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बुधवार, 28 मार्च 2018

11:56 pm

गजल

यूं  हम  दोनों' वादा  वफा  का  निभा  दें ।
चलो   जिन्दगी   को  मुहब्बत   बना   दें ।।
मेरी   रूह   है   अब   तुम्हारी   अमानत ।
मुहब्बत  भरा   दिल   तुम्हीं   पे  लुटा  दें ।।

© विकास भारद्वाज
28 मार्च  2018

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

5:41 pm

अहमद फराज की गजल

Ahmed Faraz ✒....                                    
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं

सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं

सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं

सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं

सुना है उसकी सियाह चश्मगी क़यामत है
सो उसको सुरमाफ़रोश आह भर के देखते हैं

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते हैं

सुना है आईना तमसाल है जबीं उसकी
जो सादा दिल हैं उसे बन सँवर के देखते हैं

सुना है जब से हमाइल हैं उसकी गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं

सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उसकी कमर के देखते हैं

सुना है उसके बदन के तराश ऐसे हैं
के फूल अपनी क़बायेँ कतर के देखते हैं

वो सर-ओ-कद है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
के उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं

बस एक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रहर्वान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं

सुना है उसके शबिस्तान से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीन उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं

रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं

किसे नसीब के बे-पैरहन उसे देखे
कभी-कभी दर-ओ-दीवार घर के देखते हैं

कहानियाँ हीं सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं

अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जायेँ
फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
फ़राज़ अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं

जुदाइयां तो मुक़द्दर हैं फिर भी जाने सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चलके देखते हैं

रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-खुराम कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं

तू सामने है तो फिर क्यों यकीं नहीं आता
यह बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं

ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफिल में
जो लालचों से तुझे, मुझे जल के देखते हैं

यह कुर्ब क्या है कि यकजाँ हुए न दूर रहे
हज़ार इक ही कालिब में ढल के देखते हैं

न तुझको मात हुई न मुझको मात हुई
सो अबके दोनों ही चालें बदल के देखते हैं

यह कौन है सर-ए-साहिल कि डूबने वाले
समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं

अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं

बहुत दिनों से नहीं है कुछ उसकी ख़ैर ख़बर
चलो फ़राज़ को ऐ यार चल के देखते हैं

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

8:10 pm

प्राकृतिक सौंदर्य और मनुष्य

विषय -प्राकृतिक सौंदर्य और मनुष्य में बढ़ता हुआ फासला

मानव जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है | हम अपनी आवश्यकता की लगभग सभी चीजें प्रकृति से ही प्राप्त करते हैं |
मनुष्य और प्रकृति के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है। मानव द्वारा प्रकृति की रक्षा करने से प्रकृति में हरा भरा और वातावरण स्वच्छता होने से प्रकृति सौन्दर्यमयी का अनुभव करने लगती है।
सुबह के नर्म हवा घूमना स्वास्थ के लिए लाभदायक है और धूप में पेडों की छाया में बैठना कितना सुखद और आरामदायक लगता है लेकिन समय के बढते चक्र में प्रकृति मे प्रदूषण बढने लगा है ।
पर्यावरण में अब विषैली गैसें घुलने लगी है ।
वनों की अधाँधुध कटान के कारण तथा नदियों मे विषैले रसायन से प्रकृति मे प्रदूषण तथा नई नई बीमारीयाँ फैल रही है।
मनुष्य की आयु कम होने लगी। धरती एक-एक बूँद पानी के लिए तरसने लगी है, लेकिन यह वैश्विक तपन हमारे लिए चिन्ता का विषय नहीं बना।
तापमान में तेजी से बढ़ोत्तरी के कारण दुनिया भर में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। यही हाल रहा तो आगामी कुछ दशकों में हमारी धरती वन विहीन हो जाएगी। हमारे पड़ोसी देशों में जितने वृक्ष काटे जाते हैं, उतने परिमाण में लगाए भी जाते हैं। हमें इस बात पर विचार करना चाहिए ।
मनुष्य और प्राकृतिक के बीच बढता फासला हमें बतलाता है कि जब पाप अधिक बढ़ता है तो धरती काँपने लगती है। यह भी कहा गया है कि धरती घर का आंगन है, आसमान छत है, सूर्य-चन्द्रमाँ ज्योति देने वाले दीपक हैं, समुद्र पानी के मटके हैं और पेड़-पौधे आहार के साधन हैं।
ध्यान रखना होगा हमें कि प्रकृति किसी के साथ भेदभाव या पक्षपात नहीं करती। इसके द्वार सबके लिए समान रूप से खुले हैं, लेकिन जब हम प्रकृतिक संसाधनों से खिलवाड़ करते हैं तब उसका परिणाम भूकम्प, सूखा, बाढ़, सैलाब, तूफान की शक्ल में आता है, फिर लोग काल के गाल में समा जाते हैं।
हम कह सकते हैं कि प्रकृति से मनुष्य का सम्बन्ध अलगाव का नहीं है, सचमुच प्रकृति से प्रेम हमें उन्नति की ओर ले जाता है और इससे अलगाव हमारे लिए विनाशकाल के कारण बनते हैं।

विकास भारद्वाज 'सुदीप'
21 जुलाई 2017

सोमवार, 8 जनवरी 2018

7:22 am

गजल (47) - झूटी शानो शौकत


नये  जमाने'  का'  अब  हमने'  पैरहन  देखा ।
बड़ा  अजीब  यहाँ  का  रहन  सहन  देखा ।।

वो  शंहशाह  हो'  या  कोई'  रंक  हो  हमने ।
सभी पे चलते समय एक सा ही कफ़न देखा

न  कोई'  अपना'  न  कोई  पराया' लगता है ।
हरेक आदमी' का जब मतलब से मिलन देखा

बिखरती' जिंदगियां झूठी शानो-शौकत में ।
ये'  कैसा'  हमने' शहर का तेरे' चलन देखा ।।

बे-घर किये बूढे' माँ बाप आज बच्चों ने ।
ठिठुरते'  सर्द रातों में पड़े सयन देखा ।।

बहार आती' थी' खिलते  थे फूल बागों में ।
विकास आज वो' उजड़ा हुआ चमन देखा ।।

सयन- नीद्रा,सोना

©विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"
   2 जनवरी 2018

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

2:35 am

गजल- निश्छल आँखे


                       
चला आया बादल उमड़ता हुआ ।      
अम्बर से झमाझम बरसता हुआ ।।
               
कोई आशियाना भी था कल यहाँ ।
चमन आज ये कैसा उजड़ा हुआ ।।

किसी की आहें गूंजती हैं शायद ।
दफ़न है कोई राज अरसा हुआ ।।

बिखरते गऐ दिल के अरमाँ मेरे ।
कभी था ये गुलशन महकता हुआ ।।

तुफानी सी लहरो में कश्ती फँसी ।
अभी अपना दरिया है ठहरा हुआ ।।

जिसे देखती "अक्स" निश्छल आँखें ।
फलक पर जैसे चाँद ठहरा हुआ ....।।

© विकास भारद्वाज "अक्स"
27 दिसम्बर 2017

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

8:07 pm

"माँ याद तुम्हारी सताती है "


माँ तो बच्चों के लिए खुद को भूल जाती है ।
माँ ही सदा हमें पापा की डाँट से बचाती है ।।
जमाने के ताने - बाने से घबराता मेरा मन,
माँ अब घर से दूर याद तुम्हारी सताती है ।।

माँ से हर मनुष्य के आस्तित्व का आधार है ।
माँ से पल बढ कर बनता जीवों का संसार है ।।
संयम, जीवन-त्याग और ममता की मुरत,
माँ तो इस धरती पर भगवान का अवतार है ।।

अपना ख्याल छोड़ कर परिवार के लिए माँ हर दुख सहती है ।
हम माँ का इंतज़ार करें न करें पर माँ हर पल इंतज़ार करती है ।।
जिसके ममता भरे आँचल को पाने भगवान भी तरस जाते है,
नजर लगें न बच्चों को माथे पर माँ काला टीका रखती है ।।

दुनिया के सब रिश्ते-नातों में सबसे प्यारा रिश्ता माँ का होता है ।
हर झूठे रिश्ते नातों में सुदीप बस सच्चा प्यार माँ का होता है ।।
ठोकर लगने पर रास्ते पर फिर हाथ पकड़ कर सभाँले रखती,
अनजाने में हुई गलती माफ कर दे वो दिल सिर्फ माँ का होता है ।।
   
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
   12 दिसम्बर 2017

शनिवार, 25 नवंबर 2017

5:59 am

कविता- तुम्हारा क्रंदन, तुम्हारा बलिदान

26/11/2008 के मुंबई हमले की आज 9 वीं बरसी है वीर जवानो की शहादत को मेरा सलाम, भावपूर्ण श्रद्धांजलि इस हमले में कई लोगों की जान गई थी

काले लिवासधारी मौत का सामान लाये हैं ।
हर तरफ धमाके और संगीनों के साये हैं ।।
शहर में अब बढती वारदातो से लगता हैं ।
छुपकर सीमा से कुछ आतंकवादी आये हैं ।।

मजहवी कट्टरपंथी ने फैला दी नफरत की दीवारें ।
इस जंग में लड़ते भारत माँ के जवान शहीद हुये ।।        आतंकवाद के खिलाफ शहादत को वीर जवानों ।
तुम्हारा क्रंदन, तुम्हारा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा ।।            

मासूम बच्चों के शव, बेबस हाथों में उठाये थे ।
गद्दारों ने इस कदर दुखों के बादल गिराये थे ।।
जालिमो ने बेगुनाहों पर ऐसे चलाई गोलीयाँ ।
खुशहाल परिवारों को खून के आँसू रूलाये थे ।।

हो गये लाचार और अनाथ न जाने कितने ।
जालिमों तुमको जरा भी दया न आयी थी ।।
इन मुश्किल हालात में मुँहतोड़ जवाब देने की ।
जिम्मेदारी एनएसजी कंमाडों ने पायी थी ।।
     
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
   25 नवम्बर 2017

शनिवार, 11 नवंबर 2017

6:15 pm

तेरा दिल बेक़रार अच्छा था

तेरा दिल बेक़रार अच्छा था ।
मेरा भी इंतजार अच्छा था ।।       

ये सनम दिल मेरा जलाने का.. ।
वो तुम्हारा अंदाज अच्छा था ।।

बेचैनी दिल की बढती ही जाये... ।
पहले दिल का करार अच्छा था ।।

उसका भी खूब दबदबा होगा... ।
वो शायद जानकार अच्छा था ।।

साँस दे कर्ज कर दिया चुकता ।
वो हमारा कर्जदार अच्छा था ।।

दर्द ए दिल की तुम दवा करते...।
वो तुम्हारा रोजगार अच्छा था ।।

लोग करते हैं' बात मय्यत पर ....।
आदमी दिल का यार अच्छा था ।।

हर दवा बेअसर हैं जख्म़ो पर ।
बेवफा तेरा वार अच्छा था..।।

देखते अब सुदीप राहों में ......।
उसका भी ऐतबार अच्छा था ।।    

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
    10 नवम्बर 2017

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

12:02 am

दीपावली दोहे


नन्हें दीपक की लगन, आँधी को दे मात ।
अँधेरा दूर भगा कर, उगा लालिमा प्रात ।।

सजा दिया थाल पूजा, साथ रहे परिवार ।
मनाओ घर - घर ऐसे , दीपों का त्यौहार ।।

बाज़ार में चमक है पटाखों की आवाज ।
खूब रौनक बढी है दीपावली पर आज ।।

चाइनीज दीपक छोड, मिट्टी दीप उद्दीप ।
जलाओ दिवाली पर, हर घर में अब दीप ।।

धन त्रयोदशी, गोवर्धन,भैया दूज सर्व ।
कार्तिक मास अमावस दीपावली पर्व ।।

पटाखे फूटने लगे, दीप जले अविराम ।
लक्ष्मी-गणेश पूजा आरम्भ होगी शाम ।।

घर में कैसे जलेगें , सजन इस बार दीप ।
काहे की दीपावली, जब तुम नहीं समीप ।।

लहंगा, चुनरी, बिंदी, कंगन, छुमके संग ।
तुझसे गोरी फूटते, फुलझड़ियों से रंग ।।

चमके जब लौ दीप की, लोग रहे हरसाय ।
तब घूँघट में नव वधू, मन ही मन मुस्काय ।।

भाईचारे की भावना को बल मिल जाए ।
सभी के घर में आनंद के सुखद क्षण आए ।।

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
11 अक्टूबर 2017 

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

5:50 am

हाइकु दीपावली

दीपक जले
दीपावली की शाम
उजाला फैले

दिवाली पर्व
जगमग बाजार
रोशन द्वार

चिराग जला
लक्ष्मी गणेश पूजा
कृपा कर दो

माटी के दीप
जलाओ सब लोग
चाइना छोड़ो

तुम करना
गरीबों को भी दान
पुण्य मिले

बम - पटाखे
क्षण भर आनन्द
प्रदुषण हो

©विकास भारद्वाज 'सुदीप'
14 अक्टूबर 2017 

5:50 am

गजल

आपको जबसे दिल में बसाने लगे ।
फिर नये गीत हम गुनगुनाने लगे ।।

चाँद उतरा बिखरने लगी चाँदनी ।
प्यार तुमसे हुआ वो बताने लगे ।।

कर दिया आपके इश्क ने फिर नशा ।
बिन पिये आज हम लडखडाने लगे ।।
   
जुस्तजू थी मुझे वो अचानक मिले ।
दोस्त हमको गले से लगाने लगे ।।

टूट कर जब बिखरने लगी जिंदगी ।
लोग क्या खूब हमको गिराने लगे ।।

जिंदगी ख्वाब अहसास ए आरजू ।
ये वफा, तुमसे यूँ हम निभाने लगे ।।

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
16 अक्टूबर 2017

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

5:33 am

गजल


बह्र 👉👉  : २१२   २१२   २१२  २१२
अरकान   : फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
काफिया    :  ऐ  स्वर
रदीफ        :  रहे
🌹 🌹
तुम भुला हमको दिल जलाते रहे ।
रात भर याद कर वो रूलाते रहे ।।

साथ छूटे न तुमसे हमारा कभी ।
फक्त इसलिए जख़म को छुपाते रहे ।।

टूट जाऐ नहीं दिल तुम्हारा सनम ।
ग़म छुपा साथ तेरे मुस्कुराते रहे ।।     

इश्क का ये हमें रोग ऐसा चढा ।
रात भर वो ख्बावों में सताते रहे ।।
    
भूल हमको किसी गैर के नाम की ।
मेंहदी हाथों पर वो रचाते रहे ।।

हमने वादे वफा के निभाये सभी ।
वक्त - बेवक्त तुम याद आते रहे ।।

इक जरा सी हमारी खता क्या हुई ।
लोग फिर तो कमीयाँ गिनाते रहे ।।

चाहते हैं अभी भी अमन चैन हम ।
और वो लोग साजिश बनाते रहे ।।

खूब आतंक फैला रहा पाक फिर ।
सर जवानों के कब तक कटाते रहे ।।     

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
12  अक्टूबर 2017 

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

7:04 am

उत्तर प्रदेश के शिक्षा मित्रों का संघर्ष

सुप्रीम कोर्ट से शिक्षा मित्रों को एक बार फिर जबर्दस्त धोखा प्राप्त हुआ है । सुप्रीम कोर्ट ने कुछ देर सुनवाई करके दीपक मिश्रा जी ने शिक्षा मित्रों के समस्त मामले को 24 अगस्त के लिए नियत कर दिया है । अब ऐसा लगता है कि वास्तव मे देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था माननीय सुप्रीम कोर्ट भी उत्तर प्रदेश के शिक्षा मित्रों के साथ सौतेला व्यवहार या दुसरे शब्दों मे कोर्ट ने शिक्षामित्रों के साथ भद्दा मजाक किया है ।
शिक्षामित्र बेरोजगार कर दिये गए है स्कूलों में पढाई ठप होने लगी है । शिक्षामित्रों के दिल मे इतनी निराशा है कि अब तक कई शिक्षामित्र आत्महत्या कर चुके है
समायोजन रद्द करने से पहले समायोजित शिक्षामित्रों के परिवार के बारे में सोचना चाहिए था । मानवीय संवेदना होना सुप्रीम कोर्ट का दायित्व है। कुछ ऐसे भी है शिक्षामित्र है जो लगभग 50 वर्ष की उम्र होने को है और बढती उम्र में नये पाठ्यक्रम की परीक्षा कौन पास करेगा । धरना-प्रदर्शन के बाद शाम को घर चले जाते है उन्हें भविष्य, बच्चों की पढाई व आर्थिक संकट की गहरी चिंता सता रही है
सुप्रीम कोर्ट को नियमावली में संशोधन करके शिक्षामित्रों के पक्ष में कोई फैसला लाना चाहिए।

विकास भारद्वाज
बदायूँ (उ○ प्र○)
1 अगस्त 2017

बुधवार, 26 जुलाई 2017

4:53 am

हरियाली तीज

हरियाली तीज दोहे-

घर में नव व्यंजन बनें, खाना लगे लजीज ।
सावन आये बरसता, तब हरियाली तीज।।

हाथों में रच मेंहदी, सखियाँ गाये गीत ।
सबके सजन घर आये, तुम भी आना मीत ।।

खनकती नयी चूड़ियाँ, मेंहदी रची हाथ
करें संगिनी कामना, साजन रहना साथ ||

विकास भारद्वाज "सुदीप"
26 जुलाई 2017

शनिवार, 22 जुलाई 2017

4:17 am

बस एक ख्याल तुम्हारा

ये ख्याल भी न जाने कैसा ख्याल है
खोया रहता हूँ तुम्हारे ख्यालों में,
तेरी चाहत जो अक्सर खींच लेती है
मुझको तेरी ओर।
डूबा सा जाता हूँ तुझमें इस कदर,
कि ख्याल ही नहीं रहता कि क्या हो रहा मुझको।
कह दो इन ख्यालों से कि यूँ न सताए मुझे,
अच्छा लगता है, बस एक ख्याल तुम्हारा
ये सुबह ,सर्द हवा और ये सुहाना मौसम
याद दिलाते हैं वो लम्हें
अक्सर उन लम्हों की यादों में
मायूस होने लगता हूँ
फिर??
अच्छा लगता है
बस एक ख्याल तुम्हारा
क्या है वो ख्याल ?
वो ख्याल कुछ ऐसा है,
तुमको सोचना, बीते लम्हे याद करना
जहाँ हर दर्द खूबसूरत लगता है ।
वो ख्याल इन सर्द हवाओं में कुछ यूँ आता है
और लबों मे मुस्कान ला देता है
एक अजीब सी बात है तुझमें,
जो हमेशा से पास बुलाती तुझको,
मेरे सपनों में।
चाहने लगा हूँ इस कदर तुझको,
समझ ही नहीं आता मुझे खयाल कोई और।
कि मिलोगी तुम मुझे कहीं इन ख्यालों के किसी अनजानें मोड़ पर।।
कभी भूल न जाना मुझको सनम
मेरे ख्यालों में सिर्फ तुम हो.......सिर्फ तुम हो

✍विकास भारद्वाज 'सुदीप'
22 जुलाई 2017

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

8:34 am

रिश्तों की संजीवनी में बुजुर्गो की भूमिका

रिश्तों की संजीवनी में बुजुर्गो की भूमिका

रिश्तों की संजीवनी बूटी बन जाते है, हमारे
घर के बुजुर्ग
कांपता हाथ सिर पर रखते ही, रास्तों के पत्थर हटा देते हैं, घर के बुजुर्ग।
हमेशा बुजुर्गों की छत्रछाया में ही महफूज
रहते है हम सब
देकर मशविरा तहजीब का, एक तजुर्बा बन जाते हैं, घर के बुजुर्ग ।।

हमारा हौसला, हमारी ख्वाहिश, ताकत बढाते हैं, घर के बुजुर्ग
अपने खून पसीने रूपी खाद से सींच कर पल्लवित करते है, घर के बुजुर्ग
गलत व्यवहार से उनके आत्म-सम्मान को ठेस ना देना कभी तुम
कभी होते हम उलझन में, तब प्यार से समझाते है घर के बुजुर्ग ।।

विकास भारद्वाज 'सुदीप'
20 जुलाई 2017

सोमवार, 5 जून 2017

7:42 am

विषय- पर्यावरण संतुलित कैसे हो ?

🍀☘🌱🌳🌴
पर्यावरण का तात्पर्य है सभी प्राकृतिक हमारा परिवेश जैसे की भूमि, वायु, जल, पौधें, पशु, ठोस सामग्री, कचरा, धूप, जंगल और अन्य वस्तु।
स्वच्छ वातावरण प्रकृति के संतुलन को बनाए रखता है । और साथ ही साथ पृथ्वी पर सभी जीवित चीजों को बढ़ने, और प्राणीयों को विकसित करने में मदद करता है। हालांकि अब कुछ तकनीकी उन्नति के परिणाम में मानव द्वारा निर्मित चीजे वातावरण को कई प्रकार से विनाश कर रहीं हैं जो कि प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रही है।
जैसे गंगा मे कचरा हो जाने से जल दूषित हो रहा है हम अपने जीवन को साथ ही साथ इस ग्रह पर भविष्य में जीवन के अस्तित्व को खतरे में डाल रहे हैं| पेडों का कटान अंधाधुंध तरीके से चल रहा है पेड पौधो का रोपण कम हो रहा है
फैक्टीयों से निकलने वाला कचरा नाले द्वारा नदी में छोडने से तमाम रोग फैल रहे है । पेड पौधे सूख कर खत्म हो रहे है वाहनों द्वारा निकलने वाला धुआँ प्रदूषण हो रहा है
इसके लिए गैस से संचालित वाहन चलाने चाहिए
एवं प्रदूषण जाँच केन्द्र पर जाकर जाँच करानी चाहिए

संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा विश्व स्तर पर  पर्यावरण संतुलन करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए जिससे आगे चलकर मनुष्य को परेशानी का कारण न बनें
यदि हम प्रकृति से छेडछाड गलत तरीके से कुछ भी करते हैं तो ये पूरे वातावरण के माहौल जैसे की वायु-मंडल, जलमंडल और स्थलमंडल  को विनाश की ओर ले चलते है। प्राकृतिक वातावरण के अलावा, मानव द्वारा निर्मित वातावरण भी मौजूद है जो की प्रौद्योगिकी, काम के माहौल, सौंदर्यशास्त्र, परिवहन, आवास, सुविधाएं और शहरीकरण के साथ सम्बंधित है| मानव निर्मित वातावरण काफी हद तक प्राकृतिक वातावरण को प्रभावित करता है जिसे हम सभी एकजुट होकर बचा सकते हैं ।

प्राकृतिक वातावरण के घटक संसाधन के रूप में उपयोग किया जाता है जीवन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए इंसान द्वारा इसका शोषण किया जा रहा है। हमें हमारे प्राकृतिक संसाधनों को चुनौती नहीं देनी चाहिए और पर्यावरण में इतना प्रदूषण या अपशिष्ट पदार्थ डालने में रोक लगानी चाहिए। हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों को महत्व देना चाहिए और प्राकृतिक अनुशासन के तहत उन्हें इस्तेमाल करना चाहिए।
लोगों को अधिक से अधिक प्रेरित करना चाहिए कि गंदगी करने से बीमारीयाँ फैलती है इसलिए अपने आस पास के परिवेश को स्वच्छ रखें और *स्वच्छ भारत निर्मल भारत*   अभियान में योगदान दें

*✍विकास भारद्वाज "सुदीप"*
*5 मई 2017*

मंगलवार, 9 मई 2017

8:59 pm

निर्भया : सपना डाॅ. बनना था, चंद पलों में टूटा था । - विकास भारद्वाज

विजया घनाक्षरी

कछुआ गति इंसाफ, असर न्याय का हाफ।
निर्भया के माँ बाप के,जज्बे को नमन करो।।

सशख्त कानून दिला, बेटी को न्याय मिला ।
कोर्ट का निर्णय मान्य,दरिंदो अब तो डरो ।।

दरिंदों को दे फाँसी, न्याय की आस जागी ।
तुम्हे है जीना धिक्कार, फंदे पे लटक मरो ।।

सपना डाॅ. बनना था, चंद पलों में टूटा था ।
तुम्हे याद है वो दिन,न अब याचिका भरो ।।

विकास भारद्वाज "सुदीप"
6 मई 2017


शनिवार, 6 मई 2017

10:00 am

गजल

गजल क्र○ 4

तुम्हारे पढे खत जमाना हुआ
मिले बाद वर्षों फसाना हुआ

सताती मुझे याद शामों-सहर
जख़म आज मेरा पुराना हुआ

मुझे देख पलकें झुका के मिली
हमारा सफ़र भी सुहाना हुआ
                  
किये यूँ पराये वफा से मुकर
उसे छोड आँसू बहाना हुआ

कभी इश्क का भी चढा था जुनूं
बिछड के कही ना ठिकाना हुआ

विकास भारद्वाज "सुदीप"
04/05/2017

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

6:33 am

हाइकू- पानी

जल जीवन
यूँ व्यर्थ न बहाओं
मूल आधार

जल दूषित
रोग फैलते जब
सचेत रहो

गगन मेघा
बूँद बन बरसे
सावन भादों

झरना बन
नदी में जल बहें
पहाडों बीच

बारिश आयी
तिरक्षी तेज बूदें
बहार छाई

विकास भारद्वाज "सुदीप"
9627193400              24/04/2017

रविवार, 23 अप्रैल 2017

12:21 am

लघुकथा:- नारायणी

एक महिला थी उसका नाम नारायणी अर्थात् लक्ष्मी I उसके तीन बेटे और बेटियाँ थी सभी का विवाह हो चुका था और सभी बेटे अपना नया मकान बनाकर रहने लगे जिनमें उसका सबसे बडा बेटा उमेश केन्द्रीय कर्मचारी था । उमेश के दो बेटे थे वो अमेरिका मे विवाह कर वही के निवासी हो गये और उमेश से छोटा भाई अरविन्द प्राथमिक विधालय में शिक्षक था और नारायणी का सबसे छोटा बेटा अपना विजनिश  करता था I
नारायणी अब वक्त के साथ बूढी होने लगी बुढापा एक ऐसा कडवा सच है जिसे हर
  प्राणी को आना है समय बीतता गया अब वो बूढी माँ कमजोर और चलने फिरने में असमर्थ होने लगी I उसके बेटे उसको अपने पास रखने से कतराते थे आज के जमाने में ऐसा लगता है कि पैसे की अमीरी आने पर लोग अपने माँ बाप को ही भूला देते है उनको पैसो के अलावा कुछ नही दिखता I
लेकिन उस बुढी माँ को घर से निकाल दिया आज वही लोग समाज में खुद की शक्सयित को बडा दिखाने के लिए रिश्तों को तार तार कर देते है ऐसा कुछ नारायणी के साथ हुआ आज वो इधर-उधर रहकर बुढापा काट रही है  उस बुढी महिला की स्मरण शक्ति भी उम्र के साथ कम होने लगी उसके बेटे आँखों का चश्मा तक नही बनबा सके वो अपने बेटों और बहुओं के ताने और रोकटोक से परेशान हो गयी । उसके बेटे ही नही ना जाने कितने लोगों के किस्से जमाने में देखनो को आज भी मिल रहे है ।
माँ क्या होती है समझ जाओगे शायद तुम भी किसी रात को सबके खाने के बाद एक दिन रसोई में अपना खाना खुद ढूढों माँ तो वो भगवान है जिसे बुखार भी हो जाये और उसके बेटे को पता चले तो पता है क्या कहेगी कि बेटा खाना बना रही थी ना इसलिए गर्म हूँ I
गरीबी थी जो सबको एक आंचल में सुला देती थी
,
अब अमीरी आ गई तो सबने अलग मक़ान बना लिए I
लोग न जाने क्यूँ अपने हिन्दुस्तान की संस्कृति और सभ्यता को भूलते जा रहे है I


मेरी यह कहानी पूर्णतः मौलिक
, अप्रकाशित एंव अप्रसारित है।
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
कस्बा-  मेन चौराहा खितौरा
बदायूँ-
243633  (प्र○)
दूरभाषा- +91 9627193400
ईमेल- vikasbhardwaj3400@gmail.com
ब्लॉग/साइट- www.vbsudeep.blogspot.in

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

5:28 am

◆ जलहरण-घनाक्षरी ◆ विश्व पृथ्वी दिवस

पेडों को खूब लगाओ
भूमि से सोना उगाओ
पर्यावरण स्वच्छ हो
बीमारी से मुफ्त तन ।
                              नदी में दवा न छोडों
                              पेडों का दोहन रोकों
                              धरा पर फूल खिलें
                              शुद्ध हो मानव मन ।।
मलबा डालों खेतों में
कूडा न फेंक नालों में
दूषित जल से रोग
जल सदुपयोग कर ।
                              जीवन है जीना होगा
                              वन को बचाना होगा
                              जागरुक बन अब
                              प्रकृति की रक्षा कर ।।

विकास भारद्वाज "सुदीप"
9627193400               21/04/2017

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

1:19 am

गंगा (सफाई)ऐक्शन प्लान/ठोस एवं जैव औषधीय कचरा प्रबंधन विधा- निबन्ध

विधा- निबन्ध

गंगा नदी भारत की प्राचीन नदियों में से एक है और इसका अपना एक इतिहास है ।
यह नदी सब भारतीयों की एक आस्था का भी प्रतीक माना जाता है इससे हमारी पहचान है
इसलिए यह सिर्फ एक नदी नहीं है।
यह नदी हिमालय की गोद से निकल कर मैदानी इलाको में आती है।

इन नदियों का हमारे जीवन में बहुत महत्व है क्योंकि इन नदियों से ही भूमि उपजाऊ बनती है। इसके इलावा इन नदियों के पानी से हमारी दिनचर्या भी पूरी होती है जैसे की पीने के लिए,नहाने के लिए, पेड़-पौधों के लिए,जीव-जंतुओं के लिए आदि ।

अब ये नदी प्रदूषित हो गई है । आज के समय में गंगा को मैली करने में हम सब का बहुत योगदान है। बच्चे के मुंडन से ले के की राख को इस गंगा नदी में बहाया जाता है।
तथा घर में होने वाले धार्मिक कार्यो की चीजे गंगा माँ की गोद में डाल देते है  इसके इलावा शहर का सारा गंद और कारखानो से निकलने वाले जहरीले पदार्थ और रसायन भी इस नदी में बहा दिए जाते है। अब इस गंगा नदी का पानी पिने लायक भी नहीं रहा है ।

सरकार और कई संस्थाये इसे साफ़ करने के कई उपाय निकाल रही है और तो और हर साल इसे साफ़ करने के लिए करोडों पैसे खर्च किये जाते है परन्तु इसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं दिख रहा और अगर इस नदी का यही हाल रहा तो एक दिन ये नदी का पानी पूरी तरह से प्रदूषित हो जयेग।
हम सबको प्रण लेना चाहिए की हम इसे साफ़ रखने में अपना पूरा योगदान दे।

©विकास भारद्वाज "सुदीप"
9627193400          10/04/2017

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