हिंदी साहित्य वैभव

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मंगलवार, 10 जुलाई 2018

9:05 pm

सहा है दर्द किस हद तक यह मैंने आशनाई में - राजेश शर्मा

सहा है दर्द किस हद तक यह मैंने आशनाई में ।
जिगर भी हो गया घायल यह तेरी बेवफाई में ।।
मेरी गलती है यह मैंने तुझे चाहा जो शिद्दत से,
तड़पकर मर नहीं जाऊँ कहीं तेरी जुदाई में ।।

राजेश शर्मा प्र. अ. व कवि बरेली
7:36 pm

ग़ज़ल - ज़ुबाँ को जब हमारी डर से - आनन्द तन्हा

ज़ुबाँ को जब हमारी डर से फ़ालिज मार जाता है ।
मुक़ाबिल झूठ के तब  सच  हमेशा  हार जाता है ।।

यक़ीनन  कुछ  कमी तो है, हमारे  इंतिखाबों  में,
तभी तो शहर से चुन कर कोई मक्कार जाता है।

किसी नेता का बेटा  फौज  में  भर्ती  नहीं होता,
अरे, सरहद पे लड़ने के लिये  दमदार जाता है।

हमेशा मुस्कुरा कर हम,  झुका लेते हैं सिर अपना
हमेशा   वार  उसका   इस  तरह  बेकार जाता है।

बचाये आबरू कैसे बहन-बेटी किसी की, जब,
उसे लेकर, रियाकारों के घर, परिवार जाता है।

चलो माना,कि दौलत की बदौलत सैर की तुमने,
वहाँ पर, तुम कहाँ पहुंचे जहां फ़नकार जाता है।

ग़ज़ल का शेर भी होता है , जैसे तीर नावक का,
बहुत है मुख़्तसर लेकिन जिगर के पार जाता है।

इंतिखाब- चुनाव, रियाकारों-पाखंडियों,
मुख़्तसर- छोटा/संक्षिप्त

आनन्द तन्हा जी 

6:44 pm

कविता - मां ममता की मूरत होती, करुणा की धारा - भानु शर्मा रंज

मां ममता की मूरत होती, करुणा की धारा है वो
अनंत नेह हृदय में उसके,नेह की किनारा है वो
नौ माह कोख में रखती है, ममतामयी अकेली वो
प्रसव की असहनीय दर्द को,हसकर मां ही झेली वो

हर बार जन्म लेता रब भी, मां का आंचल पाने को
कभी राम कभी मोहन बने, ममता दुलार पाने को
गीता रामायण में देखो, मां की अमर कहानी है
परिभाषित कर न सका कोई, मूरत वो बलिदानी है

दया भाव ममता औ करुणा, ये उसकी परिभाषा है
बला छूए न यहाँ पुत्र को, ये उसकी अभिलाषा है
आंचल में छुपा कर रखे वो,हमें सौ सौ दुआओं से
करती उस रब से विनती वो,हम बचे इन बलाओ से

अंगुली पकड़ सिखाय चलना,गिर गिर संभलना होता
गर चोट लगे हमको जब भी, मां दिल का रोना होता
हर पाठ सिखाया है मां नें, प्रथम पाठशाला मां है
मां तो मां होती जग जननी, मां की क्या उपमा है

अपना निवाला खिलाया है, खुद भूखा तक सोयी है
सबके अश्रु पोछने वाली, अंदर में वो रोयी है
हमनें जब आंखे नम देखी, पूछा आंसू क्यो आंखो में
मां हंसकर कहती है कुछ नहीं,तिनका गिरा है आंखो में

बच्चे की मूक ध्वनि को भी,मां सहज ही पहचाने है
क्यो रोय लाल मेरा ये मां, पल में ही ये जाने है
भूख लगे लाला को तो मां, छाती का दूध पिलाती है
चांद मामा की लोरी सुना, अपने लाल को सुलाती है

आजा निंदिया रानी जरा, मेरे लाल को सुला जाना
हो सावन की शीतल बूँदों, प्रीत सुधा पिला जाना
रब सारी जगह नहीं होता,इसलिए मां को बनाया है
रब का ही रूप मात होती, मां ही रब का साया है


प्रेम की मूरत है अद्भुत मां, दया करुणा ममता मां है
सृष्टि टिकी जिसके हृदय पर,अद्भूत साहस क्षमता मां है
जिसकी परिभाषा होय ज्ञान, मूढ़ भी बन जाये ज्ञानी
मां हंसवाहिनी रज से ही, तर जाता है अज्ञानी

मां रामायण का मंत्र है, जीवन की वो गीता है
अग्निपरीक्षा में तपी गयी, जनकदुलारी सीता है
कुरान बाइबिल पावन वाणी, आंखो का मां पानी है
उमा रमा गंगा ब्रम्हाणी, मां जगदंबा भवानी है

ब्रम्ह को पालन झुलाती है, वो अनुसूइया माता है
संतान के भाग्य को बदल दे, वो मां भाग्यविधाता है
रब को जनने वाली मां है, मां ही सृष्टि की निर्माता
मां जीवन भी है आत्मा का,तब जीवन जग में आता

चारधाम मां के चरणों में, मंदिर-मस्जिद क्यो जाते
घर में भूखा बैठा है रब,और मंगल गीत क्यो गाते
मां को हृदय में बसा लेना , भवसागर तर जायेगा
रब को भी पा लेगा तू सुन, जीवन संवर जायेगा

भानु शर्मा रंज
श्रंगार और ओज कवि
धौलपुर राजस्थान
7374060400



5:50 am

देखकर मुझको तेरा वो मुस्कुराना - सना परवीन

देखकर मुझको तेरा वो मुस्कुराना याद है,
निगाहें दीदार कर फिर नजरें चुराना याद है।
याद है मुझको खनकती चूड़ियों के संग,
रफ्ता रफ्ता तेरा वो गुनगुनाना याद है।
वो खिला गुलशन गुलाबी खूबसूरत
वो बेलौस चाहत और पाकीजा मुहब्बत,
गुजरे साथ लम्हे जहन में आज भी हैं,
बेबात पर मुझको तेरा वो बातें बनाना याद है।
लिखूं जज्बात मैं दिल से याद में तेरी
बिछा दूँ धड़कनो को मैं राह में तेरी,
नहीं है मोल कोई 'सना' की शायरी का,
आज भी तेरा अंदाज-ऐ-शायराना याद है।

सना परवीन 'मेहनाज'
हरदोई

5:40 am

नज़्म - ●सच्चे प्यार का आखिरी तोहफा - आंसू● - अक़्स बदायूँनी

तुमने जो खत किताबों में मेरी छुपाये
वो आज भी मोह्ब्बत की खुशबू देते है
तुमसे शिकायत भी बहुत सी है
जिंदगी की तमाम हसरतें अधूरी रह गयी   
पर जिदंगी में वक्त के साथ
सब कुछ बदल गया,
साथ बीते लम्हें ,यादें भी बहुत सी,
बरसों से सभाली हुई ,
पर नए फसानों ने सादगी से
तरंगें भी बदल दी हैं
इंतज़ार था मेरी आँखों में,
थकी पलकें बंद होती नहीं थी,
अपने बिस्तर पर लेट तन्हा !!
रात गुजारी है मैने खयालों मे तेरे !!
पर नए सपनों ने मासूमियत से,
टूटा मैं जब हिम्मत कोशिशों से मिलीं
तेरा मेरा अफसाना अधूरा रह गया
सच्चे प्यार का आखिरी तोहफा
आंसू बन के रह गया
सवाल बहुत से होंगे तुम्हारे भी,
सालों से जो पुछा करती थी,
फैसला तुम्हारा था
हमारी खामियां ढूढने का
हम तो तुझे सिर्फ चाहते थे
मै शराब नही अब
ख्याल जाम भर के पीता हूँ
तुम्हारे झूठे लफ्ज़ और अधूरे वादे से
मैंने भी, फिर तुमसे दूरी कर ली,
खो कर हक़, न पूछना हमसे कुछ,
ख़्वाबों में उनका चाँद सा चेहरा,
आँखों से आँसूओं की बरसात
इन्तज़ार , इज़हार , मुलाकात
सब किया है हमने
अब तुम ही बताओ जाना
प्यार की गहराई मैं कैसे बँया करता
सच्चे प्यार का आखिरी तोहफा -
आंसू बन के मिला

                        © अक्स बदायूँनी
                             27 जून 2017
5:22 am

नज़्म - क्या किसी नज़र का मैं ख़्वाब हूँ - चारु अग्रवाल "गुंजन"

क्या किसी नज़र का मैं ख़्वाब हूँ ?
या किसी के दिल का करार हूँ;
मैं अपनी ही आँखों में ढल गयी...
देखा गौर से...मैं बदल गयी

एक खोज़ हूँ, एक प्यास हूँ
ख़ुद में भटकती सराब हूँ;
मुझको गलत न समझना
थोड़ा दूर हूँ थोड़ा पास हूँ,

पाया न ख़ुद को; खोती रही
मैं पलकों पर ख़्वाब पिरोती रही,
कभी दिल की राह में मिल गयी
लगा दुनिया फिर से बदल गयी,
ठोकर पे ठोकर लगी मगर
टूटी नहीं; संगसार हूँ,

कोई कहे कि मैं रात हूँ
या फिर जलता चराग हूँ;
जो तीरगी में जलती रही
बनी मोम, बस पिघलती रही
दिखी रोशनी जहाँ जहाँ मेरी;
बस वहीं तलक निसार हूँ,

ये उठती गिरती नज़र कहे
कोई आरजू दिल में दबी रहे
मुझमें निहाँ है जो दर्द भी
वो भी हँसे; वो भी कहे
अब ख़ुद पे हूँ फ़िदा बहुत
ख़ुद की ही जानेबहार हूँ;
मैं हूँ नशा इक प्यार का
ख़ुद में घुली शराब हूँ...
न हूँ कम किसी उम्मीद से
बेहिसाब हूँ; बेहिसाब हूँ...!
                     ★ चारु अग्रवाल "गुंजन" ★
3:54 am

सकल कर्म है जीवन सार - डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'

चौपई/जयकरी छंद🎋
विधान~ चार चरण,प्रत्येक चरण में 15 मात्राएँ, अंत में गुरु लघु, दो-दो चरण समतुकांत

जय जय हो सबकी जयकार|
जयकरी छन्द करे पुकार||
राम नाम का हो मनुहार|
सकल कर्म है जीवन सार||

शाला में नित सुंदर छंद|
भाव जगाते प्रभु के वंद||
मधुर-मधुर सी मधु मकरन्द|
शब्द बोलते जय बृज नंद||

राधारानी की जयकार|
जन जन में होवे सहकार||
कृष्ण कृपा से हो जग पार|
भजन मुक्ति का है आधार||

प्रेम दया है मनु का धर्म|
तन मन से हो सेवा कर्म||
कोमल पावन हिय हो नर्म|
सरल सरस हो जीवन मर्म||

© डॉ० राहुल शुक्ल 'साहिल'


1:37 am

लघु कथा -अलविदा - पुष्प सैनी

प्रज्ञा की आँखें नीले आसमान को एकटक तक रही थी, उसके पास मैं बैठा था लेकिन उसने एक बार भी पलकें उठाकर मेरी तरफ नही देखा ।तभी उसे ओर ठंड महसूस हुई तो उसने अपने से लिपटी शाल को ओर लिपटा लिया ।मैने उसे नीचे चलने को कहा लेकिन उसने कोई जवाब नही दिया और न चलने के लिए उठी शायद वह कुछ देर और छत पर बैठना चाहती थी ।उसकी नज़रें आसमान में उड़ते परिंदों पर लगी थी और मेरी उस पर ।
प्रतिकात्मक चित्रण

                क्या यह वही प्रज्ञा है जिसकी चंचलता और वाक्पटुता मुझे परेशान कर देती थी ।जब प्रज्ञा से शादी हुई थी तब वो अपने साथ लाई थी हजारों रंग ।फुर्सत के पलों में पेंटिंग करना उसका शौक था या कहूं जूनून ।वो इन रंगों में ही अपने आपको मसरुफ़ रखती थी ।मेरे पास वक्त भी कहा था उसके लिए , मैने ही प्रज्ञा की मासूमियत को उदासी में तबदील किया है ।
                शाम को घर लौटता था तो चहकते हुए कहती थी नलिन चलो मेरी पेंटिंग देखो ।मैं हमेशा बाद में देखूंगा कहकर टाल देता था ।वह मेरी सभी ख़्वाहिश पूरी करती थी, सभी जरुरतों का ख्याल रखती थी लेकिन दूसरी तरफ उसकी कला मेरी नज़रे इनायत को तरसती रहती थी ।उसके सृजनात्मक गुणों को कभी तरज़ीह ही नही दी मैने ।जैसी चंचल वह दिखती थी उससे परे वह एक परिपक्व शख़्यित थी ।
                उसने पेंटिंग करने के लिए अलग से कमरा सजा रखा था, जिसे वह कैनवास रुम कहती थी ।मैं उस कमरे में कभी जाता ही नही था और अब प्रज्ञा भी नही जाती ।पता नही उसका यह नैराश्य कैसे दूर होगा ।उसकी जिन्दगी में अहम शख्स मैं था और मैने ही कभी उसे समझना नही चाहा लेकिन मैं अब अपनी तमाम गलतियाँ सुधारना चाहता हूँ ।
                 मुझे याद है जब उसने पहली बार अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी के विषय में बताया था, कितनी चमक थी उसकी आँखों में ।तीन साल के साथ के बाद भी मैने उसकी पेंटिंग उसी प्रदर्शनी में देखी थी ।उसकी कृतियों में तमाम रंग थे  ।उसके हाथ तराशना जानते थे, अनगढ़ नही थे ।किसी भी चित्र में कृत्रिमता नही थी सिर्फ मौलिकता थी उसी की तरह ।प्रदर्शनी देखने आए लोग उसकी तारीफ के पुल बांध रहे थे, वह खुश थी लेकिन आँखों में उदासी झाक रही थी ।
                 मैने उस दिन भी उसकी तारीफ नही की।उसके बाद प्रज्ञा को दूसरे शहरों में भी प्रदर्शनी के अवसर मिले लेकिन उसने मना कर दिया ।मैं देख रहा था वह दिनों दिन उदास और बीमार रहने लगी ।
                  तभी प्रज्ञा नीचे चलने के लिए उठी और रात को बस दो निवाले खाकर बिस्तर पर चली गई ।मैने उससे एक बार कैनवास रुम में चलकर कुछ वक्त बिताने को कहा ।उसने मना कर दिया और सो गई ।
              अगले दिन मुझे ऑफिस के काम से नैनीताल जाना था इसलिए मैने मैरी से उसकी ठीक से देखभाल करने को कहा और प्रज्ञा को बाॅय बोलकर चला गया ।रात को मुझे आने में काफी देर हो गई ।मैरी ने दरवाजा खोला तो मैने प्रज्ञा के विषय में पूछा ।उसने बताया मैडम आज शाम से ही कैनवास रुम में है ।यह सुनकर मेरी आँखों में चमक आ गई ,लगा अब सब ठीक हो जाएगा ।मैने अपना ब्रिफकेश सोफे पर रखा और सीधे कैनवेस रुम में गया ,जहा प्रज्ञा मेज पर सर टिकाये जमीन पर बैठी थी ।मुझे लगा प्रज्ञा सो गई है लेकिन जैसे ही मैने उसे उठाने की कोशिश की तो पता चला वह हमेशा के लिए सो गई है ।उसके हाथ में ब्रश था और कैनवास पर लिखा था अलविदा ।

पुष्प सैनी

सोमवार, 9 जुलाई 2018

9:13 pm

थाईलैंड: गुफा से 4और बच्चे निकाले, दुनिया का सबसे बड़ा बचाव अभियान चल रहा है जाबांज गोताखोर गुफा में फंसे बच्चों को निकालने में पूरा प्रयास....

थाईलैंड की थाम लुआंग गुफा में 23 जून से फंसे 12 लड़कों और उनके फुटबॉल कोच को बाहर निकालने के लिए अब गोताखोरों की मदद ली जा रही है. गोताखोरों की मेहनत रंग ला रही है. मिल रही जानकारी के मुताबिक 8 बच्चों को गुफा से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है. गुफा से निकाले गए बच्चों को एंबुलेंस के जरिये अस्पताल पहुंचाया जा रहा है.

फोटो : गूगल 
 रेस्क्यू ऑपरेशन के चीफ नारोंगसाक असोतानाकोर्न ने बताया कि अब तक चार बच्चों को गुफा से बाहर निकाला गया है. उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है. बाकी लोगों को निकालने के लिए टीम कोशिश कर रही है. इस बीच गुफा के बाहर तेज बारिश ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं. खबर है कि रात में ऑपरेशन रोक दिया गया है. 10 घंटे बाद अब सुबह टीम एक बार फिर से कोशिश करेगी. पूरे ऑपरेशन में कुल 90 गोताखोर जुटे हैं. इनमें 40 थाई जबकि 50 अन्य देशों के गोताखोर हैं. गुफा से निकाले गए बच्चों को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है. बच्चों को मीडिया से दूर ही रखा गया है.

दरअसल तमाम रेस्क्यू ऑपरेशन फेल होने के बाद आनन-फानन में बच्चों को बाहर निकालने के लिए 13 विदेशी गोताखोर और थाइलैंड नेवी सील के 5 गोताखोर लगाए गए हैं. इसमें 10 गोताखोर पहले चरण में अभियान को अंजाम दे रहे हैं. प्लान के मुताबिक ये गोताखोर गुफा के अंदर पहुंच रहे हैं और वहां से दो गोताखोरों की मदद से एक बच्चे को बाहर निकाला जा रहा है. यानी हर बच्चे को बाहर निकालने में दो गोताखोर लगे हैं.
फोटो :  गूगल 
एक चक्कर पूरा करने में करीब 11 घंटे का समय लग रहा है. बचाव अभियान के प्रमुख नारोंगसाक असोतानाकोर्न ने यह जानकारी दी. थाईलैंड के गोताखोर इस मिशन का नेतृत्व करेंगे और विदेशी गोताखोर ऑक्सीजन टैंक लिए हुए होंगे. रेस्क्यू में बचाने के लिए 8 देशों के एक्सपर्ट लगे हुए हैं. बचाव दल में ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और यूरोप एवं एशिया के अन्य हिस्सों से भी गोताखोर शामिल हैं.

दरअसल 'वाइल्ड बोर्स' नाम की यह फुटबॉल टीम गुफा में 23 जून से फंसी है. ये लोग अभ्यास के बाद वहां गए थे और भारी मानसूनी बारिश की वजह से गुफा में काफी पानी भर जाने के बाद वहां फंस गए. इस घटना ने समूचे थाईलैंड और दुनियाभर का ध्यान अपनी तरफ खींचा है. अधिकारी लगातार लड़कों और उनके कोच को बाहर निकालने के लिए संघर्ष कर रहे थे.

हालांकि बचावकर्मियों ने बताया कि इन बच्चों को निकालना समय से होड़ करने जैसा है क्योंकि मानसूनी वर्षा के पानी से भरी गुफा की जलनिकास व्यवस्था पर पानी फिर सकता है. इस बीच, पहाड़ में 100 से अधिक छेद किये गये हैं ताकि निकलने का एक अन्य मार्ग ढूंढा जा सके और बच्चे डूबी सुरंग में और अंदर जाने को बाध्य नहीं हों.

गौरतलब है कि 23 जून को वाइल्ड बोर्स नाम की टीम ने फुटबॉल मैच खेला. बच्चे हमेशा की तरह मौज मस्ती करना चाहते थे. साइकिल रेस लगाते हुए टीम गुफा तक जा पहुंची. 13 जिदंगियों में 12 फुटबॉल खिलाड़ी हैं और एक कोच है.


8:04 pm

ग़ज़ल - आप जो आये तो ये मौसम सुहाना हो गया ~शैलेन्द्र खरे"सोम

आप जो आये तो ये मौसम सुहाना हो गया
शुक्रिया, बेज़ार दिल मेरा दी'वाना हो गया

बस कयामत ढा रही है आपकी ये सादगी
आपकी नज़रों का मैं जैसे निशाना हो गया

तंग गलियों से गुजर के उनको छूना याद है
छोड़िए अब क्या कहूँ क़िस्सा पुराना हो गया

कुछ दिनों से शाम को छत पर टहलते रोज वो
घूमने का मुझको भी अच्छा बहाना हो गया

जिंदगी में आ गया है कोई यूं लेके बहार
अब किसी के दिल में भी मेरा ठिकाना हो गया

खुल गया जो एक मयखाना तो फिर मत पूछिए
शह्र का माहौल सारा शायराना हो गया

फेसबुक से आशिकी, वादे-वफ़ा,आसां है सब
"सोम"फिर भी लोग कहते क्या जमाना हो गया

 शैलेन्द्र खरे"सोम


                                 
6:35 pm

ग़ज़ल - गली-मुहल्लों में देखो वबाल करने लगे - शिव शरण बंधु

गली - मुहल्लों  में  देखो  वबाल  करने लगे
ज़हीन लोग भी क्या-क्या कमाल करने लगे

ज़मीं के लोग मुहब्बत से क्यूं नहीं रहते
फ़लक के चांद, सितारे सवाल करने लगे

अजीब हाल है इस दौर के फ़रिश्तों का
कि जिसको चाहा उसी को हलाल करने लगे

जो हाथ आई हुकूमत तो शरपसंद यहां
तमाम लोगों का जीना मुहाल करने लगे

यहां तो और भी ख़तरे हैं ज़िंदगी के लिए
परिंदे शह्र में आकर मलाल करने लगे

जो चन्द पैसों की आमद का इंतज़ाम हुआ
हमारे लोग हमारा ख़याल करने लगे

सियाह शब का तकब्बुर भी टूट सकता है
बस एक जुगनू अगर देखभाल करने लगे

     -हथगाम-फ़तेहपुर
(उत्तर प्रदेश) 212 652
----9415166683


4:30 am

सजल :- सुनो प्यारे जहाँ माँ बाप है कैसा वहाँ डर है - रेनू सिहं

सुनो प्यारे जहाँ माँ बाप है कैसा वहाँ डर है।
हमेशा साथ चलते हैं न दिन देखा न दुपहर है।।

चढ़ा है शौक सत्ता का जिसे वो मद में डूबा क्यों,
अकड़कर यूँ चले जैसे बचा वो एक नाहर है।

दीवानी राधिका यूँ ही नहीं है मेरे कान्हा की,
चुराता है दिलों को सबके इसका रूप मनहर है।

निभाई रस्म दुनिया की तुझे ससुराल जो भेजा,
छुपाकर दर्द घुटती क्यों कभी मत भूल पीहर है।

तुम्हें भगवान माना है सदा तुमको पूजा है,
चली है उन मुकामों पर कि जिनकी राह जौहर है।

रेनू सिंह
टूण्डला (यूपी)


3:50 am

सजल विधा - आज हम लेकर आये हैं एक बिलकुल नई “सजल विधा”।

आज हम लेकर आये हैं एक बिलकुल नई “सजल विधा”।यह विधा उर्दू की गजल विधा का हिन्दी रूप है। इसको लिखने के लिये गजल की बह्र को सीखने के बदले केवल मात्रा गणना सीखना ज़रूरी है। ग़ज़ल की कठिन बह्र से कुछ अलग सजल के बेहद सरल नियम निम्नानुसार हैं।


हिन्दी गजल को उर्दू के उस्ताद लोग बह्र, रुक्न और अरकान के स्तर पर खारिज कर देते हैं इसलिये हम लोगों ने हिन्दी गजल का नया नामकरण "सजल" के रूप में किया है. अब हिन्दी गजलों में उर्दू का कोई नियम लागू नही होगा. सजल का विस्तृत नवीन संधारित नियम इस तरह है:
दिनांक 02-09-2016 को जहाँ सर्वसम्मति से विद्वानों ने सजल शिल्प हेतु वैकल्पिक सम्बोधन शब्दों की सूची का निर्धारण किया वहाँ दूसरी ओर सजल के शिल्प का स्वरूप भी निर्धारित किया गया ।
आज सजल विधा को
और उसके शिल्पगत गठन को
पटल पर सघन चिंतन-मनन और उसके शिल्प पर गहन मन्थन के उपरान्त सभी विद्वानों की सर्वसहमति से इस रूप में मान्य किया गया है---
सजल नाम की नई विधा को हिन्दी-काव्य में एक नई विधा के रूप में पूर्ण मान्यता दी जाती है !
इसके स्वरूप को इस तरह से मान्य किया किया जाता है कि-----
1---सजल में दो-दो पंक्तियों के कम से कम 5 या फिर कितने ही विषम संख्या में पदिक होंगे ,
2--प्रथम पदिक को "आदिक"
कहा जाएगा ,
3--अंतिम पदिक को "अन्तिक"
कहा जायेगा ,
4---प्रत्येक पदिक में अंत के हर बार ( आवृत्ति )आने वाले एक शब्द को
या
केवल मात्रा-स्वर
को
"पदान्त" कहा जायेगा ,
5---पदिक में इस पदान्त से पहले आने वाले तुकान्त के शब्द को "समान्त" कहा जायेगा ।

इसके अतिरिक्त सजल के शिल्प के अंतर्गत 6 बिंदु और स्थिर किये गए ----
शिल्प का स्वरूप :
1-पंक्ति (मिसरे)का कोई सुनिश्चित मीटर होने की बाध्यता नहीं है, उसका कोई भी मीटर हो सकता है ।
2-लय कोई भी सजलकार की अपनी पसंद की होगी ।
3-पदिक (शेर) में किसी भी हिन्दी छन्द की अनिवार्यता नहीं होगी ।
4- सजल में पदिक (शेर)की रचना अपनी धुन में स्वाभाविक पढ़ंत के हिसाब से लयात्मक रूप में करेगा ।
5-सजल में मात्रिक बाध्यता नहीं होगी, मात्राभार को गिराकर ,उठाकर पढ़ंत की लय आधारित रचने की छूट होगी ।

_ सजल शिल्प हेतु वैकल्पिक सम्बोधन शब्दों की सूची
ग़ज़ल --- सजल
शेर ---- पदिक
मतला -- आदिक
मक्ता --- अन्तिक
रदीफ़ --पदांत
काफ़िया -समान्त
मिसरा -- पंक्ति

--डॉ०अनिल गहलौत और डॉ०राकेश सक्सेना

उपरोक्त शब्दावली को अपनी एक सजल के माध्यम से हम स्पष्ट करते हैं।
हमारी ‘सजल’

इसने -उसकी खायी है रोटी
गोल चाँद बन आयी है रोटी--1

मजदूरी कर दिन गुजरा फिर भी
भर के पेट न पायी है रोटी--2

भूख की आग सताये न जिसको
उसको कभी न भायी है रोटी--3

भूखे उस पर टूट पड़े थे जब
खुद से ही शरमायी है रोटी--4

त्यागे थे प्राण इसी की खातिर
निकली तू दुखदायी है रोटी--5
'
मुखिया निकले घर के जिन्होने
देकर जान कमायी है रोटी --6

भूखे को न कभी ज्ञान पढाओ
उसका कृष्ण कन्हायी है रोटी--7

उपरोक्त सजल मे पहली दो पंक्तियों से बना पद 1 “आदिक’’ है। जिसकी दोनों पंक्तियाँ तुकांत हैं ।
अन्य सभी 2 से 6 तक ‘पदिक’ कहलायेंगे। अंतिम पद नंबर 7 अंतिक है। इन सभी पदों मे दूसरी पंक्ति आदिक की पंक्तियों से तुकांत होगी।
इस सजल की प्रत्येक पंक्ति मे समान मात्रा भार है। हर पंक्ति का अंत ‘’है रोटी’’ से हो रहा है यह ‘’पदांत’’ हैं जो आदिक की दोनों पंक्तियों और हर पदिक की दूसरी पंक्ति मे समान है । और ‘’समान्त’’ है ,‘’आयी’’
खायी,भायी, कमायी,आयी, दुखदायी आदि।
ग़ज़ल की ही तरह आप अंतिक मे अपना नाम डाल सकते हैं ।
फ़ेसबुक समूह से उद्धरित

रविवार, 8 जुलाई 2018

8:40 pm

वो भी शायद ख़ुश नहीं है दिल हमारा तोड़कर - राशीद राहत

इश्क़ के इस आसमाँ का एक तारा तोड़कर।
उसने हमको रख दिया है आज सारा तोड़कर।।

आँख भीगी होठ सूखे और माथे पर शिकन।
वो भी शायद ख़ुश नहीं है दिल हमारा तोड़कर।।

राशिद_राहत

8:02 pm

लगाते ठेस अपने ही मगर रोना नही अच्छा - संतोष कुमार

लगाते  ठेस अपने ही मगर रोना नही अच्छा ।
सदा उनके लिए तो बेरुखी होना नही अच्छा ।।

अगर हो क्रोध में कोई तो कुछ भी बोल देता है ।
हमेशा ऐसी बातें दिल पे तो ढोना नही अच्छा ।।

जो जैसा करता है उसकी वही आदत है ये समझो ।
किसी की बातों से विश्वास को खोना नही अच्छा ।।

किसी के वास्ते गर तुम फूल बन कर खिल नही सकते ।
किसी की राह में कांटो का तो बोना नही अच्छा ।।

अगर जो चाहते हो तुम कभी सेहत नही बिगड़े ।
सुबह फिर इस तरह से देर तक सोना नही अच्छा ।।

दिलो की नफ़रतें होती नही है दूर नफरत से ।
किसी के भी लिए तो 'प्रीत' का होना नही अच्छा।।
सन्तोष कुमार 'प्रीत'


10:30 am

मुक्तक - तन की नज़ाकत को मैं प्यार समझ बैठा - डा राहुल शुक्ला

तन की नज़ाकत को मैं प्यार समझ बैठा|
उनकी शराफ़त को मैं इकरार समझ बैठा|
वो तो यूँ ही सफर के मददगार थे|
मैं तो उनको जीवन का हार समझ बैठा|
डा राहुल शुक्ला "साहिल" इलाहाबाद

9:19 am

ग़ज़ल - दिखाओ आँख मत हमको, तेरे ही हम दिवाने है - बृजमोहन श्रीवास्तव

दिखाओ आँख मत हमको, तेरे ही हम  दिवाने है ।
भले  ही भूल जा मुझको , तेरे आशिक  पुराने है ।।

जिसे  मनमीत कहते हो , नज़र  लूट  लेगा वो  ।
नज़र के वार से बचना ,गजब उसके निशाने है ।।

हसीना जब कहे है हाँ , हंसी दुनिया ये हो जाती ।
मना करती हसीना जब ,लगे अपने बेगाने है ।।

बड़ी कातिल अदांऐ है , कई मजनू किये पागल ।
जरा बचना हसीनो से , बने  इनसे  मैखाने  है ।।

समन्दर कब हुआ खारा, सुनो साथी कहे सबसे ।
बहाये अश्क आशिक ने , उसी के ये फसाने है ।।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी" डबरा

शनिवार, 7 जुलाई 2018

7:55 pm

मुक्तक - विचरण भले कहीं भी कर लो -- पवन शंखधार

विचरण भले कहीं भी कर लो अपना घर अपना होता है ।
भले  सप्तरंगी   हो  पर  सपना  तो  सपना  होता  है ।।
संघर्ष  कष्ट  और  विपदायें  जीवन  के  वैभव  होते  हैं ,
इतिहास पुरुष बनने के लिये जीवन भर तपना  होता है ।।

पवन शंखधार
कवि / मंच संचालक
 स्वरदूत -9927433400


12:57 am

कवि केदारनाथ सिंह के बारें ये बाते जरूर जानें.....

केदारनाथ सिंह 7 July 1934 – 19 March 2018), हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उन्हें वर्ष 2013 का ४९वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था. वे यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के १०वें लेखक थे
हिंदी साहित्य के संसार में केदारनाथ सिंह की कविता अपनी विनम्र उपस्थिति के साथ पाठक के बगल में जाकर खड़ी हो जाती है. वे अपनी कविताओं में किसी क्रांति या आंदोलन के पक्ष में बिना शोर किए मनुष्य, चींटी, कठफोड़वा या जुलाहे के पक्ष में दिखते हैं.
समकालीन भारतीय कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर केदारनाथ सिंह का 19 मार्च 2018 को निधन हो गया. उन्हें 1989 में साहित्य अकादमी और 2013 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. नवंबर 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में जन्मे केदारनाथ सिंह ने अपना शैक्षिक करियर पडरौना के एक कॉलेज से शुरू किया था. बाद में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय चले गए. वे एक उम्दा कवि और अध्यापक के रूप में वहां मशहूर थे.
उनसे जुड़ी एक बात याद आती है. वे इलाहाबाद में 20 और 21 जून 2015 को ‘उजास- हमारे समय मे कविता’ नामक एक आयोजन में बोलने आए थे. सबसे पहले उन्हें ही बोलना था लेकिन इस कार्यक्रम के आयोजक ने कार्यक्रम का परिचय देने में बहुत समय ले लिया और श्रोताओं को घनघोर तरीके से उबा दिया.
जब कवि केदारनाथ सिंह बोलने आए तो उन्होंने अपने कुरते की जेब से एक पुर्जी निकाली और एक तिब्बती कवि की कविता का अनुवाद पढ़ा और मुकुटधर पाण्डेय की तीन-चार लाइनें कहकर अपनी सीट पर बैठ गए. यह एक कवि का दूसरे कवि के प्रति सम्मान भाव था, उससे ज्यादा एक निर्वासित समुदाय के कवि की पीड़ा को वह ‘हमारे समय में कविता’ के मंच पर उपस्थित सभी कवियों की साझा चिंता बना रहा था.
बीसवीं शताब्दी की रूसी कविताओं का एक अनुवाद साहित्य अकादमी ने ‘तनी हुई प्रत्यंचा’ के नाम से प्रकाशित किया है. इसे रूसी भाषा के जानकार वरयाम सिंह ने अनूदित किया था और संपादन केदारनाथ सिंह ने किया था. अपने एक संक्षिप्त संपादकीय में उन्होंने त्स्वेतायेवाकी की लोकबिंब से आधुनिक जीवन का तीखा द्रव्य निचोड़ लेने की क्षमता और मंदेल्स्ताम के चट्टान जैसे काव्य शिल्प की सराहना की थी. यह बात कमोबेश उनके लिए भी सही है.
उन्होंने अपनी कविता यात्रा में अपने मानकों में कोई ढील नहीं दी. लोकबिंब से आधुनिक जीवन का तीखा द्रव्य उनकी कविताओं लगातार व्याप्त है. अपनी कविताओं में किसी क्रांति या परिवर्तनकामी आंदोलन के पक्ष में बिना शोर किए वे मनुष्य, चींटी, कठफोड़वा या जुलाहे के पक्ष में खड़े हो जाते हैं.
उनकी कविता हिंदी साहित्य के संसार में अपनी विनम्र उपस्थिति के साथ अपने पाठक के बगल में जाकर खड़ी हो जाती है,
जैसे दुनिया के तमाम दानिशवर और कवि होते हैं, वैसे ही केदारनाथ सिंह भी थे- उन्हें भाषा पर भरोसा था. यह भी कि लोग बोलेंगे ही , वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा.
प्रेम के नितांत व्यक्तिगत क्षणों को वे जितनी आसानी से कविता में कह जाते थे, वह किसी उस्ताद के बस की ही बात थी. उनकी मृत्यु के बाद उनकी ढेर सारी कविताएं साइबर संसार में आसमान के नीले रंग की भांति फैल गयी हैं लेकिन उनकी एक कविता तो हिंदी संसार में विदा गीत का रूप ले चुकी है,
उनके लिए कविता कोई व्यक्तिगत किस्म की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि वह दुनिया को बनाने का एक उष्मीय इरादा रखती थी.
मृत्यु बोध, बनारस और केदारनाथ सिंह
केदारनाथ सिंह की कविताओं में मृत्यु को लेकर एक विकल संवेदना सदैव व्याप्त रहती है. उन्होंने मनुष्य के ‘होने’ पर जितनी गहराई से सोचा-समझा और लिखा उतना ही उसके न होने पर लिखा,
यों हम लौट आए
जीवितों की लम्बी उदास बिरादरी में
कुछ नहीं था
सिर्फ़ कच्ची दीवारों
और भीगी खपरैलों से
किसी एक के न होने की
गंध आ रही थी.
++++
मुख्य कृतियाँ
कविता संग्रह
अभी बिल्कुल अभी
जमीन पक रही है
यहाँ से देखो
बाघ
अकाल में सारस
उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ
तालस्ताय और साइकिल
आलोचना
कल्पना और छायावाद
आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान
मेरे समय के शब्द
मेरे साक्षात्कार
संपादन
ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन)
समकालीन रूसी कविताएँ
कविता दशक
साखी (अनियतकालिक पत्रिका)
शब्द (अनियतकालिक पत्रिका)
सम्मान और पुरस्कार
ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रतीकः वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा
ज्ञानपीठ पुरस्कार
मैथिलीशरण गुप्त सम्मान
कुमारन आशान पुरस्कार
जीवन भारती सम्मान
दिनकर पुरस्कार
साहित्य अकादमी पुरस्कार
व्यास सम्मान
प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह को मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार
हिंदी की आधुनिक पीढ़ी के रचनाकार केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 के लिए देश का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। वह यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के 10वें लेखक थे। ज्ञानपीठ की ओर से शुक्रवार 20 जून, 2014 को यहां जारी विज्ञप्ति के अनुसार सीताकांत महापात्रा की अध्यक्षता में हुई चयन समिति की बैठक में हिंदी के जाने माने कवि केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 का 49वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने का निर्णय किया गया। इससे पहले हिन्दी साहित्य के जाने माने हस्ताक्षर सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन अज्ञेय, महादेवी वर्मा, नरेश मेहता, निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को यह पुरस्कार मिल चुका है। पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार मलयालम के लेखक गोविंद शंकर कुरुप (1965) को प्रदान किया गया था।
-रमाशंकर सिंह

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

2:37 am

राज कुमार के 42 डायलॉगः जिन्हें सुनकर विरोधी बेइज्ज़ती से मर जाते थे

राज कुमार के 42 डायलॉगः जिन्हें सुनकर विरोधी बेइज्ज़ती से मर जाते थे
#1. जब राजेश्वर दोस्ती निभाता है तो अफसाने लिक्खे जाते हैं..
और जब दुश्मनी करता है तो तारीख़ बन जाती है
– राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)
#2. जिसके दालान में चंदन का ताड़ होगा वहां तो सांपों का आना-जाना लगा ही रहेगा.
– पृथ्वीराज, बेताज बादशाह (1994)

#3. चिनॉय सेठ, जिनके अपने घर शीशे के हों, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते.
– राजा, वक्त (1965)
#4. बेशक मुझसे गलती हुई. मैं भूल ही गया था, इस घर के इंसानों को हर सांस के बाद दूसरी सांस के लिए भी आपसे इजाज़त लेना पड़ती है. और आपकी औलाद ख़ुदा की बनाई हुई ज़मीन पर नहीं चलती, आपकी हथेली पर रेंगती है.
– सलीम अहमद ख़ान, पाक़ीज़ा (1972)
#5. जब ख़ून टपकता है तो जम जाता है, अपना निशान छोड़ जाता है, और
चीख़-चीख़कर पुकारता है कि मेरा इंतक़ाम लो, मेरा इंतक़ाम लो.
– जेलर राणा प्रताप सिंह, इंसानियत का देवता (1993)

#6. बिल्ली के दांत गिरे नहीं और चला शेर के मुंह में हाथ डालने. ये बद्तमीज हरकतें
अपने बाप के सामने घर के आंगन में करना, सड़कों पर नहीं.
– प्रोफेसर सतीश ख़ुराना, बुलंदी (1980)
#7. हम अपने कदमों की आहट से हवा का रुख़ बदल देते हैं.
– पृथ्वीराज, बेताज बादशाह (1994)
#8. जानी.. हम तुम्हे मारेंगे, और ज़रूर मारेंगे.. लेकिन वो बंदूक भी हमारी होगी,
गोली भी हमारी होगी और वक़्त भी हमारा होगा.
– राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)
#9. महा सिंह, शायद तुम अंजाम पढ़ना भूल गए हो. लेकिन ये याद रहे कि इंसाफ के जिन सौदागरों के भरम पर, तुम फर्ज़ का सौदा कर रहे हो, उनकी गर्दनें भी हमारे हाथों से दूर नहीं.
– जगमोहन आज़ाद, पुलिस पब्लिक (1990)
#10. हम वो कलेक्टर नहीं जिनका फूंक मारकर तबादला किया जा सकता है. कलेक्टरी तो हम शौक़ से करते हैं, रोज़ी-रोटी के लिए नहीं. दिल्ली तक बात मशहूर है कि राजपाल चौहान के हाथ में तंबाकू का पाइप और जेब में इस्तीफा रहता है. जिस रोज़ इस कुर्सी पर बैठकर हम इंसाफ नहीं कर सकेंगे, उस रोज़ हम इस कुर्सी को छोड़ देंगे. समझ गए चौधरी!
– राजपाल चौहान, सूर्या (1989)

#11. याद रखो, जब विचार का दीप बुझ जाता है तो आचार अंधा हो जाता है और हम अंधेरा फैलाने नहीं अंधेरा मिटाने आए हैं.
– साहब बहादुर राठौड़, गॉड एंड गन (1995)
#12. हम कुत्तों से बात नहीं करते.
– राणा, मरते दम तक (1987)
#13. हम तुम्हे वो मौत देंगे जो ना तो किसी कानून की किताब में लिखी होगी
और ना ही कभी किसी मुजरिम ने सोची होगी.
– ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)
#14. अगर सांप काटते ही पलट जाए, तो उसके ज़हर का असर होता है वरना नहीं. हम सांप को काटने की इजाज़त तो दे सकते हैं लेकिन पलटने की इजाज़त नहीं देते परशुराम.
– पृथ्वीराज, बेताज बादशाह (1994)
#15. राजा के ग़म को किराए के रोने वालों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी चिनॉय साहब.
– राजा, वक्त (1965)

#16. घर का पालतू कुत्ता भी जब कुर्सी पर बैठ जाता है तो उसे उठा दिया जाता है. इसलिए क्योंकि कुर्सी उसके बैठने की जगह नहीं. सत्य सिंह की भी यही मिसाल है. आप साहेबान ज़रा इंतजार कीजिए.
– साहब बहादुर राठौड़, गॉड एंड गन (1995)
#17. शेर को सांप और बिच्छू काटा नहीं करते..
दूर ही दूर से रेंगते हुए निकल जाते हैं.
– राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)
#18. इस दुनिया में तुम पहले और आखिरी बदनसीब कमीने होगे, जिसकी ना तो अर्थी उठेगी और ना किसी कंधे का सहारा. सीधे चिता जलेगी.
– राणा, मरते दम तक (1987)
#19. और फिर तुमने सुना होगा तेजा कि जब सिर पर
बुरे दिन मंडराते हैं तो ज़बान लंबी हो जाती है.
– प्रोफेसर सतीश ख़ुराना, बुलंदी (1980)
#20. अपना तो उसूल है. पहले मुलाकात, फिर बात, और फिर अगर जरूरत पड़े तो लात.
– ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)

#21. भवानी सिंह को बुज़दिल कोई कह नहीं सकता! आत्मा बह नहीं गई चंदन, आत्मा लौट आई है. और अब ऐसे मालूम होता है कि बुज़दिल हम पहले थे. बुज़दिली का वो चोला आज उतारकर हमने फेंक डाला. ये कौन सी बहादुरी है कि दिन के उजाले में निकले तो भेस बदल कर, सोओ तो बंदूकों का तकिया बनाकर. चंदन, न घर ना बार, हवा का एक मामूली सा झोंका, चौंका देता है और घबराकर ऐसे उठ बैठते हैं जैसे पुलिस की गोली थी. इन गुमराह खंडरों को छोड़कर, चल मेरे साथ, इंसानों की बस्ती में चंदन, चल.
– ठाकुर भवानी सिंह, धरम कांटा (1982)
#22. चलो यहां से ये किसी दलदल पर कोहरे से बनी हुई हवेली है जो
किसी को पनाह नहीं दे सकती. ये बड़ी ख़तरनाक जगह है.
– सलीम अहमद ख़ान, पाक़ीज़ा (1972)
#23. ताक़त पर तमीज़ की लगाम जरूरी है. लेकिन इतनी नहीं कि बुज़दिली बन जाए.
– राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)
#24. बोटियां नोचने वाला गीदड़, गला फाड़ने से शेर नहीं बन जाता.
– राणा, मरते दम तक (1987)
#25. हम आंखों से सुरमा नहीं चुराते, हम आंखें ही चुरा लेते हैं.
– ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)

#26. हमने देखें हैं बहुत दुश्मनी करने वाले, वक्त की हर सांस से डरने वाले. जिसका हरम-ए-ख़ुदा,
कौन उसे मार सके, हम नहीं बम और बारूद से मरने वाले.
– साहब बहादुर राठौड़, गॉड एंड गन (1995)
#27. ये बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं,
हाथ कट जाए तो ख़ून निकल आता है.
– राजा, वक्त (1965)
#28. इरादा पैदा करो, इरादा. इरादे से आसमान का चांद भी
इंसान के कदमों में सजदा करता है.
– प्रोफेसर सतीश ख़ुराना, बुलंदी (1980)

#29. कौवा ऊंचाई पर बैठने से कबूतर नहीं बन जाता मिनिस्टर साहब! ये क्या हैं और क्या नहीं हैं ये तो वक्त ही दिखलाएगा.
– जगमोहन आज़ाद, पुलिस पब्लिक (1990)

#30. ये तो शेर की गुफा है. यहां पर अगर तुमने करवट भी ली
तो समझो मौत को बुलावा दिया.
– राणा, मरते दम तक (1987)

#31. तुमने शायद वो कहावत नहीं सुनी महाकाल, कि जो दूसरों के लिए खड्डा खोदता है वो खुद ही उसमें गिरता है. और आज तक कभी नहीं सुना गया कि चूहों ने मिलकर शेर का शिकार किया हो. तुम हमारे सामने पहले भी चूहे थे और आज भी चूहे हो. चाहे वो कोर्ट का मैदान हो या मौत का जाल, जीत का टीका हमारे माथे ही लगा है हमेशा महाकाल. तुमने तो सिर्फ मौत के खड्डे खोदे हैं, जरा नजरें उठाओ और ऊपर देखो, हमने तुम्हारे लिए मौत के फरिश्ते बुला रखे हैं. जो तुम्हे उठाकर इन मौत के खड्डों में डाल देंगे और दफना देंगे.
– कृष्ण प्रसाद, जंग बाज़ (1989)
#32. ना तलवार की धार से, ना गोलियों की बौछार से.. बंदा डरता है तो सिर्फ परवर दिगार से.
– ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)
#33. काश तुमने हमें आवाज़ दी होती.. तो हम मौत की नींद से उठकर चले आते.
– राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)
#34. महा सिंह, शेर की खाल पहनकर आज तक कोई आदमी शेर नहीं बन सका.
और बहुत ही जल्द हम तुम्हारी ये शेर की खाल उतरवा लेंगे.
– जगमोहन आज़ाद, पुलिस पब्लिक (1990)
#35. दादा तो दुनिया में सिर्फ दो हैं. एक ऊपर वाला और दूसरे हम.
– राणा, मरते दम तक (1987)

#36. औरों की ज़मीन खोदोगे तो उसमें से मट्टी और पत्थर मिलेंगे. और हमारी ज़मीन खोदोगे तो उसमें से हमारे दुश्मनों के सिर मिलेंगे.
– पृथ्वीराज, बेताज बादशाह (1994)
#37. जो भारी न हो.. वो दुश्मनी ही क्या.
– ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)
#38. मिनिस्टर साहब, गरम पानी से घर नहीं जलाए जाते.
हमारे इरादों से टकराओगे तो सर फोड़ लोगे.
– जगमोहन आज़ाद, पुलिस पब्लिक (1990)

#39. बच्चे बहादुर सिंह, कृष्ण प्रसाद मौत की डायरी में एक बार जिसका नाम लिख देता है, उसे यमराज भी नहीं मिटा सकता.
– कृष्ण प्रसाद, जंग बाज़ (1989)
#40. आपके लिए मैं ज़हर को दूध की तरह पी सकता हूं, लेकिन अपने ख़ून में आपके लिए दुश्मनी के कीड़े नहीं पाल सकता.
– समद ख़ान, राज तिलक (1984)
#41. हुकम और फर्ज़ में हमेशा जंग होती रही है. याद रहे महा सिंह, इस मुल्क पर जहां बादशाहों ने हुकूमत की है, वहां ग़ुलामों ने भी की है. जहां बहादुरों ने हुकूमत की है, वहां भगौड़ों ने भी की है. जहां शरीफों ने की है, वहां चोर और लुटेरों ने भी की है.
– जगमोहन आज़ाद, पुलिस पब्लिक (1990)

#42. राजस्थान में हमारी भी ज़मीनात हैं. और तुम्हारी हैसियत के जमींदार,
हर सुबह हमें सलाम करने, हमारी हवेली पर आते रहते हैं.
– राजपाल चौहान, सूर्या (1989)

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गुरुवार, 5 जुलाई 2018

4:47 pm

चेहरा हम भूल भी जाएं भले इक दूसरे का - आदित्य तोमर

Continue - शेष गीत...(must read and react.)

चेहरा हम भूल भी जाएं भले इक दूसरे का,
पर हमारे प्यार की छोटी कहानी याद रखना.

ख़्वाब में भी दूसरों की भीड़ हो अब लाज़मी है,
वक़्त मिलता ही नहीं इतना कि सोचें क्या कमी है,
दूसरों की ख्वाहिशों, आराइशों के हो चुके हैं,
 (आराइश - सजावट)
हम कहाँ हम रह गए, फरमाइशों के हो चुके हैं,
धुंध छाए चित्र की मुस्कान देती है गवाही,
ज़िन्दगी हमने कभी जी थी सुहानी याद रखना,
बस हमारे प्यार की छोटी कहानी याद रखना.

क्या करें वीरान ख़्वाबों के ये साये नोंचते हैं,
बारहा तन्हाइयों में डूबकर हम सोचते हैं,
काश गुज़रा वक़्त फिरने की कोई तरक़ीब होती,
हाँ, तुम्हारे लौट आने की कोई उम्मीद होती,
हर क़दम पर इश्क़ के क़िस्से तुम्हें बिखरे मिलेंगे,
तुम अगर लौटो तो ये राहें पुरानी याद रखना.
बस हमारे प्यार की छोटी कहानी याद रखना.
-
क्या करें अब जो भी है, अपनी यही बस ज़िन्दगी है,
फ़िर भी नादां दिल को अपने इश्क़ पर इतना यकीं है,
दूर रहकर भी मोहब्बत तो निभाते तुम रहोगे.
गीत मैं लिखता रहूँगा, गुनगुनाते तुम रहोगे.
अक्षरों में प्यास का अहसास मैं भर तो रहा हूँ,
गीत छलकाये जो कोई दर्द जानी, याद रखना,
हाँ, हमारे प्यार की छोटी कहानी याद रखना.

    ©आदित्य तोमर
  वज़ीरगंज, बदायूँ(उ.प्र.)
  +919368656307

बुधवार, 4 जुलाई 2018

9:56 pm

ग़ज़ल - हमारी तुम्हारी नज़र मिल रही है - विवेक राज

हमारी तुम्हारी नज़र मिल रही है ।
तभी ज़िन्दगी फूल सी खिल रही है ।।

भरोसा करो इन जवां धड़कनों पर ।
नज़र ही नहीं सिर्फ क़ातिल रही है ।।

फटा दिल रफूगर नहीं जोड़ पाता ।
इसे चाहतों की सुई सिल रही है।

फँसा देख खुद को बड़े कटघरे में ।
जुबां शेर की भी नहीं हिल रही है ।।

चले तो गए 'राज़' होकर ख़फ़ा वो ।
उन्हें भी पता रात बोझिल रही है ।।

- विवेक राज मिश्र
5:57 pm

ग़ज़ल - क़रम तेरा रहा साकी वही नाजुक मिजाजी है - एच त्यागी

क़रम तेरा  रहा  साकी  वही नाजुक  मिजाजी है ।
ग़ज़ल का शौक बादाखार को अब ख़ुशगुवारी है ।।

सुराही  को न  खोलो तुम नशा मुझको गिरा देगा ।
यकीं  कर हर  सुहानी  बज्म मे साकी दिवानी है ।।

जवां  होती  गई  रातें रहे  उस  इश्क  की खुश्बू ।
सहारा अब  वही यादें  नशे  की  शब  गुलाबी है ।।

शराबी  मैं  नहीं   तेरी   निगाहों  में  कहां  प्याले ।
मुझे  समझा  नहीं सकतीं  नज़र  ऐसे सवाली है ।।

मिली थी इश्क  मे तेरी  वफ़ा क्यों अब सताती है ।
कहां मांगें वफ़ा  'त्यागी'  यहां तो सब भिखारी है ।।
© हिम्मत सिंग त्यागी
5:41 pm

ग़ज़ल - वक़्त जैसा भी हो आता है गुजर जाता है - संतोष प्रीत

वक़्त जैसा भी हो आता है गुजर जाता है ।
बेवजह  टूटकर  इंसान  बिखर  जाता  है ।।

दर्द और गम ही न आये तो जिंदगी क्या है ।
बाद तपने के ही कुंदन तो निखर जाता है ।।

क्या गुजरती है न पूछो ये किसी के दिल से ।
वादा जब करके कोई अपना मुकर जाता है ।।

हिम्मत हारे नही इंसान तो क्या मुश्किल है ।
अच्छी तदवीर से तकदीर सवर जाता है ।।

एक  न  एक  दिन  बुझनी  ही  है  चरागे हयात ।
'प्रीत' फिर किसलिए कोई मौत से डर जाता है ।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'
5:34 pm

मुक्तक - रही हसरत सदा मेरी कहीं तू - राजेश शर्मा

रही हसरत सदा मेरी कहीं तू मुझको मिल जाए
अगर दीदार हो तेरा मेरा चेहरा भी खिल जाए
बहुत मुद्दत से ढूँढा है कभी भी मिल नहीं पाया
फटा है दर्द से सीना तो शायद अब ही सिल जाए
राजेश शर्मा प्र. अ. व कवि
नगर पंचायत रिठौरा बरेली
5:29 pm

गीत- कुछ पास नही मेरे - सना परवीन

कुछ पास नही मेरे
क्या तुझको करूँ अर्पण,
मंजूर तुझे गर हो
 एक छोटा सा है मन।

हाँ रूप नही मुझमे
और रंग नही मुझमे,
पर चाहो देख सको तो
एक उजले मन का है दर्पण।

हाय विडम्बना कैसी है
यहाँ प्रेम भी तो धन से,
तुम पाओगे मुझमे मुझको
मिलेंगे मधुर जब मन से मन।

इस मन की कच्ची डोर को
यदि समझो गहरे मन से,
तोड़े से भी न टूटेगा ये
ऐसा है प्रीत का बन्धन।

मैं कृतज्ञ हूँ उस प्रकृति की
जिसने हमेये उपहार दिया,
तुम साथ चलो उस उपवन में
जहाँ खिलते हैं मन ही मन।

सना परवीन
हरदोई
5:23 pm

मुक्तक - कयामत ही सही पर आये तो - नीतेन्द्र परमार

कयामत ही सही पर आये तो।
रूठना तो सही पर जाये तो।।
बैठा हूँ आज नदी के किनारे पर।
में सुनूगा गीत कोई गाये तो।।


- नीतेन्द्र सिंह परमार " भारत "
   छतरपुर  ( मध्यप्रदेश )
   सम्पर्क :- 8109653725
12:56 am

मुक्तक - मृगनयनी - कौशल कुमार पाण्डेय

 मृगनयनी

मृगनयनी को देख कर,नयन हुए बेहाल।
छन छन पायल बाज कर,पूछे एक सवाल।
झुलस ताप से क्यों रहा,साजन दे बतलाय-
सुधबुध भूला आज है,खोया तू किस ख्याल।।

©कौशल कुमार पाण्डेय"आस"
दिन-दिनांक-19/6/2018 ,मंगलवार।।

12:40 am

गीत - धन्य धरा धन धान्य धारती - दिलीप कुमार पाठक


धन्य धरा धन धान्य धारती|
आओ उतारें आरती||---²

जिसकी रज का तिलक लगाते|
जिसकी रज में पले बढ़े||
प्यारी मेरी वह भारत माँ|
उँगली थामे हुए खड़े||
निज बच्चों की बज्र शक्ति बन|
शत्रु सदैव संहारती ||

आओ उतारें आरती, आओ उतारें आरती||

भूल भुलैयों वाली गलियाँ|
कुञ्ज लता सब सोहें||
थलचर जलचर नभचर सहचर|
सबके सब ही मन मोहें||
आ जाना ओ कान्हा मेरे|
यशोदा तुझे पुकारती||

आओ उतारें आरती,आओ उतारें आरती ||

एक तरफ गिरिराज हिमालय |
एक तरफ गहरा सागर||
भारत वीरों की धरती है |
दिल देश प्रेम की गागर||
शत्रु सदा भय से मरते हैं|
जब भारत माँ हुँकारती||

आओ उतारें आरती, आओ उतारें आरती ||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

रविवार, 1 जुलाई 2018

8:36 am

ग़ज़ल - कैसी ये आस मन में आयी है - सुशीला धस्माना



कैसी ये आस मन में आयी है ।
खुशी नस नस में मेरे छायी है ।।

मिला जो ख़त तो उसको पढ़ते ही ।
मुस्कराहट  सी  लब  पे छायी  है ।।

हमको वीरानियां पसंद थी तब तो ।
अब तो रौनक ही मन को भायी है ।।

मिलेंगे फिर ये बिछड़ना  कैसा ।
 चन्द  लम्हों  की  ये जुदाई  है ।।

दिल हुआ कैद उनकी चाहत में ।
चाहता  अब   नहीं  रिहाई   है ।।

बहारें  मौज  ले  रही   मन  में ।
ग़मों  को  दे  चुके  विदाई  है ।।

अब तो हर रोज़ लब पे है 'मुस्कान' ।
 मन  में  छवि  तेरी  जो  बसाई  है ।।

सुशीला धस्माना 'मुस्कान'

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