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रविवार, 17 जून 2018

7:45 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह

🌹🌹🌹जय~जय🌹🌹🌹
*🌹🌹मुहब्बत🌹🌹*
                         हिन्दी गज़लें
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बीसलपुर पीलीभीत उ. प्र.

शनिवार, 16 जून 2018

1:42 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में सुशीला धस्माना 'मुस्कान' की कुछ ग़ज़लें

 ग़ज़ल 1
वज्न - 212  22  212  22
काफ़िया - आम
रदीफ़  - हो जाए

ऐ खुदा  ऐसा  काम  हो जाए ।
हर  खुशी  तेरे  नाम  हो जाए ।।

जो भूखे ही  शामों - सहर फिरते ।
उनके दुख का अब नाश हो जाए।

तूफां  बारिश  में  हो  गये बेघर ।
उनके एक ही घर नाम हो जाए।।

जो सताते हैं दूसरों को जो अब ।
उनका भी कुछ इन्तजा़म हो जाए ।।

शेर की  खाल में जो भेड़िये हैं ।
चर्चा उनकी भी आम हो जाए ।।

मांगती  हूं  ईश्वर से मैं अब तो ।
बच्चा  बच्चा श्री राम हो जाए ।।

दिन भरे हों खुशियों से 'मुस्कान' ।
आज महफिल में शाम हो जाए ।।

सुशीला धस्माना 'मुस्कान'

ग़ज़ल 2
वज्न  - 2122    2122    22
काफ़िया  - आ
रदीफ़   - पाओगे

अपनी करनी का सिला पाओगे ।
एक समय तुम भी सजा पाओगे ।।

पेड़ों पर कुछ तो रहम कर लेता ।
साफ़  वायु  फिर दिला  पाओगे ।।

जो उजाड़े हो बहारों को तुम  ।
कैसे फूलों को खिला पाओगे ।।

जो सभी जीवों का चैन छीने ।
चैन खुद को न दिला पाओगे ।।

धरती रोती आसमां रोता हैं ।
धीर कैसे तुम दिला पाओगे ।।

हर तरफ़ 'मुस्कान' हरियाली हो ।
तब खुशी सबको दिला पाओगे ।।

सुशीला धस्माना 'मुस्कान'

ग़ज़ल 3
बह्र - २२  २२ २२ २२ २
काफ़िया - आर
रदीफ -  करते हैं

हम तो बस तुमसे प्यार करते हैं ।
तुम पर ही  जां निसार करते हैं ।।

आपने  छोड़ा है जो हमको तो ।
बातें  क्यूँ  यूं  हज़ार  करते  हैं ।।

रास्ते  जैसे  होंगे  कट  जाएं ।
जब तुम्हारा दीदार करते हैं ।।

इम्तिहां  जितना वफा का लोगे ।
प्यार का फिर  निखार करते हैं ।।

जिन्दगी रूठ  भी  जाए क्या है ।
उसका  ग़म  यूं  फरार करते हैं ।।

लब पे तेरे आएगी कब 'मुस्कान' ।
हम  तो  बस  इंतज़ार  करते  हैं ।।

सुशीला धस्माना 'मुस्कान'


ग़ज़ल 4
बह्र  - 2×10
काफ़िया  - आ
रदीफ़ - देखा है

ग़ैरों को अपना बनता देखा है।
अपनों को दूर जाता देखा है।।

मतलब पड़ने पे खून का रिश्ता ।
खून का प्यासा  होता  देखा  है ।।

रात  में  नींद   कैसे   आएगी  ।
उल्फते  जाम  पीता  देखा  है ।।

लगाया दिल से  बेवफाओं  को ।
छिपे  खंजर  को आता देखा है ।।

प्यार चुंबक  के  जैसे  होता  है ।
प्यार से खिंचता सबको देखा है ।।

बात तुम चाहते तो रोक लेते ।
रार  को ऐसे बढ़ता  देखा है ।।

हो गयी 'गर ख़ता तुमसे' मुस्कान ।
अपनों को माफ़  करता  देखा  है ।।

सुशीला धस्माना 'मुस्कान'

ग़ज़ल 5
वज्न - 1222   1222    22
काफ़िया - ई
रदीफ़ - है

कैसी ये आस मन में आयी है ।
खुशी नस नस में मेरे छायी है ।।

मिला जो ख़त तो उसको पढ़ते ही ।
मुस्कराहट  सी  लब  पे छायी  है ।।

हमको वीरानियां पसंद थी तब तो ।
अब तो रौनक ही मन को भायी है ।।

मिलेंगे फिर ये बिछड़ना  कैसा ।
 चन्द  लम्हों  की  ये जुदाई  है ।।

दिल हुआ कैद उनकी चाहत में ।
चाहता  अब   नहीं  रिहाई   है ।।

बहारें  मौज  ले  रही   मन  में ।
ग़मों  को  दे  चुके  विदाई  है ।।

अब तो हर रोज़ लब पे है 'मुस्कान' ।
 मन  में  छवि  तेरी  जो  बसाई  है ।।

सुशीला धस्माना 'मुस्कान'

ग़ज़ल 6
बह्र - 122  1222    1222
काफ़िया - ते है

दिलों के तार कुछ तो अब कहते हैं ।
शायद अब याद वो हमको करते हैं ।।

हमीं को समझा के चलो किसी काबिल ।
शुक्रिया  तेरा   अब  हम  तो  चलते  हैं ।।

बेशुमार  हमने  की  मुहब्बत सो ।
जिगर का दर्द अब हम सहते  हैं ।।

 बेवफाई  तो   उस   ने  की  थी ।
 के अब जख्म दिल पे मिलते हैं ।।

एक  वो  हैं  कि  ग़म  में  डूबे  हैं ।
ग़म के बदले हम 'मुस्कान' देते हैं ।।

सुशीला धस्माना 'मुस्कान'

ग़ज़ल 7
वज्न - 212  212 212 212 22
काफ़िया - अर स्वर
रदीफ - नहीं देखा।

 आज़ादी के  बलिदानों का मंजर नहीं देखा ।
 गद्दारों का बढ़ता हुआ  खंजर नहीं देखा ।।

सांस  ले रहे हो इस  आज़ादी में तुम तो ।
परतन्त्रता के कष्टों को छूकर नहीं देखा ।।

अंदाजा क्या लगाए  किसी के भी दर्द का ।
आंसुओं  से  तर  तूने  बिस्तर  नहीं  देखा ।।

लूट  रहे  बैठे  - बैठे  देश  को  क्यों  तुम ।
दुनिया में कहीं तुम सा सितमंगर नहीं देखा ।।

जिस देश में हो  उसको ही बरबाद कर दिया ।
सीने में दिल के बदले ये पत्थर नहीं देखा ।।

जो पालता है बेटी दान देने को 'मुस्कान' ।
उस  बाप  ने  सुकूं  इक मंज़र नहीं देखा ।।

सुशीला धस्माना 'मुस्कान'

ग़ज़ल 8
बह्र - 212   212  1222
काफ़िया - आन स्वर
रदीफ़ - हो गये देखो


लोग हैवान हो गये देखो  ।
कूचे हैरान हो गये  देखो ।।

मस्त कलियों जहां गूंजी हंसी ।
बाग  शमशान  हो  गये  देखो ।।

छोटे बच्चों  में ईश  के दर्शन ।
रूठे भगवान्  हो  गये  देखो ।।

झोपड़ी भी नही थी  जिन पर ।
आज  धनवान  हो गये  देखो ।।

आज अहसास मर गया उनका ।
कैसे   इंसान    हो  गये   देखो ।।

जिनको  आता न जाता कुछ भी था ।
अब वो सुल्तान   हो  गये  देखो ।।

बिकते हैं कैसे आदमी भी अब ।
वो  भी  सामान  हो  गये  देखो ।।

जिनको   कल तक  समझ नहीं पाये ।
लब की 'मुस्कान' हो  गये  देखो ।।

सुशीला धस्माना 'मुस्कान'

शनिवार, 9 जून 2018

1:45 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में डॉ सर्वेशानन्द "सर्वेश" की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल 1
वज़्न--2122 1212 22
काफ़िया - आर
रदीफ़ - कर लें क्या

दूरियाँ  दूर  यार  कर  लें  क्या ?
नफ़रतें छोड़ प्यार कर लें क्या ?

फ़ासले तो मिटे मिटाने से ।
सरहदें आज पार कर लें क्या ?

जो यहाँ साथ मिला है हमको ।
पतझड़ों में बहार कर लें क्या ?

लौ हवायें बुझा नहीं सकती ।
आँधियों से करार कर लें क्या ?

वो इधर लौट के चला आये ।
तो यहीं इन्तजार कर लें क्या ?

डॉ सर्वेशानन्द 'सर्वेश'

ग़ज़ल 2
वज़्न--212 1212 1212 1212
काफ़िया - इयाँ
रदीफ़ - कभी कभी

ढूँढता रहा मिलीं  निशानियाँ  कभी कभी ।
दूरियाँ लिखा गयीं, कहानियाँ कभी कभी ।।

बेवशी कभी  तबाहियाँ  बयाँ न कर  सकी ।
सिसकियाँ कहें दबी तल्खियाँ  कभी कभी ।।

गम मिला  बहार  भी,  हज़ार  रंग दे  गयीं ।
झुर्रियाँ लिये दिखीं जवानियाँ कभी कभी ।।

आज तक लिखा कभी गर अपना दौर आदमी ।
खूबियाँ लिखी बड़ी कि खामियाँ कभी कभी ।।

देख दर  किसी  मिले,  दुखी  बयार आँधियाँ ।
बाँट जा  वहीं  ढली  उदासियाँ कभी कभी ।।

डॉ सर्वेशानन्द "सर्वेश"

गज़ल 3
वज़्न- २१२२  २१२२  २१२२  २१२२
काफ़िया - आनी
रदीफ़ - बात ऐसी

कह नहीं पाता किसी से खुद ज़ुबानी बात ऐसी ।
हर किसी के दिल बनाये है निशानी बात ऐसी ।।

थी हमारी हार में या जीत में ग़ुमनाम बनकर ।
जिंदगी  को  दे  रही है जो रवानी बात ऐसी ।।

हर  घड़ी  परछाइयों  सी  डोर  बाँधे घूमती है ।
हमसफ़र  बन साथ रहती है पुरानी  बात ऐसी ।।

जब कई रिश्ते बचाने को कभी दिल चाहता है ।
बेजुबाँ  सबको  बनाती  खानदानी  बात ऐसी ।।

है नवाजिश बस उसी की राज भी 'सर्वेश' जाने ।
पास गुमशुम लिख रही है एक कहानी बात ऐसी ।।

डॉ सर्वेशानन्द "सर्वेश"

ग़ज़ल 4
वज़्न--२१२२  २१२२  २१२२  २१२
काफ़िया - आयें
रदीफ़  - जिन्दगी के खेल में

रंजिशें - गम  भूल जायें जिन्दगी  के  खेल में ।
खुद हसें सबको हसायें जिन्दगी  के  खेल में ।।

हर मनुज का है तरीका मान भी अभिमान भी ।
ना किसी को आजमायें जिन्दगी के खेल में ।।

दिल्लगी  में रूठ जाये कोई हमसे बेवज़ह ।
वक्त पर उनको मनायें जिन्दगी के खेल में ।।

खेल जब तक चल रहा है, कौन छोटा या बड़ा ।
कौन पत्ता काम आयेंं  जिन्दगी  के  खेल में ।।

मोहरों की चाल पल में बदल सकती जीत को ।
कब  न  बाज़ी  हार  जायें जिन्दगी के खेल में ।।

कह सके परपीर की गज़लें सिसकती बहर भी ।
गीत  ऐसा  गुनगुनायें  जिन्दगी  के  खेल  में ।।

हर खिलाड़ी पर नज़र, रखता वही "सर्वेश" है ।
फैसला  वो  कब  सुनायेंं  जिन्दगी के खेल में ।।

डॉ सर्वेशानन्द "सर्वेश"

ग़ज़ल 5
वज़्न-  २१२  २१२  २१२
काफ़िया - आने
रदीफ़  - लगी

जब  कली मुस्कुराने लगी ।
तितलियाँ लौट आने लगीं ।।

फिर बनाने लगीं आशियाँ ।
गीत एक गुनगुनाने लगीं ।।

तीर  कब से चलाती रहीं ।
आज जाके निशाने लगी ।।

मौन ढोती हुयी सिसकियाँ ।
आसुओं  से  नहाने  लगीं ।।

सांच पूछा कि 'सर्वेश' ने  ।
बात  झूठी  बनाने  लगीं ।।

डॉ सर्वेशानन्द "सर्वेश"

ग़ज़ल 6
वज़्न--२१२२  २१२२
काफ़िया - अर
रदीफ़  -  में

याद  तेरी  रख ज़िगर में ।
लौट आया फिर शहर में ।।

था  मुझे   मालूम  करना ।
वो कहानी किस असर में ।।

है  यहाँ बदला हुआ सब ।
अज़नबी हूँ हर नज़र में ।।

तो भला पूछूं ये किससे ।
नाम तेरा किसके घर में ।।

मैं   लगा   बस   ढूंढने  में ।
तूँ कि खोने की फ़िकर में ।।

ढूंढते   रहना  है  मुझको ।
बेबसी  ढाती  लहर    में ।।

फैसला    'सर्वेश'    जाने  ।
कब मिलोगे किस पहर में ।।

डॉ सर्वेशानन्द "सर्वेश "

ग़ज़ल  7
वज़्न--२२१२  २२१२  २२१२  २२१२
काफ़िया - आत
रदीफ़  - तुमसे छीन ले

गम ना करो हालात गर  हालात  तुमसे छीन ले ।
जिसमें तुम्हारी हो  खुशी वो बात तुमसे छीन ले ।।

लाये  कभी  गर  जिंदगी  आफ़ात  ऐसे मोड़ पर ।
दर मंजिलें उलझी दिखें शुरुआत तुमसे छीन ले ।।

जो  हर  घड़ी  दिन रात तेरा बन सहारा साथ था ।
जब मुश्किलों के दरमियाँ ही साथ तुमसे छीन ले ।।

कोई  घनेरी  रात  ही एहसास  को  साझा  करे ।
तेरे ख़यालों  की  वही  एक  रात  तुमसे  छीन ले ।।

तूँ हौंसला रख फिर चलाचल अटल अपनी राह पर ।
बस कर दुआ "सर्वेश" ना ये जज़्बात तुमसे छीन ले ।।

डॉ सर्वेशानन्द "सर्वेश"

ग़ज़ल 8
वज़्न -1222 1222 1222
काफ़िया - आरों
रदीफ़  - में करें बातें

खड़े  रहकर  हज़ारों  में  करें  बातें ।
चलो  अब  हम  इशारों में करें बातें ।।

रहें  सब  बेखबर  यूँ  पास  रहकर भी ।
नजर  के  ही  नज़ारों  में  करें बातें ।।

न  कोई  ढूँढ पाये  दूर  तक चलना ।
कि  खोये  चाँद  तारों  में  करें बातें ।।

खुशी का सिलसिला कब जिन्दगी लाये ।
गमों  के   इन   बयारों   में   करें  बातें ।।

बचें   या   डूब  जायें  साथ  रहना है ।
भँवर  की  तेज  धारों  में  करें  बातें ।।

डॉ सर्वेशानन्द "सर्वेश"

मंगलवार, 5 जून 2018

1:50 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में सुदिप्ता बेहरा 'दीप्त' की कुछ ग़ज़लें

1) गज़ल
बह्र - 2122 1212 22
काफ़िया - आ स्वर
रदीफ़ - देना

हो सके तो मुझे भुला देना ।
तुम भले नाम बेवफा देना ।।

ज़िक्र मेरा कहीं अगर हो तो ।
बात  बातों  में  ही उड़ा देना ।।

पहले सुनना तू ग़ौर से मुझको ।
सुन के थोड़ा सा मुस्कुरा देना ।।

प्यार सच्चा कहाँ पे मिलता है ।
गर पता हो तो तुम पता  देना ।।

दोस्तों पे हम न बार करते पर ।
है  अगर  दुश्मनी  बता  देना ।।

सब यहां मेहमां, तुम्हारे  दर ।
जिंदगी  चार दिन बिता देना ।।

क्या  पता  दीप्त' देर हो जाये ।
प्यार मुझसे जो हो जता देना ।।

सुदिप्ता बेहेरा "दीप्त"

(2) ग़ज़ल
बह्र - 1222 1222 122
काफ़िया - अत
रदीफ़ - हो गयी है

जवां  दिल से शरारत हो गयी है ।
हमे  तुम  से मुहब्बत हो गयी है ।।

बयां कैसे करूँ मैं उनकी उल्फ़त ।
मेरे  दिल पे   इनायत  हो गयी है ।।

संवर कर आ गए हैं बज़्म में वो ।
सरे महफ़िल क़यामत हो गयी है ।।

सभी  की  उँगली जब उठ रही है ।
कसम से आज नफ़रत हो गयी है ।।

ख़ुशी  भी  दीप्त  से रूठी हुई है ।
न जाने क्यों अदावत हो गयी है ।।

सुदिप्ता बेहरा "दीप्त"

(3) ग़ज़ल
बह्र - 1212 1122 1212 22
काफ़िया - आने
रदीफ़  -  को

दिखा दिया जब से रंग तू जमाने को ।
लगे वही तब से सब तुझे सताने को ।।

धुआँ उठा न जरा सा लगी न आग कहीं ।
चली  हवा सब का आशियां जलाने को ।।


न फूल ये खिलते बाग में महक आती ।
उजाड़ के गुलशन सब लगे चुराने को ।।

तबाह देख, बहत खुश मतलबी दुनिया ।
न  छोड़ते  सब  कोई कसर रुलाने को ।।

यहाँ न दुश्मन था "दीप्त" का कभी कोई ।
न  दोस्त  है  अब  कोई  उसे  हसाने को ।।

 सुदिप्ता बेहेरा "दीप्त"



(4) ग़ज़ल
बह्र - 122 122 122 122
काफ़िया - आ स्वर
रदीफ़  - चाहती  हूँ


भरे  जख्म  ऐसी  दवा चाहती हूँ ।
जरा दोस्तोँ सेदुआ चाहती हूँ ।।

कमी जाम में है न अब होश खोया ।
पिलाओ नज़र का नशा चाहती हूँ ।।

किया इश्क इज़हार दिल आप ही से ।
कहो   आप  का  फैसला  चाहती हूँ ।।

सरे आम रुसवा न हो मेरी खातिर ।
तड़प हो भले फासला चाहती हूँ ।।

कदर दीप्त तेरी न समझे जमाना ।
चलो बेखुदी की सजा चाहती हूँ ।।


सुदिप्ता बेहेरा "दीप्त"



(5) ग़ज़ल
बह्र - 2122 2122 2122 212
काफ़िया - अर्ज
रदीफ़    -  है

आप हम को भूल भी जाओ न कोई हर्ज है ।
आप  को  दिल  मे  रखेंगे ये हमारा फर्ज है ।।

फाड़  दे  बेशक  सभी पन्ने मुहब्बत के मगर ।
आज भी गुस्ताख़ दिल पर नाम तेरा दर्ज है ।।

लाख चाहे तुम छिपा लो जिंदगी का राज सब ।
कर रही  आँखे  बयां ये इश्क  का ही   मर्ज है ।।

लूट के  दिल  तब खज़ाना  दे गये थे प्यार का ।
साथ छूटा आज, हम पर रह गया कुछ कर्ज है ।।


इश्क ने  हम  को सिखाया   गुनगुनाना दर्द में ।
गा  रही  है  दीप्त  जो  वो आपकी  दी तर्ज है ।।

 सुदिप्ता बेहेरा "दीप्त"


(6) गज़ल
 बह्र - 2122 1212 22
 काफ़िया - अर
 रदीफ़ - जाएँ

काश लम्हे  वहीं  ठहर  जाएँ ।
सामने आप जब गुजर जाएँ ।।

मुद्दतों   से   दबे   हुये  अरमाँ ।
बे धड़क आप पे बिखर जाएँ ।।

मोड़ दे रुख़ तभी हवाओँ का ।
वो  परेशां  हमे  न  कर जाएँ ।।

आप  के  साथ  सांस चलती है ।
गर खफ़ा आप हो किधर जाएँ ।।

हर शज़र " दीप्त" की यही चाहत ।
हम  खुशी  से  कहीँ  न  मर जाएँ ।।

सुदिप्ता बेहेरा  "दीप्त"

(7) ग़ज़ल
बह्र-  122   122   122
काफ़िया - आना

मुहब्बत का  है ये फसाना ।
जिसे  जानता  है  जमाना ।।

कोई मिल गयी जब दिवानी ।
 बना  हर  कोई  है  दिवाना ।।

हैं  आँखों   में  सपने  हमारे ।
मुहब्बत का इक घर बसाना ।।

 हसीं   है  अगर  रूठ  जाये ।
 मुहब्बत  से उसको  मनाना ।।

मुहब्बत का  मौका यही है ।
इसे तुम न हरगिज़  गवाना ।।

जफ़ा गर है दिल में तुम्हारे ।
अगर  हो  सके  भूल जाना ।।

मुहब्बत का रिश्ता है   माज़ी ।
इसे  जान    देकर    निभाना ।।

*माजी - अतीत

सुदिप्ता बेहेरा   "दीप्त"



( 8) ग़ज़ल
बह्र - 2122   2122   2122  212
काफ़िया - आनी
रदीफ़  - दे गया

प्यार  वो  हम  से जता के जिंदगानी दे गया ।
वो  रुलाकर के हमे गम की निशानी दे गया ।।

छोड़कर तन्हा सफर में चल दिया मुंह मोड़कर ।
जाते  जाते  घाव  मुझको  वो  रूहानी  दे गया ।।

काश वो पल आज फिर से लौट के आये यहाँ ।
जो  जमाने  को  कभी  ऐसी  कहानी  दे गया ।।

आज रुसवा हो गयी मैं इश्क के जो नाम पे ।
जिंदगी   को   वो हयाते  जावेदानी  दे गया ।।

चाह कर भी कर न पाये हम इबादत इश्क की ।
ये   दीप्त   को   कहीं   यादेँ   पुरानी  दे  गया ।।

सुदिप्ता बेहरा "दीप्त"

रविवार, 3 जून 2018

2:10 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में कौशल कुमार पाण्ड़ेय की कुछ ग़ज़लें


ग़ज़ल 1
बह्र~2222 1222 2222 1222
काफ़िया - ऐ
रदीफ़ -  ही चुरा बैठे

मेरे दिल से मिला के दिल वो ऐसें ही चुरा बैठे ।
मिलाते  आँख थे पहले वो आँखेंं ही चुरा बैठे ।।

सदा सुनकर चरागों को बुझा देते थे जो झट से ।
वही  काली  सी  रातों  का  अँधेरेंं ही चुरा बैठे ।।

खिली चंदा की पूनम देख जो कविता सुनाते थे,
मेरी दिल से सभी अपनी वो यादें ही चुरा बैठे।।

हया से नज्र नीची कर जो अक्सर साथ चलते थे,
वही  बेशर्मियत  से  "आस"  नजरें  ही  चुरा  बैठे।।

वफाओं का सिला जिसने जफाओं से दिया हरदम ।
करुँ क्या "आस" अब उससे जो शाखें ही चुरा बैठे।।

कौशल कुमार पाण्डेय "आस"

ग़ज़ल 2
बह्र - 1222  1222
काफ़िया - आती
रदीफ़ - है

तुम्हारी  याद  आती  है ।
सहर भर तड़फड़ाती है ।।

गमों का रास्ता रोके ।
मुझे नगमें सुनाती है।।

हमारा हाथ मत पकड़ो ।
खुशी  बेताब  आती  है ।।

बसा  तू  आशियां अपना ।
इश्क क्यों कर जताती है ।।

हैं   बदले   रास्ते   हमने ।
आस अब क्यों जगाती है।।

कौशल कुमार पाण्डेय "आस"

ग़ज़ल 3

वज़्न - 2122   2122    2122
काफिया - ओ
रदीफ़  -  लगा है

आपका आना सजा सबको लगा है।
प्यार दीवाना यहां सबको लगा है।।

ख्वाब में भी मुस्करा कर कशमसाना,
रूप मेरा ही सजा मुझको लगा है।।

लोग दीवानी तुझे कहने लगे हैं,
नाम मेरा जप रहीं मुझको लगा है।।

जब झुका नजरे निकलती सामने से,
है मुहब्बत में दगा मुझको लगा है।।

"आस" कैसे छोड़ दूं तेरी भला मैं,
मैं तुम्हारा हूँ सनम सबको लगा है।।

कौशल कुमार पाण्डेय "आस"

ग़ज़ल 4
बह्र - 1222 1222 12
काफ़िया - आ
रदीफ़ - नहीं

वफाओं का सिला पाया नहीं।
गमों का गीत फिर गाया नहीं।।

कभी आओ हमारे पास बैठो,
फिर न कहना कि समझाया नहीं।।

जमाने से गिला क्यों कर रहे हो,
अभी तक नाम बतलाया नहीं।

चलो दो चार बातें और कर ले,
मेरा संग तो तुम्हें भाया नहीं।।

लिखा एक गीत तुम पर भी था मैंने,
मगर तुमने कभी गाया नहीं।।

भला किसको सुनाऊँ दर्दे-दिल अब,
आस" अपना कोई साया नहीं।।

कौशल कुमार पाण्डेय"आस बीसलपुरी"

ग़ज़ल 5
बह्र - 2121 2122 212
काफ़िया - आते
रदीफ - नहीं

प्यार के चर्चे किये जाते नहीं।
गीत मेरे तुम अगर गाते नहीं।।

हौसला तुमने बढ़ाया प्यार का,
पास भी तुम ही मेरे आते नहीं।।

रंज दिल में पाल बैठा हूँ बड़ा,
लोग अब तो खास बन पाते नहीं।।

ढूंढने निकला मैं अपने यार को,
वो मुझे पहचान भी पाते नहीं।।

रोज गीतों को रचा करता हूँ मैं,
"आस" में अब गीत तुम गाते नहीं।।

 कौशल कुमार पाण्डेय "आस"

ग़ज़ल 6
बह्र - 2122  122   122  12
काफ़िया - आती
रदीफ़  -  रही रात भर

याद उनकी सताती रही रात भर ।
चाँदनी मुँह चिढ़ाती रही रात भर।।

प्यार में कितनी शामें गुजारीं मगर ।
रात  सपने  दिखाती रही रात भर ।।

तितलियां उड़ती देखीं बहुत फूल पर,
बनके गुल वो लुभाती रही रात भर।।

साजिशें उनकी कितनी खतरनाक थी ।
साँस  उसकी  बताती  रही  रात भर ।।

जिंदगी उसके ही हाथ में सौंप दी,
"आस"को आजमाती रही रात भर।।

कौशल कुमार पाण्डेय "आस"

ग़ज़ल 7
बह्र - 212  222  222  12
काफ़िया - आनी
रदीफ़ -  हो गयी

जिंदगी तुम बिन दीवानी हो गयी ।
आँख  मेरी  पानी  पानी हो  गयी ।।

याद में कटता नहीं जीवन मेरा,
व्यर्थ विरहा की कहानी हो गयी।।

शाम तक मैं राह को तकता रहा,
साँझ ढ़लते निगहेबानी हो गयी।।

आज तक समझा न तेरी बेरुखी,
किस तरह ये मेहरबानी  हो गयी।।

मैं समझता था जिसे अपना सनम,
"आस" गैरों की जवानी हो गयी।।

कौशल कुमार पाण्डेय "आस"

ग़ज़ल 8
बह्र - 22   22    22    22
काफिया-  आन
रदीफ -    नहीं हैं

सच्चे सब इंसान नहीं  हैं ।
मानव है भगवान नहीं हैं ।।

गीत  सुना  देना न काफी ।
झूठ कहा अरमान नहीं हैं ।।

दिल की बातें छुपा रहे हो ।
हम  बच्चे  नादान नहीं हैं ।।

सच्ची बातें कह दो दिलवर ।
हम  कोई  मेहमान  नहीं हैं ।।

"आस"  लगायी  है तुमसे ही ।
मत कहना एक जान नहीं हैं ।।

कौशल कुमार पाण्डेय "आस"



2:01 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में शीतल प्रसाद की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल 1
बहर- 212 212 212 212
काफ़िया- आ
रदीफ़- चाहिए

अब दुआ चाहिए ना दवा चाहिए ।
आशिकी की हमे तो हवा चाहिए।।

जिंदगी का सफर तन्हा कटता नही ।
उम्र भर के लिये हमनवा चाहिए ।।

देश को बेचकर चोर खा जाएंगे ।
देशद्रोही   मरे   बद्दुआ  चाहिए ।।

बुझ सकी है न प्यास समुद्र से कभी ।
प्यास सबकी बुझे एक कुंआ चाहिए ।।

आसमा को झुकाना बड़ी बात नही ।
हौसला तो है माँ की दुआ चाहिए ।।

आ नही पाएगा ये बुढ़ापा कभी ।
दिल हमेशा हि रखना जवा चाहिए ।।

शीतल प्रसाद

ग़ज़ल 2
बह्र - 1222  1222  122
काफिया - ऐरा
रदीफ - हो गया है

गगन  भी  अब घनेरा हो गया है ।
बहुत  गहरा  अंधेरा  हो  गया है ।।

दिखा न कई दिनों से सूरज यहाँ ।
उजालों   पर  पहरा  हो गया है ।।

जिंदगी  वतन  के नाम करदी है ।
कफ़न ही अब सेहरा हो गया है ।।

हमारी आदत न बदली अभी तक ।
भले   दूजा  बसेरा  हो  गया  है ।।

जहाँ सजती रही पहले महफ़िलें ।
वहाँ  भूतों  का  डेरा  हो गया है ।।

चमक लेता है जुगनू हुनर  उसका ।
इंसा कोशिश में दुहरा हो गया है ।।
 
शीतल प्रसाद

ग़ज़ल 3
बह्र - 1222 1222 1222
काफ़िया - ऐ
रदीफ - को

नही  है साथ में  कोई  भी चलने को ।
रखूंगा आस तुमसे मैं ही मिलने को ।।

सुना है तू शमा है रोज जलती है ।
मचलता हूँ तू आकर देख जलने को।

तुम्हारे प्यार की चाहत सदा खींचे ।
न रस्ता है न मंजिल है  ठहरने को ।।

बहुत ही आग सूरज अब उगलता है ।
लगी धरती सुबह ओ शाम जलने को ।।

जो पचपन से कभी सपने संजोये थे ।
यंहा वक्त कब मिलता ख्वाब बुनने को ।।

वन्देमातरम  नारा  कौन  कहता है ।
मिले अब रोज मुर्दाबाद सुनने को ।।

फना हो जाऊंगा मैं देश की खातिर ।
तिरंगे का कफ़न देना पहनने को ।।
                                     
शीतल प्रसाद

ग़ज़ल 4
बहर-122 122 122 122
काफ़िया - आना
रदीफ़    -  हुआ है

तुम्हे देखकर अब जमाना हुआ है ।
तुम्ही से मिरा दिल लगाना हुआ है ।।

मुहब्बत में कुछ सूझता ही नही है ।
जहां में सभी  का फ़साना हुआ है ।।

चलो आज फिर दिल नया ढूंढ लाये ।
धड़कते  हुये  अब  पुराना  हुआ  है ।।

पलक आपकी आज बोझिल हुई है ।
सुना  है  कि  आंसू  बहाना  हुआ है ।।

जिसे  ढूंढता  रात  काफ़िर  रहा  था ।
उसी का ही मस्जिद में आना हुआ है ।।

पंछी तू चलाजा जि चाहे जहाँ तक ।
लिखा  पर  यही देख दाना हुआ है ।।

शीतल प्रसाद

ग़ज़ल 5
काफ़िया:- आनी
रदीफ़:- नही है
बहर:- 122 122 122 122

जवां खून में अब रवानी नही है ।
मिटे देश पर वो जवानी नही है ।।

सताया गया हूं जमाने से फिर भी ।
किताबों में  मेरी  कहानी  नही है ।।

बिखेरो न जलवा युं हुस्ने बहारो ।
सुना है  अभी तू सयानी नही  है ।।

मिलेंगे न मोहन  किसी को जहां में ।
मीरा  सी  जगत  मे दिवानी नही है ।।

सजी  है  दुकाने  युं  हर  और  लोगों ।
किसी की भी आंखों में पानी नही है ।।

उजाड़ी  धरा  मौन  साधे  खड़ी है ।
लहरती चुनर उसकी धानी नही है ।।

शीतल प्रसाद

ग़ज़ल 6
बह्र:- 222  221  122
काफ़िया:- आन
रदीफ़:- बहुत हैंं

कहने  को  इंसान बहुत हैं ।
पर दिल के शैतान बहुत हैं।।

पग पग  में हैं धोखे मिलते ।
घर  घर  बेईमान  बहुत हैं।।

पतझड़  जैसा  मेरा जीवन ।
जीने  का  अरमान बहुत हैंं।।

माँ   तुझको   मैं  भूलूं   कैसे ।
मुझ पर तो अहसान बहुत हैं ।।

फुटपाथों  पर  भीड़  लगी  है ।
कहने भर को मकान बहुत हैंं।।

ढोंगी   देखो  सन्त  बने  हैं ।
सजने लगी दुकान बहुत हैंं ।।

मुट्ठी  में  कर लूं  आसमां को ।
इस  दिल में अरमान बहुत हैंं।।

शीतल प्रसाद

ग़ज़ल 7
बह्र - 1222×4
काफ़िया:- आया
रदीफ़:- है

जमाने  ने  सताया  है  कि  अपनों  ने  भुलाया है ।
जरा नादान दिल मेरा समझ अब तक न पाया है ।।

जिन्हें अपना बनाया था लिये हाथों मे खंजर हैं ।
किये  हैं  वार  पीछे  से  हमें  अक्सर रुलाया है ।।

करे जो प्यार से बातें वही दुश्मन हमारे हैं ।
पलट इतिहास को देखो कबीरा ने बताया है ।।

चले आओ शहर मेरे हमारा दिल नही लगता ।
वफ़ा की लाज तुम रखना तुम्हे हमने बुलाया है ।।

हमेशा दूर ही रखना दहकते इन चरागों को ।
बड़े मशहूर हैं किस्से इन्होंने घर जलाया है ।।

बड़े  मगरूर बैठे हैं लुटेरे जो सिंहासन पर ।
कमीने भूल हैं शायद तुम्हें हमने बिठाया है ।।

नही भूला हूं तुझको माँ तुम्हारी याद आती है ।
नसीबे हिस्से का खाना सदा मुझको खिलाया है ।।

शीतल प्रसाद

ग़ज़ल 8
बह्र :- 212  212  212
काफ़िया:- आ
रदीफ़:- दे मुझे

यार   अपना   पता   दे   मुझे ।
यूं  न  अब   तू  सजा  दे मुझे ।।

पीर   है   या   खुदा  वो  ही  है ।
कौन   है   तू   बता   दे   मुझे ।।

कौन जाने कि कब निकले दम ।
मैखाने से ले आ शै पिला दे मुझे ।।

मयकदा   मान   बैठा   तुम्हें ।
आँख  से  मय  पिला दे मुझे।।

जंग    जीती    हमेशा    मैंने ।
कौन   है   जो   हरा  दे  मुझे ।।

चाहता   हूं    उसे    भूलना ।
आज   ऐसी   दवा   दे  मुझे ।।

बेवफाई   न   करना   कभी ।
राज  दिल  के  बता  दे मुझे ।।

प्यार  में  बहुत  धोखे  मिले ।
तू  कही  ना  भूला  दे  मुझे ।।

शीतल प्रसाद

शुक्रवार, 25 मई 2018

2:12 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में विवेक राज मिश्र की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल  1
बह्र-  122 122 122 122
काफ़िया - इल
रदीफ़ -  रही है

हमारी तुम्हारी नज़र मिल रही है ।
तभी ज़िन्दगी फूल सी खिल रही है ।।

भरोसा करो इन जवां धड़कनों पर  ।
नज़र ही नहीं सिर्फ क़ातिल रही है ।।

फटा दिल रफूगर नहीं जोड़ पाता ।
इसे चाहतों की सुई सिल रही है।

फँसा देख खुद को बड़े कटघरे में ।
जुबां शेर की भी नहीं हिल रही है ।।

चले तो गए 'राज़' होकर ख़फ़ा वो ।
उन्हें भी पता रात बोझिल रही है ।।

- विवेक मिश्र 'राज़'

ग़ज़ल 2
बहर -  2122 2122
काफ़िया - अम
रदीफ़ - नही है

आग  मुझमें कम नहीं है ।
हाँ मगर अब गम नहीं है ।।

क़त्ल   मेरा   हो   रहा  है ।
आँख लेकिन नम नहीं है ।।

आज कल की ताकतों में  ।
हौंसले  का  दम  नहीं  है ।।

देख  लो तुम घाव देकर ।
हाथ  में  मरहम नहीं है ।।

'राज़' अब इंसानियत का ।
रह  गया  मौसम नहीं है ।।

विवेक मिश्र 'राज़'

ग़ज़ल 3
बह्र- 2122  2122
काफ़िया - ओ
रदीफ़ - रहे हैं

सब  नकलची  हो  रहे  हैं ।
इसलिए  ही   खो  रहे  हैं ।।

आँख  से देखो ज़रा तुम ।
फूल  भी  अब रो रहे हैं ।।

जागना जिनको यहाँ था ।
चैन  से  वो  सो  रहे  हैं ।।

जो फसल उगती नहीं है ।
क्यों  भला हम बो रहे हैं ।।

'राज़' तुम खुद को संभालो ।
गन्दगी   सब  धो   रहे   हैं ।।

- विवेक मिश्र 'राज'

ग़ज़ल 4
बह्र - 122 122 122 122
काफ़िया - ई
रदीफ -  थी

अदालत ही कुछ बेमुरव्वत रही थी ।
सज़ा जिस तरह से सुनाई गयी थी ।।

उसी  से  रहा  है  जमाना  ये  रूठा ।
सही बात खुलकर के जिसने कही थी ।।

किसे  हम  सुनाते  कहाँ  गुनगुनाते ।
ग़ज़ल में हमारी हक़ीकत लिखी थी ।।

हमें   देखकर   तुम  हुए  थे  पशेमाँ ।
नज़र जब हमारी तुम्हारी मिली थी ।।

रखा तुमको महफ़ूज़ खुद से ज़ियादा ।
ज़िगर  में  तुम्हारी ही  सूरत बसी थी ।।

- विवेक मिश्र  'राज़'

ग़ज़ल 5
बह्र - 122 122 122 122
काफ़िया - आ
रदीफ़ - मिलेगा

नहीं  हीर  कोई  न  रांझा मिलेगा ।
तुम्हें आशिकी में तमाशा मिलेगा ।।

नसीहत नहीं  चाहता है भिखारी ।
हंसेगा तभी जब निबाला मिलेगा ।।

घरों से निकलकर हक़ीकत न ढूँढ़ो ।
नहीं तो तुम्हें सब दिखावा मिलेगा ।।

हमेशा बरसती नहीं आग बनकर ।
कभी  धूप  से भी सहारा मिलेगा ।।

कभी देखिए बांटकर 'राज़' खुद को ।
तुम्हें  प्यार  सबसे  ज़ियादा मिलेगा ।।

विवेक मिश्र 'राज़

ग़ज़ल 6
बह्र - 122  122  122  122
काफ़िया - ऐले
रदीफ़ - बहुत हैं

हमारे  सफर  में  झमेले बहुत हैं ।
भरी भीड़ में भी अकेले बहुत हैं ।।

नहीं चैन से हम अभी जी सकेंगे ।
अभी तो गए हम ढकेले बहुत हैं ।।

उसे  क़ामयाबी  नहीं यूं मिली है ।
शुरू में कहीं कष्ट  झेले बहुत हैं ।।

भुला हम सकेंगे न उन दोस्तों को ।
कभी साथ में जिनके खेले बहुत हैं ।।

खुली पोल बाबा की है 'राज़' जबसे ।
परेशान  अब  उनके  चेले  बहुत  हैं ।।

विवेक मिश्र 'राज़'

ग़ज़ल 7
बह्र - 122 122
काफ़िया - ई
रदीफ़ - हैं

हवा  चल  पड़ी  है ।
तभी  खलबली  है ।।

हुनर  जीतता  है ।
हक़ीक़त  यही है ।।

बचोगे  कहाँ  तक ।
नज़र लड़ चुकी है ।।

तुम्हारी  खुशी  में ।
मेरी   ज़िंदगी   है ।।

कहो 'राज़' खुलकर ।
मिली अब खुशी है ।।

- विवेक मिश्र 'राज़'

ग़ज़ल 8
बह्र - 2122   2122
काफ़िया - आ
रदीफ़ - रही है

सांस  थमती जा रही है ।
शक्ल भी मुरझा रही है ।।

मौत से शिकवा नहीं है ।
ज़िन्दगी हड़का रही है ।।

वो मुझे मरहम दिखाकर ।
ज़ख्म  देती  आ रही  है ।।

जीस्त चौराहा हुई ज्यों ।
लक्ष्य से भटका रही है ।।

उंगलियां बेकार निकलीं ।
धूप  घी  पिघला रही है ।।

- विवेक मिश्र 'राज़'
शहांजहांपुर (उ०प्र०)

बुधवार, 23 मई 2018

2:15 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में डॉ0 लियाकत अली की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल 1
बह्र- 1222 1222 1222
काफ़िया - आने
रदीफ़ - को

तुम्हारी ये अदा अच्छी नही हैं दिल लुभाने को ।
मेरा मन आज भी कहता तुम्हे अपना बनाने को ।।

तेरी जुल्फों के' साये में कभी जब नींद आती थी ।
होठों पर होठ रख देना मुझे जल्दी जगाने को ।।

तुम्हारे गीत को सुनकर विहग भी पास आते थे ।
छेड़ो तुम आज भी प्रीतम उसी मीठे तराने को।।

मैं दौड़ा पास आता था मगर तुम रूठ जाती थी ।
चले आओ कभी तुम ही सनम मिलने मिलाने को ।।

लियाकत  है  खड़ा  उस  मोड़  पर  प्यारे ।
जहां तुम छोड़ कर लौटे थे अपने उस फ़साने को।।

डॉ0 लियाकत अली

ग़ज़ल 2
बह्र - 212 212 212 212
काफ़िया - आ
रदीफ़ - हो गयी

देखते-देखते जब  प्रभा हो गयी ।
नींद आई नही ओ जुदा हो गयी ।।

तेरे दर पे मैं आया था जिसके लिए।
ओ न मुझको मिली बेवफा हो गयी।।

लेके हाथो में गजरा निहारा किये।
चांदनी चाँद से फिर जुदा हो गयी।।

छोटी सी भूल हम जो किये थे कभी।
आज मुझको वही तो सजा हो गयी।।

ख्वाब में जिसको देखा जलज ने कभी ।
आँख  मेरी  खुली  तो  कज़ा  हो  गयी।।

डा लियाकत अली 'जलज'

ग़ज़ल 3
वज़न - 2122 122 12
काफ़िया - अन
रदीफ़  -  हो गया

आज कैसा चलन हो गया ।
रीतियों का पतन हो गया ।।

प्रेम लोगो में कम हो गये ।
सारा रिश्ता ग्रहन हो गया।।

 खूँ  के  रिश्ते  कहाँ खो गये ।
 रिश्ते में अब जलन हो गया।।

सहमी-सहमी ज़मी चुप हुई।
तपता सूरज गगन हो गया।।

बेटा  मायूस  था  मेरा  पर  ।
देख खिलौना मगन हो गया।।

फूल चुन कर के लाये थे जो ।
खुशबुओं सा बदन हो गया ।।

प्यार से उसने देखा जलज ।
खूबसूरत  चमन  हो  गया ।।

डा० लियाक़त अली ''जलज''

ग़ज़ल 4
वज्न  - 2212 1221 221 212
काफ़िया  - आन
रदीफ़     -  पर

उड़ता   रहा   परिंदा   सदा  आसमान  पर ।
कौवे को था गुमान फक्त अपनी उडान पर ।।

धरती   पे   हो   निगाहें  भले  आसमान  हों ।
फख्र क्यूँ न हम करें आज अपने जहान पर ।।

जो   प्यार   और  सम्मान  है  तेरे  गांव  में ।
भूला  नही  हूँ   मैं   यार आकर मकान पर ।।

कितना सरस है इस गांव बीसल की ये सरज़मी ।
चर्चा -ए - आम   होने   लगी   हर   जुबान  पर ।।

जलता रहा तपिश में जलज कोई गम नही ।
कुर्बान  मेरी  जां  दोस्त  ऐसे  सम्मान  पर ।।

डॉ० लियाकत अली "जलज"

ग़ज़ल 5
बह्र - 212  122  212 1222
काफिया - ई
रदीफ़ - है

इस नये ज़माने में ,कौन चीज असली है।
तेल,दूध घी आदि अब तो मिलते नकली है ।।

झूठ रूपी खेतों में फसल जो भी उगते है,
यकीन कैसे करले हम शुध्द सभी फ़सली है।।

प्यार को परखने का माप भी नही मिलता,
लूट के बाज़ारो में इश्क़ भी तो मचली है।।

रब बचाये हकीमो से, दर्द बढ़ा देते है,
ज़ख़्म तो पुराने है,दवा कैसी निकली है।।

इनकी क्या लियाकत है,कौन सा तजुर्बा है।
इनकी मुंसिफ़ि देखो,नियत कैसी बदली है।।

डॉ0  लियाकत अली

ग़ज़ल  6
बह्र- 2122    222    2122   222
काफ़िया - आरा
रदीफ़ - हैं

सरपतो  के  झुरमुट में, गांव कितना प्यारा है ।
हर तरफ है हरियाली,तालाबो का किनारा है ।।

मिटटी खेत की लेकर,हर किसान कहता है ।
माथे की ये चन्दन है,नदी तिलक की धारा है ।।

गांव के तालाबों में,नीलकमल खिलते है ।
बेटी घर की लक्षमी है,बेटा राम सा प्यारा है ।।

अमृत की बूंदे भी,गंगा जल में मिलती है ।
स्वच्छ अपना हृदय है,मन में निर्मल धारा है ।।

आज भी बुजुर्गो की,गांव में लियाकत है ।
हम अदब से रहते है,संस्कार ये हमारा है ।।

जब दिल कभी घबराये,गांव में चले आना ।
छांव   बूढ़े  बरगद की,हर दवा से प्यारा है  ।।

डा लियाकत अली

ग़ज़ल  7
बह्र- 2122   2122    2122  22
काफ़िया - अन
रदीफ़ -  देखा क्या

कैसे होती है किसी दिल में चुभन देखा क्या।
आँख रोती है मगर मन की जलन देखा क्या।।

फूट होती है अगर तो लोग विखर जाते है।
इस तरह होते हुए घर का  पतन देखा क्या।।

जो  बयां करती है सच्चाई यहाँ बिकती नही।
ऐसे भी  जांबाज दिलावर का फन देखा क्या।।

एक  हार में गुंथ कर  जो साथ रहते है सदा।
ऐसे रंगीन गुलो का सबने चमन  देखा क्या।।

अब किसी किसान के घर भगत सिंह नही होते।
जहाँ   बन्दूको  के   बोने  का  चलन देखा क्या ।।

 देश   में   बहती   है  देखा प्यार की गंगा बहुत ।
हिन्दू ओ मुस्लिम का  वो गंगो जमन देखा क्या ।।

देश पर अपने जो मर मिट जाये हँसकर के जलज।
ऐसे   वीर  सपूतो  के  तिरंगे का कफ़न देखा क्या।।

डॉ० लियाकत अली 'जलज'

ग़ज़ल  8
बह्र - 212   212   212   212
काफ़िया  - आन
रदीफ़  - हैं काशी की बेटियां

आन, बान ओ शान है, काशी की बेटियां।
लक्ष्मी बाई महान है,काशी की बेटियां।।

लाई है स्वर्ण मेडल कामनवेल्थ  जीतकऱ ।
देश  की  शान हैं   काशी   की   बेटियां ।।

हर साँस में बसती है गन्ध माटी की प्यारे ।
खुसबू   है  फूलदान है काशी की बेटियां ।।

बेटा - बेटी   में   तो   कोई   फर्क  है  नही  ।
होती ये कुल की मान है, काशी की बेटियां।।

काशी की हर गली ही लियाकत है प्यार की।
इस देश की पहचान है, काशी की बेटियां।।

डॉ0 लियाकत अली

गुरुवार, 17 मई 2018

1:00 am

माँ भारती के लाल हो,हिन्द देश की शान हो - विकास भारद्वाज

माँ भारती के लाल हो,हिन्द देश की शान हो
सरकार मौनी साधे, हिंसा से बचाइये ।।

सर्जिकल स्ट्राइक हो,मुंह तोड़ जवाब हो ।
कारगिल ध्यान करो, मजा तो चखाइये ।।

चुकता करो हिसाब,वीरों अगले पिछले ।
हमारे दो के बदले, तोप तो चलाइये ।।

ऐसी करिए दुर्दशा, गिनने ना पाए लाश ।
कायराना चाल खेली, सबक सिखाइये ।।

© विकास भारद्वाज

बुधवार, 16 मई 2018

2:29 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में विश्वेश्वर शास्त्री 'विशेष' की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल क्र० 1           

वज्न      -- 1222   1222  1222
काफिया - ए
 रदीफ  -  को

हमारा ही नशेमन था जलाने को ।
हमारा ही कलेजा था  दुखाने को ।।

हमीं से सीख के शोखी अजी देखो ।
हमारे  सामने  आये   दिखाने  को ।।

दिये  थे  फूल  हाथों  में  हसीं  तेरे ।
उसी  हाथों मिला खंजर चुभाने को ।।

दुआ  में  रोज  माँगी  थी खुशी तेरी ।
मिले ले किन हमीं  तुमको रुलाने को ।।

भुलाया था सभी को ही तिरी लौ में ।
हमी को आज कहते हो भुलाने को ।।

वफा  का  खूब  पाया  है सिला हमने ।
चले हो आज तुम खुद ही मिटाने को ।।

चले हो यूँ  कहाँ देखो  यहाँ मुड के ।
नहीं  यूँ  छोडता  कोई जमाने  को ।।

रहेंगे  हम  कहाँ  बोलो  बिना तेरे ।
जरा दो  बोल  बोले जा दिवाने को ।।

विश्वेश्वर शास्त्री 'विशेष'


ग़ज़ल   2       
वज्न -- १२२  १२२  १२२  १२
काफिया --  आ
रदीफ --    कर गया

गमे जाम ऐसा पिला कर गया ।
हमें मौत  से वो मिला कर गया ।।

रुलाया  उसी  की खुशी ने हमें  ।
नया  दर्द  ऐसा दिला कर गया ।।

किया  याद  हमने  हमेशा  उसे ।
उसे क्या हमें वो भुला कर गया ।।

हँसाया  हमीं   ने   हमेशा  जिसे ।
भला  हो  हमें वो रुला कर गया ।।

जगे  हम  तभी  से खुदा  खैर कर ।
हमें  बाजुओं  में  सुला  कर  गया ।।

उसे  ढूँढते  हैं  उसी की डगर  ।
जहाँ वो हमें कल बुला कर गया ।।

खुदा  जिंदगी  ये  हुई   बेवजह ।
नशेमन  हमारा मिटा कर गया  ।।

विश्वेश्वर शास्त्री 'विशेष'

 गजल  3
वज्न -- 122  122  122  122
काफिया --आर
रदीफ   --  दें

मिले जो  हमें  वो  गमों को भुला दें ।
खिजाँ जिन्दगी को गुलों से सजा दें ।।

जलाओ  हमेशा  शमा  हौसलों की ।
बुझायें  शमा  को  न ऐसी  हवा दें ।।

निभायें  हमेशा  किये  जो भी वादे ।
नहीं  जिंदगी  में किसी को  दगा दें |।

दुखायें नहीं दिल कभी भी किसी का ।
दुखी  जो  भी  आये मुहब्बत लुटा दें ।।

कभी  आँच  आये  वतन पे  हमारे ।
वतन के लिये हम खुदी को मिटा दें ।।

पढेंगे   हमेशा   अमन  के   तराने ।
चमन में अमन है सभी को बता दें ।।

झुकाना किसी को नहीं खंजरों से ।
झुकाना  वही  चाहतों से झुकादें ।।

मिरी आज दिल में तमन्ना यही है  ।
खुशी  सब  रहें ये हमेशा दुआ दें ।।

विश्वेश्वर शास्त्री 'विशेष'           


गजल  क्र 4
बहर- २१२२ २१२२ २१२२
काफिया --- आ
रदीफ -------रहा है
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
ये युवा किस राह चलता जा रहा है।
वे वजा ही आज बहका जा रहा है ।।

ढा रहे है रोज ही जुल्मो सितम को ।
बागवाँ कैसा ये उजडा जा रहा है ।।

हाथ बच्चों के थमा पत्थर रहे हैं ।
कौन कहता मुल्क पढता जा रहा है।।

टाँग खींची भाई ने ही भाई की है ।
भाई से ही भाई लड़ता जा रहा है ।।

दोगलों ने देश को ही खा लिया है ।
देश पर कर्जा ही बढता जा रहा है ।।

कौन कहता है गुलामी है नहीं अब ।
रंग दूजों का ही चढता जा रहा है ।।

आज नारी देश की महफूज क्या है ।
कोंख में खंजर ही गडता जा रहा है ।।

          विश्वेश्वर शास्त्री 'विशेष'

ग़ज़ल क्र 5

बहर- १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

हमारे पास आ जाओ तुझे दिल ने पुकारा है ।
हमें अपना बना जाओ तुझे दिल ने पुकारा है ।।

हमेशा याद आती हैं अदायें झूमतीं तेरीं ।
जरा सा मुस्कुरा जाओ तुझे दिल ने पुकारा है ।।

सजाये ख्वाब थे हमने हसीं महफिल सजाने के ।
मुहब्बत को जगा जाओ तुझे दिल ने पुकारा है ।।

बनो हमराह तुम मेरे हमेशा साथ देने को ।
मेरे दिल में समा जाओ तुझे दिल ने पुकारा है ।।

सुनाये गीत जो तुमने दुनिया से छिपा कर के ।
वहीं फिर से सुना जाओ तुझे दिल ने पुकारा है ।।

भुलाते याद जब तेरी तो खुद को भूल जाते हैं ।   
घटा बन दिल पे छा जाओ तुझे दिल ने पुकारा है ।।

नहीं अब चैन आता है बड़ा बैचेन ए दिल है ।
दवा दर्दे पिला जाओ तुझे दिल ने पुकारा है ।।

जो कसमें हमने खाई थीं हमेशा जान देने की ।
वही वादा निभा जाओ तुझे दिल ने पुकारा है ।।

विश्वेश्वर शास्त्री 'विशेष'

गजल  7
वज्न - १२२२  १२२२  १२२२ १२२२
काफिया - ने
रदीफ    -  को

हमारे  पास आ जाओ हमारा गम भुलाने को ।
बना लो आज तुम अपना कलेजे से लगाने को ।।

जमाना आज का देखो बडा मुश्किल गुजारा है ।
यहाँ हर  शख्श बैठा है मुआ काँटा चुभाने को ।।

भरोसा कौन करता है किसी का भी जमाने में ।
लगे हैं  एक  दूजे  को   यहाँ  इन्शाँ  सताने को ।।

यहाँ  पर रोज  लुटते हैं यहाँ  पर रोज मरते हैं ।
मगर  कोई नहीं  आता  गरीबों के बचाने को ।।

करें जो बेइमानी बस उन्हीं का आज परचम है ।
सुने कोई  नहीं  भाई  शरीफों  के फसाने को ।।

बचाई जान थी जिसकी कि बाजी जान की देकर ।
वही   खोले   पिटारा   है  हमेशा   ही डसाने को ।।

रखे  जो  पास  हैं  ईमाँ  बने  मजबूर  बैठे हैं ।
यहाँ मक्कार जो जितना चलाता है जमाने को ।।

बताऊँ आप को कैसे बड़ा मजबूर 'विश्वेश्वर',
खड़े हैं घेर कर दुश्मन मुझे खंजर चुभाने को ||

-विश्वेश्वर शास्त्री 'विशेष'


गजल 8
बहर- २१२२ , २१२२, २१२२, २१२.
काफिया ----- आ
रदीफ -------- छोड दो

मुस्कुरा कर सामने से पास अाना छोड़ दो ।
देख कर हम को जरा नजरें मिलाना छोड़ दो ।।

देख कर हम पर गुजरती ए सनम हम क्या कहें ।
इश्क के मारे बहुत हम को सताना छोड़ दो ।।

खौफ लगता है सुनो तुम को जमाने से कहीं ।
तो ज़माने में रहो या फिर ज़माना छोड़ दो ।।

आज तक बोले नहीं बस ये चुभन दिल में रही ।
मौन रह कर भी हमें तुम अब रुलाना छोड़ दो ।।

कौन कहता है कि हम आशिक नहीं तेरे सनम ।
आइने   के  सामने  तुम   ए  बताना  छोड़  दो ।।

प्यार  में शम्मा   विचारी  देख तो पल पल जली ।
या तो तुम शम्मा बनो या फिर जलाना छोड़ दो ।।

जान तुम पर है फिदा जाने जिगर मैं क्या कहूँ ।
जान  न   दे  दूँ कहीं तुम आजमाना छोड़ दो ।।

चाँदनी में चाँद बन कर तुम नहीं आया करो ।
चाँद शरमाता बहुत है छत पे आना छोड़ दो ।।

  - विश्वेश्वर शास्त्री 'विशेष'

     राठ हमीरपुर (उ.प्र.)
2:25 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में नीतेन्द्र सिंह परमार "भारत" की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल  1
वज्न     - 212 212 212 212
क़ाफ़िया - आ
रद़ीफ  - चाहिए।

शब्द बोलो मगर तौलना चाहिए ।
तौल करके सदा बोलना चाहिए ।।

होश आता नहीं शाम होते  यहाँ ।
जाम पीकर नहीं झूमना चाहिए ।।

नैन उनके मुझे देखते हैं अभी ।
आस करके जिया खोलना चाहिए ।।

पाक मिट्टी मिली आज हमको यहाँ ।
हाथ  लेकर  इसे  चूमना   चाहिए ।।

दोस्ती के सफ़र में मिली जो दुआ ।
साथ उसको लिये पूजना चाहिए ।।

रोज जिनके यहां खेलते थे कभी।
पास जाकर वहां घूमना चाहिए।।

दर्द  होगा  उसे  दूर  जाये  कही ।
राज की बात हैं सोचना चाहिए ।।

भौह तिरछी किये पास थी वो खङी ।
नैन  भी  तो  नही  मोङना  चाहिए ।।

प्रीत करता रहा रात दिन में उसे ।
इस तरह से नही छोड़ना चाहिए ।।

वो किताबी मजे याद आते हमें ।
लेख लिखकर सदा जाँचना चाहिए ।।

राह कांटो भरी जो मिलेगी कभी।
अश्क आँखो लगे पोछना चाहिए ।।

नीतेन्द्र सिंह परमार " भारत "


गजल  2
वज्न  - 122 122 122 122
काफिया - आ
रदीफ - नही है

हमारे  हृदय  का  किनारा  नही  है ।
किसी की नज़र का इशारा नही है ।।

दिखी जो जहाँ में पड़ा आज पीछे ।
जमाना  दिखाये  नजारा  नही  है ।।

करूं बात सारी नदी की लहर सें ।
बहाये  सभी  को  गवारा  नही है ।।

भले  रूठ  जाये  हमारी  मुहब्बत ।
जमीं पर मिले वो सितारा नही है ।।

चले चाल सीधी मिले अजनबी भी ।
खुमारी  चढ़ी  पर  पुकारा  नही  है ।।

कहो  आज मनसे जहां में जहाँ पर ।
किया  काम  ऐसा  सुधारा  नही  हैं ।।

नीतेन्द्र सिंह परमार " भारत "

ग़ज़ल 3
बह्र      - 122 122 122 122
काफ़िया  -  अन
रद़ीफ      -  की

सुनाओ उसी को सुने बात मन की ।
दिखाओ जहाँ में रहे आस धन की ।।

खिलौना बना हैं मुसाफिर यहां का।
न ठहरो वहां पर हिफाजत न तन की।।

हरी डाल तोङे उसी को सजा दो ।
मिले नेक छाया जहाँ छाँव वन की ।।

निकालो न पाती लिखी थी जुवां से।
सिखाओ पढ़ा कर गुने सोच जन की।।

किनारे किनारे चला आज उससे ।
कहू आज भारत तमन्ना गगन की ।।

तपन  में  जलेगें मुहब्बत  करेगें  ।
करूं आज बाते सुहाने चमन की ।।

उठूँगा   गिरूँगा   चलूँगा  जहाँ   में ।
करूंगा हिफाजत यहां पर वतन की।।

लडाई   करो   दूर   मेरा   शहर  हैं ।
दुआ अब करो आज न्यारे अमन की ।।

- नीतेन्द्र सिंह परमार " भारत "

ग़ज़ल 4
बह्र- 1222 1222 1222 1222
रद़ीफ     -  को
काफ़िया -  ये

कही कोई नही होता सफर में साथ चलने को ।
मिले दुश्मन यहाँ हैं सब नहीं कोई पिघलने को ।।

उसी ने जान दी अपनी मगर सोचा नही हैं कुछ ।
हथेली पर रखा हैं दिल चला मैंखाने पलने को ।।

भरोसा कर लिया मैंने उसे अपना समझ कर ही ।
यहाँ  सीधे  चलाये  तीर  मेरी  जान  खलने  को ।।

करूं सेवा उसी की रात दिन राही मिले जो हैं ।
लगी जो चोट सीने में वही पर तेज मलने को ।।

सिफारिश हो गई हैं तो जमाना प्यार करता है ।
करूं फरियाद में रब से जरा सा और फलने को।।

सिखाया पाठ जो हमको वही में आज बतलाता।
सड़क की मोड़ पर बैठे सभी अब आज पलने को।।

- नीतेन्द्र सिंह परमार " भारत "

गज़ल 5
वज्न  - 1222 1222 122
रदीफ - हरदम।
काफ़िया - आ।

जमाने ने दिखाये रंग हरदम ।
रहा में भी उसी के संग हरदम।।

बताई थी बहुत बाते सफर में ।
मगर में था परेशां तंग हरदम ।।

नयी तकनीक खोजी है जहां में ।
बहुत  ढूँढ़े  हुआ वो दंग हरदम ।।

डराते   हैं  मुझे  अंगार  से  वो  ।
लडे हैं हम सदा ही जंग हरदम ।।

नमक डाले कभी वो रोज यारो ।
जले  थे  जो हमारे अंग हरदम ।।

- नीतेन्द्र सिंह परमार "भारत"

ग़ज़ल 6
वज्न - 122 122 122 122
क़ाफ़िया - आ
रद़ीफ - हुआ हैं

दिले  इश्क को  तो कमाया हुआ है ।
ये दिल रात दिन भर जलाया हुआ है ।।

मुझे   क्या   पता  था हुई  पीर  भारी ।
नरम हाथ से खिल खिलाया हुआ है ।।

जमाना  सुने  आज  मेरी  कहानी ।
दिवाना वही फिर सुलाया हुआ है ।।

मुझे   आज   तो   वो  बुराई  सताये ।
उसी दिल लगी को भुलाया हुआ है ।।

उसी  से  कहूँ राज दिल खोलके मैं ।
बिना  पैर  के  भी  चलाया हुआ  है ।।

हमारा  कहा  आप  गर  मान  लेते ।
यहा आँख से गम पिलाया हुआ है ।।

खड़ी दूर मुझसे जरा पास आओ ।
हमे  रात  मे  भी बुलाया हुआ है ।।

- नीतेन्द्र सिंह परमार "भारत"

 ग़ज़ल 7
बह्र - 1222 1222 122
रद़ीफ - आया
काफ़िया - आम।

यहाँ पर आज कैसा नाम आया ।
कही कोई नही अब काम आया ।।

सभी  बैठे  यहाँ पर मुँह फुलाये ।
नही जब हाथ में तो दाम आया ।।

नशे  से  हो  गये मशहूर जो भी ।
पिये वो भी यहाँ पर जाम आया।।

कही  जोगी  कही  भोगी मिले हैं ।
बहुत भटके यहाँ पर धाम आया ।।

हुकूमत छोड़ दी हमने जहां की।
वही सब मोड़ करके थाम आया।।

नीतेन्द्र सिंह परमार " भारत "

ग़ज़ल 8
बह्र       :- 1222 1222 1222
काफ़िया:- ए
रद़ीफ:-    को

मिले हमको यहाँ सब साथ चलने को ।
यही  बाते  सुनी  हैं  रोज  खलने को ।।

हमारा तो मुकद्दर बोलता है जो ।
किसी के रास्ते में नेक मिलने को ।।

सुमन मन से मिले वो बाग बन कर भी ।
गुलाबी   रंग   की  बौछार  फलने  को ।।

कभी उससे किया वादा निभाया है ।
नई सी पंख की डाली न खिलने को ।।

गनीमत हैं जहाँ वालो अभी तो ये ।
कहो मत हाथ में भी हाथ मलने को ।।

यहाँ रोका नही तुमको शराफत हैं ।
चले आओ समय के साथ ढलने को ।।

-नीतेन्द्र सिंह परमार "भारत"
   छतरपुर  ( मध्यप्रदेश )

शनिवार, 12 मई 2018

2:51 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में दिलीप कुमार पाठक "सरस" की कुछ ग़ज़लें

गज़ल क्र० 1
बह्र - 1222 1222 122
क़ाफ़िया~ आना
रदीफ़~ आ गया है

कहाँ किसको निभाना आ गया है ।
बड़ा ज़ालिम जमाना आ गया है ।।

अँधेरे   में   चलाया   तीर  ऐसे ।
निशाने पर निशाना आ गया है ।।

हुईं  आँखें  नशीली  लब  गुलाबी ।
कि साकी को पिलाना आ गया है ।।

जवानी जब चटकती है महकती ।
कली  को मुस्कराना आ गया है ।।

लिफाफे पर चमक होना जरूरी ।
नये  में  फिर  पुराना आ गया है ।।

चलेगा दौर कब तक ये पता क्या ।
"सरस" सिक्का जमाना आ गया ।।

©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

गज़ल क्र 2
बह्र - 1222 1222 1222
क़ाफ़िया- आने
रदीफ़ - का मिले मौका

कली को मुस्कराने का मिले मौका ।
भ्रमर को गुनगुनाने का मिले मौका ।।

सजी  अभिसारिका मिलने चली आयी ।
कभी  तो  आजमाने  का  मिले  मौका ।।

तपेगा ताप कब तक मैं रहूँ प्यासा ।
भरी बारिश नहाने का मिले मौका ।।

जवाँ - सी  चाँदनी  रूठी  हुई  बैठी ।
हँसाने  का  मनाने  का  मिले मौका ।।

समय  काटे  नहीं  कटता  अकेला  हूँ ।
तुम्हें  भी  तो  बुलाने  का मिले मौका ।।

तुम्हारे एक आने से ये हसीं महफिल ।
"सरस" अपना बनाने का मिले मौका ।।

© दिलीप कुमार पाठक "सरस"

गज़ल  3
बह्र - 122 122 122 122
काफ़िया - आरा
रदीफ - नहीं है

यहाँ  आज कोई हमारा नहीं है ।
जमाना  बुरा है  सहारा नहीं है ।।

हवा में  उड़ेंगे  अभी और ऊपर ।
खुदा का कोई तो इशारा नहीं है ।।

अभी और फाँके गरीबी के कितने ।
बड़ी  मुफलिसी  है गुजारा नहीं है ।।

नदी-सी सदी है चली जा रही है ।
कहाँ जा रही है  विचारा नहीं है ।।

उछाला गया है सरस दोष किसका ।
हमारा  नहीं   है   तुम्हारा  नहीं  है ।।

©दिलीप कुमार पाठक "सरस"

गज़ल 4
बह्र - 1222 1222 1222
काफ़िया - इयों
रदीफ - पर है

सियासत गोटियों की बोंटियों पर है ।
कहीं रोटी कहीं तो बेटियों पर है ।।

सुनायी दे रही वो चीख कैसी है ।
खबर कैसे नहीं जो सुर्खियों पर है ।।

गरीबों का निवाला छीन लेता जो ।
दलालों की दलाली मंत्रियों पर है ।।

भरोसा एकता का तोड़ मत देना ।
बड़ी आफ़त हमारे साथियों पर है ।।

शराफ़त का ढिढोरा पीटने वाले ।
बुरा हर काम काला मर्जियों पर है ।।

अकेले का नहीं है दोष सिस्टम में ।
मशाले में नमक भी मिर्चियों पर है ।।

अड़ाना  टाँग  छोड़ो  है  बड़ा  मुर्गा ।
सरस  दावत  अभी तो मुर्गियों पर है ।।

© दिलीप कुमार पाठक "सरस"

ग़ज़ल  5
बह्र- 1222 1222 1222
काफ़िया - अन
रदीफ़ - कैसी

हवाओं  ने  कहा  है ये घुटन कैसी ।
कटे उस पेंड़ से पूछो चुभन कैसी ।।

ख़ता थी उन ख़तो की जो लिखे तुमने ।
जवाबी  ख़त  जलाने  में  जलन कैसी ।।

समझ इतनी कि खुद को नासमझ कहती ।
मिलन  की  आग  में  जलती अगन कैसी ।।

नहाना झील में उसका क़यामत था ।
नज़र में हुस्न की मदिरा मगन कैसी ।।

कमल की उस कली में जब भरे खुशबू |
महकती  फिर  जवानी  आदतन  कैसी ।।

सरस  की  प्यास  कोई  आ  बढ़ा  जाए ।
चली  है   आज  देखो  तो  पवन  कैसी ।।

© दिलीप कुमार पाठक "सरस"

ग़ज़ल 6
बह्र - 212 212 212 212
काफ़िया - आ
रदीफ - चाहिए

मुस्कराती  हुई   ये  फ़िजा  चाहिए ।
ज़िन्दगी को जरा सी वफ़ा चाहिए ।।

इक  नज़र  का तलबगार  बीमार  है ।
कुछ दवा चाहिए कुछ दुआ चाहिए ।।

नींद आती नहीं रात भर आजकल ।
हुस्न को इश्क़ की बस हवा चाहिए ।।

प्यास बन चूम ले झूम के लफ्ज़ को ।
गुनगुनाने  को  कुछ तो नया चाहिए ।।

मैं  लिखूँगा  तुम्हारे  लबों  पर  गज़ल ।
बस "सरस" प्यार का हौसला चाहिए ।।

 दिलीप कुमार पाठक "सरस"

ग़ज़ल 7
वज़्न - 122 122 122 122
काफ़िया- आना
रदीफ़-  हुआ है

किसी की नज़र का निशाना हुआ है ।
कहीं हुस्न पर दिल दिवाना हुआ है ।।

गज़ब ढा रहा मुस्कराना तुम्हारा ।
बड़ा आज मौसम सुहाना हुआ है ।।

लगाके गले से कहा कान में कुछ ।
गज़ल का मुकम्मल तराना हुआ है ।।

लिपट  यूँ  गयी है लबों की गुलाबी ।
भरा जाम़ खुद को पिलाना हुआ है ।।

बहारें   पुकारें  हसीं  हैं  नज़ारे  ।
इशारे  इशारे  बुलाना  हुआ है ।।

कसम इश्क़ की मैं बना प्रेम जोगी ।
हमारा  तुम्हारा फसाना हुआ है ।।

कभी गुनगुनाना गज़ल है तुम्हारी ।
सरस  है  तुम्हारा बताना हुआ है ।।

दिलीप कुमार पाठक "सरस"

ग़ज़ल 8
व़ज्न~122 122 122 122
क़ाफिया~ए (स्वर)
रदीफ़~से लगा ले

लगा ले लगा ले गले से लगा ले ।
शराबी बना मयक़दे से लगा ले ।।

अकेला  खड़ा हूँ  नहीं साथ कोई ।
जरा पास आ काफ़िले से लगा ले ।।

कहीं काम का हो न जाऊँ कभी मैं ।
अभी तो मुझे हाँसिये से लगा ले ।।

गिरूँगा उठूँगा अभी मैं लड़ूँगा ।
अँधेरा घना है दिये से लगा ले ।।

बड़प्पन  डराता  बहुत आजकल है |
मुझे  भी  मेरे  बचपने  से  लगा  ले ।।

गज़ल की कसम फिर गज़ल गूँज होगी ।
"सरस"  शेर  को  क़ाफ़िये  से  लगा ले ।।

©दिलीप कुमार पाठक "सरस"
2:33 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में शैलेन्द्र खरे "सोम' की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल   1
बहर-2×15
काफ़िया- आ स्वर
रदीफ़-करता हूँ

मैं  पागल  सायों  के  पीछे - पीछे  भागा  करता हूँ ।
वीरानों  में  गीत  मिलन  के अक्सर गाया करता हूँ ।।

अब केवल मयखाने में  ही  चैन  मेरा दिल पाता है ।
मन्दिर मस्जिद की राहों  पर मैं तो बहका करता हूँ ।।

क्या जानूँ नयनों की भाषा खुद को जैसे भूल गया ।
गैरों  से  आंसू  लेकर  मैं  भी  तो   रोया  करता हूँ ।।

कल  की भोर नही देखूँ मैं ऐ मालिक दिल ऊब गया ।
लिख  देता  हूँ  रोज  वसीयत जब मैं सोया करता हूँ ।।

मैं नवयुग बातें क्या जानूँ कुछ भी सीख नहीं पाया ।
पर इतना संज्ञान है मुझको कागज काला करता हूँ ।।

लगते  हैं  अपने   बेगाने  भूला  बस्ती  हस्ती  सब ।
अपने घर की  राह सभी  से मैं खुद पूछा करता हूँ ।।।

कोई बात  हुई  ऐसी  जो  मुझको  भी मालूम नहीं ।
क्यूँ  तेरे  बारे   में  खुद  से  ज्यादा सोचा करता हूँ ।।

"सोम"भला कैसा शिक़वा जो कोई अपना खास नहीं ।
अपनों  के  कारण  अपनों  को  रोते  देखा  करता  हूँ ।।
                                     
शैलेन्द्र खरे"सोम"

ग़ज़ल  2
बह्र- 212 212 212 212
काफ़िया- अर
रदीफ़- जाएगा

जान भी  जायेगी  ये   जिगर  जाएगा ।
ऐसे देखो न  आशिक तो  मर जाएगा ।।

फूल  नाज़ुक  है ये  इसको  छूना नहीं ।
टूटकर बस जमीं पर बिखर  जाएगा ।।

है   नशा   तो   अभी   मैं    शहंशाह हूँ ।
ये  नशा  रात   भर   में  उतर  जाएगा ।।

चैन  पाता  नहीं  अपने   घर  में अगर ।
जा  रहा है तो  जा  तू  किधर जाएगा ।।

कुछ निकल जायेगी  आँसुओं में तपन ।
वक्त के  साथ  हर  जख़्म भर जाएगा ।।

खुद   तमाशा   बनेगा   वो   संसार  में ।
जो  मेरे  दिल  से  यूं  खेलकर जाएगा ।।

मत पढ़ो  जोर  से सुर्खियां आजकल ।
पेट  में  भी  जो  बच्चा है डर जाएगा ।।

रंगतों   के    लिए   भागना    छोड़ दे ।
तितलियाँ  तो मिलेंगीं  जिधर जाएगा ।।

"सोम" रुख  से अगर वो हटा  दें  घूँघट ।
वक्त  भी  एक  पल  को  ठहर जाएगा ।।

घूँघट - मुख ढकने का जालीदार कपड़ा

शैलेन्द्र खरे"सोम"

ग़ज़ल  3
बह्र-1222 1222 122
काफ़िया- ई
रदीफ़- है

किसी  की  चाह  यूं  दिल में दबी है ।
कहूँ    कैसे    बड़ी    ही   बेबसी है ।।

जहाँ   भी    देखता    हूँ   तीरगी है ।
दिनों-दिन   बढ़   रही   आवारगी है ।।

उदासी  के   भँवर    में   चाँद  डूबा ।
बहुत   सहमी   हुई   सी  चाँदनी  है ।।

नहीं  परवाह  मुझको  मुश्किलों की ।
डगर    काँटों   भरी    मैंने   चुनी है ।।

चले  आओ  मेरे   दिलवर  कहाँ हो ।
हवा  रूख़ी  फिज़ा  भी  अनमनी है ।।

जिसे   है  टूटकर   मुझसे   मुहब्बत ।
करे  गुस्सा   कभी   तो  लाज़मी  है ।।

कहो  किसको  पता कब रूठ जाए ।
बड़ी    ही   वेवफ़ा    ये  जिन्दगी है ।।

गले लग जा कयामत आ लिपट जा ।
पता   किससे   मेरा   तू   पूछती  है ।।

सजाये   कौन  टूटे   ख़्वाव   हैं  जो ।
बड़ा  ही  मतलबी   अब  आदमी है ।।

अँधेरों  से  निकल  कर "सोम" देखो ।
जहां   में   रोशनी    ही    रोशनी  है ।।

शैलेन्द्र खरे"सोम"

ग़ज़ल  4
बहर~122 122 122 122
काफ़िया - आओ
रदीफ़ - गैर मुरद्दफ

खड़े दूर  क्यों   हो  जरा  पास आओ ।
मुहब्बत में  ऐसे  न  दिल को जलाओ ।।

हजारों  जवां   दिल  मचल  ही  उठेंगे ।
अदाओं से यूं बिजलियाँ  मत गिराओ ।।

भरी  मस्तियाँ   जो  निगाहों  में, पीलूँ ।
कभी पास आकर  तो नजरें मिलाओ ।।

मुझे  यूं  सताओ  न  अपना  बनाकर ।
कभी  प्यार  से  नाम  लेकर  बुलाओ ।।

लगेगी बहुत  चोट  नाजुक  बदन पर ।
हवाओं  सुनो  पास   उनके  न जाओ ।।

सुने"सोम"किस्से जो  चाहत वफ़ा के ।
कभी  मैं  सुनाऊँ  कभी  तुम सुनाओ ।।

शैलेन्द्र खरे"सोम"

ग़ज़ल 5
बह्र-1222 1222 122
काफ़िया- आ (स्वर)
रदीफ़- है

मुकद्दर आजकल मुझसे ख़फ़ा है ।
अभी बर्बादियों का  सिलसिला है ।।

फिरा  सारे   जमाने   में  भटकता ।
सकूं फिर भी नहीं घर सा मिला है ।।

निगाहों से पिलाया क्या  बता दो ।
उतरता  ही   नहीं   कैसा  नशा है ।।

इरादों  में  बुलंदी  हो  तो  समझो ।
तुम्हारे   सामने  अम्बर   झुका है ।।

जिसे अहसास अपनी भूल का हो ।
नहीं  उसके   लिये  कोई  सजा है ।।

कहूँ आबाद  कैसे  इस  जहां को ।
यहाँ  कोई  नहीं  हँसता  दिखा है ।।

परेशां "सोम" दुश्मन  इसलिये भी ।
बचा  लेती  मुझे  माँ  की  दुआ है ।।

शैलेन्द्र खरे"सोम"


गजल  6
बहर~122 122 122 122
काफ़िया- आरे
रदीफ़-  सलामत

नज़र भी  सलामत नजारे सलामत ।
सदा खुश रहो तुम तुम्हारे सलामत ।।

गिराते  रहो   बिजलियाँ यूं दिलों पे ।
हसीं शोख़  कातिल इशारे सलामत ।।

नहाते   रहो   इश्क   की  रोशनी में ।
रहें जबतलक  ये  सितारे  सलामत ।।

दिया छोड़ इस मुफ़लिसी में सभी ने ।
बहुत है जो ग़म  के सहारे सलामत ।।

हुई  एक  मुद्दत  मुझे  उनसे बिछुड़े ।
बुझी  आग  लेकिन शरारे सलामत ।।

उठा जो कभी  कोई' तूफान तो भी ।
उफनतीं ये  मौजें  किनारे सलामत ।।

यही सोच  तो  "सोम" करते दुआ हैं ।
तभी हम सुखी जब हमारे सलामत ।।

 शैलेन्द्र खरे"सोम"


ग़ज़ल  7
बह्र-  2122  1212  22
काफ़िया- आरा
रदीफ़- है

आज  कहता  जहान सारा है ।
आदमी   आदमी  से  हारा है ।।

चाँद  से   चाँदनी   लगे  रूठी ।
यार  गर्दिश  में जो सितारा है ।।

भूल सकता  नही  कभी यारों ।
वक्त  जो  साथ  में  गुजारा है ।।

मछलियाँ छोड़ के कहाँ जायें ।
आज पानी हुआ जो  खारा है ।।

कोई  मिलता  कोई जुदा होता ।
बहती जाती समय की धारा है ।।

भूल  पाऊँ नही  कभी  तुमको ।
हर  तरफ  हो  रहा  नजारा  है ।।

आँख  जब बंद हो गई उसकी ।
वो न  बोला  बहुत  पुकारा है ।।

बेसहारा   कहाँ   हुआ  हूँ   मैं ।
तेरी  हर  याद  का  सहारा है ।।

"सोम" बैठो  न हार कर यूं भी ।
वक्त  का  भी  यही  इशारा है ।।

शैलेन्द्र खरे"सोम"


ग़ज़ल  8
बहर-2122 2122 2122 212
काफ़िया- आओ
रदीफ़-  आप जो

एक  पल  जी  लूं  खुशी  से पास आओ आप जो ।
बैठ   कर   पहलू   में'   मेरे   मुस्कुराओ  आप जो ।।

मैं   यहाँ   से   देखता   हूँ   चाँद   देखो  आप  भी ।
इस  तरह   ही   दूरियाँ  थोड़ी  मिटाओ  आप जो ।।

जान  इतना   जानिए    ये  जिंदगी   हो  खुशनुमा ।
नाम   का    सिंदूर   मेरे   जो   लगाओ  आप  तो ।।

माप  लें  इक  दूसरे    की   सासों   की  गहराइयाँ ।
आज  मुझको  भी डुबो  कर डूब जाओ आप जो ।।

अब तलक  अपने   मुझे   हर   दौर   तड़फ़ाते  रहे ।
आपसे शिकवा गिला क्या दिल जलाओ आप जो ।।

आँसुओं  से  ही  लिखी  है  अपने दिल की दास्ताँ ।
हँस रहे हैं सब खता क्या खिलखिलाओ आप जो ।।

जानता  भाषा   नजर   की   मैं  नजर  से  बोलता ।
आपके  दिल  को  पढूँ  नजरें  मिलाओ  आप जो ।।

"सोम"  इश्को  आशिकी  में   यूं  कई  शायर  बने ।
इक ग़ज़ल मैं भी  लिखूँ अब गुनगुनाओ आप जो ।।

शैलेन्द्र खरे"सोम"

शुक्रवार, 11 मई 2018

2:58 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी' की कुछ ग़ज़लें

नाम- बृजमोहन श्रीवास्तव
साहित्यिक नाम- साथी
पिता का नाम- श्री राधाकृष्ण श्रीवास्तव
माता का नाम- श्रीमति मथुरा बाई
जन्मतिथि - 20/08/1976
निवासी- वार्ड. नं. 25 मोती अपार्टमेन्ट के बगल में ठाकुर बाबा मन्दिर के पास डबरा जिला ग्वालियर (म.प्र.)
शिक्षा- बी.काँम, एम.काँम, एल.एल.बी.
पुरूस्कार/सम्मान  -वागेश्वरी पुँज अंलकरण ,श्रेष्ठ कलमवीर सम्मान ,जनचेतना मंच बीसलपुर (उ.प्र.)
प्रकाशन विवरण -काव्य नंदिनी मे गीत ,अखबार और पत्रिकाओ गीत कविताओ का प्रकाशन ,sr chenal 84 lndore पर काव्य पाठ प्रसारण 9/6/18 शाम 8.00 बजे

गजल  1
बहर - 22, 22, 22 ,22 ,22 ,22, 22, 2
रदीफ- लगता है ।
काफियाँ- आ

अपने रंग लगाते है तो, दिल को अच्छा लगता है ।
अपने रंग दिखाते है तो, दिल को धक्का लगता है ।।

विष घोले जो मन ही मन मे, बाते मन माफिक करता ।
सच  कहने  मादा जिसमे  क्यो  वो  झूठा  लगता  है ।।

जो  खाते  मेहनत  से रोटी,  जीवित  बस  ईमान रखा ।
वे तो भृष्ट दिखे जन जन को , माल्या सच्चा लगता है ।।

देश चलाओ मोदी जी तुम, बहुमत खूब दिया जन ने ।
मँहगाई  मे  दबती जनता, आज  छलावा  लगता  है ।।

आगे भी सत्ता आऐगी, बस  जनता  का ध्यान रखो ।
जीत सुनिश्चत है हरदम ही, राहुल बबुआ लगता है ।।

बीबी चाहे कितनी सुन्दर, आँख  टिकाते  साली पर ।
साली जब घर में आ जाये , मजनू जीजा लगता है ।।

सोच बहूँ की सब जन रखते, बेटी  से  क्यो  डरते हो ।
बेटी  चाहे  कुछ  भी  कर  ले, बेटा  प्यारा  लगता है ।।

होली  है  त्यौहार  मिलन  का,  सारे  रंग  लगा  देना ।
हिन्दु मुस्लिम गले है मिलते, उत्सव न्यारा लगता है ।।

© बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल 2
बहर -212 , 212 , 212 ,212
काफियाँ -आन
रदीफ -है

चंद पैसो मे  बिकता ये  ईमान है ।
लोग इसमें समझते क्यूँ शान है ।।

प्यार के नाम पर बस छलावा  दिखा ।
हो  रहा  हीर  राँझा  का  अपमान  है ।।

क्या  हुऐ  आज  नेता  बताये  किसे  ।
हर गली हो रहा सच का बलिदान  है ।।

खो रही संस्कृति सादगी सभ्यता ।
आज नंगे बदन का ही सम्मान है ।।

मंदिरो  में  कहाँ  अब  ईश्वर  है   रहे  ।
फिर  भी  देते  वही  पर  सब  दान है ।।

मस्जिदो में खुदा आज बंदी बना ।
कर खुदा पर रहे बंदे अहसान है ।।

भूख उसकी मिटाओ जो भूखा दिखे ।
फिर खुदा आप पर खुद मेहरबान है ।।

लड़ रहे मंदिरो मस्जिदो के लिऐ ।
राम का दूसरा  नाम  रहमान है ।।

आज सिक्को में बिकता है जग देखिऐ ।
हाथ जिसके है पावर वो दीवान है ।।

दुख  करो  मत कभी  जिन्दगी  मे  सनम ।
हमसाथी के पास खुशियो का सामान है ।।

बोल मीठे ही *साथी* सदां बोलना ।
बोल कड़वे से मिलता कहाँ मान है ।।

© बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"          
   
गजल    3
बहर-212,212,212,212
काफियाँ -आ
रदीफ-पड़ा

प्यार करना हमें तुमसे मँहगा पड़ा ।
जेब का खर्च सारा ही भरना पड़ा ।।

जिदंगी  में  थी  आयी दिवाली लगी ।
आज मेंरा दिवाला है निकला पड़ा ।।

सीदा  सादा  था  मार्ग  प्रिये   प्यार  का ।
नाज  नखरो  से  सपनो  में  रोना  पढ़ा ।।

सोचता   हूँ   बचा  लू   मैं   पैसे  अभी ।
आयी जी. एस. टी. है तबसे सूखा पड़ा ।

आज   बरबाद   होकर   खड़ा   सामने ।
फिर भी मुँह तेरा ये क्यो  है लटका पड़ा ।।

खर्च  तूने  किया  इतना  जानू  मेरा ।
तेरे श्रंगार पर मुझको बिकना पड़ा ।।

प्यार  तुमसे  करू  या  तुम्हे  छोड़  दू ।
आज संशय में *साथी* बिचारा पड़ा ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल  4
बहर -2122 , 1212 , 22
काफिया - आब
रदीफ - होती है

जिंदगी इक  किताब  होती  है ।
खूबसूरत   जबाब   होती   है ।।

आईने  पर  यकींन  कर  लेना ।
हर कली ही  गुलाब  होती है ।।

प्यार मिलता नही यहाँ सच्चा ।
हुश्न  जग  में शबाब  होती  है ।।

मत पियो जाम मँहगा है यारो ।
इससे तबियत खराब होती है ।।

नैन  तुमसे मिले  है  अब  शामें ।
बिन  पिये  बेहिसाब  होती   है ।।

आदते गम भुलाने की सीखो ।
यादें मीठा ही ख्वाब होती है ।।

आज *साथी* चले आओ दिल में ।
कब मुहब्बत  हिसाब  होती  है ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल 5
बहर-2122  1212   22
काफियाँ-  ईर
रदीफ- बनता है

प्यादा जब भी वजीर बनता है ।
देख  लेना  नजीर   बनता  है ।।

तोड़   डाली  कमर  गरीबी  ने  ।
कौन  वरना  फकीर  बनता  है ।।

जो मिला है सबक अमल करना ।
कौन  वरना  कबीर   बनता   है ।।

बिछ रही है बिसात धोखे  की ।
राजनेता   अमीर   बनता   है ।।

क्यो किया है  गुरूर काया पर  ।
माँस  से  ही  शरीर  बनता  है ।।

जी रहे  आज किस वहम में हो ।
दूध  फटकर  पनीर  बनता  है ।।

सत्य असहाय सा खड़ा दिखता ।
झूठ  हरदम  अबीर  बनता  है ।।

देख लो सरहदो को अब *साथी* ।
प्यार से  कब  जमीर  बनता है ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल 6
बहर-1222 ,1222 ,122
काफियाँ-  आ
रदीफ-   दो

लगे जो हमसफर अपना पता दो ।
पकड़कर हाथ थोड़ा सा दबा दो ।।

नशे में झूमने  का शौक  जिनको ।
पता मत पूछना उनको पिला दो ।।

पहनकर  बैठते  जामा  सियासी ।
हकीकत से उन्हे वाकिफ करा दो ।।

बने  बैठे  है  जो  गामा  फिरोजी ।
बिना पूछे सिरो को अब उडा़ दो ।।

गरीबों  की  बनी  है  ठंड  दुश्मन ।
बदन पर आज तुम कम्बल उढ़ा दो ।।

मिटा दो आज नफरत को दिलो से ।
सभी का धर्म हो भारत सिखा दो ।।

नशे  *साथी*  बुरे  सब  छोड़  देना ।
युवा  तस्वीर  भारत  की सजा दो ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल  7
बहर-212 , 212 ,212
काफियाँ -  आना
रदीफ-  नही

बेबसो  को  सताना नही ।
डूबते  को  बहाना  नही ।।

रूठने की है आदत बुरी ।
रात में अब सताना नही ।।

हाल दिल का तो हम जानते ।
बात  हमसे  छुपाना  नही ।।

ज़िन्दगी से तू लेना सबक ।
दिल किसी का दुखाना नही ।।

आज दिल की ही सुनना *साथी*।
पर  किसी  को   बताना   नही  ।।

कवि बृजमोहन  श्रीवास्तव "साथी"

गजल  8
बहर- 212, 212, 212, 212
रदीफ- कर दिया
काफियाँ- आ

हाथ मेने जो पकड़ा मना कर दिया ।
गैर बाँहो में झूली ये क्या कर दिया ।।

आँख  मुझसे  कभी  भी  मिलायी नही ।
डूब आँखो में किसकी भला कर दिया ।।

प्यास  मिलने  की तुमसे बहुत थी मुझे ।
हमको आँसू दिखा कर विदा कर दिया ।।

आँखो  में था  बसाया खुशी से सनम ।
अश्क हमको बनाकर दगा कर दिया ।।

प्यार  पावन  मेरा  यार  लज्जा  नही ।
मेरी चाहत को तुमने जफा कर दिया ।।

मत  कराओ  कभी  अपना दीदार तुम ।
आज सजदे में तुमको खुदा कर दिया ।।
 
जी  नही  सकते  साथी  तुम्हारे  बिना ।
जानकर भी हमें क्यूँ  जुदा कर दिया ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
डबरा
2:55 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में सन्तोष कुमार 'प्रीत' की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल  1
बह्र - 1222      1222    1222   1222
काफिया - ना
रदीफ - नही अच्छा

लगाते ठेस अपने ही मगर रोना नही अच्छा ।
सदा उनके लिए तो बेरुखी होना नही अच्छा ।।

अगर हो क्रोध में कोई तो कुछ भी बोल देता है ।
हमेशा ऐसी बातें दिल पे तो ढोना नही अच्छा ।।

जो जैसा करता है उसकी वही आदत है ये समझो ।
किसी की बातों से विश्वास को खोना नही अच्छा ।।

किसी के वास्ते गर तुम फूल बन कर खिल नही सकते ।
किसी  की  राह  में  कांटो  का  तो  बोना नही अच्छा ।।

अगर  जो चाहते हो तुम कभी सेहत नही बिगड़े ।
सुबह फिर इस तरह से देर तक सोना नही अच्छा ।।

किसी की बातों से सकूँन का खोना नही अच्छा।
किसी के भी लिए तो 'प्रीत' ना होना नही अच्छा।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल 2
वज्न - 2122   2122    2122   12
काफिया - ई
रदीफ़ - अच्छी नही

दिल लगी तो ठीक है दिल की लगी अच्छी नही ।
जब  जमाना  बेरहम  हो  सादगी  अच्छी  नही ।।

हर किसी के सीने में दिल है कोई पत्थर नही ।
प्यार करना तो भला है आशिकी अच्छी नही ।।

यूँ नही कोई जो करता ही न हो कोई नशा ।
हर नशा तो लाजमी है बेखुदी अच्छी नही ।।

कोई  सजदा  कोई  पूजा  कर  रहा है देखो ।
मन मे जब श्रद्गा न हो तो बंदिगी अच्छी नही ।।

हर किसी की होती हसरत वो बड़ा इंसान हो ।
धन का बढ़ना ठीक है पर साहबी अच्छी नही ।।

'प्रीत' ही दिल मे न हो तो है जुदाई ही भली ।
हो अगर जो सामने तो बेरुखी अच्छी नही ।।


सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल  3
बह्र - २१२२ १२१२ २२
काफिया- आर
रदीफ - कर लें क्या

हम भी जीवन में प्यार कर लें क्या ।
जिंदगी  में बहार  कर  लें  क्या ।।।

उसने  देखा  अदा  से  यूं  हमको ।
तीर इस दिल के पार कर लें क्या ।।

दिल  अभी  तक  सकूँ  से  मेरा  है ।
दिल को फिर बेकरार कर लें क्या ।।

उसको दे कर के जीत हम अपनी ।
नाम  सब  अपने  हार कर लें क्या ।।

उसके  जीवन को फूल से भर कर ।
अपने  हिस्से  में  खार  कर लें क्या ।।

माना   है   इश्क   आग   का  दरिया ।
डूब  कर  उसको  पार  कर  लें क्या ।।

मौत  जीवन  पे  है  सदा  भारी ।
मौत  से  ही करार  कर लें क्या ।।

'प्रीत' में दिल तो दे दिया पहले ।
जान  कुर्बान  यार कर लें क्या ।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल  4
वज़्न - 122 122 122 122
काफिया - आ
रदीफ़ - हुआ है

मेरे चाँद का फिर से आना हुआ है ।
दिवाना तो उसका जमाना हुआ है ।।

कि है ईद छत पर सभी आ गए है ।
उन्हें  देखने  का बहाना हुआ है ।।

खिजां से भी गुजरे तो आये बहारें ।
के चर्चा में उसका फ़साना हुआ है ।।

जिसे देख ले एक नज़र होश खो दे ।
निगाहें छलकता पैमाना हुआ है ।।

ग़ज़ल गीत नगमे उसी के लिए है ।
लिए 'प्रीत' दिल में तराना हुआ है ।।

 - सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल 5
वज्न - 1222        1222    122
काफ़िया - आर
रदीफ़ - देखा

कलम देखा कलम की धार देखा ।
बदलते  वक्त  की  रफ्तार  देखा  ।।

इन्हें अब आ गयी मौकापरस्ती ।
इन्हें  बिकते सरे बाजार  देखा ।।

जो सच के साथ है तन्हा खड़ा है ।
कि मिलते झूठ को उपहार देखा ।।

सियासत इस तरह हॉबी हुई है ।
इतर इसके नही अखबार देखा ।।

दिखाता आइना सच को कभी था ।
वहीं   होते   हुए   व्यापार   देखा ।।

कही  लालच  कही मजबूरिया है ।
समय की 'प्रीत' इन पे मार देखा ।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल  6
बह्र - 2122  2122  2122  22
काफ़िया - अर
रदीफ़ - जाता है

वक़्त जैसा भी हो आता है गुजर जाता है ।
बेवजह टूटकर इंसान बिखर जाता है ।।

दर्द और गम ही न आये तो जिंदगी क्या है ।
बाद तपने के ही कुंदन तो निखर जाता है ।।

क्या गुजरती है न पूछो ये किसी के दिल से ।
वादा जब करके कोई अपना मुकर जाता है ।।

हिम्मत हारे नही इंसान तो क्या मुश्किल है ।
अच्छी तदवीर से तकदीर सवर जाता है ।।

एक  न  एक  दिन  बुझनी  ही  है  चरागे हयात ।
'प्रीत' फिर किसलिए कोई मौत से डर जाता है ।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल 7
बह्र- 2122   2122   2122  22
काफ़िया - ई
रदीफ़ - रखना

दर्द   सीने  में न आंखों  में  तू  नमी रखना ।
अच्छे दिन आएंगे इस बात पे यकीं रखना ।।

हो   अगर  दृढता विस्वास  में तो फलती है ।
सोच नकारात्मक अपनी कभी नही रखना।।

वक़्त  जब  साथ  न  दे लोग बदल जाते है ।
फिर भी व्यवहार में अपने नही कमीं रखना।।

एक  न  एक दिन आसान तो हो जाएगी ।
 मुश्किले लाख सही होंठो पर हँसी रखना ।।

हौसला  आसमां  छुए  तो कोई  बात नही ।
'प्रीत' पर पॉव को अपने सदा जमीं रखना।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल 8
बह्र  - 2122   2122   212
काफ़िया - इल
रदीफ़ - नही

कौन  सी  राहें  जहाँ  मुश्किल नही।
हर किसी को तो मिले मंजिल नही।।

मुश्किलें जो  पार  कर  आगे बढे ।
दूर उससे फिर कोई साहिल नही ।।

हम   समझ  पाते  नही  है उम्रभर ।
वरना ऐसा कौन जो काबिल नही ।।

दूसरों    को    दोष    देना   छोड़   दे ।
इससे होगा तुझको कुछ हासिल नही ।।

वेवजह उनसे शिकायत क्यों करे ।
तेरे अरमानों का वो कातिल नही ।।


आदमी    को   आदमी   से    जोड़ता ।
'प्रीत' जिस दिल मे न हो वो दिल नही ।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

रविवार, 6 मई 2018

3:17 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में पारस गुप्ता की कुछ ग़ज़लें

नाम-   पारस वार्ष्णेय
साहित्यिक नाम- पारस गुप्ता शायर दिल से
पिता का नाम- श्री प्रेमहंस गुप्ता
माता का नाम- स्व0 श्रीमति राधा वार्ष्णेय 
जन्मतिथि - 6 दिसम्बर 1995
निवासी- कैथल गेट चन्दौसी जिला- सम्भल
शिक्षा- बीएससी , एमएससी०(गणित) 
समप्रति - अध्ययनरत् 

ग़ज़ल क्र 1
बहर- १२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया- आ
रदीफ- देना

अगर हमसे मुहब्बत हैं सनम हमको बता देना ।
मिटा देना बसी नफरत गिलें शिकवें मिटा देना ।।

अगर तुम कर सको इतना तो करना सिर्फ इतना तुम ।
करो  जो  प्यार  तुम  हमसे  तो हमदम जाँ लुटा देना ।।

भला कैसे कहूं तुमको हैं कितना प्यार अब तुमसे ।
हैं चाहत अब यहीं तुमसे कसम खुद ही बता देना ।।

करें ऐसी मुहब्बत जो कि हम तुम  इस जहां पर ही ।
करेंगी याद जब दुनिया कहानी तुम सुना देना  ।।

न किस्सा ये मुहब्बत का, सुनाना अब किसी से तुम ।
करेंगे लोग जब चर्चे, तो किस्सा तुम सुना देना ।।

अगर हमसे मोहब्बत हैं सनम हमको बता देना ।
मिटा देना बसी नफरत गिलें शिकवें मिटा देना ।।

©  पारस गुप्ता 
        चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र 2
बहर- १२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया- आना
रदीफ- बना डाला

मोहब्बत  के  ख़यालों ने हमें काना बना डाला ।
कभी बिकते कभी मिटते कभी आना बना डाला ।।

करें किससे शिकायत हम ज़माने की बताओ तुम ।
शिकायत को मेरी तुमने कैसे नाना बना डाला ।।

सुनो हम आज भी तुमसे मोहब्बत खूब करते हैं ।
मोहब्बत की बीमारी ने हमें साना बना डाला ।।

गिले शिकवे सभी इतने सुहाने से लगे मुझको ।
कि शिकवों ने तेरे फिर तो हमें ताना बना डाला ।।

नशा दुनिया में हैं इतने लगें मुझको सभी फीकें ।
यूं उसकी एक नज़र नें हमको दीवाना बना डाला ।।

करेंगे हम नशा इतना उन्हीं की आँख में गिरकर ।
उन्हीं की आँख को शायर ने मैखाना बना डाला ।।

1.काना= मोहब्बत में डूबे रहना 
2.आना= पैसा
3.नाना= जिसको कोई सुनने वाला नहीं
4.साना=आशिक

© पारस गुप्ता 
      चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र 3
बहर-१२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया - आनी
रदीफ - हैं

नादाने दिल हमारा हैं तिरी कातिल जवानी हैं ।
हुआ फिर चांद भी बेकल परी तू आसमानी हैं.....

कई शायर चलें आए ग़ज़ल कहने अदाओं पर ।
लचकती जब क़मर तेरी हुई दुनिया दिवानी हैं ।।

खिलें गुलशन बहारों में फिजाओं में नशा छाया ।
हवा चल दी मुहब्बत की हवाओं में रवानी हैं ।।

उठा पर्दा छुपे रुख से हुआ पहरा सितारों पर ।
घटा छाई हैं काली सी कि आई शब सुहानी हैं ।।

नही दिल्ली नही पटना नही रांची नही जम्मू ।
मेरा दिल तो बना डिस्ट्रिक बनी तू राजधानी हैं ।।

जरा इक बार तो कह दो सनम झूठा सही लेकिन ।
नही हमसे मुहब्बत हैं तुम्हें नफरत निभानी हैं ।।

पकड़कर हाथ जब बोले कहाँ जाते हो तुम जानम ।
नही कटते सहर-शामौ बनी हर शब विरानी हैं  ।।

चलें महफ़िल में *पारस* भी लिखें जातें जहाँ किस्सें ।
नहीं किस्सा लिखा हमने लिखी तुमपे कहानी हैं ।।

© पारस गुप्ता
       चंदौसी (सम्भल)


ग़ज़ल क्र  4

बह्र - 2122 2122 2122
काफ़िया - अत 
रदीफ- हो गयी तिरछी नज़र से

इक इनायत हो गयी तिरछी नज़र से ।
दिल में चाहत हो गयी तिरछी नज़र से ।।

गिर के फिर से उठ गयी उनकी नज़र जो ।
दिल में आफ़त हो गयी तिरछी नज़र से ।।

क्या कहें दिल घायल अब हो गया हैं ।
इक शरारत हो गयी तिरछी नज़र से ।।

क्यों रखें दिल अब गिले शिकवों की चाहत ।
हाँ   इज़ाजत  हो  गयी   तिरछी   नज़र  से ।।

आइने की दीद हसरत क्यों करें दिल ।
अब कयामत हो गयी तिरछी नज़र से ।।

© पारस "दिलसे"

ग़ज़ल क्र 5
बह्र - 1222   1222   1222    1222
रदीफ- से
काफिया- आने

मिलें तुझको सितम कितने, बता उनके सुहाने से ।
लगें कितने वो अपने से, सुना सब कुछ ज़माने से  ।।

सुनाऊँ हाल क्या दिल का, किसी से यार अपना मैं ।
नहीं लगता हैं दिल मेरा, किसी का दिल दुखाने से ।।

लिखूं किस्सा मुहब्बत का, मैं दिल के खून से अपने ।
लिखूंगा प्यार के किस्से, हमेशा दिल चुराने से  ।।

ग़ज़ल से गीत से दुनिया, सदा आबाद हैं अपनी ।
सुनें हैं गीत अपने भी, जुबां उनकी भी गाने से ।।

मिला जो आज अबतक हैं, न ग़म उसका भी करना तुम ।
तसल्ली हैं मुझें उसमें, मिला जितना ख़जाने से ।।

मिज़ाजे - दिल रखा अपना, सदा मैंने गरीबों सा ।
कभी हासिल तुम्हें होगा, न कुछ मेरे ठिकाने से ।।

हुई किस्मत मिरी रुकसत कहूं क्या यार मैं उनसे ।
बड़े  मगरूर  से  वो  बेवफा शायर दिवाने से ।।

© पारस गुप्ता 
    चंदौसी (सम्भल)

ग़ज़ल क्र 6
2122  2122  2122  212
काफिया- आर
रदीफ- है

दिल्लगी  का दौर हैं  और प्यार में तकरार है ।
प्यार में तकरार ही अब प्यार का इकरार है ।।

हुस्न उसका लग रहा हैं मानो जैसे चाँद सा ।
चाँद  का  देखो  जमीं पर हो गया दीदार है ।।

जुल्फ़ें हैं उसकी सुनहरी आँखें कातिल भी लगें ।
जब हयाँ करती हैं वो नख़रा बना अगियार है ।।

कशमकश में हैं जो देखें चांदनी का नूर सब  ।
हुस्न उनका लग रहा अब दो-धारी तलवार है ।।

ऐ खुदा कर देना बरकत जाए मिल बाजार में ।
देख कर नज़रें मिली थी फिर हुआ इज़हार है ।।

वो हमें भी देखकर यूं  मुस्कुराकर चल दिये ।
हो गया हो जैसे उसको भी तो मुझसे  प्यार है 

1. अगियार    -  दुश्मन
2. कशमकस -  आन्तरिक संघर्ष

©  पारस गुप्ता 
     चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र 7
बहर- २१२२,२१२२,२१२२,२१२
रदीफ- के लिये
काफिया- आने

वो मिलें हैं सिर्फ हमको आजमाने के लिये ।
ज़ख्म क्या काफ़ी नहीं थे दिल दुखाने के लिये ।।

जब मिलें तब मुस्कुराने की वजह को पूछते ।
मुस्कुराता हूं मैं अक्सर ग़म छिपाने के लिये ।।

क्या कमी हैं इस जहां में आशिकों की भी कहो ।
सैकड़ों आशिक पड़े हैं,  दिल लगाने के लिये ।।

क्या कहें तुमको बताओ मैखाने का पैमाना ।
जानता हूं, वो मिलें हैं,  दिल जलाने के लिये ।।

नाम क्या आया ग़ज़ल में ऐसा आलम हो गया ।
हो गया, मशहूर मैं भी, अब ज़माने के लिये ।।

आजमाने को पड़ी थी, दुनिया  पूरी क्यों  मगर ।
उनको पारस ही मिला फिर आजमाने के लिये ।।

© पारस गुप्ता 
चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र० 8
बह्र-  १२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया- आज
रदीफ- कहता हूं

कहा तुमने नहीं अब तक चलो मैं आज कहता हूं ।
हमें  तुमसे मोहब्बत है मैं दिल का राज कहता हूं ।।

लिखा  था  ख़त  मैंने  तुमको  पढ़ा  तुमने नहीं दिलवर ।
चलो अब ख़त की छोड़ो तुम दिलों अल्फ़ाज़ कहता हूं ।।

मोहब्बत की कहानी क्या दिवानी क्या जवानी क्या ।
निशानी हो अनूठी तुम तुम्हें मैं ताज कहता हूं ।।

बदल बेशक गये हो तुम मगर खोये नहीं हो तुम ।
तलाशें क्यूं तुम्हें अब हम तुम्हें मैं बाज कहता हूं ।।

ग़ज़ल गाकर सुनाना तुम लिखीं हमने जो तुम पर हैं ।
सुना   देना   सभी  गजलें के सरगम साज कहता हूं ।।

जमाना क्या कहेगा अब न सोचो तुम सनम इतना ।
बनोगी तुम मेरी दुल्हन फक़्त दिल राज कहता हूं ।।

हमें   तुमसे  मोहब्बत  हैं   चलो  मैं आज कहता हूं ।
कहां तुमने नहींं अबतक मैं दिल का राज कहता हूं ।।

© पारस "दिल से"

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