हिंदी साहित्य वैभव

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सोमवार, 9 जुलाई 2018

4:30 am

सजल :- सुनो प्यारे जहाँ माँ बाप है कैसा वहाँ डर है - रेनू सिहं

सुनो प्यारे जहाँ माँ बाप है कैसा वहाँ डर है।
हमेशा साथ चलते हैं न दिन देखा न दुपहर है।।

चढ़ा है शौक सत्ता का जिसे वो मद में डूबा क्यों,
अकड़कर यूँ चले जैसे बचा वो एक नाहर है।

दीवानी राधिका यूँ ही नहीं है मेरे कान्हा की,
चुराता है दिलों को सबके इसका रूप मनहर है।

निभाई रस्म दुनिया की तुझे ससुराल जो भेजा,
छुपाकर दर्द घुटती क्यों कभी मत भूल पीहर है।

तुम्हें भगवान माना है सदा तुमको पूजा है,
चली है उन मुकामों पर कि जिनकी राह जौहर है।

रेनू सिंह
टूण्डला (यूपी)


3:50 am

सजल विधा - आज हम लेकर आये हैं एक बिलकुल नई “सजल विधा”।

आज हम लेकर आये हैं एक बिलकुल नई “सजल विधा”।यह विधा उर्दू की गजल विधा का हिन्दी रूप है। इसको लिखने के लिये गजल की बह्र को सीखने के बदले केवल मात्रा गणना सीखना ज़रूरी है। ग़ज़ल की कठिन बह्र से कुछ अलग सजल के बेहद सरल नियम निम्नानुसार हैं।


हिन्दी गजल को उर्दू के उस्ताद लोग बह्र, रुक्न और अरकान के स्तर पर खारिज कर देते हैं इसलिये हम लोगों ने हिन्दी गजल का नया नामकरण "सजल" के रूप में किया है. अब हिन्दी गजलों में उर्दू का कोई नियम लागू नही होगा. सजल का विस्तृत नवीन संधारित नियम इस तरह है:
दिनांक 02-09-2016 को जहाँ सर्वसम्मति से विद्वानों ने सजल शिल्प हेतु वैकल्पिक सम्बोधन शब्दों की सूची का निर्धारण किया वहाँ दूसरी ओर सजल के शिल्प का स्वरूप भी निर्धारित किया गया ।
आज सजल विधा को
और उसके शिल्पगत गठन को
पटल पर सघन चिंतन-मनन और उसके शिल्प पर गहन मन्थन के उपरान्त सभी विद्वानों की सर्वसहमति से इस रूप में मान्य किया गया है---
सजल नाम की नई विधा को हिन्दी-काव्य में एक नई विधा के रूप में पूर्ण मान्यता दी जाती है !
इसके स्वरूप को इस तरह से मान्य किया किया जाता है कि-----
1---सजल में दो-दो पंक्तियों के कम से कम 5 या फिर कितने ही विषम संख्या में पदिक होंगे ,
2--प्रथम पदिक को "आदिक"
कहा जाएगा ,
3--अंतिम पदिक को "अन्तिक"
कहा जायेगा ,
4---प्रत्येक पदिक में अंत के हर बार ( आवृत्ति )आने वाले एक शब्द को
या
केवल मात्रा-स्वर
को
"पदान्त" कहा जायेगा ,
5---पदिक में इस पदान्त से पहले आने वाले तुकान्त के शब्द को "समान्त" कहा जायेगा ।

इसके अतिरिक्त सजल के शिल्प के अंतर्गत 6 बिंदु और स्थिर किये गए ----
शिल्प का स्वरूप :
1-पंक्ति (मिसरे)का कोई सुनिश्चित मीटर होने की बाध्यता नहीं है, उसका कोई भी मीटर हो सकता है ।
2-लय कोई भी सजलकार की अपनी पसंद की होगी ।
3-पदिक (शेर) में किसी भी हिन्दी छन्द की अनिवार्यता नहीं होगी ।
4- सजल में पदिक (शेर)की रचना अपनी धुन में स्वाभाविक पढ़ंत के हिसाब से लयात्मक रूप में करेगा ।
5-सजल में मात्रिक बाध्यता नहीं होगी, मात्राभार को गिराकर ,उठाकर पढ़ंत की लय आधारित रचने की छूट होगी ।
●
_ सजल शिल्प हेतु वैकल्पिक सम्बोधन शब्दों की सूची
ग़ज़ल --- सजल
शेर ---- पदिक
मतला -- आदिक
मक्ता --- अन्तिक
रदीफ़ --पदांत
काफ़िया -समान्त
मिसरा -- पंक्ति
●
--डॉ०अनिल गहलौत और डॉ०राकेश सक्सेना

उपरोक्त शब्दावली को अपनी एक सजल के माध्यम से हम स्पष्ट करते हैं।
हमारी ‘सजल’

इसने -उसकी खायी है रोटी
गोल चाँद बन आयी है रोटी--1

मजदूरी कर दिन गुजरा फिर भी
भर के पेट न पायी है रोटी--2

भूख की आग सताये न जिसको
उसको कभी न भायी है रोटी--3

भूखे उस पर टूट पड़े थे जब
खुद से ही शरमायी है रोटी--4

त्यागे थे प्राण इसी की खातिर
निकली तू दुखदायी है रोटी--5
'
मुखिया निकले घर के जिन्होने
देकर जान कमायी है रोटी --6

भूखे को न कभी ज्ञान पढाओ
उसका कृष्ण कन्हायी है रोटी--7

उपरोक्त सजल मे पहली दो पंक्तियों से बना पद 1 “आदिक’’ है। जिसकी दोनों पंक्तियाँ तुकांत हैं ।
अन्य सभी 2 से 6 तक ‘पदिक’ कहलायेंगे। अंतिम पद नंबर 7 अंतिक है। इन सभी पदों मे दूसरी पंक्ति आदिक की पंक्तियों से तुकांत होगी।
इस सजल की प्रत्येक पंक्ति मे समान मात्रा भार है। हर पंक्ति का अंत ‘’है रोटी’’ से हो रहा है यह ‘’पदांत’’ हैं जो आदिक की दोनों पंक्तियों और हर पदिक की दूसरी पंक्ति मे समान है । और ‘’समान्त’’ है ,‘’आयी’’
खायी,भायी, कमायी,आयी, दुखदायी आदि।
ग़ज़ल की ही तरह आप अंतिक मे अपना नाम डाल सकते हैं ।
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रविवार, 8 जुलाई 2018

8:40 pm

वो भी शायद ख़ुश नहीं है दिल हमारा तोड़कर - राशीद राहत

इश्क़ के इस आसमाँ का एक तारा तोड़कर।
उसने हमको रख दिया है आज सारा तोड़कर।।

आँख भीगी होठ सूखे और माथे पर शिकन।
वो भी शायद ख़ुश नहीं है दिल हमारा तोड़कर।।

राशिद_राहत

8:02 pm

लगाते ठेस अपने ही मगर रोना नही अच्छा - संतोष कुमार

लगाते  ठेस अपने ही मगर रोना नही अच्छा ।
सदा उनके लिए तो बेरुखी होना नही अच्छा ।।

अगर हो क्रोध में कोई तो कुछ भी बोल देता है ।
हमेशा ऐसी बातें दिल पे तो ढोना नही अच्छा ।।

जो जैसा करता है उसकी वही आदत है ये समझो ।
किसी की बातों से विश्वास को खोना नही अच्छा ।।

किसी के वास्ते गर तुम फूल बन कर खिल नही सकते ।
किसी की राह में कांटो का तो बोना नही अच्छा ।।

अगर जो चाहते हो तुम कभी सेहत नही बिगड़े ।
सुबह फिर इस तरह से देर तक सोना नही अच्छा ।।

दिलो की नफ़रतें होती नही है दूर नफरत से ।
किसी के भी लिए तो 'प्रीत' का होना नही अच्छा।।
सन्तोष कुमार 'प्रीत'


10:30 am

मुक्तक - तन की नज़ाकत को मैं प्यार समझ बैठा - डा राहुल शुक्ला

तन की नज़ाकत को मैं प्यार समझ बैठा|
उनकी शराफ़त को मैं इकरार समझ बैठा|
वो तो यूँ ही सफर के मददगार थे|
मैं तो उनको जीवन का हार समझ बैठा|
डा राहुल शुक्ला "साहिल" इलाहाबाद

9:19 am

ग़ज़ल - दिखाओ आँख मत हमको, तेरे ही हम दिवाने है - बृजमोहन श्रीवास्तव

दिखाओ आँख मत हमको, तेरे ही हम  दिवाने है ।
भले  ही भूल जा मुझको , तेरे आशिक  पुराने है ।।

जिसे  मनमीत कहते हो , नज़र  लूट  लेगा वो  ।
नज़र के वार से बचना ,गजब उसके निशाने है ।।

हसीना जब कहे है हाँ , हंसी दुनिया ये हो जाती ।
मना करती हसीना जब ,लगे अपने बेगाने है ।।

बड़ी कातिल अदांऐ है , कई मजनू किये पागल ।
जरा बचना हसीनो से , बने  इनसे  मैखाने  है ।।

समन्दर कब हुआ खारा, सुनो साथी कहे सबसे ।
बहाये अश्क आशिक ने , उसी के ये फसाने है ।।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी" डबरा

शनिवार, 7 जुलाई 2018

7:55 pm

मुक्तक - विचरण भले कहीं भी कर लो -- पवन शंखधार

विचरण भले कहीं भी कर लो अपना घर अपना होता है ।
भले  सप्तरंगी   हो  पर  सपना  तो  सपना  होता  है ।।
संघर्ष  कष्ट  और  विपदायें  जीवन  के  वैभव  होते  हैं ,
इतिहास पुरुष बनने के लिये जीवन भर तपना  होता है ।।

पवन शंखधार
कवि / मंच संचालक
 स्वरदूत -9927433400


12:57 am

कवि केदारनाथ सिंह के बारें ये बाते जरूर जानें.....

केदारनाथ सिंह 7 July 1934 – 19 March 2018), हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उन्हें वर्ष 2013 का ४९वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था. वे यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के १०वें लेखक थे
हिंदी साहित्य के संसार में केदारनाथ सिंह की कविता अपनी विनम्र उपस्थिति के साथ पाठक के बगल में जाकर खड़ी हो जाती है. वे अपनी कविताओं में किसी क्रांति या आंदोलन के पक्ष में बिना शोर किए मनुष्य, चींटी, कठफोड़वा या जुलाहे के पक्ष में दिखते हैं.
समकालीन भारतीय कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर केदारनाथ सिंह का 19 मार्च 2018 को निधन हो गया. उन्हें 1989 में साहित्य अकादमी और 2013 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. नवंबर 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में जन्मे केदारनाथ सिंह ने अपना शैक्षिक करियर पडरौना के एक कॉलेज से शुरू किया था. बाद में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय चले गए. वे एक उम्दा कवि और अध्यापक के रूप में वहां मशहूर थे.
उनसे जुड़ी एक बात याद आती है. वे इलाहाबाद में 20 और 21 जून 2015 को ‘उजास- हमारे समय मे कविता’ नामक एक आयोजन में बोलने आए थे. सबसे पहले उन्हें ही बोलना था लेकिन इस कार्यक्रम के आयोजक ने कार्यक्रम का परिचय देने में बहुत समय ले लिया और श्रोताओं को घनघोर तरीके से उबा दिया.
जब कवि केदारनाथ सिंह बोलने आए तो उन्होंने अपने कुरते की जेब से एक पुर्जी निकाली और एक तिब्बती कवि की कविता का अनुवाद पढ़ा और मुकुटधर पाण्डेय की तीन-चार लाइनें कहकर अपनी सीट पर बैठ गए. यह एक कवि का दूसरे कवि के प्रति सम्मान भाव था, उससे ज्यादा एक निर्वासित समुदाय के कवि की पीड़ा को वह ‘हमारे समय में कविता’ के मंच पर उपस्थित सभी कवियों की साझा चिंता बना रहा था.
बीसवीं शताब्दी की रूसी कविताओं का एक अनुवाद साहित्य अकादमी ने ‘तनी हुई प्रत्यंचा’ के नाम से प्रकाशित किया है. इसे रूसी भाषा के जानकार वरयाम सिंह ने अनूदित किया था और संपादन केदारनाथ सिंह ने किया था. अपने एक संक्षिप्त संपादकीय में उन्होंने त्स्वेतायेवाकी की लोकबिंब से आधुनिक जीवन का तीखा द्रव्य निचोड़ लेने की क्षमता और मंदेल्स्ताम के चट्टान जैसे काव्य शिल्प की सराहना की थी. यह बात कमोबेश उनके लिए भी सही है.
उन्होंने अपनी कविता यात्रा में अपने मानकों में कोई ढील नहीं दी. लोकबिंब से आधुनिक जीवन का तीखा द्रव्य उनकी कविताओं लगातार व्याप्त है. अपनी कविताओं में किसी क्रांति या परिवर्तनकामी आंदोलन के पक्ष में बिना शोर किए वे मनुष्य, चींटी, कठफोड़वा या जुलाहे के पक्ष में खड़े हो जाते हैं.
उनकी कविता हिंदी साहित्य के संसार में अपनी विनम्र उपस्थिति के साथ अपने पाठक के बगल में जाकर खड़ी हो जाती है,
जैसे दुनिया के तमाम दानिशवर और कवि होते हैं, वैसे ही केदारनाथ सिंह भी थे- उन्हें भाषा पर भरोसा था. यह भी कि लोग बोलेंगे ही , वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा.
प्रेम के नितांत व्यक्तिगत क्षणों को वे जितनी आसानी से कविता में कह जाते थे, वह किसी उस्ताद के बस की ही बात थी. उनकी मृत्यु के बाद उनकी ढेर सारी कविताएं साइबर संसार में आसमान के नीले रंग की भांति फैल गयी हैं लेकिन उनकी एक कविता तो हिंदी संसार में विदा गीत का रूप ले चुकी है,
उनके लिए कविता कोई व्यक्तिगत किस्म की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि वह दुनिया को बनाने का एक उष्मीय इरादा रखती थी.
मृत्यु बोध, बनारस और केदारनाथ सिंह
केदारनाथ सिंह की कविताओं में मृत्यु को लेकर एक विकल संवेदना सदैव व्याप्त रहती है. उन्होंने मनुष्य के ‘होने’ पर जितनी गहराई से सोचा-समझा और लिखा उतना ही उसके न होने पर लिखा,
यों हम लौट आए
जीवितों की लम्बी उदास बिरादरी में
कुछ नहीं था
सिर्फ़ कच्ची दीवारों
और भीगी खपरैलों से
किसी एक के न होने की
गंध आ रही थी.
++++
मुख्य कृतियाँ
कविता संग्रह
अभी बिल्कुल अभी
जमीन पक रही है
यहाँ से देखो
बाघ
अकाल में सारस
उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ
तालस्ताय और साइकिल
आलोचना
कल्पना और छायावाद
आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान
मेरे समय के शब्द
मेरे साक्षात्कार
संपादन
ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन)
समकालीन रूसी कविताएँ
कविता दशक
साखी (अनियतकालिक पत्रिका)
शब्द (अनियतकालिक पत्रिका)
सम्मान और पुरस्कार
ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रतीकः वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा
ज्ञानपीठ पुरस्कार
मैथिलीशरण गुप्त सम्मान
कुमारन आशान पुरस्कार
जीवन भारती सम्मान
दिनकर पुरस्कार
साहित्य अकादमी पुरस्कार
व्यास सम्मान
प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह को मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार
हिंदी की आधुनिक पीढ़ी के रचनाकार केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 के लिए देश का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। वह यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के 10वें लेखक थे। ज्ञानपीठ की ओर से शुक्रवार 20 जून, 2014 को यहां जारी विज्ञप्ति के अनुसार सीताकांत महापात्रा की अध्यक्षता में हुई चयन समिति की बैठक में हिंदी के जाने माने कवि केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 का 49वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने का निर्णय किया गया। इससे पहले हिन्दी साहित्य के जाने माने हस्ताक्षर सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन अज्ञेय, महादेवी वर्मा, नरेश मेहता, निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को यह पुरस्कार मिल चुका है। पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार मलयालम के लेखक गोविंद शंकर कुरुप (1965) को प्रदान किया गया था।
-रमाशंकर सिंह

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

2:37 am

राज कुमार के 42 डायलॉगः जिन्हें सुनकर विरोधी बेइज्ज़ती से मर जाते थे

राज कुमार के 42 डायलॉगः जिन्हें सुनकर विरोधी बेइज्ज़ती से मर जाते थे
#1. जब राजेश्वर दोस्ती निभाता है तो अफसाने लिक्खे जाते हैं..
और जब दुश्मनी करता है तो तारीख़ बन जाती है
– राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)
#2. जिसके दालान में चंदन का ताड़ होगा वहां तो सांपों का आना-जाना लगा ही रहेगा.
– पृथ्वीराज, बेताज बादशाह (1994)

#3. चिनॉय सेठ, जिनके अपने घर शीशे के हों, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते.
– राजा, वक्त (1965)
#4. बेशक मुझसे गलती हुई. मैं भूल ही गया था, इस घर के इंसानों को हर सांस के बाद दूसरी सांस के लिए भी आपसे इजाज़त लेना पड़ती है. और आपकी औलाद ख़ुदा की बनाई हुई ज़मीन पर नहीं चलती, आपकी हथेली पर रेंगती है.
– सलीम अहमद ख़ान, पाक़ीज़ा (1972)
#5. जब ख़ून टपकता है तो जम जाता है, अपना निशान छोड़ जाता है, और
चीख़-चीख़कर पुकारता है कि मेरा इंतक़ाम लो, मेरा इंतक़ाम लो.
– जेलर राणा प्रताप सिंह, इंसानियत का देवता (1993)

#6. बिल्ली के दांत गिरे नहीं और चला शेर के मुंह में हाथ डालने. ये बद्तमीज हरकतें
अपने बाप के सामने घर के आंगन में करना, सड़कों पर नहीं.
– प्रोफेसर सतीश ख़ुराना, बुलंदी (1980)
#7. हम अपने कदमों की आहट से हवा का रुख़ बदल देते हैं.
– पृथ्वीराज, बेताज बादशाह (1994)
#8. जानी.. हम तुम्हे मारेंगे, और ज़रूर मारेंगे.. लेकिन वो बंदूक भी हमारी होगी,
गोली भी हमारी होगी और वक़्त भी हमारा होगा.
– राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)
#9. महा सिंह, शायद तुम अंजाम पढ़ना भूल गए हो. लेकिन ये याद रहे कि इंसाफ के जिन सौदागरों के भरम पर, तुम फर्ज़ का सौदा कर रहे हो, उनकी गर्दनें भी हमारे हाथों से दूर नहीं.
– जगमोहन आज़ाद, पुलिस पब्लिक (1990)
#10. हम वो कलेक्टर नहीं जिनका फूंक मारकर तबादला किया जा सकता है. कलेक्टरी तो हम शौक़ से करते हैं, रोज़ी-रोटी के लिए नहीं. दिल्ली तक बात मशहूर है कि राजपाल चौहान के हाथ में तंबाकू का पाइप और जेब में इस्तीफा रहता है. जिस रोज़ इस कुर्सी पर बैठकर हम इंसाफ नहीं कर सकेंगे, उस रोज़ हम इस कुर्सी को छोड़ देंगे. समझ गए चौधरी!
– राजपाल चौहान, सूर्या (1989)

#11. याद रखो, जब विचार का दीप बुझ जाता है तो आचार अंधा हो जाता है और हम अंधेरा फैलाने नहीं अंधेरा मिटाने आए हैं.
– साहब बहादुर राठौड़, गॉड एंड गन (1995)
#12. हम कुत्तों से बात नहीं करते.
– राणा, मरते दम तक (1987)
#13. हम तुम्हे वो मौत देंगे जो ना तो किसी कानून की किताब में लिखी होगी
और ना ही कभी किसी मुजरिम ने सोची होगी.
– ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)
#14. अगर सांप काटते ही पलट जाए, तो उसके ज़हर का असर होता है वरना नहीं. हम सांप को काटने की इजाज़त तो दे सकते हैं लेकिन पलटने की इजाज़त नहीं देते परशुराम.
– पृथ्वीराज, बेताज बादशाह (1994)
#15. राजा के ग़म को किराए के रोने वालों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी चिनॉय साहब.
– राजा, वक्त (1965)

#16. घर का पालतू कुत्ता भी जब कुर्सी पर बैठ जाता है तो उसे उठा दिया जाता है. इसलिए क्योंकि कुर्सी उसके बैठने की जगह नहीं. सत्य सिंह की भी यही मिसाल है. आप साहेबान ज़रा इंतजार कीजिए.
– साहब बहादुर राठौड़, गॉड एंड गन (1995)
#17. शेर को सांप और बिच्छू काटा नहीं करते..
दूर ही दूर से रेंगते हुए निकल जाते हैं.
– राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)
#18. इस दुनिया में तुम पहले और आखिरी बदनसीब कमीने होगे, जिसकी ना तो अर्थी उठेगी और ना किसी कंधे का सहारा. सीधे चिता जलेगी.
– राणा, मरते दम तक (1987)
#19. और फिर तुमने सुना होगा तेजा कि जब सिर पर
बुरे दिन मंडराते हैं तो ज़बान लंबी हो जाती है.
– प्रोफेसर सतीश ख़ुराना, बुलंदी (1980)
#20. अपना तो उसूल है. पहले मुलाकात, फिर बात, और फिर अगर जरूरत पड़े तो लात.
– ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)

#21. भवानी सिंह को बुज़दिल कोई कह नहीं सकता! आत्मा बह नहीं गई चंदन, आत्मा लौट आई है. और अब ऐसे मालूम होता है कि बुज़दिल हम पहले थे. बुज़दिली का वो चोला आज उतारकर हमने फेंक डाला. ये कौन सी बहादुरी है कि दिन के उजाले में निकले तो भेस बदल कर, सोओ तो बंदूकों का तकिया बनाकर. चंदन, न घर ना बार, हवा का एक मामूली सा झोंका, चौंका देता है और घबराकर ऐसे उठ बैठते हैं जैसे पुलिस की गोली थी. इन गुमराह खंडरों को छोड़कर, चल मेरे साथ, इंसानों की बस्ती में चंदन, चल.
– ठाकुर भवानी सिंह, धरम कांटा (1982)
#22. चलो यहां से ये किसी दलदल पर कोहरे से बनी हुई हवेली है जो
किसी को पनाह नहीं दे सकती. ये बड़ी ख़तरनाक जगह है.
– सलीम अहमद ख़ान, पाक़ीज़ा (1972)
#23. ताक़त पर तमीज़ की लगाम जरूरी है. लेकिन इतनी नहीं कि बुज़दिली बन जाए.
– राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)
#24. बोटियां नोचने वाला गीदड़, गला फाड़ने से शेर नहीं बन जाता.
– राणा, मरते दम तक (1987)
#25. हम आंखों से सुरमा नहीं चुराते, हम आंखें ही चुरा लेते हैं.
– ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)

#26. हमने देखें हैं बहुत दुश्मनी करने वाले, वक्त की हर सांस से डरने वाले. जिसका हरम-ए-ख़ुदा,
कौन उसे मार सके, हम नहीं बम और बारूद से मरने वाले.
– साहब बहादुर राठौड़, गॉड एंड गन (1995)
#27. ये बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं,
हाथ कट जाए तो ख़ून निकल आता है.
– राजा, वक्त (1965)
#28. इरादा पैदा करो, इरादा. इरादे से आसमान का चांद भी
इंसान के कदमों में सजदा करता है.
– प्रोफेसर सतीश ख़ुराना, बुलंदी (1980)

#29. कौवा ऊंचाई पर बैठने से कबूतर नहीं बन जाता मिनिस्टर साहब! ये क्या हैं और क्या नहीं हैं ये तो वक्त ही दिखलाएगा.
– जगमोहन आज़ाद, पुलिस पब्लिक (1990)

#30. ये तो शेर की गुफा है. यहां पर अगर तुमने करवट भी ली
तो समझो मौत को बुलावा दिया.
– राणा, मरते दम तक (1987)

#31. तुमने शायद वो कहावत नहीं सुनी महाकाल, कि जो दूसरों के लिए खड्डा खोदता है वो खुद ही उसमें गिरता है. और आज तक कभी नहीं सुना गया कि चूहों ने मिलकर शेर का शिकार किया हो. तुम हमारे सामने पहले भी चूहे थे और आज भी चूहे हो. चाहे वो कोर्ट का मैदान हो या मौत का जाल, जीत का टीका हमारे माथे ही लगा है हमेशा महाकाल. तुमने तो सिर्फ मौत के खड्डे खोदे हैं, जरा नजरें उठाओ और ऊपर देखो, हमने तुम्हारे लिए मौत के फरिश्ते बुला रखे हैं. जो तुम्हे उठाकर इन मौत के खड्डों में डाल देंगे और दफना देंगे.
– कृष्ण प्रसाद, जंग बाज़ (1989)
#32. ना तलवार की धार से, ना गोलियों की बौछार से.. बंदा डरता है तो सिर्फ परवर दिगार से.
– ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)
#33. काश तुमने हमें आवाज़ दी होती.. तो हम मौत की नींद से उठकर चले आते.
– राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)
#34. महा सिंह, शेर की खाल पहनकर आज तक कोई आदमी शेर नहीं बन सका.
और बहुत ही जल्द हम तुम्हारी ये शेर की खाल उतरवा लेंगे.
– जगमोहन आज़ाद, पुलिस पब्लिक (1990)
#35. दादा तो दुनिया में सिर्फ दो हैं. एक ऊपर वाला और दूसरे हम.
– राणा, मरते दम तक (1987)

#36. औरों की ज़मीन खोदोगे तो उसमें से मट्टी और पत्थर मिलेंगे. और हमारी ज़मीन खोदोगे तो उसमें से हमारे दुश्मनों के सिर मिलेंगे.
– पृथ्वीराज, बेताज बादशाह (1994)
#37. जो भारी न हो.. वो दुश्मनी ही क्या.
– ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)
#38. मिनिस्टर साहब, गरम पानी से घर नहीं जलाए जाते.
हमारे इरादों से टकराओगे तो सर फोड़ लोगे.
– जगमोहन आज़ाद, पुलिस पब्लिक (1990)

#39. बच्चे बहादुर सिंह, कृष्ण प्रसाद मौत की डायरी में एक बार जिसका नाम लिख देता है, उसे यमराज भी नहीं मिटा सकता.
– कृष्ण प्रसाद, जंग बाज़ (1989)
#40. आपके लिए मैं ज़हर को दूध की तरह पी सकता हूं, लेकिन अपने ख़ून में आपके लिए दुश्मनी के कीड़े नहीं पाल सकता.
– समद ख़ान, राज तिलक (1984)
#41. हुकम और फर्ज़ में हमेशा जंग होती रही है. याद रहे महा सिंह, इस मुल्क पर जहां बादशाहों ने हुकूमत की है, वहां ग़ुलामों ने भी की है. जहां बहादुरों ने हुकूमत की है, वहां भगौड़ों ने भी की है. जहां शरीफों ने की है, वहां चोर और लुटेरों ने भी की है.
– जगमोहन आज़ाद, पुलिस पब्लिक (1990)

#42. राजस्थान में हमारी भी ज़मीनात हैं. और तुम्हारी हैसियत के जमींदार,
हर सुबह हमें सलाम करने, हमारी हवेली पर आते रहते हैं.
– राजपाल चौहान, सूर्या (1989)

आनलाइन शापिग हर प्रोडक्ट पर भारी छूट आफर सीमित समय तक 

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

4:47 pm

चेहरा हम भूल भी जाएं भले इक दूसरे का - आदित्य तोमर

Continue - शेष गीत...(must read and react.)

चेहरा हम भूल भी जाएं भले इक दूसरे का,
पर हमारे प्यार की छोटी कहानी याद रखना.

ख़्वाब में भी दूसरों की भीड़ हो अब लाज़मी है,
वक़्त मिलता ही नहीं इतना कि सोचें क्या कमी है,
दूसरों की ख्वाहिशों, आराइशों के हो चुके हैं,
 (आराइश - सजावट)
हम कहाँ हम रह गए, फरमाइशों के हो चुके हैं,
धुंध छाए चित्र की मुस्कान देती है गवाही,
ज़िन्दगी हमने कभी जी थी सुहानी याद रखना,
बस हमारे प्यार की छोटी कहानी याद रखना.

क्या करें वीरान ख़्वाबों के ये साये नोंचते हैं,
बारहा तन्हाइयों में डूबकर हम सोचते हैं,
काश गुज़रा वक़्त फिरने की कोई तरक़ीब होती,
हाँ, तुम्हारे लौट आने की कोई उम्मीद होती,
हर क़दम पर इश्क़ के क़िस्से तुम्हें बिखरे मिलेंगे,
तुम अगर लौटो तो ये राहें पुरानी याद रखना.
बस हमारे प्यार की छोटी कहानी याद रखना.
-
क्या करें अब जो भी है, अपनी यही बस ज़िन्दगी है,
फ़िर भी नादां दिल को अपने इश्क़ पर इतना यकीं है,
दूर रहकर भी मोहब्बत तो निभाते तुम रहोगे.
गीत मैं लिखता रहूँगा, गुनगुनाते तुम रहोगे.
अक्षरों में प्यास का अहसास मैं भर तो रहा हूँ,
गीत छलकाये जो कोई दर्द जानी, याद रखना,
हाँ, हमारे प्यार की छोटी कहानी याद रखना.

    ©आदित्य तोमर
  वज़ीरगंज, बदायूँ(उ.प्र.)
  +919368656307

बुधवार, 4 जुलाई 2018

9:56 pm

ग़ज़ल - हमारी तुम्हारी नज़र मिल रही है - विवेक राज

हमारी तुम्हारी नज़र मिल रही है ।
तभी ज़िन्दगी फूल सी खिल रही है ।।

भरोसा करो इन जवां धड़कनों पर ।
नज़र ही नहीं सिर्फ क़ातिल रही है ।।

फटा दिल रफूगर नहीं जोड़ पाता ।
इसे चाहतों की सुई सिल रही है।

फँसा देख खुद को बड़े कटघरे में ।
जुबां शेर की भी नहीं हिल रही है ।।

चले तो गए 'राज़' होकर ख़फ़ा वो ।
उन्हें भी पता रात बोझिल रही है ।।

- विवेक राज मिश्र
5:57 pm

ग़ज़ल - क़रम तेरा रहा साकी वही नाजुक मिजाजी है - एच त्यागी

क़रम तेरा  रहा  साकी  वही नाजुक  मिजाजी है ।
ग़ज़ल का शौक बादाखार को अब ख़ुशगुवारी है ।।

सुराही  को न  खोलो तुम नशा मुझको गिरा देगा ।
यकीं  कर हर  सुहानी  बज्म मे साकी दिवानी है ।।

जवां  होती  गई  रातें रहे  उस  इश्क  की खुश्बू ।
सहारा अब  वही यादें  नशे  की  शब  गुलाबी है ।।

शराबी  मैं  नहीं   तेरी   निगाहों  में  कहां  प्याले ।
मुझे  समझा  नहीं सकतीं  नज़र  ऐसे सवाली है ।।

मिली थी इश्क  मे तेरी  वफ़ा क्यों अब सताती है ।
कहां मांगें वफ़ा  'त्यागी'  यहां तो सब भिखारी है ।।
© हिम्मत सिंग त्यागी
5:41 pm

ग़ज़ल - वक़्त जैसा भी हो आता है गुजर जाता है - संतोष प्रीत

वक़्त जैसा भी हो आता है गुजर जाता है ।
बेवजह  टूटकर  इंसान  बिखर  जाता  है ।।

दर्द और गम ही न आये तो जिंदगी क्या है ।
बाद तपने के ही कुंदन तो निखर जाता है ।।

क्या गुजरती है न पूछो ये किसी के दिल से ।
वादा जब करके कोई अपना मुकर जाता है ।।

हिम्मत हारे नही इंसान तो क्या मुश्किल है ।
अच्छी तदवीर से तकदीर सवर जाता है ।।

एक  न  एक  दिन  बुझनी  ही  है  चरागे हयात ।
'प्रीत' फिर किसलिए कोई मौत से डर जाता है ।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'
5:34 pm

मुक्तक - रही हसरत सदा मेरी कहीं तू - राजेश शर्मा

रही हसरत सदा मेरी कहीं तू मुझको मिल जाए
अगर दीदार हो तेरा मेरा चेहरा भी खिल जाए
बहुत मुद्दत से ढूँढा है कभी भी मिल नहीं पाया
फटा है दर्द से सीना तो शायद अब ही सिल जाए
राजेश शर्मा प्र. अ. व कवि
नगर पंचायत रिठौरा बरेली
5:29 pm

गीत- कुछ पास नही मेरे - सना परवीन

कुछ पास नही मेरे
क्या तुझको करूँ अर्पण,
मंजूर तुझे गर हो
 एक छोटा सा है मन।

हाँ रूप नही मुझमे
और रंग नही मुझमे,
पर चाहो देख सको तो
एक उजले मन का है दर्पण।

हाय विडम्बना कैसी है
यहाँ प्रेम भी तो धन से,
तुम पाओगे मुझमे मुझको
मिलेंगे मधुर जब मन से मन।

इस मन की कच्ची डोर को
यदि समझो गहरे मन से,
तोड़े से भी न टूटेगा ये
ऐसा है प्रीत का बन्धन।

मैं कृतज्ञ हूँ उस प्रकृति की
जिसने हमेये उपहार दिया,
तुम साथ चलो उस उपवन में
जहाँ खिलते हैं मन ही मन।

सना परवीन
हरदोई
5:23 pm

मुक्तक - कयामत ही सही पर आये तो - नीतेन्द्र परमार

कयामत ही सही पर आये तो।
रूठना तो सही पर जाये तो।।
बैठा हूँ आज नदी के किनारे पर।
में सुनूगा गीत कोई गाये तो।।


- नीतेन्द्र सिंह परमार " भारत "
   छतरपुर  ( मध्यप्रदेश )
   सम्पर्क :- 8109653725
12:56 am

मुक्तक - मृगनयनी - कौशल कुमार पाण्डेय

 मृगनयनी

मृगनयनी को देख कर,नयन हुए बेहाल।
छन छन पायल बाज कर,पूछे एक सवाल।
झुलस ताप से क्यों रहा,साजन दे बतलाय-
सुधबुध भूला आज है,खोया तू किस ख्याल।।

©कौशल कुमार पाण्डेय"आस"
दिन-दिनांक-19/6/2018 ,मंगलवार।।

12:40 am

गीत - धन्य धरा धन धान्य धारती - दिलीप कुमार पाठक


धन्य धरा धन धान्य धारती|
आओ उतारें आरती||---²

जिसकी रज का तिलक लगाते|
जिसकी रज में पले बढ़े||
प्यारी मेरी वह भारत माँ|
उँगली थामे हुए खड़े||
निज बच्चों की बज्र शक्ति बन|
शत्रु सदैव संहारती ||

आओ उतारें आरती, आओ उतारें आरती||

भूल भुलैयों वाली गलियाँ|
कुञ्ज लता सब सोहें||
थलचर जलचर नभचर सहचर|
सबके सब ही मन मोहें||
आ जाना ओ कान्हा मेरे|
यशोदा तुझे पुकारती||

आओ उतारें आरती,आओ उतारें आरती ||

एक तरफ गिरिराज हिमालय |
एक तरफ गहरा सागर||
भारत वीरों की धरती है |
दिल देश प्रेम की गागर||
शत्रु सदा भय से मरते हैं|
जब भारत माँ हुँकारती||

आओ उतारें आरती, आओ उतारें आरती ||
दिलीप कुमार पाठक "सरस"

रविवार, 1 जुलाई 2018

8:36 am

ग़ज़ल - कैसी ये आस मन में आयी है - सुशीला धस्माना



कैसी ये आस मन में आयी है ।
खुशी नस नस में मेरे छायी है ।।

मिला जो ख़त तो उसको पढ़ते ही ।
मुस्कराहट  सी  लब  पे छायी  है ।।

हमको वीरानियां पसंद थी तब तो ।
अब तो रौनक ही मन को भायी है ।।

मिलेंगे फिर ये बिछड़ना  कैसा ।
 चन्द  लम्हों  की  ये जुदाई  है ।।

दिल हुआ कैद उनकी चाहत में ।
चाहता  अब   नहीं  रिहाई   है ।।

बहारें  मौज  ले  रही   मन  में ।
ग़मों  को  दे  चुके  विदाई  है ।।

अब तो हर रोज़ लब पे है 'मुस्कान' ।
 मन  में  छवि  तेरी  जो  बसाई  है ।।

सुशीला धस्माना 'मुस्कान'

शुक्रवार, 29 जून 2018

1:18 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में डॉ. ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी 'शैलेश' की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल क्र० 1
श्याम की मीरा दीवानी हो गयी ।
यह  कहानी तो पुरानी हो गयी ।।

प्यार की सौगात प्यारे छीन ली ।
बोझ  अपनी  जिंदगानी हो गई ।।

देखकर बेटो की अपनी साज़िशे ।
माँ  बेचारी  पानी  पानी  हो  गई ।।

हार  गेंदे  के सुवन  में  शब्द  सुंदर ।
क्या  गज़ब  की मेहरबानी  हो गई ।।

आपने जो बाजी कहाँँ वाजिब कहा ।
मुझसे  ही  कुछ  बदजुबानी  हो गई ।।

सासंद इस शहर का पी एम हुआ ।
अब  बनारस  राजधानी  हो  गई ।।

बात  तो  शैलेस  केवल  बात  थी ।
उसकी भी अब वाणी जानी हो गई ।।

डॉ0 ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी 'शैलेश'

ग़ज़ल क्र 2

थी  मेरी  हसरत  बहुत  ही  छोटी,
गुनाह  मेरा  बहुत  बड़ा  था ।
वजूद मेरा  न  सह  सके  तुम, 
क्या जिद पे पहले कभी अड़ा था ।।

न खोट नियत थी कुछ बजह मेरी,
था खैर मकदम  ऐसा  इरादा ।
बहुत  थे  हमले  को हमपे झपटे
वहाँ  अकेला  ही  मैं  खड़ा  था ।।

थी कैसी कशिश थी कितनी कीमत,
नही  छिपा  था  नजर  से  मेरे ।
उन्हें भी हमने थी बख्सी इज्जत,
क्या उनमे हीरे का कण जड़ा था।।

ये किस रुतबा की जिसने अपने,
गुरुर  को  ही  बड़ा  दिया  हो ।
क्यो बगुल जाते हो उसको जिसने,
तुम्हारे हक में कभी लड़ा था ।।

न  जिस्म  पर  मेरे  चोट  आई,
मगर जिगर तो हुआ ही घायल।
अवाक मैं रह गया था पलभर,
वो  कॉल भी बहुत बड़ा था ।।

बहुत  ही  सुंंदर  था तेरा मुखड़ा,
तो आग बरस ही किसलिए वह ।
खड़ा था  कि  आदमी  वहाँ पर,
नही  मरा  जानवर   सड़ा  था ।।

मुझे  मुहब्बत  ने उसकी बाँधा,
खाजोश बैठा जो उसकी आगे ।
न आता इस डर कहि भी जाता,
शैलेश  सारा  शहर  पड़ा  था ।।


ग़ज़ल क्र 3

किसी से चोट मिलती है, तो कोई प्यार देता है।
भंवर के बीच से नोका, मर्री कर पार देता है ।।

न बदल है न बदलेगा पुरानी सोच का नक्शा,
है पाता जब कभी मौका, छुरी पर धार देता है।

है हस्ता मुस्कराता और चुटकी काट लेता है,
मिला हुँँ जब कभी तोहफा यही हर बसर देता है।

सभलने की नसीहत तो मुझे देता है हर कोई ।
अकेला है  ऐसे जीवन को मेरे रफ्तार देता है ।।

दिखावा तो नही करता, मगर दिलदार है बेहद ।
जिसे   होती   जरूरत   है  उसे  उधार  देता है ।।

मरे  मलोक गजब का फैसला है तू भी दे देता ।
किसी को फूल देता है किसी को कहर देता है ।।

मुरब्बत है न दिल मे न पता है आदमियत क्या ।
भला ऐसे के हांथो में ही क्यों अधिकार देता है ।।

जहाँ भर के लिए दरियादिली है तेरे दिल मे तो ।
सिर्फ शैलेश को हो किसलिये धिक्कार देता है ।।


ग़ज़ल क्र  4

घर  बँटा  रोटी  बँटी  दिल बँट  गया ।
इस  तरह  अपनो  से इंसा कट गया ।।

वक्त   आया   दूर   जा   बैठा   कही,
नेकीयो  के  रास्ते  से  हट  गया ।।

हाथ खाली  यह  यहाँँ  करता  भी  क्या ।
वह रहे   काशी   में   मैं   चिनहट  गया ।।

माँ  रही  उत्सव  रहा  सब  कुछ  रहा ।
फूल  से  आँगन  था  सारा  पट  गया ।।

प्यार  क्या  अपनत्व  क्या  आई  समझ ।
सामने   छाया   अंधेरा   छट   गया ।।

बाते   जिसके   लिए   जिल्लत   सहे ।
बात  उसकी  सुन  कलेजा  फट  गया ।।

गैर   था   शैलेश   लेकिन   वक्त   पर ।
कर  गया  इमदाद  फिर  सरपट  गया ।।

ग़ज़ल क्र  5

जख्मो की  गहराई  तुम क्या जानोगे ।
आँँख मेरी भर आईं तुम क्या जानोगे ।।

तुम जूनून के चलते जितना गवा दिए ।
कैसे  हो  भरपाई  तुम  क्या  जानोगे ।।

कितनी किल्लत और मसक्कत कर मैंने ।
जोड़ी   पाई   पाई   तुम   क्या   जानोगे ।।

तन पर कपड़ा नही जवानी बोझ बनी ।
लेती  है  अंगड़ाई   तुम  क्या  जानोगे ।।

तुमने खाया मौज उड़ाया जीवन भर ।
कैसे  हुई  कमाई  तुम  क्या  जानोगे ।।

जहाँ रहे तुमने महलो का सुख पाया ।
क्या है घर अंगनाई तुम क्या जानोगे ।।

आज सियासत शहर की उसके ही चलते ।
कितनी   है   गरमाई   तुम   क्या  जानोगे ।।

जनता  मरे  भूख  से  पर  अफसर  नेता
खाते   खूब   मलाई   तुम  क्या  जानोगे ।।

कटे   रहे   माटी   से  जीवम  भर  प्यारे ।
खेती  और  सिंचाई  तुम   क्या  जानोगे ।।


ग़ज़ल क्र 6

समय  देखिये  और समय की धार देखिये ।
फुटपाथों पर आज दिख रहा प्यार देखिये ।।

राजा  चुप  है  रानी  चुप  है  मंत्री  भी  चुप ।
सब   पर  हुक्म  चलाता  चोकीदार  देखिये ।।

प्रायः  सच्चाई  की  कसमें  लोग  है  खाते ।
किंतु  झूठ  का  चलता  कारोबार  देखिये ।।

कुछ   कहने   सुनने  की छूट  नही  आई ।
बुद्धजीवियों   का   गूंगा  दरबार  देखिये ।।

हुआ  हादसा पिछले बरस  मरे  अनगिनत ।
फिर  भी  जाते  लोग  वहाँ हट बार देखिये ।।

हत्या   लूट   फिरौती  चोरी  बलात्कार  की ।
खबरों  से  है  भरा  हुआ  अख़बार  देखिये ।।

अपराधी मानव है कदम  उठा  सुरक्षित  रखो ।
राजनीति   वालो    के   शुभ   उद्द्गर  देखिये ।।

घर   के   लोगों   की   अंदेखो   के   चलते ।
देश   हुआ   शैलेः   बहुत   बीमार   देखिये ।।


ग़ज़ल क्र 7

तुमसे  जो  कुछ  मिला  बहुत  है ।
बना   रहे   सिलसिला   बहुत   है ।।

अपनी    करनी    नही    देखते ।
उनको  शिकवा - गिला  बहुत  है ।।

लम्हेंं    नही   एहसास   मुझे   है ।
घाव  जिगर  का  छिला बहुत  है ।।

जैसे  -  जैसे   जी   ही   लूंगा ।
यादों  का  काफिला  बहुत है ।।

कत्ल  उसी  का  करना  चाहो ।
जो  तुमसे  ही  हिला  बहुत है ।।

ढह  जाएगा  निश्चित  इक  दिन ।
यदपि   ऊँचा   किला  बहुत  है ।।

अब  तो  कर  शैलेष  पर  रहम ।
दिया  इसे  तू   सजा   बहुत है ।।

ग़ज़ल क्र  8

अधरों से छू दिया आपने लम्हा-लम्हा ग़ज़ल हो गया ।
राह  भटकते  पगने  पाई, यत्र सार्थक पहल हो गया ।।

काव्य कीर्ति का आँचल फहरा इंद्रधनुष अम्बर में लहरा ।
संदया डूबी मधुर मिठास से रूप समय का नवल हो गया ।।

माटी की सेवा में आपने जो भी शास्वत क्षड है गुजरे ।
आप नाम चाहे जो दे दे अपना जीवन सफल हो गया।

तन से ऊपर, धन से ऊपर मन से जो भी किया आपने ।
पन्ने   पर  युग  के आरेखित स्वदे खांस अटल हो गया ।।

अट्टालिका न माने रखती सप्तरंग भी होते ढूंढ़ले ।
जर्जर इस छाया के आगे झूठा ऊंचा महल हो गया ।।

आघातों  को  सहते  सहते  टूट  गया  शैलेश  चदुर्दिक ।
थोड़ा सम्बल मिला आपका यह निर्बल भो सबल हो गया ।।

डॉ0 ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी 'शैलेश'

सोमवार, 25 जून 2018

7:31 pm

जब कालरात्रि बढ़ती ओढ़नी पसार हो - आदित्य तोमर

जब कालरात्रि बढ़ती ओढ़नी पसार हो.
हर ओर सघन क्रूरतम नैशान्धकार हो.
निद्रारणवों की थाह गाहती हो चेतना.
मधुकैटभी प्रवृत्ति चाहती हो जीतना.
उस वक़्त अग्निहोत्र धर्म पालता कवि है.
प्राणों की आहुति दे दीप बालता कवि है.
रवि रश्मियाँ जहाँ न कर्म पाला करे हैं.
कवि उर की उर्मियाँ वहाँ उजाला करे हैं.
-
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
7:29 pm

ग़ज़ल - आप हम को भूल भी जाओ न कोई हर्ज है - सुदीप्ता बेहरा

आप हम को भूल भी जाओ न कोई हर्ज है,
आप   को  दिल मे रखेंगे ये हमारा फर्ज है |

फाड़ दे बेशक सभी पन्ने मुहब्बत के मगर,
आज भी गुस्ताख़ दिल पर नाम तेरा दर्ज है |

लाख चाहे तुम छिपा लो जिंदगी का राज सब,
कर रही  आँखे  बयां ये इश्क  का ही   मर्ज है |

लूट के  दिल  तब खज़ाना  दे गये थे प्यार का,
साथ छूटा आज, हम पर रह गया कुछ कर्ज है।

इश्क ने  हम  को सिखाया   गुनगुनाना दर्द में,
गा रही है 'दीप्त' जो   वो आपकी  दी तर्ज है।

सुदिप्ता बेहेरा "दीप्त"
     उड़ीसा
7:26 pm

ग़ज़ल - यहां बात सच इक कहानी कहेगी - नीतेन्द्र परमार

यहां  बात सच इक कहानी कहेगी ।
जिगर  में  उठे  वो  रवानी  कहेगी।।

मिलो तुम कभी जब सितारे निहारे ।
चिरागों  जले  सब  जवानी  कहेगी ।।

सफर हैं हमारा जरा बात सुनलो ।
उसी से मिलूं जो दिवानी कहेगी ।।

जरा  पास बैठो सितमगर  हमारे ।
सही बात तो अब जुवानी कहेगी ।।

बड़ा नेक दिखता हमें ये जमाना ।
मगर  प्रीत  टूटी  निशानी कहेगी ।।

कही लुट न जाये दिलो का खजाना ।
यहा  आज  भारत  सुहानी  कहेगी ।।

- नीतेन्द्र सिंह परमार " भारत "
   छतरपुर  ( मध्यप्रदेश )
   सम्पर्क :- 8109643725

7:22 pm

ग़ज़ल - भला चुप रहने से क्या होगा - पारस गुप्ता

यहाँ के लोग सच बताते क्यूँ नहीं...
हैं  प्यार तो फिर जताते क्यूँ नहीं...
भला चुप रहने से क्या होगा बताओ..
हक हैं तो फिर लेने आते क्यूँ नहीं....
काविशें तक नहीं करते लोग यहाँ के...
छूटा प्यार लोग अब जुटाते क्यूँ नहीं.....
(काविशें=कोशिशें)
इकरार करोगें तभी तो प्यार मिलेगा...
दिल से दिल अपना मिलाते क्यूँ नहीं......
गलतफेमियाँ हुई खुशियों के दरम्यान...
गर बस चुकीं हैं तो मिटाते क्यूँ नहीं......
अगर सनम तुम्हारा हैं तो रहेगा भी...
असल प्यार अपना वो दिखाते क्यूँ नहीं.....
गुनगुनाओ यार तुम ग़ज़लें मुहब्बत की...
न मिलें दिल तो हाथ मिलाते क्यूँ नहीं....
मुकद्दर में लिखा नहीं मिलता "पारस"...
सिक्का किस्मत का आजमाते क्यूँ नहीं.....
पारस गुप्ता (शायर दिलसे)
   चंदौसी (सम्भल)

7:19 pm

राष्ट्ररक्षा

हिन्द धरा पर जन्मे हम हिंदुस्तान हमारा है ।
करो  राष्ट्र  की  रक्षा  ये हिंदुस्तान हमारा है।।

गांधी  ने  शेखर  ने  अब्दुल  हमीद  के जैसे ।
कितनो के लहू ने बचाया हिंदुस्तान हमारा है।।

देखो  आज  भी  सरहद  पार  पे  उनको  तुम ।
जिनके भरोसे सोता चैन से हिंदुस्तान हमारा है।।

ऐसे करें हम राष्ट्र की रक्षा ऐसा हो  बल हम में।
जैसे हिमालय गर्व से कहता हिंदुस्तान हमारा है।।

विश्वविजेता  हो  देश हमारा लेकर ये संकल्प ।
और गर्व से हम फिर बोलें हिंदुस्तान हमारा है।।

सना परवीन
हरदोई

6:20 am

राम हैं वे बस इसी से तम्बुओं में बैठकर - आदित्य तोमर

राम हैं वे
बस इसी से
तम्बुओं में बैठकर भी
धैर्य की प्रतिमा बने से
बाट जोहे जा रहे हैं ।
राम हैं वे
बस इसी से
शांति के संकल्प के हित
पक्ष जनमत का समझकर
दूर रहते हैं पहल से ।
राम हैं वे
बस इसी से
राजनेता तो नहीं पर
राजधर्मा व्यक्ति जैसा
कर रहे व्यवहार अब तक ।
राम हैं वे जानते हैं
शक्ति पर अंकुश लगाना
धर्म का परचम उठा -
उन्मादियों के गढ़ ढहाना
प्रेम में कटिबद्ध होकर
सागरों के पार जाना
दुष्ट का संहार करना
भक्त के हित हार जाना
हाँ मगर जिस भाँति भी हो
शांति की स्थापना, वह -
यत्न कर जाना उन्हें है
बाण से पहले विनय का
मार्ग अपनाना उन्हें है ।।


- आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ
5 अप्रैल, 2017


6:18 am

दाती पर चढी साढे साती


पाप का कलश फूटा
              गुस्से में दिखाते दाँत
महाराज गजलों पे
                 चूर नाचने लगे
दिल्ली में जमाये पैर
               झाडियों के खट्टे बेर
भक्त सभी बाबा जी का
                 नूर बाँटने लगे
न्याय के भी देव को भी
             गच्चा दे रहे थे दाती
भारत की मीडिया से
             दूर भागने लगे
शनि का सवैया चढा
               चढ गयी साढ़े साती
धनाधिप आज देखो
              धूर चाटने लगे

   राजेश मिश्र प्रयास

1:22 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में राजेन्द्र कुमार गुप्त 'बावरा' की कुछ ग़ज़लेंं

ग़ज़ल 1

आदमी  तो  दुखी  ही  रहा ।
दर्द   से   होंठ  है  सी  रहा ।।

ऐ   चमन   के  पुजारी  बता ।
देवता  बन   कही  भी  रहा ।।

अपने  मक्कारियों   मे  पँगा ।
चाल  चलता  फितरती  रहा ।।

हर  तरफ  तिशनगी है जगी ।
एक  दूजे  का  खू  पी  रहा ।।

बीज  नफरत  की  बोता  फिरे ।
मीत   बन   कर   फरेबी   रहा ।।

चाँद - मंगल  तलक  जो गया ।
खौफ   के  साये  में  जी  रहा ।।

आईने  दिल  को  बेपर्द  कर ।
'बावरा'  पर्दा  क्यों  सी  रहा ।।

© राजेन्द्र कुमार गुप्त 'बावरा'

ग़ज़ल 2

कहते  हो  लापता  है,  जाहिर  पता  हमारा ।
दुश्वारियों   ने   ठोकर,  दे   दे   हमे   दुलारा ।।

जो   धूल  में  मिले  है,  थे  फूल  वो  चमन  के ।
किसने  इन्हें  है  मसला, क्या  दोष  है  निहारा ।।

हँसना  अगर  बुरा  है,  रोने  पर  क्यो  है  बंदिश ।
रहता   हूं   हाशिये   में,  ले   भाग्य  का  पिटारा ।।

नफरत  की  आग  बोकर  पाओगे  क्या  बता दो ।
मिल्लत  की   ये  वशियत,  सारे  जहा  से  न्यारा ।।

कहते   हो  शूल  बन कर  पावो  में  चुभ  रहे  है ।
कैमूरी   'बावरा'   हु    छीनो   न   हक   हमारा ।।


ग़ज़ल 3
212   212  212 

फूलोंं   को   तोड   लाना   कैसा ।
कांटो   से  खुद   बचाना   कैसा ।।

अर्श   पे   छाने  वाले  बोलो ।
फर्श   पे   तेरा  आना  कैसा ।।

खोद  दी  गहरी  खाई  तो फिर ।
डरना  क्या  और  डरना  कैसा ।।

भूख  की खलती जब आग हो ।
घड़ियाली  ऑंसू  बहना  कैसा ।।

भ्रम   की   जो   सुई   से   सिला ।
जख़्म  का  मिट  ही  पाना कैसा ।।

बावरा     उन्मादी    आक़ा   पर ।
ये  ख़ंजर  चल  ही  जाना  कैसा ।।



ग़ज़ल 4

जिन्दगी गणित जैसा दर्द बड़ा गहरा है।
आस्तिनी  सापों का लगा हुआ पहरा है ।।

कौन जाने द्रोपदी की चींख कोई सुन पाए ।
रेत  जैसा  प्रीत  लिए  कृष्ण  हुआ भरा है ।।

शोर   बड़ा   गलियों  में   चौराहे  अंंजान ।
मरघटी  सन्नाटे  को  चीर  रहा  लहरा  है ।।

बुझ   रहे   आशा  के  दीप  हर  दरवाजे ।
गूँज रहा घर घर जयचन्द का ककहरा है ।।

कैसे यहाँ भाव करें भावना के खंडहर में ।
छीनता  उजाला  को अमावस बेबहरा है ।।

बावरा  अशोक  वाटिका  में  बैठी  जानकी ।
काल जयी रावण का खोफ खाता खतरा है ।।


ग़ज़ल 5

पर्वत  की  चोटी  से  पूछो  सागर  की गहराई से ।
रेतीली ममता से पूछो डीआरएस भरी तन्हाई से।।

कट कट गिरते लोग जल रहे बारूदी अंगारो से ।
विधवा की माँँगों से पूछो उजड़े कोख जम्हाई से।।

नफरत की दीवार उठाते जहाँ जेहादी गारो से ।
ऐसे में अनुराग से पूछो राग द्वेष की खाई से ।।

कंकालों से पति मेधना उजड़ गई लंका कैसे ।
लंका पति रावण से पूछो या इस तानाशाही से ।।

चोर  की  दाढ़ी  में तिनके से पूछो शहंशाहों से ।
बावरा रहते शीशमहल में सदा बहार बहाई से ।।


ग़ज़ल 6

दरियों  में  नही  हलचल,सुना है किनारा ।
क्या  बात  हुई  तुरबत  ने,  पाँव पसारा ।।

दहशत   में   समाया   है,  रौनुमा  सवेरा ।
सजदा  करु  कहाँ मैं, ऊँचा चढ़ा है पारा ।।

पत्थर से नशब करते  हैं  खून  के छीटेंं ।
अमन औ चमन लौटे कैसे , चैन दुवारा ।।

मतलब-परस्त लोगो कुछ तो विचार करलो ।
है   जादुई   करिश्मा,   या   जादुई  नज़ारा ।।


महफूज  गुलिश्ता  है  काँटों  की  बंदिशे  है ।
गर  'बावरा'  बनोगे  उजड़ेगा   घर  तुम्हारा ।।


ग़ज़ल 7

कोई  शिकवा  नही बहारोंं से ।
कोई  रुसवाई  नही  खारोंं से ।।

फानी दरिया से उठती लहरें है ।
मिट  न  जाये कही किनारोंं से ।।

मै  हूं  तेरी  वफ़ा  का  शैदाई ।
फिर भी हरजाई कहते तारों से।।

तेरी रहमत बरसती है हर शै पर ।
जीना   मरना   इन्ही  इशारोंं  से ।।

दर्द  दिल  ने  पिया  दवा  समझ ।
'बावरा' मिलता  दुआ  प्यारोंं  से ।।


ग़ज़ल 8

शाकी ! यह मैखाना कैसा ।
अपना  और बेगाना कैसा ।।

भीड़  तंत्र  के  इन  हाथो  में ।
बजता  बिगुल  तराना  कैसा ।।

कूक  कोकिला  तोड़  रही  दम ।
आखिर   यह   याराना  कैसा ।।

पवन  कह  रहा  बुझे  हुए  मन ।
तिनकों   का  उड़  जाना कैसा ।।

बिकते  जिस्म   से  तो  पूछो ।
उनका   ठौर   ठीकाना  कैसा ।।

फैला है  उन्माद  धरा  पर ।
फिर आंसू धरकाना कैसा ।।

'बावरा'बिधवा सी देहरी पर ।
सागर  का  लहराना  कैसा ।।

राजेन्द्र कुमार गुप्त 'बावरा'

शनिवार, 23 जून 2018

5:43 pm

मुक्तक - मेरी तनहाई को कोई आवाज तो दे

मेरी तनहाई को कोई आवाज तो दे,
मेरे  प्रेम गीत  को कोई साज तो  दे,
कदमों में झुका दे हम  आसमाँ  को,
मेरे सपनों को  कोई  परवाज़  तो दे ।।
                    
कुमार सागर

5:41 pm

ग़ज़ल - दिखाओ आँख मत हमको , तेरे ही हम  दिवाने है


दिखाओ आँख मत हमको , तेरे ही हम  दिवाने है ।
भले ही भूल जा मुझको ,तेरे  आशिक पुराने है ।।

जिसे *मनमीत* कहते हो , नज़र लूट लेगा वो  ।
नज़र के वार से बचना ,गजब उसके निशाने है ।।

हसीना जब कहे है हाँ , हंसी दुनिया ये हो जाती ।
मना करती हसीना जब ,लगे अपने बेगाने है ।।

बड़ी कातिल अदांऐ है , कई मजनू किये पागल ।
जरा बचना हसीनो से , बने इनसे मैखाने है ।।

समन्दर कब हुआ खारा , सुनो साथी कहे सबसे ।
बहाये अश्क आशिक ने , उसी के ये फसाने है ।।

बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"डबरा

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