हिंदी साहित्य वैभव

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गुरुवार, 16 अगस्त 2018

1:55 am

अपना कोई जा रहा लौट के नही आने वाले सफर से.......

मेरे प्रिय राजनीतिज्ञों में एक, अटल जी, कुशल रणनीतिकार, कवि, एक बेहद प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व...
जीवन मृत्यु के बीच हैं,...अभी नाज़ुक स्थिति में...

अटल जी की स्थिति बहुत गंभीर बनी हुई है। जीवन रक्षक प्रणाली पर है हम ईश्वर से प्रार्थना करते है कि वे सामान्य स्थिति में आयें  

आप यूँ तो छोड़ कर ऐसे हम - सबको जा नही सकते ।
अब उठ़ो भी हे जनप्रिय ये कैसी आपकी खामोशी है ।।

© विकास भारद्वाज सुदीप 

      उठो अटल अभी लड़ना है, ये देश सारा पुकार रहा ।
      योद्धा  हो  तुम  कुरुक्षेत्र के, काल से कैसे हार रहा ।।

                        © शीतल वोपचे 

      हे !   कवि  कुलश्रेष्ठ   उठो   यूँ   हार  न  मानो तुम,
      मौत तुम्हें हरा नहीं सकती, इस बात को मानो तुम ।।

                      © कुमार सागर 


दिये जैसा समर्पण हो वही नेता कहाता है|
सुहाने बोल से अपने विरोधी को झुकाता है|
अटल जी प्रेरणा बनकर जिएँगें कोटि बरसों तक|
वतन हित भाव का अच्छा सही सब को सुहाता है|

          © डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'

अटल जो रहा है,अटल सा रहेगा
फंसे बीच कीचड़ कमल सा रहेगा 

बुझा न सकेगी तुझे कोई आंधी
सदा तेरा दीपक ये जल ता रहेगा ।।

© स्वराक्षी स्वरा 


काश! तू हँसते हुए हाथ  उठाये ।
यूँ नाम अटल सार्थक हो जाये ।।

अटल नाम था अजब काम था ।

खामोशी से तुने सबको बताया ।।

© साधना कृष्णा 


बिजलियो कौधना आज बिलकुल नही ।

आँसमाँ   के   सितारे   बचाना   तुम्हे ।।

© बृजमोहन साथी 


जिंदगी जंग ही में काटी है।
अटल है जंग मेरी साथी है।।

© कौशल कुमार पाण्डेय 

सदा  सलामत की दुआ,  करूँ हाथ मैं जोड़ |
अटल रत्न तुम एक हो, कभी न जाना छोड़ ||

© दिलीप कुमार पाठक 

🇮🇳🇮🇳


उम्मीद न थी,जो हो गया वो भी देखना पड़ेगा,
एक  शाश्वत  प्राण को पाखंड सहना पड़ेगा,
इस  राजनीति  की  नीति  भी देखिए जनाब,
अटल महाप्रयाण को आधिकारिक पुष्ट होना पड़ेगा


© खुशीराम बाजपेई


कुटिल  विषैले  अट्टहास  से,
    काल  सदा  विजयी  बनकर।
दे जाता  अमिट घाव मन को,
    आज  काल  कल  में सनकर।।


    © शुभा शुक्ला मिश्रा 'अधर'


दीप सदा जलता रहे,    
                  होत सदा गुणगान। 
नमन सारा जगत करे ,
                   जय अटल जी महान ।।

अमर हो गए प्रिय कविवर, 
                    सुंदर वक्ता महान।
श्रद्धांजलि अटल जी को,  
                    हर मन में पाये स्थान।।
                   
           ©भुवन बिष्ट


तोड़ गए बन्धन सभी, हृदय गए वो चीर ।
जन -जन के नेता बने, अटल बनी तस्वीर।।


                            ©मुकेश शर्मा "ओम"


वो अटल अमर हो गए।
वो आज थे कल हो गए।
विखेर कर यादें  अपनी,
 वो आँखों में नम हो गए।

©विवेक दुबे "निश्चल"



 ताज़ा प्रेस रिलीज

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

8:16 pm

तिरंगा --- चन्द्रशेखर ,भगत सिंह की तिरंगा विश्व में पहचान है तिरंगा छोड़, मैं जाऊँ कहाँ तिरंगा मेरी जान है।। - मोहन राना "अभय"

चन्द्रशेखर ,भगत  सिंह की 
तिरंगा  विश्व  में  पहचान है
तिरंगा छोड़, मैं  जाऊँ कहाँ
तिरंगा    मेरी     जान     है।

                     हिन्दुस्तान तिरंगा की  इबादत
                      यहाँ    फिदा    आसमान   है
                      फिदाई  ने जब  फिदा   किया
                      आह  निकली  क्या  महान है।

कलाम हिन्दुत्व के अजीज है
सपनों  में   उडा़ई ,  उडा़न  है
किशोर अवस्था  सोचा ख्वाब
कलाम     एक     जबान     है।

                       फिगार  ने  हमको फै़ज  किया
                       इसका     हमें     अभिमान   है
                       द्रोही का धड़ अन्जाम दिया था
                       उसका     क्या     खानदान   है।

गाँधी, लाला और   नेहरू  की
विश्व     में        पहचान     है
तिरंगा   छोड़ , मैं  जाऊँ  कहाँ
तिरंगा       मेरी      जान     है।

                © आर्य मोहन राना "अभय"
                                  मथुरा
                           9458468826

12:15 am

माँ प्यारी, माँ कितनी प्यारी, माँ जग की तू है उजियारी - मोहन राना

माँ प्यारी, माँ कितनी प्यारी
माँ जग की तू है  उजियारी
                    माँ बचपन का झूला पलना
                    माँ नदियाँ और मीठा झरना।

माँ आशीष  हो, जैसे बातेंं
माँ बिन नही कटती है रातें
                    माँ  मोहन  ममता  की  धारा
                    जैसे   माँ  हो   गंग   किनारा।

माँ बिहबल नित ओझल होती
आँखें  पकड़  पकड़ माँ  रोती
                   दादी  की   माँ   पहली  पोती
                   माँ  की   गोदी   स्वर्ग  पिरोती।

माँ प्यारी,  माँ  कितनी  प्यारी
माँ   जग   की   है   अपसारी
                    माँ   मेरी   है    भोरी  - भारी
                    सबसे   सुन्दर  प्यारी - प्यारी।
माँ प्यारी, माँ  कितनी  प्यारी।।


     ©आर्य मोहन राना "अभय"
                 मथुरा
           9458468826

सोमवार, 13 अगस्त 2018

3:44 am

ग़ज़ल - आज भी क़ायम हमारे देश में है राजशाही - टिल्लन वर्मा

आज भी  क़ायम  हमारे  देश  में है  राजशाही
हर नगर,हर गाँव में मिल जाएंगे ज़िल्लेइलाही

जितने ख़ालाज़ाद थे पल में इकट्ठे हो गए सब
जब यकीं होने लगा छिन जाएगी अब बादशाही

हड्डियाँ भी जिन बुज़ुर्गों की भजन करने लगी हैं
वो  सियासतदां अभी  तक चाहते  हैं  वाहवाही

अस्पतालों में  पड़े  रोगी  मुसलसल चीख़ते हैं
मर  गईं  संवेदनाएं  हो  रही  खुलकर  उगाही

जांच भ्रष्टाचार की जब चाहें तब कर लीजियेगा
सिद्ध कर सकते  नहीं ये भ्रष्ट अपनी  बेगुनाही

हाथ में  हथियार  भी हैं और  पत्थर  खा रहे हैं
हैं विवश कितने हमारे देश के "टिल्लन" सिपाही

ख़ालाज़ाद = मौसेरे भाई
टिल्लन वर्मा  (स्रोत: फेसबुक)
                              उझानी (बदायूँ)


शनिवार, 11 अगस्त 2018

10:01 pm

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह से अकरम खान की कुछ ग़ज़लें

 ग़ज़ल 1
122  122   122   122

मुहब्बत  भी  करके मुहब्बत न जानी ।
मुहब्बत में निकली वो कितनी सयानी ।।

दिवाना बनाया हैं उसने भी मुझको ।
दिवाना  बनाया  न  बनती  दिवानी ।।

मेरे दिल के जख्मों को देखे तो कोई,
ज़फा ही ज़फा है उसी की निशानी।

वो लैला नहीं थी तो मजनूँ बनू क्यों,
समझ ही न पाया ये दिल भी कहानी।

हैं दिल में भी नफरत के शोले सुलगते,
है दुनियां के दिल में भी उल्फत जगानी।

जरूरी  नहीं  के  जवानी  में  ही  हो,
है बचपन बुढापा भी इसकी रबानी ।।

न समझा जो इसको तो मिट ही गया वो,
बिना इसके सबको पडी़ मात खानी।

अज़ब हैं रिवायत जमाने में देखो ।
दिवानों को मारो न मारो ज़वानी।।

मेरा मुल्क दुनियां में आगे रहा है ।
हमें और है इसकी इज्ज़त बढा़नी ।।

कहीं आज मातम कहीं पर खुशी है ।
मिटी तो नही हैं जो चाहीं मिटानी ।।

निशाना बना है मुहब्बत में 'अक़रम',
मुहब्बत में फिर भी मिली न निशानी।

अक़रम खान

ग़ज़ल 2
122      122    121  12
       
वफा  उनसे  माँगी  वफा  न  मिली ।
खता  हमने  ढूंढी  खता  न  मिली।।

बहुत  कच्चे  धागों  से  रिश्ते  बधें ।
रिश्तों  से  हमें  तो  सदा  न  मिली ।।
 
होठों  पे  तबस्सुम  हैं  उसके  यूं तो ।
मगर उस हुस्न को वो  अदा न मिली  ।।

 नहीं  कोई  ऐसा  जमाने  में  अब ।
जमाने  में  जिसको  दगा  न  मिली ।।

बना  हूँ  मैं  मुजरिम अदब जो किया ।
मेरे  इस  मरज  को  दवा  न  मिली ।।

मुझे  लग  रहा  था  वो  होगी  खफा ।
मगर  आज  तक  वो  खफा  न  मिली ।।

गिरेवाँ  में अपने झाँके जमाना,
सजा़वर को क्यों कर सजा न मिली ।

यूं नफरत मिटाने की कोशिशें की ।
मुहब्बत की हमको घटा न मिली ।।

अक़रम खान

ग़ज़ल 3
1222    1222   1222  1222

नहीं हैवान मुश्किल है, नहीं शैतान मुश्किल है ।
जमाने में जरा ढूढों भले इंसान मुश्किल है ।।

शहर में बन रही हैं रोज ही पत्थर की दीवारें ।
मुअज़्ज़िन की पहुँच आजा़न मुश्किल है।

खुदा क्यों बन रहा है तू खुदा तेरा भी मालिक है ।
जिसे चाहें मिटा डाले उसे सब कुछ ये हासिल है।

कश्ती साहिल पे आकर डूब ही जाती है दोस्तों ।
कहाँ मालूम होता है जरा सा दूर  साहिल है।।

जो सच्ची बात पर हर वक्त लड़ता औ' झगड़ता है ।
जमाने में वही इंसान देखो सबसे जाहिल है ।।

जहन्नुम क्यों बना डाला ये तो दुनियां की जन्नत थी ।
ये मेरा पहले भी दिल था ये मेरा आज भी दिल है ।।

अजी आतंक ने मुस्लिम का सर नीचा किया अकरम ।
अमन  को  चाहने  वाला  न  कोई  इसमें  शामिल  है ।।

अकरम खान

ग़ज़ल 4
212   212    212   212 

शान महफिल में अपनी जमाया करो ।
गीत  मेरे  तुम  अब  गुनगुनाया करो ।।

हम मिलेगें सनम शाम को आज  पर ।
ज़ाम आंखो से गर तुम पिलाया करो ।।

सब  गिले  दूर  हो जाय तुमसे सुनो ।
ग़र नज़र से नज़र तुम मिलाया करो ।।

उसकी यादों को दिल में बसाया मैंने ।
जख़्म  यूँ  दिल  के मत दुखाया करो ।।

छोटी सी बातों पर तुम जो नाराज हो ।
यूँ  सितम  दिल पे  मेरे , न ढाया करो ।।

अकरम खान

ग़ज़ल 5
2122     122    122 12

चोट  खाती   रही   मुस्कराती  रही ।
दूध दुनियां को अपना पिलाती रही ।।

फब्तियां  कस  रहा  था  जमाना मगर ।
फब्तियों  को  गले  वो  लगाती  रही ।।

बहन बेटी बनी पत्नी बन के वो माँ ।
सारे रिश्ते मुकम्मल निभाती रही ।।

कितने धोखे दिये हमने कोढे़ दिये ।
सारे जुल्मों के सदमें उठाती रही ।।

जुल्म सहने की आदत ने बुजदिल किया ।
फिर भी जिंदादिली वो बढा़ती रही ।।

पेट  में  ही  इसे  मारता  नादाँ  है ।
फिर भी खुद को तसल्ली दिलाती रही ।।

आँख को बंद करके जमाना सुने ।
बेबसी वो सभी को सुनाती रही ।।

देके ममता को वो खा़क में मिल गयी ।
पर जमाने का गुलशन सजाती रही ।।

ना  धुँआ  ही  उठा सांस गुम हो गई ।
अपनी साँसों को 'अकरम' दबाती रही।।


ग़ज़ल 6
212×4
चाँदनी   रात   भर  जग  मगाती  रही ।
फिर  बहारों  के  सपनें  सजाती  रही ।।
राह  ए  इश्क  में  तो  मिली ठोकरें ।
जिंदगी  हर  कदम आजमाती रही ।।
हिज्र  की  रातें  भी आँखों  में काटी हैं ।
जिंदगी   क्यूँ   मुझे   ही  रुलाती  रही ।।
जख्म  दामन  मे  अपने  समेंटें  हुऐ ।
जिंदगी   तीरगी  को   मिटाती  रही ।।
बर्षा पानी छायी बदली यूँ रात भर ।
फिर तेरी याद मुझको सताती रही ।।


अकरम 7 
 212×4
हम सनम तुझमें ही आज खोने लगे ।
बन गये हमसफर, साथ चलने  लगे ।।

जब से तुम जिंदगी में आयी हो सनम ।
प्यार  की  राहों  में  फूल  खिलने लगे ।।

जो मुझे साथ तेरा मिला तब से ही ।
फासले किस कदर देख घटने लगे ।।

अपनी भी जिंदगी खूबसूरत होगी ।
इश्क  में  यार के हम तो होने लगे ।।

संग चलने का वादा अभी कर लिया ।
देखकर लोग  हमको वो जलने लगे ।।


 8

122  122  122  12 
खुशियों भरी थी हर जिदंगी

वो मिलकर जुदा तो नहीं हो गया ।
सनम  वेवफा  तो  नही  हो  गया ।।

जाने कौन सी बात दिल को लगी ।
सनम गमज़दा तो  नही  हो  गया ।।

मैं सच बोला था और वो शक्की थे ।
कहीं  फासला  तो  नही  हो  गया ।।

 किसी  बात पर  वो  मुझे  छोडकर ।
 कहीं  वो  खफा  तो  नहीं  हो गया ।।

पराये   हुए   अपने   ऐसा   लगा ।
कहीं  हादसा  तो  नही  हो  गया ।।

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

7:39 am

जिला हरदोई स्वाधार गृह से 19 महिलाएं लापता ----राजेश मिश्र प्रयास

----शव्द प्रहार-----------

जिला हरदोई बीच
               महिला स्वाधार गृह
महिलाएं लापता हैं
               गिनती उन्नीस है
सुर्पनखा ताड़का भी
               गृहों में डटी पड़ीं हैं
बड़ा भाई कर रहा
               इकट्ठी ये फीस है
धीरे धीरे खुली पोल
             गपला था गोल मोल
मुझको दिखाई दिया
             जिन्दा दसशीस है
जाँच में खुलासा हुआ
             दुष्टों में इजाफा हुआ
खा रहा है नारियों को
               कौन सा खब्बीस है

💐💐💐💐💐💐💐💐
    राजेश मिश्र प्रयास
   बीसलपुर पीलीभीत
यदि सच लगे तो आप सभी का आशीर्वाद चाहता हूँ

7:26 am

ऐ अमर वीर बलिदानी भारत के सपूत - प्रदीप ध्रुवभोपाली


ऐ अमर वीर बलिदानी भारत के सपूत अंगार लिखो।
तुम मातृभूमि के लिए करो उत्सर्ग और तुम प्यार लिखो।


दुश्मन को कर दो तहस नहस औ धूल चटा दो तुम उनको
दुश्मन के लाखों शीश काट जय महाकाल जयकार लिखो।


जो लहू आग की तरह गर्म न हुआ लहू नहिं पानी है,
तुम महाप्रलय बन टूट पड़ो दुश्मन पे हाहाकार लिखो।


ऐ शूरवीर तुम बनो काल दुश्मन को मृत्यु दो अकाल,
तुम करो वार मरते हजार हो दुश्मन का संहार लिखो।


महाराणाप्रताप का है प्रताप लक्ष्मीबाई का तेज भी है,
बम तोप मिसाइल का गर्जन खूँ की प्यासी तलवार लिखो।


ये भगतसिंह आज़ाद राजगुरु का बलिदान नहीं भूलें,
हो पाक और नापाक कोई अब युद्ध हो आरोपार लिखो।

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प्रदीप ध्रुवभोपाली, म,प्र
भोपाल, दिनाँक-04/08/2018
मो.-09893677052
■■■■■■■■■■■■■■

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

1:02 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में नमिता नज्म की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल 1                         
2122 1212 22
                                         
मेरी आँखों के आब जैसा था ।
वो महकते गुलाब जैसा था ।।
               
उसकी  आँखों में वो नशा था ।
हां वो बिलकुल शराब जैसा था ।।

ख्वाहिशों के हुजूम बढते तब ।
वो तो रंगीन ख्वाब जैसा था ।।

 तू तो मेरी हदो से बाहर था ।
 कोई हीरा नायाब जैसा था ।।

 मेरी मंज़िल कभी नहीं था वो ।
 फिर भी मेरे जनाब जैसा था ।।
     
  नमिता "नज़्म"

ग़ज़ल 2

1222  1212  1222  1222

दिले नादान को न पूछ कैसे हमने समझाया ।
कभी मुट्ठी में आसमां थाली में चाँद दिखलाया ।।

गुज़ारी एक उम्र हमने तुम्हारे इंतज़ार में ।
न टूटे ख्वाब नींद से अजी खुद को न उठाया ।।

मचलती लहरों पे अक्सर तिरी तस्वीर बनती है ।
बड़ी शिद्द्त से ये हुनर मैनें आँखों को सिखलाया ।।

अलग ये बात है कि तुम निभा  पाए न कुछ वादे ।
तुम्हारे आने की आहट से हर पल दिल को धड़काया ।।

मेरी आँखों में तेरे वस्ल के मंज़र मचलते है ।
कहीं गिर जाए न मोती जो हर पल बचाया है ।।

 नमिता "नज़्म "

ग़ज़ल 3
212  212   212    22

मौसमों से बदल कैसे जाते हो ।
क्यों मुझे इतना तुम सताते हो ।।

मेरी सांसो को तुम रोक कर तुम अब ।
क्यों यूं रफ्तार दिल की घटाते हो ।

आँखों में ख्वाब भी अब नहीं यारा ।
क्यों मिरी अब नींदे तुम उड़ाते हो ।।

अपने ही दिल से की ये बगावत क्यों ।
कैसी चाहत ये जो तुम निभाते हो ।।

कतरा कतरा बचा है मिरे अंदर ।
क्यों उसे लहरों से तुम लड़ाते हो ।।

नमिता "नज़्म"

गज़ल  4
2122    2122   212

उल्फत  होनी  थी  इशारा  हो  गया ।
इक  कदम  ठहरें  किनारा  हो  गया ।।

हम तो थे तन्हा वो बन साथी आये ।
आसमाँ भी फिर हमारा हो गया ।।

चलती थमती जिंदगी तेरी खातिर ।
अब मुकम्मल वो सहारा हो गया ।।

दोस्तों में थे हम बहुत प्यारे अजी ।
तुमसे मिलकर दिल तुम्हारा हो गया ।।

साथ मेरे अब सफर में नज़्म है ।
खूबसूरत  सा  नज़ारा  हो गया ।।

नमिता "नज़्म"

ग़ज़ल  5
2212      1221   2122

पहचान  पर  जमी  गर्द  धुल  रही है ।
ख्वाहिश की बेड़ियाँ आज खुल  रही है ।।

मेरा  वजूद  अब  उभरने  लगा  है ।
अब जिंदगी यूँ ही चाक सिल रही है ।।

तेरी निगाहों में छिपती यही  मुहब्बत ।
यूँ हमसफ़र  की  खुशबु मिल रही है ।।


ये मेरा दिल धड़कता तेरे लिऐ ही ।
मैं राह में खड़ी धूप भी खिल रही है ।।

उससे मिला मेरा दिल यूँ नज़्म जैसे ।
अब प्यार की मिठास सी घुल रही है ।।

नमिता "नज़्म"

ग़ज़ल  6
1222    1222  1222   1222

ये जो उल्फत हैं अब सारे जमाने को बतानी है ।
उसी के साथ ही अब जिंदगी मुझको बितानी है ।।

ये दरख़्त मुहब्बत और जज़्बातो के है यारा ।
इन्ही की छाँव छोटी आशियाँ अपनी बनानी है ।।

अलग से तो कोई लम्हा नहीं   आयेगा अब अपना ।
सफर में ही सभी ख़्वाहिश यूँ ही मिलकर सजानी है ।।

ये तेरे मेरे ख्वाबो के चमकते  जुगनू है अब तो ।
इन्ही से अब हमें मिलकर अंधेरी को हरानी है ।।

हया तो मुश्किलें देती रहेगी "नज़्म" दस्तक पर ।             
इन्हें तो साथ मिल-जुल कर हमें ही तो निभानी है ।।

नमिता "नज़्म"

ग़ज़ल  7
2122    1222    1122  22

दिल की मानिंद कोई और मचलता क्यों है ।
है अगर संग तो वो मोम सा गलता क्यों है ।।

मेरे दिल में है क्या मै कैसे बताउ उसको ।
हमसफ़र वो नहीं तो साथ में  चलता क्यों है ।।

मेरा दामन भरा है चाँद सितारों से  पर ।
मेरी क़िस्मत में फिर अँधेरा ही दिखता क्यों है ।।

इंतजार कभी अब खत्म नहीं होगा पर ।                                आइना देख कर वो रोज सँवरता क्यों है ।। 

मैंने माना नहीं मिलना है तुझे अब मुझसे ।                 
तेरी नज़रो में इतना प्यार छलकता क्यों है ।।

नमिता " नज़्म "

ग़ज़ल  8
2122     1222       12   
                     
सारे  एहसास  तुझसे  मिलते  हैं ।   
तुझसे  ज़ज्बात   मेरे  मिलते  हैं ।।

 देख  बरसे है मुझपे अब बादल  ।
 तुझसे  बरसात  भी  तो  मिलते  हैं

 मेरे  क़दमो  को  तेरा  साथ  मिले ।
आओं  हालात  से हम  मिलते  हैं ।।

 मैं  करूँ  दिल  की  बातें  तुझसे सब ।
 अपने  ख्यालात  भी  तो  मिलते हैं ।।

 मर   के   भी   मैं  बनूगीं  तेरी  ही ।
 हर  ज़नम  में अगर  वो मिलते हैं ।।

 नमिता "नज़्म "
9 अगस्त 2018 

बुधवार, 8 अगस्त 2018

1:04 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में डा. नसिमा निशा की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल 1

नदी की धार, समन्दर, लहर किनारों ने ।
लगाया पार, हमेशा ही तेज़ धारों ने ।।

सभी को रौशनी मिलती है आसमाँ से,
हमें तो अंधेरा ही बख्शा है चाँद तारों ने ।।

असीर हौसला उड़ने का दे रहे लेकिन,
हमारे पंख काट दिये हैं हमारे सहारों ने ।।

किसे करें शिकायत कि आईना अपना,
किया है चूर -चूर खुद अपने ही प्यारों ने ।।

' निशा 'खिज़ा ने ज़रूर हमारा साथ दिया,
फ़रेब तो बारहा हमको दिया बहारों ने ।।

डा. नसीमा निशा

गज़ल 2

वज्न - 2122 1212 22

दर्दे दिल की किताब रहने दो ।
ये मुसलसल अज़ाब रहने दो ।।

नींद तो मेरी आपने छींनी ।
मेरी आँखों में ख्वाब रहने दो ।।

हर खुशी आपको मुबारक हो ।
मेरी आँखों में आब रहने दो ।।

इश्क में हमने तुमने क्या पाया ।
फ़िर करेंगे हिसाब रहने दो ।।

आप से क्या वफ़ा की उम्मीदें ।
अब तो छॊडॊ जनाब रहने दो ।।

ये बहाना है लड़खड़ाने का ।
मेरी आंखें शराब रहने दो ।।

तुमसे कोई सवाल नही मेरा ।
पास अपने जवाब रहने दो ।।

सब हक़ीक़त निशा पता है अब ।
कैसे   हो   तुम   नवाब  रहने दो ।।

ड़ा० नसीमा निशा

गज़ल 3

उसके वहमो गुमान में रहना ।
हर घड़ी इम्तिहान में रहना ।।

बन के बादल किसी की यादॊ का
फ़िक़्र के आसमान मे रहना ।।

दुश्मनी क्यों किसी से हम रख्खें ।
कब तलक है जहान में रहना ।।

रूह भी चाहती है आज़ादी ।
क्यों बदन के मक़ान में रहना ।।

करके एहसान जो जताते हैं ।
क्यों समझते हैं शान में रहना ।।

तू तो सूरज है रौशनी देकर ।
हर घड़ी तुम ढलान में रहना ।।

जानते हैं कि दुनिया फ़ानी है ।
क्यों यहाँ आन-बान में रहना ।।

पर-क़तर जायें ये 'निशा' फ़िर भी ।
हौसलो से उड़ान में रहना ।।

ड़ा० नसीमा निशा

गज़ल 4

वज्न - 212 212 212 212

सिस्कियां ले रहे आज रिश्ते सभी ।
 झूठ लगने लगे लोग हंसते सभी ।।

हर तरफ़ साज़िशो की चली है हवा ।
खौफ़ज़द हो रहे सब्ज़-पत्ते सभी।।

भाव इंसानियत का उतरता गया ।
आदमी हो गये आज सस्ते सभी ।।

हमसफ़र वो नहीं साथ फ़िर भी रहे ।
एक हम ही नही लोग कहते सभी ।।

उठ रहा है धुआँ अब यहाँ इसलिये ।
बुझ गए दीप अब जलते-जलते सभी ।।

भूख से बिलबिलाती गरीबी यहाँ ।
देख कर भी मियाँ आगे बढ़ते सभी ।।

कर 'निशा' जानो-दिल तू खुदा पे फ़िदा ।
एक उसके सिवा गैर लगते सभी ।।

ड़ा० नसीमा निशा

ग़ज़ल 5

वज्न - 122    122    122  122

ये  दिल  जैसे  जैसे  मचलता रहेगा ।
वही  दर्द  ग़ज़लों  में  ढलता  रहेगा ।।

ये फ़िरकापरस्ती का आलम जहाँ में ।
कभी  ख़त्म  होगा  या  चलता रहेगा ।।

कहाँ  एक  सा  कुछ  रहा  है  जहाँ में ।
ये  मौसम  है  प्यारे,  बदलता  रहेगा ।।

कोई  बेइमानी  नहीं  अब  चलेगी ।
ये  नेकी  का  सिक्का  है चलता रहेगा।।

सिला चाहतो का भले तुम न देना ।
वफ़ा का दिया फ़िर भी जलता रहेगा ।।

नज़र  दिल तुम्हारा ज़बा भी तुम्हारी ।
हरिक हक़ तुम्हें ही क्या मिलता रहेगा ।।

"निशा "चाहने से न बदलेगी दुनिया ।
ज़माना  तुम्हें  ही  बदलता  रहेगा ।।

डॉ नसीमा "निशा"

ग़ज़ल 6
वज्न- 222    221   122

होने को  मशहूर  हुए हैं ।
अपनो  से ही दूर हुए हैं ।।

थी मजबूरी थाम सके न ।
अच्छे दिन काफ़ूर हुए हैं ।।

घर की क़ीमत जाने वो ही ।
घर  से  जो  भी दूर हुए हैं ।।

दौलत  का  जादू चढें जब ।
रिश्ते  सब  नासूर  हुए हैं ।।

उतरा हैं जो उम्रे-नशा अब ।
मंज़र   सब  बेनूर   हुए  हैं ।।

भूलेंगे हम देखो 'निशा' सब ।
आज बहुत मजबूर हुए हैं ।।

ड़ा० नसीमा निशा

ग़ज़ल 7
212     2212    2212

ज़िन्दगी  बेजान  है  तेरे बिना ।
कुछ नहीं आसान है तेरे बिना ।।

क्या कहें कैसे कहें ए जानेजाँ ।
ज़िन्दगी हलकान है तेरे बिना ।।

इश्क  न  जाने  ये  कैसा  मर्ज़  है ।
खुद  से  है अंजान हम - तेरे बिना  ।।

भाग जाता है हदो को तोड़ कर ।
दिल  बहुत नादान है  तेरे बिना ।।

थी निशा की शोखियाँ अनमोल सी ।
ज़िन्दगी  वीरान  है  तेरे  बिना l।

ड़ा० नसीमा निशा

गज़ल 8
222 221 122

देखो तो दीवार कहाँ है ।
दो धारी तलवार कहाँ है ।।

तुम भी इंसा ,हम भी इंसा ।
सोचो तो तक़रार कहाँ है ।।

गंगा- जल जो चाहे पी ले ।
मज़हब पहरेदार कहाँ है ।।

साथ जियेगें, साथ मरेगें ।
बोलो वो इक़रार कहाँ है ।।

एक फ़लक है एक ज़मी है ।
हमको भी इंकार कहाँ है ।।

हाथ पकड ग़र साथ चले तो ।
फिर मंन्ज़िल दुश्वार कहाँ है ।।

आज निशा सब रिश्ते बदले ।
पहले  जैसा   प्यार कहाँ है ।।

ड़ा० नसीमा निशा

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

9:58 pm

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह से नेहा चाचरा बहल की कुछ ग़ज़लें

1

और कुछ दे नहीं सकते तुम्हे हम प्यार के सिवा ।
दिल में रह नहीं सकता कोई दिलदार के सिवा ।।

मैं रस्ता ताकती हूँ किस घड़ी तू मिलने आजाए ।
हां मैंने पा लिया सब कुछ तेरे दीदार के सिवा ।।

निगाहों में समा जा तू तो दिल को चैन आजाए ।
मुझको कुछ नहीं भाए तेरे इक़रार के सिवा ।।

सुकूं मिल जाता है मुझको देखकर एक झलक तेरी ।
कि मैने सुन लिया सब कुछ तेरे इज़हार के सिवा ।।

जो तेरी याद आये तो तड़प के आहें भरती हूँ ।
याद बस तू ही है मुझको तेरे तकरार के सिवा ।।

ये 'नेहा' बात बोले तो उसे तुम गौर से सुनना ।
नही अब चाहतें दिल की बस तेरे प्यार के सिवा ।।

© नेहा चाचरा बहल

2

तुमसे मिलने को हम भी बेकरार बैठे हैं ।
पलकें बिछा के हम अंगना बुहार बैठे हैं ।।

यूँ तो दीदारे चाँद रोज़ ही कर लेते हैं ।
अब तो पूनम का करने इंतज़ार बैठे हैं ।।

इश्क की खाई में हर शख्स फिसल जाता है ।
तू अगर साथ दे हम भी तैयार बैठे हैं ।।

तेरी आंखों से जाम हमको भी पी लेने दे ।
प्याले हम प्यार के लेकर हज़ार बैठे हैं ।।

अब तो ज़िंदा हैं बस सनम तुम्हारी चाहत से ।
प्रेम बरखा समेटे कब से यार बैठे हैं ।।

ज़ुस्तजू में लगे हैं सिर्फ तुमसे मिलने की ।
तेरे स्वागत में हम बाहें पसार बैठे हैं ।।

न जाने 'नेहा' कि तू किस घड़ी आजायेगा ।
तेरे लिए सजा के घर के द्वार बैठे हैं ।।

3

दूर से ही सही नज़रो को मिल ही जाने दो ।
आज फ़िर गीत मुझको प्यार का तुम गाने दो ।।

यूँ तो रंगीन है हर शाम यहाँ यारों की ।
इस हँसी शाम में कुछ पल मुझे बिताने दो ।।

देखो तुम देख कर के बदसलूकी करते हो ।
इक नज़र तुझको देखलूं मुझको आने दो ।।

यकीं करो कि चाहतें बहुत हैं तेरे लिये ।
खैरमकदम में हमे पल्कों को बिछाने दो ।।

ये मानते हैं नेहा ,वक़्त मुक्कमल नहीं है ।
पल दो पल ही सही खुदको तुम सताने दो ।।

4

तुम कहते हो तो तुमको मैं एक गीत सुनाती हूँ ।
अपने दिल का हाल तुम्हे गाकर ही बताती हूँ ।।

क्यों हो तुम यूँ खफ़ा खफ़ा इतराते फिरते हो ।
मैं ही बुद्धु हूँ क्या तुम पर जान लुटाती हूँ ।।

जिस पर जग ऐतबार करे वो प्यार का सौदा है ।
आओ बैठो पास मेरे मैं प्यार सिखाती हूँ ।।

दिल की धड़कन साथ न दे इसका क्या भरोसा है ।
रखलो दिल पे हाथ,मैं दिल का हाल सुनाती हूँ ।।

मेरे दिल का मीत है वो,दिल जिसने तोड़ा है ।
नाम से जिसके आज भी मैं हर पल मुस्काती हूँ ।।

ये भी सच है तन्हाई में हर याद उसी की है ।
जिसकी याद में मैं 'नेहा', सब कुछ लिख जाती हूँ ।।

5

काश सच ये ख़्वाब वाली बात हो जाय ।
तेरा मेरा हो साथ तब बरसात हो हो जाय ।।

हाथों में हो हाथ और भीगे हों दो बदन ।
संग सुबह से शाम और फ़िर रात हो जाय ।।

तू टूट के पिघले जिधर बाज़ु हों वो मेरी ।
ऐसी ही कुछ खुदा की करामात हो जाय ।।

खामोश रहें लब और आंखों से बोलें हम ।
ऐसी भी मेरे यार अपनी मुलाकात हो जाय ।।

'नेहा' निबाहेंगे सदा रिश्तों को उम्र भर ।
ये अपनी मुहब्बत की बस शुरुआत हो जाय ।।

6

कोशिश रहेगी दिल को तेरे मैं करार दूँ ।
भूले न जिसको तू कभी तुझको  वो प्यार दूँ ।।

बातों में हंसी रात को ज़ाया न कीजिये ।
बिखरी हैं रुख पे ज़ुल्फ़ जो इसको सवाँर दूँ ।।

मांगे बिना ही तूने मुझे सबकुछ तो दे दिया ।
अब आ ज़रा करीब तुझे बाहों का हार दूँ ।।

बरसात का यूँ आना और साथ में है तू ।
भीगे लबों पे तेरे  मैं खुद को ही वार दूँ ।।

ज़िक्र तुझसे प्यार का तुझसे ही कर दिया ।
'नेहा' ये तू भी कह दे, प्यार बेशुमार दूँ ।।

7

कुछ हकीकत मेरी शेरों में छुपी होती है ।
दिल की आवाज़ सदा कलम से जुडी होती है ।।

जिगर में दर्द है,चेहरे पे जो दिखता ही नहीं ।
लबों पे इस कदर मुस्कान बिखरी होती है ।।

मुझको खुद नहीं पता  कि मैं परेशां क्यों हूँ ।
क्यूं दिल धड़कने की आवाज़ बढी होती है ।।

मैं रूठ कर भी नहीं रूठी सी रह पाऊँ उनसे ।
कि उनसे मिलने की जल्दी भी इतनी होती है ।।

हँसूं मैं जोर से तो इसमें बुराई क्या है ।
मैं मुस्कराऊँ तो भी सबकी नज़र होती है ।।

क्यों गुर्बतें तेरी आँखों में नेहा रहती हैं ।
अधूरे ख्वाबों की हर बात जुडी होती है ।।

© नेहा

8

ये प्यार ही तो है जो बेकरार करता है ।
मेरा दिल अब भी तुझपे ऐतबार करता है ।।

कितना चाहूँ मैं तुझे ये बताना मुश्किल है ।
दिल तो हर ख्वाब में दीदारे यार करता है ।।

हसरतें ये दिल की आज मेरे बस में नहीं ।
दिल तुझे मिलने की कोशिश हज़ार करता है ।।

दरमिया हमारे देखो दूरियां बहुत हैं ।
मेरा दिल फिर भी तुझपे जान निसार करता है ।।

नेहा नाकाम है तुझसे मिल नहीं पाती ।
रूबरू हम मिलें दिल इंतज़ार करता है ।।

© नेहा चाचरा बहल 

रविवार, 5 अगस्त 2018

5:38 am

मित्र प्यार की, सरस धार - दिलीप कुमार पाठक

मित्रता दिवस की हार्दिक बधाई के साथ ~

मित्र प्यार की, सरस धार है|
मित्र प्यार का, सरल सार है||
मित्र प्यास है, नवल आस है|
मित्र गंध का, कमल पास है||

मित्र सृष्टि की,अनुपमा लगी|
मित्र प्रीत में, सहजता पगी||
मित्र गीत का, अधर साज है|
मित्र राग से, नवल आज है||

मित्र साथ में, सहज गीत से|
मित्र हार में, सकल जीत से||
मित्र प्रात सा, नयन योग है|
मित्र ज्ञान का, मधुर भोग है||

मित्रता दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ
🌹🙏🏻🌹

©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
              संस्थापक
जनचेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति
      बीसलपुर (पीलीभीत)

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

9:58 pm

आज जन्मदिन है युवा साहित्यकार विकास भारद्वाज जी का आइये लुत्फ लेते है उनकी कुछ ग़ज़लों का......


आज रू-ब-रू होते हैं उस कम उम्र के उस बड़े शायर से... जिसकी कहन दाँतों तले उँगलियाँ दबाने पे मजबूर कर देती है...

हम बात कर रहे हैं यूपी के शहर बदायूं से ता'अल्लुक़ रखने वाले नौजवान शायर अक़्स बदायूंनी जी की... शायरीबाज़ी का एक अलग अंदाज़ अक़्स जी की शायरी को बेहद खास बना देता है...आइए लुत्फ़ लेते हैं अक़्स बदायूंनी जी की ख़ूबसूरत सी ग़ज़लों के कुछ शेरों का...

मुझसे तेरी आंखो  की  क़यामत  नही  देखी  जाती ।
यार   तेरी  जुल्फो  की  शरारत  नही   देखी  जाती ।।

इक नज़र मुझसे मिला लें जो तू फिर महफिल में ।
देखने    वालों    की    हैरत   नही   देखी   जाती ।।

तुम्हारे बिन मुझे अब अपना घर अच्छा नही लगता ।
नही हो साथ तुम अब ये सफ़र अच्छा नही लगता ।।

गरीबों  की  बस्तीं  में  आती जब भी आधियां हमकों ।
तबाही  का  कभी - कोई  मंजर  अच्छा  नही लगता ।।

बढो तुम जिंदगी से प्यार होगा ।
पढो सपना तभी साकार होगा ।।
     
करो माँ - बाप की सेवा निस्वार्थ ।
तभी जीवन सदा गुलजार होगा ।।

किया सम्मान तुमने जो बडों का ।
वहाँ फिर आपका सत्कार होगा ।।

लबों का आज जो खामोश होना ।
समझ आया तुम्हें इनकार होगा ।।

थोड़ी उलझन में  हूँ  पर  बुज़दिल  नही ।
साथ हो तुम  फिर  कोई  मुश्किल  नही ।।

इस  तन्हा  दिल  को  ले  जायें  हम  कहाँ ।
बिन  तुम्हारे  जमती  अब  महफिल  नही ।।

ये  तन्हाई  और  ये  आलम  बडा  खुदगर्ज है ।
उम्र  भर  अब  हम  भरेगें  जिंदगी  इक  कर्ज़ है ।।

जिंदगी  से  यूँ  कभी  तेरा  मिटेगा  नाम  क्या ।
हर  वरक  में  तू  फसाने  की  तरह  अब  दर्ज   है ।।

हम   मुहब्बत   से  मुहब्बत   का'  सिला   देते   है  ।
बर्षों'  से  बिछडें'   उन्हें  दिल  से'  मिला   देते   हैं ।।

यूं   तो  रिश्तों  में  हो  जाती  है  गलतफहमी  पर  ।
हम   दिलों   की   दूरियां   दिल  से  मिटा  देते  हैं ।।

1:07 am

कलम अनवरत् फिर चलती जायेगी तब हमें खूबसूरत सी मंजिल हासिल होगी - विकास भारद्वाज

गुरू जी चरणों में मेरी कुछ पंक्तियां समर्पित :-

गुरू-चरणों से गुरू - ह्र्दय तक, गुरू-प्रेम से सींचेगा जब रूह अपनी होगी ।
कलम अनवरत् फिर चलती जायेगी तब हमें खूबसूरत सी मंजिल हासिल होगी !।
गुरू ही दर्पण, शिक्षा के द्वारा जनमानस-समाज को जागृत करते,
गुरू की डांट से न इतराना इसमें हमारी छुपी हुई भलाई होगी ।।

हम रोज अभ्यास करे, गुरू जी बड़े प्यार से सिखाते है ।
गुरू जी के आशीर्वाद से ही हम अच्छा सृजन कर पाते है ।।
गुरू का तुम अपमान न करना वो सिर्फ सम्मान चाहते हैं,
जीवन में आने वाली कठिनाईयों से हमें अवगत कराते हैं ।।

© विकास भारद्वाज
  27 जुलाई  2018


गुरुवार, 26 जुलाई 2018

9:14 pm

हिन्दुस्तान में सुहागिन महिलाएं करवा रही मुड़न - राजेश मिश्र

ये उमा रमा का साहस है ये वीरों की परिभाषा है
जो ढोल पीटते हिन्दू का धरती पर घोर कुहासा है
बेदर्दी जल्लादों सा व्यवहार यहां पर होता है
कुछ चंद लफंगे हसते हैं मजबूरों का दिल रोता है
ये राम राज का शासन है या खरदूषण सा जंगल है
अपना ही मार रहा खुद को देखो ये कैसा दंगल है
कुछ नकभिन्ने प्रत्येक जगह पर नाक बड़ी भिन्नाते हैं
जिन पर न मरी मुशरिया है खुद को आजाद बताते है
नक्सल वादी की तरह आज व्यवहार निभाया जाता है
सत्रह सालों के तपस्वी को बेकार बताया जाता है
यहां दिखते नही सुधारक हैं उनको ये शर्म मुबारक हो
इन वाणी के जल्लादों को लाशों की बड़ी तिजारत हो
दयनीय दशा से ये गुजरे परिभाषा कैसे छूट गयी
दुर्योधन दिखे असंख्यों हैं गिनती की भाषा छूट गयी
इस तानाशाही शासन ने खेल मौत का खेला है
इन पढ़े लिखे मासूमों ने हर बार वक्ष पर झेला है
वाजीगर ने हर बार कहा मैं काम तुम्हारा कर दूँगा
मन में उनके अभिलाषा थी मैं जहर जिस्म में भर दूँगा




राजेश मिश्र
बीसलपुर (पीलीभीत)

मंगलवार, 24 जुलाई 2018

9:33 pm

सात सौ हिन्दू शिक्षा मित्र मर चुके लेकिन सरकार मौन

कैसे मानू कट्टर हिन्दू मर रहे आज हिन्दू भाई
तुम ढोल पीटते छाती पर औ बजा रहे हो सहनाई
इनके घर में मातम पसरा सन्नाटा मुझे दिखा भारी
इन मासूमों पर जुल्म ढहा करते उन्नीस की तैयारी
गंगा पर बसे बनारस में रैली में तुमने वोला था
जुम्मेदारी अब मेरी भाषण में शव्द ये तोला था
माँ गंगा ने भी सुने शव्द वह सोच रही मन में होगी
माँ से भी झूठ वोलते हैं बदनामी जन जन में होगी
मर चुके उन्हीं की लाशों पर सत्ता लेकर इठलातें हैं
इनके घर जाकर देखो तो भूखे बच्चे चिल्लाते है
जब जब कोई बेबस रोकर दिल ही दिल में जलता है
चाहे जो सत्ता भोगी हो सिंहासन उसका हिलता है
कौरव दल में सब योद्धा थे फिर कुरूक्षेत्र क्यों हार गये
वनवास भले ही भोगा हो पर पाण्डव बाजी मार गये
सत्य सनातन सनातनी परिभाषा नही दिखी मुझको
जख्मों पर मरहम लगा सके वो आशा नही दिखी मुझको
जो खुद को कहते रामभक्त वो झूठ बोलते दिखे मुझे
पाँच साल तक अपनों की ही पोल खोलते दिखे मुझे
महिला भी मरी ये पुरुष मरे बच्चों ने चिता जलायी है
सत्ता के चौकीदारों का एक शव्द न पड़ा दिखाई है
बड़े बड़े फनकारों ने दो शव्द नही वोले इन पर
दाताओं ने आकांओ के दिल रहम नही डोले इन पर
नीति राम की नही दिखी मर्यादा नही दिखाई दी
सूर्य वंश जैसी कोई परिभषा नही दिखाई दी
जो नीति नही अपना सकते वो राम को क्या अपनायेगें
जो पड़ा अयोध्या में तम्बू उसको कैसे हटबायेंगें
जिसके भगवान हो तम्बू में वह सोते दिखे कोठियों में
उसके न कलेजा दिखा शेर है पानी भरा बोटियों में
बेबस मजबूर दुखी का जो जमकर उपहास उडाते हैं
वो गीदड ही रह जाते हैं वो शेर नहीं कहलाते हैं
घर घर का शिक्षा मित्र जगा तो सत्ता को हिलवायेगा
अभी समझ रहे जिसको लल्लू इतिहास बदल कर जायेगा
💐💐💐💐💐💐💐💐
जय हिन्द जय भारत
राजेश मिश्र

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

10:45 pm

गांव का घर - अनन्तराम चौबे

गांव हमारा सुन्दर प्यारा
गांव का घर है अलग न्यारा ।
बचपन की है याद दिलाता ।
बरसात का मौसम याद है आता ।
पानी रोज वहाँ गिरता था ।
हफ्तो सूरज दर्शन नही देता ।
आंगन गलियो मे कीचड़ रहता ।
मूसलाधार जब बारिश होती ।
गांव की नदी उफान पर रहती ।
नदी मे तैरते मस्ती करते
साथी सभी इकट्ठे रहते ।
नदी मे खूब नहाते रहते ।
स्कूल रोज पढने को जाते
नागा न स्कूल का करते ।
बाढ बहुत जब नदी मे आती
घर के आंगन तक आ जाती ।
गलियो मे पानी भर जाता
घर से निकलना मुश्किल होता ।
बरसात शुरू जब होती थी
घर के सामने के बाड़े मे
माँ भुट्टा ककड़ी भिन्डी
के पेड़ लगा देती थी ।
भुट्टा बड़े जब हो जाते
रोज भूजकर खाते थे
वही नाश्ता करते थे ।
एक हाथ की ककड़ी होती
खाने के साथ उसको खाते ।
अब तो गांव गांव नही लगता
शहर के जैसा अब वो लगता ।
अभी भी गांव मे घर है अपना
बचपन की याद जब आती
मन को भावुक वो कर देती ।

अनन्तराम चौबे 'अनन्त'
    जबलपुर म प्र

      
6:10 pm

धन औ शोहरत त्यागिये अब दोस्ती इंसान से आओ निभायें - प्रदीप ध्रुवभोपाली

धन औ शोहरत त्यागिये अब दोस्ती इंसान से आओ निभायें।
भूँख से जो हैं हताहत और दुखी आओ गले उनको लगायें।
धर्म जाति के बखेड़े राजनैतिक आपसी मे हैं लड़ाते,
हिन्द पर क़ुर्वान हों सब देशवासी ये तराना गुनगुनायें।
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ओजकवि प्रदीप ध्रुवभोपाली, भोपाल.दिनाँक-15/07/2018,मो.9893677052
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4:56 am

नई रोशनी नई पहल ~विमोचन एवं सम्मान समारोह दौसा(राजस्थान) ~यात्रावृत्त

जैसा कि प्रजातन्त्र स्तम्भ का प्रकाशन के चीफ आ0 अनिल कुमार गुप्ता जी ने पहले ही अवगत करा दिया था कि दौसा में विमोचन और सम्मान समारोह 15 जुलाई 2018 को करेंगे|प्रतीक्षा की घड़ी धीरे धीरे समाप्त हुई, कार्यक्रम से पाँच दिवस पूर्व निमन्त्रण भी प्राप्त हो गया,दौसा जाने की तैयारी शुरू ही साहब|

     मैं और प्रयास दोनों लोगों ने दौसा जाने हेतु कमर कस ली, दो दिन पूर्व ही घर से निकल पड़ा,बरेली आ0 प्रयास जी की बहिन जी के यहाँ रात्रि बितायी,पूड़ी सब्जी का आनंद लिया और सो गया, सुबह ट्रेन थी छः बजे, सुबह साढे चार बजे आँख खुली, प्रयास जी को जगाया,जल्दी जल्दी दैनिक कार्यों को किया,चाय नाश्ता कर रेलवे जंक्शन की ओर मैं और प्रयास जी भान्जे की बाइक से भागा, टिकट लिया और आला हजरत ट्रेन पर चढ़ गया, सीट भी मिल गयी ,फिर क्या था शुरू हुआ सफ़र |

ठसाठस भरी ट्रेन चल पड़ी साहब|बातें करते, फोन करते, झपकियों के मध्य शाम पाँच तीस पर सफर समाप्त हो गया|आ0 अनिल सर ले सम्पर्क साधा, बोले जंक्शन को बाहर मिलो,मैं जंक्शन को बाहर आया, पान खाया और दस मिनट में आ0.अनिल सर श्वेत कार में सवार दिखाई दिए, मेरा फोन घनघना उठा, फोन पर मैंने कहा सर आपके पीछे हूँ, तब तक कार के करीब मैं और प्रयास जी पहुँच गये, गेट खोल झट अन्दर पहुँचा, आ0 अनिल सर पूरी आत्मीयता से मिले, उनकी अनुभवी आँखों में अपनेपन की चमक पाकर हम दोनों गद्गद हो उठे|कार कार्यक्रम स्थल की ओर चल पड़ी, रास्ते भर बातचीत का सिलसिला चलता रहा|आ0 अनिल सर को ड्राइवर प्रिय खलील जी भी काफी दिलचस्प व्यक्ति थे|लो जी कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गया|वहाँ हमारे कुछ रचनाकार साथी आ चुके थे, जिनसे परिचय प्राप्त हुआ, कुछ ही क्षणों में एक कार्यालय जैसे कक्ष में अपने रचनाकार साथियों के मध्य थे, जिनमें एक प्रकाशन के संरक्षक महोदय आ0 रघुनाथ मिश्र सहज जी थे, जिनकी सहजता आत्मीयता, भाषाशैली, व्यक्तित्व सभी कुछ सम्मोहित सा कर रहा था, आपसे काफी कुछ सीखने को मिला, सहज, सजल, सरस प्रयास ,लक्ष्मी के साथ बातों का, सहित्य चर्चा का एक सेतु सा बनता चला जा रहा था, जैसा कि साँझ की मोहकता अपनी ओर बुला रही थी, हाथ मुँह धोकर ,चाय नाश्ता किया, इस बीच आ0 मीनाक्षी परीक जी से बात कर काफी अच्छा लगा, आपकी आत्मीयता, आपकी वाकपटुता, सच्ची सहनशीलता प्रेरणाप्रद थी|आप ही कार्यक्रम की संयोजिका थीं, कार्यक्रम स्थल की रमणीयता अलौकिक थी देवभूमि होने के साथ साथ प्राकृतिक वातावरण की सोंधी खुशबू मन को आह्लादित कर रही थी|चाय नाश्ता करके मैं और प्रयास जी आ0.अनिल सर की कार से घूमने चले गये, घूम के वापस आये तो देखा कि भोजन का प्रबन्ध हो चुका है, आ0 मीनाक्षी जी के पतिदेव पूरी निष्ठा से आवभगत में लगे हुए थे|हम सभी रचनाकार आ0.सहज जी के साथ बातचीत कर रहे थे, आ0.अनिल सर ने आगामी योजना ~भूमिका बतायी ,सहज जी का तेज और चेहरे की मुस्कान बहुत भायी|
इसी बीच मुहब्बत गजल संग्रह के प्रकाशन की बात हुई, जिसके प्रकाशन का जिम्मा प्रजातन्त्र प्रकाशन ने लिया, कबर पृष्ठ शीघ्र भेजने को बोला ताकि आई एस बी एन नम्बर शीघ्र प्राप्त हो सके तो आपको उपलब्ध करा सकें,मुद्रण का समस्त कार्य जनचेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति को ही प्रदान किया गया है |इस संकलन का विमोचन एवं समारोह उ0 प्र0 में ही होगा|
भोजन लग चुका था, हम सभी साहित्यकार भोजन पर टूट पड़े, आ0 मीनाक्षी जी का प्रेम भोजन में रस बनकर स्वाद को बढ़ा रहा था|दाल चावल रोटी कद्दू की सब्जी वाह्हह्हह्ह वाह्हह्हह्ह सब उठ गये मैं खाता ही जा रहा था |आ0.मीनाक्षी जी स्वयं परोस कर सबको खिला रहीं थीं और आनंदित हो रहीं थी|
भोजन कर हम सब सोने चले गये, सबके अलग अलग कमरे थे, सब अपने अपने कमरे में लेट गये, हम और प्रयास जी, काफी देर बात करते रहे, कब सो गये पता न चला|कुछ साथी देर रात में आये, आ0.अनिल सर और आ0 मीनाक्षी जी सबको रिसीव करते रहे|
सुबह उठा ही था कि एक बच्ची चाय जे गयी थी, चाय पी और दैनिक कार्य से निवृत्त हुआ ही था कि आ0.अनिल सर कमरे में आ गये ,काफी देर कार्यक्रम के सन्दर्भ में बात हुई, हमने बोला कि जनचेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति की ओर से आपका और मीनाक्षी जी को सम्मानित करना है कुछ समय कार्यक्रम प्रदान करें, जिसकी स्वीकृति मिल गयी थी|चाय नाश्ते का बुलावा आ गया|बहुत ही स्वादिष्ट पोहा बना था खूब खाया, चाय पी|फिर रचनाकार साथियों के आने का सिलसिला चल पड़ा|हम और प्रयास जी घूमने चले गये आ0 अनिल दा की कार से|लौट कर आया तो भोजन चल रहा था|रायता,पूड़ी,सब्जी ,नमकीन बूँदी, लड्डू वाह्हह्हह्ह वाह्हह्हह्ह मजा आ गया, सभी साहित्यकार साथियों के अपने अपने समूह बन गये, सब बातों में मशगूल हो गये, कार्यक्रम प्रारम्भ होने की घोषणा हुई, तब सबका सम्मोहन टूटा|सुन्दर मंच सजाया गया था, जो एक इतिहास रचने की तैयारी में था|पहले सरस्वती वंदना एक बच्ची के नृत्य के साथ, फिर स्वागतगान और नृत्य, एक नृत्य आ0 मीनाक्षी जी के बेटे ने भी किया जो बहुत ही सुन्दर था| साझा संकलन नई रोशनी नई पहल का विमोचन, आ0 मीनाक्षी जी का प्रतिवेदन और उनके द्वारा रचित एक संकलन ~यथार्थ के झरोखे से, का विमोचन हुआ |
फिर सम्मान कार्यक्रम शुरू हुआ |सबका सम्मान पूरी निष्ठा से हो रहा था, संचलन बाबूराम जी कर रहे थे |मुझे भी सम्मानित करने का मौका मिला|इसी बीच प्रयास जी और मैने जनचेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति की ओर से आ0 अनिल कुमार गुप्ता जी और आ0 मीनाक्षी जी को उनके संकलनों के लिए सम्मानित किया|
साढ़े पाँच बजे कार्यक्रम समाप्त हुआ, सब अपने अपने गन्तव्य की ओर लपके|मैं और प्रयास जी आ0 सहज जी से, आ0 अनिल दा से और आ0 मीनाक्षी जी से विदा लेकर रास्ते की भोजन सामग्री लेकर अपने घर की ओर रवाना हो गया, बरेली आकर कुमार कौशल जी, विकास भारद्वाज सुदीप जी को जंक्शन पर बुलाया, ससमय दोनों भाई आ गये,

प्रतीक्षाल़य में दो घण्टे साहित्यिक चर्चा के बाद कौशल जी को तीन पुस्तक और सम्मान पत्र प्रदान किया फिर विकास जी प्रयास जी और मैं आटो से आगे बढ़ा, रास्ते में विकास जी उतर गये, और फिर ऑटो सो उतर बीसलपुर की इस पर सवार होकर घर आ ही गया|
बहुत ही सुन्दर लाजबाब ऐतिहासिक कार्यक्रम की आ0 मीनाक्षी जी, आ0.अनिल दादा, गुरु तुल्य आ0 सहज दादा के साथ सभी साथियों को बहुत बहुत हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ |

🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
जय जय
😄🙏😄
4:30 am

अपने मित्र की पाँच वर्षीय बच्ची के निधन का कारुणिक चित्रण - दिलीप कुमा पाठक

अन्तर्मन  के  क्रन्दन  को  मैं , अन्दर  रोक  नहीं पाया|
पाँच साल की बच्ची को जब, निज हाथों से दफ़नाया||

पाला पोसा बड़ा किया उस, माँ की बिटिया छली गयी|
क्रूरकाल  के  हाथों  में  वह, झट  हाथों से चली गयी||

चार  रोज  मैं  पूर्व गया था, उसके पापा से मिलने|
पापा चाचाजी आये हैं, लगी कली सी वह खिलने||

देखो  चाचा  मेरे  तन  पर , बड़े  बड़े से छाले हैं|
दर्द बहुत ही होता मुझको, खाने तक के लाले हैं||

ठीक शीघ्र हो जाओगी तुम, मैंने उसको समझाया|
अन्तर्मन के क्रन्दन को मैं, अन्दर रोक नहीं पाया ||

उस दिन बारिश थमी हुई थी, दो पहर मात्र ही गुजरे थे|
फूटे  छालों  पानी  बहता,  ले  उसको  कब  ठहरे  थे||

नजर एक पापा पर डाली, फिर कातर मुँह मोड़ लिया|
दवा हेतु बाइक पर जाते, पथ में ही दम तोड़ दिया||

गोदी में पापा की बिटिया, घर  को  कैसे लौटाया|
अन्तर्मन के क्रन्दन को मैं, अन्दर रोक नहीं पाया ||

घर की दीवारें चीख रहीं,हाहाकार मची भारी|
आज विधाता चला रहा है,माँ के सीने पर आरी|

फिर गश खाकर गिरी विचारी ,अँसुअन आँचल धोया है|
धरतीतल की बात कहें क्या, आसमान भी रोया है||

पीट पीट के छाती हारे, ये जग है काल सताया||
अन्तर्मन के क्रन्दन को मैं, अन्दर रोक नहीं पाया ||

                  © दिलीप कुमार पाठक "सरस"

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

11:48 pm

नायिका की मनः स्थिति - बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

आज दिल ये हुआ है पपीहा,
याद प्रीतम की आने लगी है ।

काली घिरती घटाँऐ सुहानी ,
मेरे दिल को सताने लगी है ।।

तुम बिना ऐसे तड़पू मैं  साथी
जल बिना जैसे मछली तड़पती ।

हो रही बूँदे सावन की कातिल ,
आग तन में लगाने लगी है ।।
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
   डबरा



गुरुवार, 12 जुलाई 2018

9:50 pm

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह से अक्स बदायूँनी की जी कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल  क्र० 1

बहर-.हज़ज मुसद्दस सालिम
🌸 वज़्न - 1222  1222  1222
अरकान-  मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन
🌸 क़ाफ़िया— आ...स्वर
🌸 रदीफ़ --- क्यूँ नहीं आया...

नए    साँचे    में   ढलना   क्यूँ    नहीं  आया ।
हमें   खुद   को   बदलना  क्यूँ    नहीं  आया ।।
मिला  धोखा  हमें  जब   लोगों  से  फिर भी ।
हमें    इंसाँ    परखना    क्यूँ    नहीं    आया ।।
जिसे   देखो,   जुबाँ   पर   झूट   हैं, आखिर ।
हमें    सच   को   छुपाना   क्यूँ  नही  आया ।।
हरिक   पल   जिंदगी   तेरा    नया   किस्सा ।
हमें    काँटो   पे   चलना   क्यूँ   नहीं  आया ।।
किसी   ने   शूलों    की   राहें   बना   डाली ।
हमें   ज्वाला   में   तपना   क्यूँ  नही  आया ।।
हया   ए   राह,  मिलती   ठोकरें   फिर   भी ।
हमें   गिरकर   सभलना   क्यूँ   नही  आया ।।
समय    का   फेर   तो  देखो  हमें  अब  भी ।
कठिनता   से   निकलना  क्यूँ   नहीं  आया ।।

अक़्स बदायूँनी
    

ग़ज़ल क्र० 2

🌸 वज़्न - 212  212  212  212
बहर-मुतदारिक मुसम्मन सालिम
अरकान-फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन
🌸 क़ाफ़िया— आ स्वर
🌸 रदीफ़ ---  कर दिया

प्यार   में   उसने   मुझको   फ़ना  कर  दिया ।
ख़ाक  सा  था  मैं  मुझको  खुदा  कर  दिया ।।

उसके   लहजे   ने   कायल   हमें  था  किया ।
हक  मुहब्बत  का  उसने  अदा   कर   दिया ।।

चेहरे     पर     सदा     मुस्कराहट     रहे ।
प्यार  में  हमनें  दिल  आईना  कर  दिया ।।

इश्क   उसका   वफा   से    मुकर  ही  गया ।
जख़्म  दिल  का  यूँ  उसने  हरा  कर  दिया ।।

याद  कर   तुझको   आँखों  से  आँसू  बहें  ।
यार   तुम  ने  अज़ब  फासला   कर   दिया ।।

अब   कहाँ  मिलते  हैं  खुशमिजाजी  से  वो  ।
उम्र    भर    को   हमें   गमज़दा   कर   दिया ।।

हाँ  बहुत  गहरा  रिश्ता  था  इक  शक़्स  से  ।             
जिसको   चाहा  था  उसने  दगा  कर  दिया ।।

© अक़्स बदायूँनी


गजल क्र○ 3

बहर- 122 122 122 122
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
काफिया- आने
रदीफ़- लगे हैं

बिना  बात  के  मुस्कुराने  लगे  हैं ।
हमें  प्यार  वो  यूँ  जताने  लगे  हैं ।।

कभी  माँगते  थे  हमें  वो  दुआ  में ।
वही  होंठ  अब  गुनगुनाने  लगे  हैंं ।।

जिसे  हम  भुलाना  अजी चाहते पर ।
सुबह  शाम  वो  याद  आने  लगे  हैंं ।।

तरसते  रहें  फक्त  दीदार  को  हम ।
उसी   चेहरे   को   भुलाने   लगे  हैंं ।।

ढहाये  हैं जुल्मों  सितम  याद  करके ।
हमें   हाल   ए   दिल  बताने  लगे  हैंं ।।

गुजरने  लगी  रात  जबसे  तड़प  कर ।
वही  दर्द   दिल  का  छुपाने  लगे  हैंं ।।

किया  साथ  चलने  का  वादा  जिन्होंने ।
वही   आज   सब   हिचकिचाने  लगे  हैंं ।।

© विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"



गजल क्र○ 4

बह्र           :  २१२२ २१२२  २१२
अरकान   : फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
काफिया    : अा स्वर
रदीफ      :  छोड़िये

रोज   का    झूठा    बहाना    छोडिये ।
अब   हमारा   दिल   दुखाना  छोड़िये ।।

जो बनाये   दोस्त   पैसों   से  सुनो ।
दोस्ती   को   आजमाना    छोड़िये ।।
 
अब हमारे  दिल  की  तुम  हो  आरज़ू ।
ख्वाब   में   आकर   सताना   छोड़िये ।।

शाम  को   बागों  में  आ  हमसे  मिलों ।
आज   से   मैख़ाने    जाना    छोड़िये ।।
 
आज  से   सुनना   हमारी  भी  ग़ज़ल ।
गीत    अब   तो   गुनगुनाना   छोड़िये ।।

हाँ बहुत  ठोकर  मिली  मुझको सुनो ।
जिंदगी   अब   तो   रुलाना  छोड़िये ।।

लोग  अब  डरते  न  क्यूँ   भगवान  से ।
आग   घर - घर  अब  लगाना  छोडिये ।।

© विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"



गजल क्र○ 5

बह्र           : 1222  1222  1222  1222
काफिया    :  आ
रदीफ        :  लेना दिवाली पर
                                                       
दिलों   की   दूरियाँ   सबसे   मिटा   लेना  दिवाली  पर ।
सभी  को  अब  गले  से  तुम  लगा  लेना दिवाली  पर ।।

जरा  मन  के  अँधेरे  को  मिटा  इस   बार  तुम  देखो ।
मुहब्बत का  दिया  दिल  में  जला  लेना  दिवाली  पर ।।

पुराने   हो   गये  रिश्तें  नया  करके  दिखाओ  तुम  ।
बनाया  जो  कभी  रिश्ता  बचा  लेना  दिवाली  पर ।।

गली  में  आज  निकलेगा  चमकता  चाँद ए  गौरी ।
जला  के  दीप  थोड़ा  मुस्कुरा  लेना  दिवाली  पर ।।

रहा  ताउम्र   सबसे   दूर   घर   को   छोड़  परदेशी ।
जरा  तू  प्यार  लोगो  पर  लुटा  लेना  दिवाली  पर ।।

© विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"



ग़ज़ल  क्र० 6

वज़्न -1222 1222 122
🌸 क़ाफ़िया -आ स्वर
🌸रदीफ- हुआ हूँ

ग़में     तन्हाई     में     खोया    हुआ   हूँ ।
किसी   की   याद   का   मारा   हुआ  हूँ ।।

आते   वो   याद,   तन्हा   शाम,  यानी ।
अभी  तक  दर्दे - दिल  पाला  हुआ  हूँ ।।

किसी   पल   मौत   के  आगोश  में  ग़ुम ।
हो   कर   इक   टूटा  ही  तारा   हुआ  हूँ ।।

जहाँ   पर   छोड़कर   जो   वो   गये  थे ।
वहीं    पर    मैं   अभी   ठहरा   हुआ  हूँ ।।

उसी    ने    इश्क    में     की    बेवफाई  ।
समंदर   सा   मैं    तब   खारा   हुआ  हूँ ।।

© विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"



ग़ज़ल  क्र० 7

बह्र -  1222    1222     1222       1222
काफ़िया - अर
रदीफ -  अच्छा नहीं लगता

तुम्हारे  बिन  मुझे अपना ये घर अच्छा नही लगता ।
नही हो साथ तुम अब ये सफ़र अच्छा नही लगता ।।

युं  तो  चलते  रहे  थे साथ तुम कल तक हमारे पर ।
चुराते  हो  हमींं  से  अब  नज़र अच्छा नहीं लगता ।।

न  खेलों  तुम  किसी  की जिंदगानी से सितमगर बन ।
अमन  औ  चैन  के  बदले  कहर  अच्छा  नहीं लगता ।।

तेरी  यादों  के  साये  से अभी  दिल  को तसल्ली है ।
पुरानी  बातों  को अब  सोचकर अच्छा नहीं लगता ।।

परिंदे  अब   कहाँ  अपना  ठिकाना   ढूढेगें   लोगो ।
गर्मी  की  धूप  में  सूखा  शज़र  अच्छा नही लगता ।।

कभी  जो  झुग्गियों  पे आँधियाँ  रूठें तो सच हमको ।
गरीबों  की  निगाहों  में  ये  डर  अच्छा  नहीं  लगता ।।

© विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"

ग़ज़ल  क्र० 8
बहर-.हज़ज मुसद्दस सालिम
🌸 वज़्न - 1222  1222  1222  1222
अरकान-  मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन
🌸 क़ाफ़िया— आन..स्वर
🌸 रदीफ़ --- लगती हैं....
मुझे   तेरे   बिना   दुनिया   बहुत  वीरान  लगती  है ।
भली  ये  जिंदगी  लेकिन  मुझे  शमशान लगती  है ।।
बहुत कोशिश की  हैं  ये  जिंदगी  तुझको बचाने की ।
चले   ये   साँस   जो   मुझे   ही   अंजान  लगती  है ।।
जो   वृद्धाश्रम   में    बूढी   माँ   को  छोड़  आये  हैं ।
सुनों  वो  बूढी  महिलायें   मुझे  भगवान  लगती  हैं ।।
न  जाने  कब  गुजर  जाये  सफ़र  ए  जिंदगानी  का ।
मुझे  तो  एक  दो  दिन  की  ही  ये महमान लगती हैं ।।
मिले  जिसको  सही  राहें  जो  अब के दौर  में  लोगों ।
अजी  ये  जिंदगी  उसको  बहुत  आसान  लगती  हैं ।।
कभी  देखा  नही  मैंने - तुझे  पर  आज  देखा  तो ।
लगा  बर्षों  पुरानी  अपनी  तो  पहचान  लगती  है ।।
©विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"


9:50 pm

ग़ज़ल - अब मरीज़े इश्क़ को कैसा ठिकाना चाहिए - चित्रा भारद्वाज

अब  मरीज़े  इश्क़ को कैसा ठिकाना चाहिए
आतिशे दिल को हवा पर आशियाना चाहिए

लग गईं हैं दाँव पर साँसें बिसाते इश्क़ में
इस तरफ या उस तरफ तय हो ही जाना चाहिए

रूह को तेरी जरूरत इस कदर है जाने जां
जीस्त के खातिर जरूरी आब ओ दाना चाहिए

दिन ढले ही लौट आते हैं परिंदे शाख पर
हो गयी अब रात तुझको लौट आना चाहिए

अब थकन तक जा चुकी हैं हसरतें दीदार की
खुश्क आँखों में 'सुमन ' दरिया समाना चाहिए
चित्रा भारद्वाज ' सुमन '
5:30 am

शाइरी की बुनियाद ही मुतालआ यानी अध्ययन - फ़ैयाज़

पढ़ना क्यों ज़रूरी है?
_________________
शाइरी की बुनियाद ही मुतालआ यानी अध्ययन होती है. बग़ैर पढ़े आप बहुत दिनों तक शाइरी नहीं कर सकते या अच्छी शाइरी तो कर ही नहीं सकते. वज्ह यह है कि आप अपनी उम्र के 20- 22 सालों के तजरबे को 20- 22 ग़ज़लों तक ही बयान कर सकते हैं. उसके बाद आपकी सोच अपने आप को दोहराती है और बारहा आप एक ही ज़ाविए से या एक ही मौज़ूअ पर शे'र कहते रह जाते हैं. यह तो सभी जानते हैं बल्कि सच भी यही है कि बेश्तर शाइरी की शुरुआत इश्क़ में पड़कर होती है. जो कि उस शाइर की शुरूआती और सबसे ख़राब शाइरी होती है. उसके बाद हिज्र के आते- आते कुछ ठीक- ठाक होने लगती है लेकिन वह भी कुछ दिनों तक ही क़ाइम रह पाती है. लिहाज़ा हमारा किताबों की जानिब रुख़ करना लाज़िमी ही नहीं बल्कि हमारी मजबूरी भी बन जाता है. हमें पढ़ना इसीलिए भी चाहिए हम हर क़िस्म के शाइर की शाइरी को नज़दीक से समझ सकें. उनके शे'र बनाने के तरीक़े को समझ सकें. तमाम शाइर एक ही बात को इतने मुख़्तलिफ़ लहजे में कहते मिलेंगे कि आपको उनका हर शे'र नया ही लगेगा. ज़बान और उसका इस्तेमाल हम लुग़त से क़तई नहीं सीख सकते न ही किसी उस्ताद को इतनी फ़ुर्सत है और न ही आपको. सो भी हमें पढ़ना चाहिए ताकि हम जान सकें कि कैसे किस लफ़्ज़ को कहाँ इस्तेमाल किया जाता है. यह एक लम्बी प्रोसेस है और इसमें अगर 10- 12 साल भी लग जाएँ तो भी बड़ी बात नहीं.
पढ़ने को लेकर मुझसे हज़ार बार यह सवाल पूछा गया कि क्या और कैसे पढ़ना है. इसके मुताल्लिक़ मेरा जवाब यह है कि सबकुछ पढ़ने के लिए ही लिखा गया है. शाइरी पढ़ना तो ज़रूरी है ही साथ- साथ कहानी, उपन्यास भी अगर आप पढ़ेंगे तो भी आपके इल्म में इज़ाफ़ा ही होगा और वह इसीलिए क्यों कि कहानी या उपन्यास एक नहीं बल्कि कई किरदार के बनने- बिगड़ने की प्रोसेस को समझने में हमारी मदद करते हैं. हम उन्हें पढ़कर अपनी ज़िन्दगी के आगे की ज़िन्दगी का अनुभव कर पाते हैं. हमारे अपने ज़ाती तजरबे में एक जादुई इज़ाफ़ा सिर्फ़ अध्ययन के माध्यम से किया जा सकता है. जब भी कोई नया शाएर पढ़ें तो पहले पढ़े जा चुके शाएर को दिमाग़ में रखते हुए पढ़ें कि इसमें और उसमें क्या फ़र्क़ है? कैसे ये दोनों शाइर एक दूसरे से जुदा हैं. अगर आपने नया- नया (यानी इससे पहले कभी कुछ नहीं पढ़ा) पढ़ना शुरूअ किया है तो पढ़ते वक़्त यह भूलकर पढ़ें कि आप भी कुछ लिख लेते हैं. पढ़ते- पढ़ते हमें अक्सर लगने लगता है कि एक शे'र होने वाला है लेकिन वो शे'र उस वक़्त आपको भले ही ख़ूब अच्छा लगे लेकिन चंद रोज़ बाद आप ख़ुद ही उसे ख़ारिज करने में संकोच नहीं करेंगे लिहाज़ा हमें पढ़ते वक़्त लिखने से बचना है. शाइर का चुनाव आप अपनी समझ के हिसाब से करें. शाइरी से शाइर की ज़ाती ज़िन्दगी समझने की कोशिश करने के बजाए उस शे'र को समझने की कोशिश करें. हर एक लफ़्ज़ को बारीकी से पढ़ें और सोचें की अगर लिखे गए लफ़्ज़ की जगह कोई और लफ़्ज़ होता तो शे'र कैसा होता? शे'र के सतही मआनी के इलावा उसमें निहाँ तमाम पहलू कुरेदने की कोशिश करें. एक ग़ज़ल को समझने में एक दिन, एक हफ़्ता या पूरा महीना भी लगता है तो लगने दीजिए लेकिन आगे तब तक न बढ़िए जब तक आपको वह समझ में न आ जाए. अगर आप महीनों या साल- साल भर शे'र नहीं कह पा रहे हैं तो इसका यह मतलब क़तई नहीं होता है कि आपके अंदर का शाइर मर गया है या मरता जा रहा है. हो सकता है वो शाइर चुप- चाप कुछ धमाका करने की तैयारी कर रहा हो. आज के तजरबे को आज ही कह देने से शे'र बहुत कम ही अच्छे होते हैं. सो इससे भी बचकर चलें. ख़यालों को पकने दिया करें.
हमें कुछ लिखने के लिए नहीं बल्कि कुछ सीखने के लिए पढ़ना है. हमें पढ़कर सब याद करना है फिर सब भूल जाना है फिर अपना लिखना है. अगर आपको यह प्रोसेस और मेरी बात समझ में आ गयी होगी तो यक़ीनन आप अच्छी शाइरी कर पाएंगे.
______________
फ़ैयाज़



5:18 am

हमदर्दी- मन मे दिल मे दुख पैदा कर दे। मन की भावनाओ को विचलित कर दे - अनन्तराम चौबे

मन मे दिल मे
दुख पैदा कर दे।
मन की भावनाओ
अनन्तराम चौबे 'अनन्त'
    जबलपुर म प्र
    9770499027
को विचलित कर दे ।
वही तो हमदर्दी है
वो शव्द ही ऐसा है
हमदर्दी हो जाती है ।
हमदर्दी से कोई
किसी का दिल
भी जीत सकता है ।
हमदर्दी तो कदम
कदम पर रहती है ।
नफरत को भी
क्षण मे बदल दे ।
हमदर्दी ऐसी होती है ।
नफरत करने वालो से
भी हमदर्दी हो जाती है ।
सुअर जानवर ऐसा है
दूर सभी उससे रहते है ।
सुअर के बच्चे को
कुत्ते पकड़ ले अपनी
जान बचाने को जोर
जोर से चिल्लाता है ।
देखने वाले के दिल मे
हमदर्दी हो जाती है ।
बच्चे के उस दर्द को
देखकर हमदर्दी
सबको होती है ।
कुत्तो से छुड़ाकर
सुअर के बच्चे की
मिलकर जान बचाते है ।
हमदर्दी का रिश्ता ऐसा है
किसी से भी जुड़ जाता है ।
दुख दर्द का नाता ऐसा है
हमदर्दी से जुड जाता है ।
कोई आतंकी कोई डाकू
कोई दुष्कर्मी दुराचारी
जब भी मारा जाता है ।
तब हमदर्दी नही होती है ।
क्ररता के भाव से मन
मे हमदर्दी नही होती है ।

बुधवार, 11 जुलाई 2018

11:16 pm

ग़ज़ल - जो भी रहने को था रहा ही नहीं - पुष्पराज यादव

जो भी रहने को था रहा ही नहीं
उसने रिश्ता कोई रखा ही नहीं

सब इसे लाइलाज कहते हैं
इश्क के रोग की दवा ही नहीं

तुम मुझे यूँ भी भूल सकती हो
सोच लो, मैं कभी मिला ही नहीं

उसको मुझ जैसा इश्क करने का
रोग लगना था पर लगा ही नहीं

अब मुझे लूटने को आये हो
जब मेरे पास कुछ बचा ही नहीं

पुष्पराज यादव (स्त्रोत : फेसबुक)

 
10:06 am

वीर सपूत मंगल पाण्डे की शहादत पर प्रस्तुत रचना - राजेश मिश्र प्रयास

देश भक्त बलवीरों का झरना प्रताप का वहता है
वतन की खातिर मिट जाते बस नाम अमर वो रहता है
मंगल पाण्डे भड़क गये थे उस अग्रेजी वर्दी से
कारतूस बनवाते गोरे गाय सुअर की चर्बी से
यूरोपी रेजीमेन्ट बनी थी भारतीयों की भर्ती से
भूमिदेव अंगार उगा यू पी बलिया की धरती से
बीस बर्ष की आयु युवा इस बटालियन का हिस्सा था
बढ रही छावनी बैरकपुर कुछ दिलदारी का किस्सा था
गोरे अफसर रोज नये कुछ पत्ते खोला करते थे
भारत के वीर सपूतों को देहाती वोला करते थे
मिलकर के सब सैनिक वोले जो कारतूस चलवाते हो
तुम गाय सुअर का लेप चढा नापाक हमें करवाते हो
यदि सभी चाहते आजादी तो कोई तो मृगराज बनो
मिलकरके जान लुटा देंगे बस तुम पहली आवाज बनो
बस पवनपुत्र बन जाओ तुम हम सब अंगद बन जायेंगे
इन गद्दारों की लंका में अब लंका दहन मचायेंगें
भारतीय बलिदानों से बंगाल की धरती पावन थी
विद्रोह उठा था जब पहला सन अठरह सौ सत्तावन थी
केहरि बन करता सिंसनाद वह अद्भुत योद्धा मंगल था
थीं लोड रायफल हाथों में वो इतिहासों का दंगल था
ललकार रहे साथी आओ मिलकर यह फर्ज निभाना है
भारत की लाज बचानी है हमें अपना धर्म बचाना है
आक्रोश भरा था हृदय में वो वगावती तेवर में थे
थीं पिस्टल लोड रायफल भी सब शस्त्र रुप जेवर में थे
जनरल हर्से ने फोर्स सहित फिर आगे जाकर घेर लिया
मंगल को करलो गिरफ्तार ईश्वर पाण्डे को आदेश दिया
उसने आदेश नही माना ऐसा कैसे कर सकता हूँ
यदि मंगल कुर्बानी देगा मैं साथ साथ मर सकता हूँ
कर्नल बाँग बढा आगे मंगल ने उस पर बार किया
लेकर तलवार भिडे दोनों कर्नल मुँह के बल डार दिया
भारतीय सिपाही था पलटू थी सेखी बडी कमीने में
धोखे से बार किया उसने तलवार भोक दी सीने में
पल्टू ने ही कर गिरफ्तार अपनों को फसवाया है
गद्दार कमीना दगाबाज वो मन ही मन हर्षाया है
उन फिरंगियों ने मिलकरके फाँसी का हुक्म सुनाया है
राजेश मिश्र इस वर्णन को रोते रोते लिख पाया है
जो दर्द दबे हैं सीने में वो दर्द लिखा हम करते हैं
हसते फाँसी जो झूल गये वो मर्द लिखा हम करतें हैं

राजेश मिश्र प्रयास 
कोषाध्यक्ष जनचेतना साहित्यिक साँस्कृतिक समिति रजि0 226
जिलाध्यक्ष राष्ट्रीय ब्राह्मण महासंघ ---जिला (पीलीभीत)

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1:59 am

ग़ज़ल :- तितली से दोस्ती न गुलाबों का शौक़ है - चिराग़ शर्मा

तितली से दोस्ती न गुलाबों का शौक़ है ।
मेरी तरह उसे भी किताबों का शौक़ है ।।

वरना  तो  नींद  से  भी नही कोई ख़ास रब्त,
आँखों को सिर्फ़ आपके ख़्वाबों का शौक़ है ।

हम आशिक़-ए-ग़ज़ल हैं तो मग़रूर क्यों न हों,
आख़िर ये शौक़ भी तो नवाबों का शौक़ है ।।

उस  शख़्स  के फ़रेब से वाक़िफ़ हैं हम मगर,
कुछ अपनी प्यास को ही सराबों का शौक़ है ।।

गिरने दो ,ख़ुद संभलने दो ,ऐसे ही चलने दो,
ये  तो  चराग़  ख़ानाख़राबों  का  शौक़ है ।।
 चिराग़ शर्मा (फोटो स्रोत : फेसबुक)

1:14 am

अदब की दो मशहूर शख्सियतें - एक के लिए ताजमहल एक शहंशाह की मोहब्बत की निशानी है, एक ऐसी कहानी है, जो कभी खत्म नहीं हो सकती, जबकि दूसरे शायर के लिए यह एक ऐसी इमारत है, जो गरीबी और गरीबों का मजाक उड़ाती है...

अदब की दो मशहूर शख्सियतें - शकील बदायूनी और साहिर लुधियानवी।

एक के लिए ताजमहल एक शहंशाह की मोहब्बत की निशानी है, एक ऐसी कहानी है, जो कभी खत्म नहीं हो सकती, जबकि दूसरे शायर के लिए यह एक ऐसी इमारत है, जो गरीबी और गरीबों का मजाक उड़ाती है। आपके लिए ताजमहल क्या है। 

आप भी इन दोनों शायरों की तखलीक पर गौर कीजिए 

शकील बदायूनी :- 
शकील बदायूनी (स्रोत : गूगल)

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल
सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी हैं
इसके साये मे सदा प्यार के चर्चे होंगे
खत्म जो हो ना सकेगी, वो कहानी दी है
एक शहंशाह ने बनवा के...

ताज वो शम्मा है उल्फत के सनमखाने की
जिसके परवानों मे मुफलिस भी, जरदार भी है
संग-ए-मरमर में समाए हुए ख्वाबों की कसम
मरहले प्यार के आसान भी, दुश्‍वार भी हैं
दिल को एक जोश इरादों को जवानी दी है
एक शहंशाह ने बनवा के...

ताज इक जिंदा तसव्वुर है किसी शायर का
इसका अफ़साना हकीकत के सिवा कुछ भी नहीं
इसके आगोश में आकर ये गुमां होता है
जिंदगी जैसे मुहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
ताज ने प्यार की मौजों को रवानी दी है
एक शहंशाह ने बनवाके...

ये हसीं रात ये महकी हुई पुरनूर फिजां
हो इजाजत तो ये दिल इश्क का इजहार करे
इश्क इंसान को इंसान बना देता है
किसकी हिम्मत है मुहब्बत से जो इनकार करे
आज तकदीर ने ये रात सुहानी दी है
एक शहंशाह ने बनवाके...

स्रोत :- Rekhta.org से

साहिर लुधियानवी :-
साहिर लुधियानवी (स्रोत : गूगल)

ताज तेरे लिए इक मजहर-ए-उल्फत1 ही सही
तुम को इस वादी-ए-रंगीं2 से अकीदत3 ही सही
मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे...
बज्म-ए-शाही4 में गरीबों का गुजर क्या मानी
( 1-मोहब्बत की निशानी, 2- सुंदर स्थान, 
3- आदर/ पसंद, 4- रॉयल कोर्ट)

सब्त जिस राह पे हों सतवत-ए-शाही1 के निशां
उस पे उल्फत भरी रूहों2 का सफर क्या मानी
(, 1- राजसी वैभव, 2-प्रेमिका)


मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तशरीर-ए-वफा1
तूने सतवत2 के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मकाबिर3 से बहलने वाली,
अपने तारीक4 मकानों को तो देखा होता
(1- मोहब्बत/ विश्वास के इस दिखावटी पर्दे के पीछे, 
2- धन/वैभव 3.मकबरा 4. अंधियारे)


अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक1 न थे जज्बे उनके
लेकिन उनके लिये तश्शीर2 का सामान नहीं
क्यूंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफलिस3 थे
(1- सच, 2- प्रचार, 3-गरीब)


ये इमारत-ओ-मकाबिर, ये फासिले, ये हिसार1
मुतल-कुलहुक्म2 शहंशाहों की अजमत3 के सुतून4
दामन-ए-दहर5 पे उस रंग की गुलकारी6 है
जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अजदाद7 का खून
(1.किले, 2-सनकी, घमंडी, 3-महानता, 4-निशानी, 
5- दुनिया के दामन पर, 6-फूल और शराब, 7- पूर्वज)


मेरी महबूब! उन्हें भी तो मुहब्बत होगी
जिनकी सानाई1 ने बख्शी है इसे शक्ल-ए-जमील2
उनके प्यारों के मकाबिर रहे बेनाम-ओ-नमूद3
आज तक उन पे जलाई न किसी ने कंदील4
(1-कलात्मकता, कारीगरी, 2-खूबसूरत रूप, 
3-बिना किसी पहचान के, गुमनाम, 4-मोमबत्ती)


ये चमनजार1, ये जमुना का किनारा, ये महल
ये मुनक्कश2 दर-ओ-दीवार, ये महराब, ये ताक
(1- बगीचा, 2-आकर्षक)

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