेतु विदेश जा कर
वहीं का हो गया। इस अकेलेपन में सुमित्रा जैसी सलोनी शोड़षी का साथ उन्हें
भा गया।
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ठण्डी हवा के झोंके ने सुमित्रा को फिर से वर्तमान में ला पटका। मार्च की
पहली तारीखें थीं, शायद कहीं पहाड़ों पर बर्फ गिर रही थी अथवा वर्षा हुई
थी। यहाँ हिमालय की तराई से पहाड़ अधिक दूर भी नहीं थे। उसने खिड़की बन्द
कर दी और बिस्तर पर आ लेटी। माँ सो रही थी, बेखबर।
कड़ी धूप में ठण्डी बयार का-सा झोंका ही तो थीं ठकुराइन दीदी। हर वक्त
पूजा पाठ में मगन। जाने कब सुमित्रा उनके नाक का बाल बन गई। वही ठकुराइन
दीदी, जिन्हें किसी के हाथ का बना खाना पसन्द ही नहीं आता था, अब वह
सुमित्रा के हाथ के बने सभी पकवान बड़े चाव से खाती थीं, फिर एक दिन
उन्होंने विधिवत् उसे गोद ही ले लिया।
यह फैसला उन्होंने तब लिया जब उनके इकलौते बेटे ने भारत लौटने से इन्कार
कर दिया। न सिर्फ़ इनकार किया बल्कि उसने तो अपने पत्र में माँ को यहाँ
तक लिख मारा कि उसे उनकी सम्पत्ति से भी कोई दिलचस्पी नहीं है।’’
वैसे तो सुमित्रा ठकुराइन दीदी को सारा दुख-दर्द सुना आती थी और वह उसे
हिम्मत और दिलासा भी देतीं पर जब सुमित्रा ने माँ-बाप की शक्ल ही न देखने
का अपना फैसला ठकुराइन दीदी को सुनाया तो उन्हें बहुत दुख हुआ। वह जानती
थीं कि संतान की अवज्ञा का माँ-बाप पर कितना गहरा असर होता है। उन्हीं के
समझाने-बुझाने पर उसने फिर माँ के पास जाना-आना शुरु किया था। उन्हीं
ठकुराइन दीदी की शिक्षा का फल था कि अपने साथ किये गये हर दुर्व्यवहार के
अपराधी को वह क्षमा कर देती थीऋ उनकी अपार धन सम्पत्ति के साथ-साथ उनके
उदार विचार भी तो उसे विरासत में प्राप्त हुए थे।
रात भर की जगी होने पर भी मुर्गे की बांग के साथ ही सुमित्रा उठ बैठी।
ठकुराइन दीदी से सन्ध्या वन्दन का पाठ भी तो पढ़ा था उसने।
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पूजा से निवृत्त होने और चाय नाश्ते के बाद सुमित्रा फिर चक्की के पास जा
खड़ी हुई। मोटा आदमी जिसका नाम मदन था उठ खड़ा हुआ। आज वह तख़त पर बैठा था।
‘‘आइये दीदी? कैसी कटी आपकी रात?’’
‘‘ठीक है भइया? सुमित्रा ने स्वयं को संयत रखने का संकल्प रात ही ले लिया
था अतः बिना किसी भूमिका के प्रश्न किया, ‘‘क्या तुम्हें इस चक्की से कुछ
लाभ है?’’
‘‘नहीं-दीदी? पता नहीं क्यों काम बहुत कम हो गया है, वैसे एक कारण तो यह
भी है कि इधर-उधर और चक्कियाँ भी लग गईं हैं। फिर लोग शहर भी अधिक जाने
लगे हैं।’’
‘‘कितने में खरीदी थी चक्की तुमने?’’
‘‘पंद्रह हजार में............क्यों?’’
‘‘बेचेंगे क्या?’’
‘‘मैं समझा नहीं।’’
‘‘मैं तुम्हें मुँह माँगी कीमत दूँगी इसकी।’’ सुमित्रा के लिए तो यह
चक्की एक फाँस ही थी, जो उसके कलेजे में अटकी हुई थी। कितनी ही उदार होने
के बाद भी वह यह बात नहीं भूल सकती थी कि इसी चक्की के पास बची थोड़ी सी
ज़मीन के लिए माँ ने उसे कितना लताड़ा था। इन्हीं भइयों के लिए ना? और
भाइयों ने क्या किया? चक्की भी बिकवा दी और अब उसे रोटी के दो टुकड़ों के
लिए उनकी बीवियों की दस बातें सहनी पड़ती हैं। वे दोनों डरती हैं तो बस
सुमित्रा से, क्योंकि अब वह पैसे वाली जो है परन्तु बात बस इतनी ही नहीं
है, दरअसल सुमित्रा समय पड़ने पर भइयों की मदद भी तो करती है इसलिए उसका
रुतबा घर में बना हुआ है। आखिरकार सुमित्रा ने पचास हजार देकर चक्की
तुरन्त खरीद ली। तार देकर मुरारी और छोटे बेटे वरुण को भी उसने सितारगंज
ही बुला लिया था। जमीन का वह छोटा सा टुकड़ा जो सुमित्रा के मन में कसक
बनकर सालता रहता था, आज उसका था, उसका अपना। अब उसे माँ के सामने हाथ
नहीं फैलाने थे, इसके विपरीत बेगाने लोगों के हाथ चली गई पैतृक सम्पत्ति
उसने पैसे देकर पुनः प्राप्त कर ली थी अपने बेटे वरुण के नाम से और उसने
वरुण के नाम से लोन के लिए भी साथ ही साथ एप्लाई कर दिया था।

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‘‘वरुण फ्लोर मिल’’ का नामपट्ट भी बनकर आ गया था, वरुण बहुत प्रसन्न था।
एम.ए. पास करने पर भी नौकरी का कहीं दूर-दूर तक कोई भरोसा न था। अगर माँ
ने उसके नाम पर ‘फ्लोर मिल’ की योजना बनाई तो उसे क्योंकर सुख और
प्रसन्नता का अनुभव न होता। देखते ही देखते रिश्तेदार और मित्र, मेहमान
आने शुरु हो गये थे। सुमित्रा बहुत प्रसन्न थी। अपनी प्रशंसा सुनकर किसे
सुख नहीं होता। हर मुख पर एक ही बात थी, ‘‘नालायक बेटों ने तो चक्की
बिकवा दी थी, वह तो बेटी ही लायक निकली जिसने सब सँभाल लिया, बेगाने के
हाथ गई सम्पत्ति फिर अपने हाथ आ गई थी।’’
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हाथ में ढेर सारे लिफ़ाफ़े लिए सुमित्रा ने घर में कदम रखा तो देखा, माँ
मिल के नामपट््ट के पास खड़ी बड़े गौर से उसे देख रही है। सुमित्रा को
देखकर माँ ने झट पीठ फेरकर दुपट्टे से आँखें पोछ लीं, जो मोटे चश्में के
भीतर से भीगी हुई सुमित्रा को साफ़ नजर आ रही थी। अब माँ के पास कहने को
कुछ था ही नहीं, क्या कहती। सुमित्रा हाथ का सामान रखने अन्दर जाती कि
तभी सड़क पर बस रुकी, कुछ मेहमान और आये थे। मिल और सड़क का फासला मुश्किल
से तीन गज़ का रहा होगा इसीलिए अंदर भी हर प्रकार की आवाज आती थी। भीतर
लपकती सुमित्रा के पाँव कण्डक्टर की आवाज ने बाँध लिए। वह सड़क पर खड़ा
चिल्ला रहा था, ‘‘कोई और है? बटेसर की चक्की, बटेसर की चक्की। जल्दी उतरो
चक्की वालो।’’
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समय गुजरते कितनी देर लगती है? मिल तैयार खड़ी थी। उद्घाटन का दिन आ
पहुँचा। सुमित्रा, मुरारी और उनके दोनों बेटे मेहमानों के स्वागत में
व्यस्त थे। दोनों भाई-भाभियाँ खिसियाए रहने पर भी भीतर की व्यवस्था को
सँभाल रहे थे। बढ़िया भोजनों की सुगन्ध, रंग-बिरंगे परिधानों, टेप
रिकार्डर पर बजती अंग्रेजी धुनों के बीच स्थानीय विधायक ने रिबन काटा,
नाम पट्ट पर पड़े आवरण की डोर पकड़ कर खींची, तालियाँ बज उठीं। कैमरों की
फ्लश गनें चमक उठीं। लोग फोटो की परिधि में आने के लिए एक दूसरे को
धकियाने लगे। आखिर ये फोटोग्राफ कल अखबार में आने वाले जो थे।
        आवरण हटते ही बजती तालियाँ एकदम रुक गईं जैसे चलती गाड़ी में अचानक ब्रेक
आ लगे हों, लेकिन अगले ही क्षण तालियाँ दुगने वेग से फिर बज उठीं। माँ की
बूढ़ी आँखें मोटे चश्में के भीतर एक बार फिर से छलक आईं। नाम पट्ट पर मोटे

अक्षरों में लिखा था,
‘‘बटेसर की चक्की’’
प्रो0 वरुण कुमार सन ऑफ मुरारी लाल
        लोग आगे बढ़-बढ़कर सुमित्रा को बधाइयाँ दे रहे थे। शहर के बढ़े-बूढ़े हज़ारों
आशीवादों से उसे लाद रहे थे। सबका धन्यवाद करती हुई सुमित्रा ने हाथ
उठाया। माहौल एकदम शान्त हो गया। सब लोग प्रतीक्षा कर रहे थे कि अब
सुमित्रा क्या कहने वाली है, देखें तो सही। मुरारी और उसके दोनों बेटे
आँखों में प्रश्न लिए माँ का चेहरा देख रहे थे कि सुमित्रा ने अपना मुँह
खोला, ‘‘यह चक्की क्योंकि मेरे पिताजी की निशानी है और मेरी माँ की रोटी
का आधार थी।  इसके बिक जाने से मेरी माँ परेशान थी। क्योंकि यह चक्की अब
मैंने खरीद ली है इसलिए अब उनकी सारी परेशानी मेरी परेशानी है। आज से माँ
के जीवित रहने तक उन्हें  इस चक्की अर्थात फ्लोर मिल से 500/- मासिक
पेंशन मिला करेगी। वे चाहे जिस बेटे के साथ या चाहें तो मेरे साथ भी रह
सकती हैं।
        एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कई बुजुर्गों के चेहरे आँसुओं से भीग गए।            
आशा शैली 

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