हिंदी साहित्य वैभव

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मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

5:08 am

ग़ज़ल :- बवंडर लग रहा होगा ये इम्तेहान थोड़ी है - प्रदीप ध्रुव


बवंडर लग रहा होगा ये इम्तेहान थोड़ी है।
उसे भी तो पता होगा कि वो नादान थोड़ी है।-01
*
हुआ था कल जो बंटवारा उसी का है नतीज़ा ये,
हमारा है रहेगा भी ये पाकिस्तान थोड़ी है।-02
*
बहाकर खूं मिला हमको शहीदों की अमानत ये,
ये हिन्दोस्ताँ हमारा लूट का सामान थोड़ी है।-03
*
वहम कोई नहीं पाले मिलेगा एक क़तरा भी,
न मुमकिन है किसी हालात पे आसान थोड़ी है।-04
*
किसी फ़िरकापरस्ती से दफ़ा इक मुल्क़ बंट जाए,
जो पूरा हो सके ऐसा कि ये अरमान थोड़ी है।-05
*
किसी शैतान का पैगाम तामीली में आ जाए,
जहां मे ये नहीं मुमकिन भी वो भगवान थोड़ी है।-06
****
★★★  ★★★  ★★★ ★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
दिनाँक.25/12/2019
मो.09589349070
★★★  ★★★  ★★  ★★★
5:07 am

गीत-उपवन और झरने - प्रदीप ध्रुव


***
गीत उपवन और झरने नदी बह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।
*
पीर है इक सदी की जो संभाब्य है।
ये तो वृत्तांत लघु में महाकाव्य है।
गीत सुर में जो ढलती मचलती हुई,
गीत वो धूप और स्वेद का काब्य है।
गीत है जो ब्यथा ज़िन्दगी सह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।-01
*
गीत अल्लढ़ मचलती नदी धार है।
गीत केवट की अनुपम वो पतवार है।
जो लगा दे कि उस पार ये ज़िन्दगी,
गीत वो सौम्य नाविक की मनुहार ही।
काब्य की धार उर में है जो बह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।-02
*
गीत जो जो किला लाल बिन चल रही।
गीत मज़दूर कवि के हृदय पल रही।
गीत आभार है इस वतन के लिए,
राष्ट्र के भक्त उनके हृदय ढल रही।
अब बचाओ भी मर्यादा जो ढह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।-03
*
गीत कविता का ब्यापार बिल्कुल नहीं।
मात्र प्रियतम का मनुहार भर ये नहीं।
गीत है लोरियाँ माँ की वात्सल्य मय,
गीत जीवन का आसार भर ये नहीं।
ये सदृश जो विहंगम सरित बह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।-04
*
गीत टूटे हुए दिल का आसार है।
सुख की अनुभूति का गीत आगार है।
जो चरम कल्पनाओं में हो अग्रसर,
सृष्टि और ज़िन्दगी का परम सार है।
गीत है अस्मिता उर में जो रह रही।
गीत पर्वत सदृश ये सदी कह रही।-05
***
★★★  ★★★  ★★★  ★★
स्वरचित,कापीराइट,गीतकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.27/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:06 am

ग़ज़ल :-ग़रीबों पे ग़ज़ल है ये निहायत दास्तां उनकी - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-1222×4,मफाईलुन×4
***
ग़रीबों पे ग़ज़ल है ये निहायत दास्तां उनकी।
बयां करते फटेहालात जो है खामखां उनकी।-01
*
यतीमों पे ग़ज़ल है तो उन्हीं के नाम से होगी,
न हो क्यों ये हिफाज़त भी करे वो बागवां उनकी।-02
*
यतीमों ने है फरमाया यकीं उनको खुदा पे है,
दुआ मांगे न चाहत में रहा है आसमां उनकी।-03
*
बड़े ईमान वाले हैं खुदा कहता यही बहतर,
गिला इस बात की ना कद्र कर पाए जहां उनकी।-04
*
ग़ुमां पाले जमाना "ध्रुव"नहीं कुछ संग में जाना,
रुकी सांसें नहीं फिर काम आती है फ़िजां उनकी।-05
***
★★★★★★★★★★★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.28/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:05 am

ग़ज़ल :- ये प्यार भी मुक़म्मल मिलता नहीं सभी को - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-2212-1222-2121-22
***
ये प्यार भी मुक़म्मल मिलता नहीं सभी को।
चाहत खिला हुआ ग़ुल  मिलता नहीं सभी को।-01
*
बेज़ार हो चला वो गम की तपिश हुई जब,
रौशन हुआ मगर दिल मिलता नहीं सभी को।-02
*
आशिक़ रहा फ़िजां का इंसानियत नहीं की,
गम है मिला मुसलसल मिलता नहीं सभी को।-03
*
आना बहार थी पर गम की तपिश मिली है,
मानिन्द उनके भी फल मिलता नहीं सभी को।-04
*
ये वक़्त भी उठा औ देता उतार सबको,
हों रास्ते ज़ुदा हल मिलता नहीं सभी को।-05
*
आसां नहीं जगह भी दिल में बना सकें हम,
कोई मिला है हरदिल मिलता नहींं सभी को।-06
*
बेखौफ जी सकें "ध्रुव" अरमां रहा सभी का,
सब कुछ रहे मुक़म्मल मिलता नहींं सभी को।-07
***
★★★★★★★★★★★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.29/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
5:00 am

ग़ज़ल :- जिनके खातिर भी हमने लुटा जान दी - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-2222-1221-2212
***
जिनके खातिर भी हमने लुटा जान दी।
उनने भी तो मुझे मौत आसान दी।-01
*
ये है आसां नहींं दोस्त हरदम रहे,
दोस्त कल का मिटा दे मुझे ठान दी।-02
*
मैं ही पागल रहा यार माना उसे,
उसने दी चोंट मैने मेरी जान दी।-03
*
कब है आया फरेबी किसी काम पे,
उसने ही तो सभी कुछ हलाकान दी04
*
चलते चलते पहुँच है गये मोड़ पे,
उसने तो मार किश्तो में आसान दीँ।-05
*
ऐसा जायज़ नहींं ज़िन्दगी में कभी,
उसने मंदिर में कर्कश भरी तान दी।-06
*
होती आसां नहीं मौत या ज़िन्दगी,
रब ने तक़दीर "ध्रुव" को बियाबान दी।-07
***   ****   ****   ***    *****
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल म.प्र.
दिनाँक.30/01/2020
मो.09589349070
★★★★  ★★★   ★★★★
4:59 am

गीत :-खुशियाँ ज़िन्दगी की - प्रदीप ध्रुव


मात्राभार-14-14
***
खूटियों पर टाँग खुशियाँ,हो गये परिवार के हम।
चैनसुख भूले सभी कुछ,बन मुसाफ़िर ख़ार के हम।
*
भूल हम बैठे स्वयं को,कर्मपथ चलते रहे बस।
त्याग का पर्याय देखा,आँख सब मलते रहे बस।
हम हुए हैं शून्य संग,साक्षवत संसार के हम।
चैनसुख भूले सभी कुछ,बन मुसाफ़िर खार के हम।-01
*
डूबकर संसार में हम,पी रहे सबका जो गम था।
आँसुओं से तरबतर थे,बाँट डाला जो सितम था।
हम बने कर्तव्य पालक,साक्ष्य थे अधिकार के हम।
चैनसुख भूले सभी कुछ,बन मुसाफ़िर खार के हम।-02
*
पर मिला निष्कर्ष ये भी,फल नहीं मिलता यहाँँ छल।
आज में जीते नहीं हम,और है आता नहींं कल।
यत्न नाहक क्यों करें गम,मोहरे ब्यापार के हम।
चैनसुख भूले सभी कुछ,बन मुसाफ़िर खार के हम।-03
*
आचमन पीते रहे हम,संग पिया हमने सितम है।
भाग्य से मिलता रहेगा,दिल में जो आया वहम है।
रात पूनम की अँधेरा,पर तमस में ही रहे हम।
चैनसुख भूले सभी कुछ,बन मुसाफ़िर खार के हम।-04
*
★★★★★★★★★★★★
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.31/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
4:57 am

ग़ज़ल :- यादों के साये ज़िन्दगी ग़ुज़ार लेंगे हम- प्रदीप ध्रुव


यादों  के  साये  ज़िन्दगी  ग़ुज़ार  लेंगे हम।
पहले  जो  हो  गई  ख़ता  सुधार  लेंगे हम।-01

उनपे  दीवानगी   हुई  बेइंतहा  मुझे,
चाहत  है  उनका  प्यार  भी  उधार लेंगे  हम।-02

आवारगी  है  हिज़्र  में  हम  बेखबर हुए,
यादों  में  आपके  ये  दिन  ग़ुज़ार  लेंगे हम।-03

तनहाइयाँ  तो  ज़िन्दगी  में  हमसफ़र   हुईं,
यादों  में  उनका  अक्स  भी  उतार लेंगे  हम।-04

मुमकिन  भले  आसाँ  नहीं  सब बेशुमार  हो,
मंज़िल  न  आए  हाँथ  में  बिसार  लेंगे  हम।-05

ग़ुमनाम  अपनी  ज़िन्दगी  जो  अब  तलक  रही,
कुछ  फूल  भी  रखें  उधार  ख़ार  लेंगे हम।-06

★★★★★★★★★★★★
कवि शायर प्रदीप ध्रुवभोपाली,
भोपाल,दिनाँक.10/06/2019
मो.9893677052/9589349070
★★★★★★★★★★★★

4:55 am

ग़ज़ल :- जब से रुखसत हुआ दिलरुबा नही आया - प्रदीप ध्रुव


जब से रुखसत हुआ दिलरुबा नही आया ।
जाने  क्या कुछ  हुआ  महरवाँँ नहीं आया ।।-01
*
हमने मागा सुकून था उससे मगर वो तो
बदला मौसम कभी कहकशां नहीं आया।-02
*
दे के सपने गया बहुत से मगर अब तक,
वो है ज़ालिम मिरा हमनवां नहीं आया।-03
*
मेरा माशूक दे के तड़प गया जब से,
उसके मानिन्द कोई ज़वां नहीं आया।-04
*
कबसे हाथों हिना सजाई हुई आखिर,
कैसा ज़ालिम मिरा नौज़वां नहीं आया।-05
*
रो के होने लगे अश्क़ "ध्रुव" ख़त्म अब तो,
मेरे दिल का हसीं बागवां नहीं आया।-06
***
****   ****  ***  ***  ***  ***
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.07/02/2020
मो.09589349070
★★★  ★★★  ★★★  ★★
4:53 am

गीत :-प्रेम क्या है - प्रदीप ध्रुव


प्रेम क्या है सुनो साथियों, प्रेयसी का मिलन साज है।
मीरा ने ज्यों किया कृष्ण से,बस वही नेक अंदाज़ है।
*
राग है रागिनी प्रेम स्वर,माँ का वात्सल्य शुचि प्रेम है।
राखियों में पगा प्रेम है,करती वो जो बहन नेम है।
ईश की साधना प्रेम है,मर्म या हम कहें राज है।
मीरा ने ज्यों किया कृष्ण से,बस वही नेक अंदाज़ है।-01
*
भ्रात का प्रेम अनुपम भरत,
लक्ष्मण का वो वनवास है।
जो सखी के मिलन के लिए,मन में जगती हुई आश है।
प्रेम निकले हृदयतल से जो,नेह की एक आवाज है।
मीरा ने ज्यों किया कृष्ण से,बस वही नेक अंदाज़ है।-02
*
प्रेम निर्बल नहीं है सबल,प्रेम तो एक आकाश है।
प्रेम संभावना सिद्धि की,ये भगीरथ की अभिलाश है।
प्रेम जो प्रेयसी के लिए,हद पे जाने का आग़ाज़ है।
मीरा ने ज्यों किया कृष्ण से,बस वही नेक अंदाज़ है।-03
*
बिन बताये जो मन जान ले,प्रेम पावन सा एहसास है।
हो कर जो न घटे फिर कभी,प्रेम मन का ये विश्वास है।
प्रेम का राज हरदम रहा,प्रेम सदियों से था आज है।
मीरा ने ज्यों किया कृष्ण से,बस वही नेक अंदाज़ है।-04
***
★★★★★★★★★★★★
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.16/02/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
4:52 am

गीत :-खुशबुओं की तरह - प्रदीप ध्रुव


खुशबुओं की तरह हम बिखरते रहे,
दिल में सबके मगर हम उतरते रहे।
वक्त के जो थपेड़े पड़े हम पे हैं,
उससे ज़्यादा और हम निखरते रहे।
*
कभी गुल सरीखे सजाये गये,
सजावट  से फिर हम हटाये गये।
कभी दौर था जब रहे अर्श पे हैं,
सरताज़ भी हम बनाये गये।
वही दौर था शेर मानिन्द हम या,
सदर की तरह हम ग़ुज़रते रहे।
वक़्त के जो थपेड़े पड़े हम पे हैं,
उससे ज़्यादा और हम निखरते रहे।-01
*
वक्त बदलाव का नाम है ज़िन्दगी,
ज़िन्दगी ने हमें आजमाया बहुत।
जब रहे अर्श पे तो हँसे भी बहुत,
ज़िन्दगी ने मगर फिर रुलाया बहुत।
हार माने नहीं तय हुई मंज़िलें,
अश्क़ संग और भी हम सँवरते रहे।
वक़्त के जो थपेड़े पड़े हम पे हैं,
उससे ज्यादा और हम निखरते रहे।-02
*
बात ईमान की और अदब संग चले,संग मेरा मुश्किलों नें निभाया बहुत।
कुछ मिले कालनेमि मगर राह पे,
बच निकलते रहे,पर लुभाया बहुत।
जब चले तो चले फिर रुके ही नहीं,देखने को असलियत ठहरते रहे।
वक्त के जो थपेड़े पड़े हम पे हैं,
उससे ज़्यादा और हम निखरते रहे।-03
*
टिमटिमाता दिया जल रहा अनवरत,कोशिसें आँधियों की बुझा न सके।
गर्त में डालने की रहीं कोशिसें,
उनके फन कुचला सर वो उठा न सके।
हम कभी टूटते नाम उसका नहीं,
मेरे अरमां और भी मचलते रहे।
वक्त के जो थपेड़े पड़े हम पे हैं,
उससे ज़्यादा और हम निखरते रहे।-04
***
★★★★★★★★★★★★
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.17/02/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
4:51 am

गीत :- शान तिरंगा - प्रदीप ध्रुव



सैनिक बोला माटी चंदन,मान तिरंगा है,मेरी शान तिरंगा है।
जान लुटाकर शान बचायें,जिसमें जाँ बसती,वोअरमान तिरंगा है।
*
पूजन करते हम माटी का,माँ की शान बढ़ाते हैं।
एक नहीं हम शीश हजारों, माँ को रोज़ चढ़ाते हैं।
नहीं तिरंगा झुकने दें हम,इसका पूजन करते,पावन यमुना गंगा है।
सैनिक बोला माटी चंदन,मान तिरंगा है,मेरी शान तिरंगा है।-01
*
संकट में हो जान मगर,हम फ़र्ज़ निभाते हैं।
दुश्मन को हर हाल में,हम तो धूल चटाते हैं।
जिसके बिना नहीं जी पायें,जोश चढ़ाये रग रग में वरदान तिरंगा है।
सैनिक बोला माटी चंदन,मान  तिरंगा है,मेरी शान तिरंगा है।-02
*
जान लुटायें जब सैनिक,ये लिपट बहुत रोये।
अर्थी के संग सज़ा तिरंगा,निज आपा खोये।
बीत रही क्या सैनिक माँ पे,और बहन पे,नहीं अंजान तिरंगा है।
सैनिक बोला माटी चंदन,मान तिरंगा है,मेरी शान तिरंगा है।-03
*
जोश हमें देता दुश्मन को धूल चटाते हैं।
दुश्मन का सर काट हजारों,माँ पे चढ़ाते हैं।
देश से बढ़कर तीन रंग ध्वज,छू ले दुश्मन,नहीं आसान तिरंगा है।
सैनिक बोला माटी चंदन,मान तिरंगा है,मेरी शान तिरंगा है।-04
***
★★  ★★  ★★  ★★  ★★
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.18/02/2020
मो.09589349070
★★  ★★  ★★  ★★  ★★
4:50 am

ग़ज़ल :- हादसा है ज़िन्दगी ये मौत भी इक हादसा है - प्रदीप ध्रुव

बह्र/अर्कान-2122×4,फाइलातुन×4
★★★★★★★★★★★★

हादसा है ज़िन्दगी ये मौत भी इक हादसा है।
चाह बिन जीना यहाँ मरना यहाँँ भी खाँमखा है।-01

हौंसला मुझमे दिखा जाँवाज थे हम नामवर भी,
एक ही आवाज़ में पीछे चला फिर कारवां है।-02

रौब वाला वो रहा कहते रहे उसको फ़लक सब,
जब सितारे ग़र्दिशों में कौन कहता आसमां है।-03

आरज़ू को ज़ुस्तज़ू में जो करे तब्दील कहते,
सब यही आसाँ नहीं ये इस जहाँ का बागवां है।-04

ऐ खु़दा मेरे लिए इंसानियत है फ़र्ज़ जायज,
हमवतन से हम निभाते यूँ कि वो बस हमनवां है।-05

मुफ़लिसों के जब मसीहा हम बने सब ने कहा ये,
आज भी इंसानियत का दौर "ध्रुव" कह लो ज़वां है।-06

★★★★★★★★★★★★
कवि शायर प्रदीप ध्रुवभोपाली
भोपाल,दिनाँक.21/02/2019
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
4:48 am

ग़ज़ल :- मसाइल बहुत से खुराफ़ात वाले - प्रदीप ध्रुव

★★★★★ग़ज़ल★★★★★
बह्र/अर्कान-122×4
***
मसाइल बहुत से खुराफ़ात वाले।
सियासी इनायत करामात वाले।।
*
सियासी एजेण्डे छुपे तौर चलते,
मुल्क़ तोड़ दें यार हालात वाले।
*
बहाना जिन्हें चाहिए हरक़तों का
दिखें दिन में कुछ और कुछ रात वाले।
*
पिलाया जिन्हें दूध सत्तर बरस से
फ़सादात के हैं वो सौगात वाले।
*
हलाकान जिनने किया मुल्क़ अब तक
नहीं दम मगर "ध्रुव" बड़ी बात वाले।
*
***  ***   ***   ***   ***   ***
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.26/02/2020
मो.09589349070
***  ***   ***   ***  ***  ****
4:47 am

ग़ज़ल :- आँँसू बहे जो रात भर तो बन गई ग़ज़ल - प्रदीप ध्रुव

*******ग़ज़ल*******
बह्र/अर्कान-2212-2212-2212-12
******************************
आँँसू बहे जो रात भर तो बन गई ग़ज़ल।
ये ज़िन्दगी में ज़ख्म आये तन गई ग़ज़ल।
*
दो पल खुशी की ज़िन्दगी ख़ारों भरा सफ़र,
दिन काटने की बात आयी ठन गई ग़ज़ल।
*
जाती रही है नींद वो जबसे जुदा हुए,
बहते हुए जो आंसुओं से सन गई ग़ज़ल।
*
ठोकर लगी तो  सांच क्या मालूम ना हुआ,
करने पता क्या माजरा मधुवन गई ग़ज़ल।
*
सारा फरेबी है जहां शिकवा करें कहां,
सरपंच अलगू मिल गये आंगन गई ग़ज़ल।
*
आशिक़ हुए थे यार के धोखा मिला जिन्हें,
बेचैनियों में *ध्रुव* सुनो लन्दन गई ग़ज़ल।
***
++++++++++++++++++++++++++
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल, मध्यप्रदेश
दिनांक-22/03/2020
मो.09589349070
*********************************
3:55 am

ग़ज़ल :- है छेद सफ़ीना में इल्ज़ाम समंदर पे - प्रदीप ध्रुव


है छेद सफ़ीना में इल्ज़ाम समंदर पे।
बदनाम हुए खुद वो इल्ज़ाम मुकद्दर पे।
*
गुमनाम रहे कबसे अश़आर नहीं आये,
बन के वो मिलें ग़ालिब भटके जो गली दर पे।
*
सामान बहुत कम था फरियाद हुई इसकी,
तब बोल उठा मुंसिफ तुम आओ गली घर पे।
*
अंज़ान नहीं कोई ग़द्दार यहां कितने,
इल्ज़ाम किसी सर का लाओ न कलंदर पे।
*
इंसान मिलें बहतर मिल जाएं यहां बदतर,
हो ऐब नहीं फिर भी लग जाए कोई सर पे।
***
प्रदीप ध्रुवभोपाली, भोपाल,म.प्र.
दिनांक,23/03/2020
मो.09589349070
**************************
3:53 am

ग़ज़ल :- उठी नज़र गिरा दिया उसने - प्रदीप ध्रुव

वज़्न-1212-1212-22

उठी  नज़र  गिरा  दिया  उसने।
अजाब  में  मिला  दिया  उसने।
*
तमाम  उम्र  भर  सलामत  रहे,
कि  आइना  दिखा  दिया  उसने।
*
उधार  प्यार  जो दिया  कल  को
नसीब  ये  निभा   दिया   उसने।
*
शरारतें   गुज़र   गईं   हद   से
ग़नीमतें   बता   दिया  उसने ।
*
शबाब  वो  शराब  माफिक़ *ध्रुव*
हसीन  ग़ुल  खिला  दिया उसने।
***
**************************
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनांक.25/03/2020
मो.09589349070
**************************
3:51 am

ग़ज़ल :- हिदायत ये जमाने में निभाना है - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-1222-1222-1222
***
हिदायत  ये  जमाने में  निभाना  है।
पता  आया  जहां तो  कैदखाना है।
*
हिकारत से  उन्हें वो  देख  कर  बोले
खुदा  जाने  कहां  पे  आबदाना है।
*
कहीं  मातम  उधर  बारात  है निकली,
निहायत  बेरहम  ये  तो जमाना है।
*
कहीं  सीरत  कहीं  सूरत  बिकाऊ सब,
बिके   सबकुछ   किसी   को  आजमाना है।
*
ज़हन्नुम  देख  आये  इस  ज़माने का,
बिलायत   ज़ीस्त   का   इक कैदखाना है।
*
हुआ  था इश्क़  है  होता  रहेगा *ध्रुव*
बदल  जाते  करक्टर यूं जमाना  है।
***
**************************
प्रदीप ध्रुवभोपाली, भोपाल,म.प्र.
दिनांक.25/03/2020
मो.09589349070
**************************
3:50 am

ग़ज़ल :- चोर मैं तू है सिपाही तो मज़ा है आ रहा - प्रदीप ध्रुव

चंद अश़आर/ग़ज़ल
**************************
बह्र/-2122-2122-2122-212
फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन
फाइलुन

चोर मैं तू है सिपाही तो मज़ा है आ रहा।
तू सड़क मैं यार राही तो मज़ा है आ रहा।
*
जो कहे तू वो बनेगी सब कहें नाज़ीर अब
हो रही है वाहवाही तो मज़ा है आ रहा।
*
आसमां है सुर्ख़ अब तो रोज़ वो गहरा चला
सुर्ख़ से हो जाय स्याही तो मज़ा है आ रहा।
*
ज़िन्दगी को ग़र हक़ीक़त में जिएं ये सीख लें
फिर कहेंगे या इलाही तो मज़ा है आ रहा।
*
जो निहायत खानदानी तो अलग तासीर भी
जो हुई है ठाट शाही तो मज़ा है आ रहा।
*
फ़लसफ़ा है ज़ीस्त ये नोबल भी हम यूं कह सकें
ये ज़ुदा *ध्रुव* यार राही तो मज़ा है आ रहा।
*
***
**************************
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल म.प्र.
दिनांक 29/03/2020
मो.09589349070
**************************
3:49 am

ग़ज़ल :- सियासत को क़रीने से अगर तुम खुद सजाओगे - प्रदीप ध्रुव

***********ग़ज़ल**********
बह्र/अर्कान-1222*4,मफाईलुन*4

***
सियासत को क़रीने से अगर तुम खुद सजाओगे।
यकीं मानो फतह का दौर तब ही यार लाओगे।
*
बुलंदी में नहीं झंडा कभी यूं ही ये लहराये
अगर चाणक्य नीती हो तभी कुछ यार पाओगे।
*
बिसातें भी बिछाना है ज़ुदा अंदाज़ शातिर हो
यकीं मानो फतह होगी तुम्हीं तुम लहलहाओगे।
*
शराफ़त ओढ़ कर चलना ज़ुबां यूं हो गली मिश्री
बनाया है जिसे आका सलामी ठोंक आओगे।
*
बनो आबाम के लीडर निहायत सादगी रखना
बिठायेगी तुम्हें सर‌ पे यकीनन जीत जाओगे।
*
दवा दारू कभी कंबल भरी रातों मयस्सर कर
खिलेगा ग़ुल तुम्हारे सर पे *ध्रुव* सहरा सजाओगे।
***
**************************
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र
दिनांक.30/03/2020
मो.09589349070
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3:46 am

ग़ज़ल :- सब अकेले ही न चखा जाये - प्रदीप ध्रुव


वज़्न-2122-2112-22

सब अकेले ही न चखा जाये।
कुछ सभी का ख़्याल रखा जाये।-01
*
हम नहीं बेगार करेंगे अब
काम भी अब ख़ास दिया जाये।-02
*
हो गये हो आप मसीहा जब,
ख़ैरमक़दम यार किया जाये।-03
*
वो नहीं सुनते अब जायज भी,
दिन गये लद यार अब कहा जाये।-04
*
यार ज़िद अपनी भी यही है अब
अब न ज़्यादा सितम सहा जाये।-05
*
कर रहा तू वार अरे ज़ाहिल,
हांथ दो क्या यार दिया जाये।-06
*
डर खुदा से वो न बख्शेगा "ध्रुव"
हांथ रख सौग़ात मिला जाये।-07
***
★★★★★★★★★★★★
स्वरचित,कापीराइट,ग़ज़लकार,
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.17/01/2020
मो.09589349070
★★★★★★★★★★★★
3:44 am

हास्य रचना/चुनाव का मौसम - प्रदीप ध्रुव


चुनाव का मौसम आया,नेताजी ने बुज़ुर्गो के पाँव छुए।और विजयश्री मिलते ही पाँच बरस को ईद के चाँद हुए।
फिर क्या...
ग़ुमशुदा नेता की तलाश में जनता ने जगह जगह इश्तहार लगवाया.।
कोई ज्योतिषियों के चक्कर तो कोई तांत्रिक के यहाँँ हवन करवाया।
पर हाय री किश्मत..
इन सबके बावजूद भी नेता लापता पाँच बरस नज़र न आया।
और अगला चुनाव आने की आहट भर से नेताजी फिर पधारे..
किसी ने कहा आप कहाँ से आ टपके,सभी ने कहा तुम स्वर्ग सिधारे.
अरे चुनावी मौसम के मेंढक फिर टर्र टर्र टर्राने आ गये..
मुझे पता है तुम्हारी दाल भर काली नहीं,सारी दाल ही खा गये..
अरे बुड़बक बेशरम मोटी खाल के तुम,न काम के न काज के तुम..
अब कौन सा मुँह ले कर तुम फिर से आशिर्वाद लेने आ गये..
***  ***  ***   ****   ****   ****  ***  ***   *****
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल म.प्र.दिनाँक.
08/02/2020
मो.09589349070
****   ****   ***   ****   ****   ***** 
3:43 am

हास्य रचना/आग किसने लगाई - प्रदीप ध्रुव


तुम शेर..हम..सवाशेर..गुलमटो..
ये आग किसने लगाई..
मै ने और मिश्रीलाल ने....
सालो को घोल घोल के ऐसा पिलाया..
अरे.हमने.तो कान में फुसफुसाया
हम हैं न..लगे रहो मुन्नाभाई..
स्सालों को बिरयानी किसने खिलाई..
मै ने और मिश्रीलाल ने...
आजादी के सत्तर सालों में,
रोंककर रखा बस मिश्री पिलाते रहे..और वो ज़हर उगलते रहे..
आज़ादी का..कहर बरपते रहे..
ये काम किसने किया...
मै ने और मिश्रीलाल ने..
अरे गर्व से सीना चौड़ा हो जाता मेरा.
साम्प्रदायिकता की आग किसने सुलगाई..
भारत तेरे टुकड़े होंगे,चिल्लाने की
घुट्टी किसने भर भर पिलाई
मै ने और मिश्रीलाल ने..
काम ग़ज़ब का किया हमने 
स्सालों को न मरने न जीने दिया हमने..
कसम कालेचोर की उसके सगे भाई निकले हम..
ये सब्सिडी फ्री बिजली पानी की आदत किसने सिखाई.
मै ने और मिश्रीलाल ने..
अरे हमने कहा लगे रहो रातदिन
साल में एक की जगह कैलेण्डर चार निकालो..
और ठीकरा इसपे उसपे फोड़ो...
सच भी है..ये काम किसने किया
मै ने और मिश्रीलाल ने..
अरे निकम्में के नातियों...
बैठे खा रहे सफेद हाँथियो़..
दिनरात काम हम करें,और तुम
रिजल्ट अपना बता रहे..
हमीं तो हैं,जो तुमको बसाया..
तुम्हारा बाज़ा हमने बजाया...
तभी तो सुर भी बेसुरा निकला
ये काम किसने किया..
मै ने और मिश्रीलाल ने..
अँधेरे के यारो,देश के.मक्कारो
कब तक तुम्हारा भार हम उठायेंगे
कम से कम अब तो हमारी जय बोलो..
वंदेमातरम् बोलकर मुँह खोलो
ज़मीन है नहीं पैरों तले हमारी है
टेंट भी हमारा बिरयानी हमारी है
आधे कैलेन्डर भी हमारे हैं
नारे लगाने वाले आधे हमारे हैं
आज़ादी सत्तर सालों बाद डूब मरना किसने सिखाया..
मै ने और मिश्रीलाल ने..
गुलामी पसंद नमकहरामों
अँधेरे के बाशिंदों खैरातियो
शर्म से डूब मरो,मेरा काम तुम्हारा नाम..
तुम्हारे चाँद मे चार चाँद किसने लगाया..
मैं ने और मिश्रीलाल ने
वो तो बताया नहीं,लगे रहे हम
किया था वादा तुमसे यहीं रहो
तुम्हें आगे न बढ़ने देंगे खैरातियो
न जीने न मरने देंगे...
दूसरो के टुकड़ो पे जीना किसने सिखाया
तुम्हें वोट बैंक किसने बनाया..
मै ने और मिश्रीलाल ने..
और खाओ रसमलाई, फोकट की
हुई न तुम्हारी जगहँसाई...
अब चिल्लाते रहो बस..
तुम्हें कहीं न रहने दिया...
ये काम आखिर किसने किया..
मैं ने और मिश्रीलाल ने....
अरे लात के भूतो,कम से कम अब तो सोते से जाग जाओ..
हम भी डूब गये तुम्हें डुबा दिया
सरेआम ये काम किसने किया..
मै ने और मिश्रीलाल ने...
***
प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनाँक.09/02/2020
मो.09589349070
★★  ★★★  ★★  ★★  ★
3:42 am

गीत :- आज सुखमय जिएं किसने देखा है कल - प्रदीप ध्रुव


आज सुखमय जिएं किसने देखा है कल।
रुख यहां ज़िन्दगी का बदलता है पल।
आश विश्वास संचार सुखमय करे।
जो मिले घाव थे आज उनको भरे।
ऐसा जीवन भी जीना नहीं काम का,
हर घड़ी मन में ये अब मरे अब मरे।
सांच को देखिए आंख को आज मल।
रुख यहां ज़िन्दगी का बदलता है पल।०१
*
भाव समभाव के पी सकें हम ग़रल।
आश कम हों यहां जी सकें हम सरल।
आवरण हम मिटा ठोस चिन्तन करें,
ज़िन्दगी को बनाएं सरल और तरल।
हम सजग हो चलें हर घड़ी आज छल।
रुख यहां ज़िन्दगी का बदलता है पल।०२
*
हम सफलता उसे आज हैं कह रहे।
जो कि ऊंचाइयों की तरफ बह रहे।
आज असफल जो ईमान पे हैं चले
नित्यप्रति घात प्रतिघात हैं सह रहे।
सांच सुखमय मगर हैं वो दिखते विफल।
रुख यहां ज़िन्दगी का बदलता है पल।०३
*
अब बिना कूटनीति है निस्सार सब।
कुर्सियों पर नज़र है यही सार अब।
कीजिए अब खुशामद सियासत बड़ी
वक्त बेवक्त जरूरत ही आ जाए कब।
संग सियासत रहे तोड़ आए निकल।
रुख यहां ज़िन्दगी का बदलता है पल।०४
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प्रदीप ध्रुवभोपाली, भोपाल,म.प्र.
दिनांक.07/04/2020
मो.09589349070
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3:41 am

गीत :- हमें चलना संग सभी के,पर इतिहास भी रखना याद हमें - प्रदीप ध्रुव भोपाली


हमें चलना संग सभी के,
पर इतिहास भी रखना याद हमें।
हम आंखें मूंद चलें नहीं अब,
नहीं होना फिर बर्वाद हमें।
*
हम भाईचारा रखेंगे पर,
पर नीयत पर चौकस होंगे।
कहता इतिहास भरोसा कर, 
फिर मरने को बेवश होंगे।
इतिहास वो जौहर का अब भी,
हर पल आता है याद हमें।
हम आंखें मूंद चलें नहीं अब,
नहीं होना है बर्वाद हमें।-01
*
हर चाल विफल कर देंगे हम,
खोटी नीयत को हराएंगे।
जो मानवता के दुश्मन हैं,
प्रण प्राण से जुट के मिटाएंगे।
संहार करेंगे दुश्मन का,
अब करना नहीं फरियाद हमें।
हम आंखें मूंद चलें नहीं अब,
नहीं होना है बर्वाद हमें।-02
*
वो फूट करेंगे आपस में,
नहीं फंसना हमको चालों में।
संहार करेंगे मिलकर हम,
ताक़त है बहुत दिलवालों में।
बर्वाद करेंगे दुश्मन को,
भारत करना आबाद हमें।
हम आंखें मूंद चलें नहीं अब,
नहीं होना है बर्वाद हमें।-03
*
ये झूठे भाईचारे के,पैगाम 
न अब चल पाएंगे।
हम देश के हित में चाल चलें, दुश्मन सारे हिल जाएंगे।
ये सुन लें खोल के कान सभी,
करना हिंद ज़िंदाबाद हमें।
हम आंखें मूंद चलें नहीं अब,
नहीं होना है बर्वाद हमें।-04
*
तुम झूठ के राग अलापो मत,
भारत के हित में काम करो।
जयचंद हमारे नज़रों में,
उनका तो बुरा अंज़ाम करो।
अंज़ाम करेंगे हम तो अब,
नहीं करना अब फरियाद हमें।
हम आंखें मूंद चलें नहीं अब,
नहीं होना है बर्वाद हमें।-05
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प्रदीप ध्रुवभोपाली भोपाल म.प्र.
दिनांक.10/04/2020
मो.09589349070
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3:39 am

गीत :- दिन पुराने लौट आए हैं - प्रदीप ध्रुव भोपाली


बिछड़ कर जो गये पंछी, यकायक लौट कर आए।
बहुत सहमें हुए चहरे, गिरफ्त से छूट कर आए।

कोई पैदल ही चलकर के,आए गांव को अपने।
शहर से वो चले आए,जो देखे छोड़कर सपने।
भयावह रोग से डर के,वो घर गांव को आए।
बहुत सहमें हुए चहरे, गिरफ्त से छूटकर आए।-01
*
विरह में थे शज़र, डालों को पंछी छोड़कर भागे।
मगर मुश्किल हुई पंछी,जो आए भाग हैं जागे।
शहर को जो गये पंछी,मज़ा हैं लूटकर आए।
बहुत सहमें हुए चहरे, गिरफ्त से छूटकर आए।-02
*
हमारे गांव को पिछड़ा समझकर,
थे शहर भागे।
न कहकर वे कभी थकते, हमारे भाग हैं जागे।
बदलता देख मंज़र गोद मां की,
टूटकर आए।
बहुत सहमें हुए चहरे, गिरफ्त से छूटकर आए।-03
*
बहुत से पांव चलकर,आ सके न, याद है आयी।
हवाले आग के उस शहर में फरियाद है आयी। 
न आखिर पल में घरवाले,शक्ल भी देखने पाए।
बहुत सहमें हुए चहरे, गिरफ्त से 
छूटकर आए।-04
*
परिन्दे ठूंठ पर आए,बसंत फिर लौट आया है।
हरे कानन और गांवन ने खुशी के गीत गाया है।
वतन आए खुशी से वो, नहीं वो 
रूठकर आए।
बहुत सहमें हुए चहरे, गिरफ्त से छूट कर आए।-05
*
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प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल,म.प्र.
दिनांक.13/04/2020
मो.09589349070
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3:33 am

दीप आओ जलाएं,हम कोरोना भगाएं - प्रदीप ध्रुव भोपाली


दीप आओ जलाएं,हम कोरोना भगाएं।
आ गया है जो संकट,हम उसको मिटाएं।

घर के रहकर सजग,देना मात हमें।
हो सेनेटाइज इसमें,देना साथ हमें।
दाल कोरोना की,न अब गल पाएगी,
हर मदत हाथों में,हाथ देना हमें।
हम-वतन से मोहब्बत,चलो हम निभाएं।
आ गया है जो संकट,हम उसको मिटाएं।

कहती सरकार जो,उसका पालन करें।
दूरी सामाजिक,उसका अनुपालन करें।
स्वच्छता रखना है,ये समाधान है,
आओ जीवन में,हम अनुशासन करें।
मिटे बीमारी ये,हर कदम हम उठाएं।
आ गया है जो संकट,हम उसको मिटाएं।

मास्क पहनें सभी,घर में ही हम रहें।
मन में रख धैर्य, विचारों से सम रहें।
ज़ंग कोरोना भयावह,बचें यत्न कर,
ताकि कल खुशियां हो,आंखें न नम रहें।
करना पालन नियम,आओ सबको बताएं।
आ गया है जो संकट,हम उसको मिटाएंं।

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प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल म.प्र.
दिनांक.05/04/2020
मो.09589349070
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2:01 am

मुक्तक‌- दिल के करीब ये कभी आजार - अभिषेक जैन

न करना।।
दिल के करीब ये कभी आजाद
न करना।।
ये इश्क है इसको कभी अखबार
न करना।।
वो काम का बंदा है अभी काम
बहुत है।।
ये रोग लगाकर उसे बेकार
मत करना।।

अभिषेक जैन पथारिया
दमोह मध्य प्रदेश

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

7:36 pm

नशा तेरे प्यार का - वीरेन्द्र कौशल


नशा  तेरे  प्यार  का 
देखो तो कितना अज़ीब 
हो गर कहीं रेंज़ से दूर 
कर देता मुझे मज़बूर
ऐसा होता यूं महसूस
हूँ  नहीं  मैं  महफूज़ 
हैं सिर्फ यह तड़पता 
हो गर कहीं आस पास य़ा करीब
फिर सुन ले मेरे रक्कीब 
तो दिल हैं यह धड़कता 
तेरा  ज़ो हो जाये दीदार 
तो  होता  हूँ  दिलदार 
न  हो  गर तेरा दीदार 
ये  दिल रोता  ज़ार ज़ार 
पुकारता  तुझे  बारम्बार 
तो  आजा  तो  एक  बार 
तेरी एक झलक को बेताब 
हर पल अा रहे तेरे ख्वाब 
नशा  तेरे  प्यार  का ....

आपका अपना ,
वीरेन्द्र  कौशल
11:07 am

ग़ज़ल :- ग़ज़लमेरी जान कितना सताने लगी है - पारस गुप्ता


मेरी  जान  कितना  सताने  लगी  है..... 
वो सपनों में फिर से हां आने लगी है.....

निगाहों  में मेरी थी तस्वीर जिसकी...
वहीं आंख फिर क्यों सजाने लगी है.....

खयालों  की  दुनिया  में  डूबे हैं ऐसे...
वहीं  रात  दिन  फिर  चुराने लगी है.....

ये  बातें  वही हैं रुकी जो अधर पर..
सभी  सामने  आज  आने  लगी  है.....

मुलाकात होती कभी जो सड़क पर...
हमें  देख  कर  मुस्कुराने   लगी  है.....

जरा  यार  देखो हुआ क्या जुबां को... 
मोहब्बत  के गीतों को गाने लगी है.....

कहीं मैं चुरा लूँ न उसके ये दिल को...
यही  सोचकर  दिल  छुपाने लगी है..... 

कभी  हमने  पूछा  मुहब्बत है हमसे...
दबे  पांव  शरमा  के  जाने  लगी  है.....

उन्हें  प्यार  हमसे  तो  होने लगा है...
सहेली  से  अपनी  जताने  लगी है.....

वो आए हैं छत पे तो मिलने को हमसे...
मगर   क्यूं   दुपट्टा   सुखाने  लगी  है.....

ये  डर  है  कोई  देख  लेगा  हमें  तो...
वो छुप छुप के नजरें मिलाने लगी है.....

कहा  उसने  हमसे मुहब्बत है तुमसे...
वो  चाहते  को अपनी बताने लगी है.... 

अभी तक तो किस्सा था सपनों का
हकीकत  में  पारस  को पाने लगी है......


रचनाकार - पारस गुप्ता
                   (शायर दिलसे)

11:06 am

ग़ज़ल :- क्या खुदा मंजूर करता अब दुआ है.....पारस गुप्ता

२१२२,२१२२,२१२२

क्या  खुदा  मंजूर  करता  अब  दुआ है.....
इश्क़  क्यों  लगता  मुझे  अब बद्दुआ है.....

लिख रहे हैं फिर गजल हम इश्क़ पे हां....
जी  अभी  कोई  नया,  शाबा  जगा  है......
(शाबा= दर्द-ए-दिल)

आइना  क्यों  साफ  करते फिर रहे हो...
गर्द   तो   माथे   पे   तेरे   ही  लगा  है......

रात   भर   सोया   नहीं   याद  में   वो...
रात  भर  गुमशम  कहीं  रोता  रहा  है.....

#पारस_गुप्ता

विशिष्ट पोस्ट

सूचना :- रचनायें आमंत्रित हैं

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