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शनिवार, 12 मई 2018

2:33 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में शैलेन्द्र खरे "सोम' की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल   1
बहर-2×15
काफ़िया- आ स्वर
रदीफ़-करता हूँ

मैं  पागल  सायों  के  पीछे - पीछे  भागा  करता हूँ ।
वीरानों  में  गीत  मिलन  के अक्सर गाया करता हूँ ।।

अब केवल मयखाने में  ही  चैन  मेरा दिल पाता है ।
मन्दिर मस्जिद की राहों  पर मैं तो बहका करता हूँ ।।

क्या जानूँ नयनों की भाषा खुद को जैसे भूल गया ।
गैरों  से  आंसू  लेकर  मैं  भी  तो   रोया  करता हूँ ।।

कल  की भोर नही देखूँ मैं ऐ मालिक दिल ऊब गया ।
लिख  देता  हूँ  रोज  वसीयत जब मैं सोया करता हूँ ।।

मैं नवयुग बातें क्या जानूँ कुछ भी सीख नहीं पाया ।
पर इतना संज्ञान है मुझको कागज काला करता हूँ ।।

लगते  हैं  अपने   बेगाने  भूला  बस्ती  हस्ती  सब ।
अपने घर की  राह सभी  से मैं खुद पूछा करता हूँ ।।।

कोई बात  हुई  ऐसी  जो  मुझको  भी मालूम नहीं ।
क्यूँ  तेरे  बारे   में  खुद  से  ज्यादा सोचा करता हूँ ।।

"सोम"भला कैसा शिक़वा जो कोई अपना खास नहीं ।
अपनों  के  कारण  अपनों  को  रोते  देखा  करता  हूँ ।।
                                     
शैलेन्द्र खरे"सोम"

ग़ज़ल  2
बह्र- 212 212 212 212
काफ़िया- अर
रदीफ़- जाएगा

जान भी  जायेगी  ये   जिगर  जाएगा ।
ऐसे देखो न  आशिक तो  मर जाएगा ।।

फूल  नाज़ुक  है ये  इसको  छूना नहीं ।
टूटकर बस जमीं पर बिखर  जाएगा ।।

है   नशा   तो   अभी   मैं    शहंशाह हूँ ।
ये  नशा  रात   भर   में  उतर  जाएगा ।।

चैन  पाता  नहीं  अपने   घर  में अगर ।
जा  रहा है तो  जा  तू  किधर जाएगा ।।

कुछ निकल जायेगी  आँसुओं में तपन ।
वक्त के  साथ  हर  जख़्म भर जाएगा ।।

खुद   तमाशा   बनेगा   वो   संसार  में ।
जो  मेरे  दिल  से  यूं  खेलकर जाएगा ।।

मत पढ़ो  जोर  से सुर्खियां आजकल ।
पेट  में  भी  जो  बच्चा है डर जाएगा ।।

रंगतों   के    लिए   भागना    छोड़ दे ।
तितलियाँ  तो मिलेंगीं  जिधर जाएगा ।।

"सोम" रुख  से अगर वो हटा  दें  घूँघट ।
वक्त  भी  एक  पल  को  ठहर जाएगा ।।

घूँघट - मुख ढकने का जालीदार कपड़ा

शैलेन्द्र खरे"सोम"

ग़ज़ल  3
बह्र-1222 1222 122
काफ़िया- ई
रदीफ़- है

किसी  की  चाह  यूं  दिल में दबी है ।
कहूँ    कैसे    बड़ी    ही   बेबसी है ।।

जहाँ   भी    देखता    हूँ   तीरगी है ।
दिनों-दिन   बढ़   रही   आवारगी है ।।

उदासी  के   भँवर    में   चाँद  डूबा ।
बहुत   सहमी   हुई   सी  चाँदनी  है ।।

नहीं  परवाह  मुझको  मुश्किलों की ।
डगर    काँटों   भरी    मैंने   चुनी है ।।

चले  आओ  मेरे   दिलवर  कहाँ हो ।
हवा  रूख़ी  फिज़ा  भी  अनमनी है ।।

जिसे   है  टूटकर   मुझसे   मुहब्बत ।
करे  गुस्सा   कभी   तो  लाज़मी  है ।।

कहो  किसको  पता कब रूठ जाए ।
बड़ी    ही   वेवफ़ा    ये  जिन्दगी है ।।

गले लग जा कयामत आ लिपट जा ।
पता   किससे   मेरा   तू   पूछती  है ।।

सजाये   कौन  टूटे   ख़्वाव   हैं  जो ।
बड़ा  ही  मतलबी   अब  आदमी है ।।

अँधेरों  से  निकल  कर "सोम" देखो ।
जहां   में   रोशनी    ही    रोशनी  है ।।

शैलेन्द्र खरे"सोम"

ग़ज़ल  4
बहर~122 122 122 122
काफ़िया - आओ
रदीफ़ - गैर मुरद्दफ

खड़े दूर  क्यों   हो  जरा  पास आओ ।
मुहब्बत में  ऐसे  न  दिल को जलाओ ।।

हजारों  जवां   दिल  मचल  ही  उठेंगे ।
अदाओं से यूं बिजलियाँ  मत गिराओ ।।

भरी  मस्तियाँ   जो  निगाहों  में, पीलूँ ।
कभी पास आकर  तो नजरें मिलाओ ।।

मुझे  यूं  सताओ  न  अपना  बनाकर ।
कभी  प्यार  से  नाम  लेकर  बुलाओ ।।

लगेगी बहुत  चोट  नाजुक  बदन पर ।
हवाओं  सुनो  पास   उनके  न जाओ ।।

सुने"सोम"किस्से जो  चाहत वफ़ा के ।
कभी  मैं  सुनाऊँ  कभी  तुम सुनाओ ।।

शैलेन्द्र खरे"सोम"

ग़ज़ल 5
बह्र-1222 1222 122
काफ़िया- आ (स्वर)
रदीफ़- है

मुकद्दर आजकल मुझसे ख़फ़ा है ।
अभी बर्बादियों का  सिलसिला है ।।

फिरा  सारे   जमाने   में  भटकता ।
सकूं फिर भी नहीं घर सा मिला है ।।

निगाहों से पिलाया क्या  बता दो ।
उतरता  ही   नहीं   कैसा  नशा है ।।

इरादों  में  बुलंदी  हो  तो  समझो ।
तुम्हारे   सामने  अम्बर   झुका है ।।

जिसे अहसास अपनी भूल का हो ।
नहीं  उसके   लिये  कोई  सजा है ।।

कहूँ आबाद  कैसे  इस  जहां को ।
यहाँ  कोई  नहीं  हँसता  दिखा है ।।

परेशां "सोम" दुश्मन  इसलिये भी ।
बचा  लेती  मुझे  माँ  की  दुआ है ।।

शैलेन्द्र खरे"सोम"


गजल  6
बहर~122 122 122 122
काफ़िया- आरे
रदीफ़-  सलामत

नज़र भी  सलामत नजारे सलामत ।
सदा खुश रहो तुम तुम्हारे सलामत ।।

गिराते  रहो   बिजलियाँ यूं दिलों पे ।
हसीं शोख़  कातिल इशारे सलामत ।।

नहाते   रहो   इश्क   की  रोशनी में ।
रहें जबतलक  ये  सितारे  सलामत ।।

दिया छोड़ इस मुफ़लिसी में सभी ने ।
बहुत है जो ग़म  के सहारे सलामत ।।

हुई  एक  मुद्दत  मुझे  उनसे बिछुड़े ।
बुझी  आग  लेकिन शरारे सलामत ।।

उठा जो कभी  कोई' तूफान तो भी ।
उफनतीं ये  मौजें  किनारे सलामत ।।

यही सोच  तो  "सोम" करते दुआ हैं ।
तभी हम सुखी जब हमारे सलामत ।।

 शैलेन्द्र खरे"सोम"


ग़ज़ल  7
बह्र-  2122  1212  22
काफ़िया- आरा
रदीफ़- है

आज  कहता  जहान सारा है ।
आदमी   आदमी  से  हारा है ।।

चाँद  से   चाँदनी   लगे  रूठी ।
यार  गर्दिश  में जो सितारा है ।।

भूल सकता  नही  कभी यारों ।
वक्त  जो  साथ  में  गुजारा है ।।

मछलियाँ छोड़ के कहाँ जायें ।
आज पानी हुआ जो  खारा है ।।

कोई  मिलता  कोई जुदा होता ।
बहती जाती समय की धारा है ।।

भूल  पाऊँ नही  कभी  तुमको ।
हर  तरफ  हो  रहा  नजारा  है ।।

आँख  जब बंद हो गई उसकी ।
वो न  बोला  बहुत  पुकारा है ।।

बेसहारा   कहाँ   हुआ  हूँ   मैं ।
तेरी  हर  याद  का  सहारा है ।।

"सोम" बैठो  न हार कर यूं भी ।
वक्त  का  भी  यही  इशारा है ।।

शैलेन्द्र खरे"सोम"


ग़ज़ल  8
बहर-2122 2122 2122 212
काफ़िया- आओ
रदीफ़-  आप जो

एक  पल  जी  लूं  खुशी  से पास आओ आप जो ।
बैठ   कर   पहलू   में'   मेरे   मुस्कुराओ  आप जो ।।

मैं   यहाँ   से   देखता   हूँ   चाँद   देखो  आप  भी ।
इस  तरह   ही   दूरियाँ  थोड़ी  मिटाओ  आप जो ।।

जान  इतना   जानिए    ये  जिंदगी   हो  खुशनुमा ।
नाम   का    सिंदूर   मेरे   जो   लगाओ  आप  तो ।।

माप  लें  इक  दूसरे    की   सासों   की  गहराइयाँ ।
आज  मुझको  भी डुबो  कर डूब जाओ आप जो ।।

अब तलक  अपने   मुझे   हर   दौर   तड़फ़ाते  रहे ।
आपसे शिकवा गिला क्या दिल जलाओ आप जो ।।

आँसुओं  से  ही  लिखी  है  अपने दिल की दास्ताँ ।
हँस रहे हैं सब खता क्या खिलखिलाओ आप जो ।।

जानता  भाषा   नजर   की   मैं  नजर  से  बोलता ।
आपके  दिल  को  पढूँ  नजरें  मिलाओ  आप जो ।।

"सोम"  इश्को  आशिकी  में   यूं  कई  शायर  बने ।
इक ग़ज़ल मैं भी  लिखूँ अब गुनगुनाओ आप जो ।।

शैलेन्द्र खरे"सोम"

शुक्रवार, 11 मई 2018

2:58 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में बृजमोहन श्रीवास्तव 'साथी' की कुछ ग़ज़लें

नाम- बृजमोहन श्रीवास्तव
साहित्यिक नाम- साथी
पिता का नाम- श्री राधाकृष्ण श्रीवास्तव
माता का नाम- श्रीमति मथुरा बाई
जन्मतिथि - 20/08/1976
निवासी- वार्ड. नं. 25 मोती अपार्टमेन्ट के बगल में ठाकुर बाबा मन्दिर के पास डबरा जिला ग्वालियर (म.प्र.)
शिक्षा- बी.काँम, एम.काँम, एल.एल.बी.
पुरूस्कार/सम्मान  -वागेश्वरी पुँज अंलकरण ,श्रेष्ठ कलमवीर सम्मान ,जनचेतना मंच बीसलपुर (उ.प्र.)
प्रकाशन विवरण -काव्य नंदिनी मे गीत ,अखबार और पत्रिकाओ गीत कविताओ का प्रकाशन ,sr chenal 84 lndore पर काव्य पाठ प्रसारण 9/6/18 शाम 8.00 बजे

गजल  1
बहर - 22, 22, 22 ,22 ,22 ,22, 22, 2
रदीफ- लगता है ।
काफियाँ- आ

अपने रंग लगाते है तो, दिल को अच्छा लगता है ।
अपने रंग दिखाते है तो, दिल को धक्का लगता है ।।

विष घोले जो मन ही मन मे, बाते मन माफिक करता ।
सच  कहने  मादा जिसमे  क्यो  वो  झूठा  लगता  है ।।

जो  खाते  मेहनत  से रोटी,  जीवित  बस  ईमान रखा ।
वे तो भृष्ट दिखे जन जन को , माल्या सच्चा लगता है ।।

देश चलाओ मोदी जी तुम, बहुमत खूब दिया जन ने ।
मँहगाई  मे  दबती जनता, आज  छलावा  लगता  है ।।

आगे भी सत्ता आऐगी, बस  जनता  का ध्यान रखो ।
जीत सुनिश्चत है हरदम ही, राहुल बबुआ लगता है ।।

बीबी चाहे कितनी सुन्दर, आँख  टिकाते  साली पर ।
साली जब घर में आ जाये , मजनू जीजा लगता है ।।

सोच बहूँ की सब जन रखते, बेटी  से  क्यो  डरते हो ।
बेटी  चाहे  कुछ  भी  कर  ले, बेटा  प्यारा  लगता है ।।

होली  है  त्यौहार  मिलन  का,  सारे  रंग  लगा  देना ।
हिन्दु मुस्लिम गले है मिलते, उत्सव न्यारा लगता है ।।

© बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल 2
बहर -212 , 212 , 212 ,212
काफियाँ -आन
रदीफ -है

चंद पैसो मे  बिकता ये  ईमान है ।
लोग इसमें समझते क्यूँ शान है ।।

प्यार के नाम पर बस छलावा  दिखा ।
हो  रहा  हीर  राँझा  का  अपमान  है ।।

क्या  हुऐ  आज  नेता  बताये  किसे  ।
हर गली हो रहा सच का बलिदान  है ।।

खो रही संस्कृति सादगी सभ्यता ।
आज नंगे बदन का ही सम्मान है ।।

मंदिरो  में  कहाँ  अब  ईश्वर  है   रहे  ।
फिर  भी  देते  वही  पर  सब  दान है ।।

मस्जिदो में खुदा आज बंदी बना ।
कर खुदा पर रहे बंदे अहसान है ।।

भूख उसकी मिटाओ जो भूखा दिखे ।
फिर खुदा आप पर खुद मेहरबान है ।।

लड़ रहे मंदिरो मस्जिदो के लिऐ ।
राम का दूसरा  नाम  रहमान है ।।

आज सिक्को में बिकता है जग देखिऐ ।
हाथ जिसके है पावर वो दीवान है ।।

दुख  करो  मत कभी  जिन्दगी  मे  सनम ।
हमसाथी के पास खुशियो का सामान है ।।

बोल मीठे ही *साथी* सदां बोलना ।
बोल कड़वे से मिलता कहाँ मान है ।।

© बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"          
   
गजल    3
बहर-212,212,212,212
काफियाँ -आ
रदीफ-पड़ा

प्यार करना हमें तुमसे मँहगा पड़ा ।
जेब का खर्च सारा ही भरना पड़ा ।।

जिदंगी  में  थी  आयी दिवाली लगी ।
आज मेंरा दिवाला है निकला पड़ा ।।

सीदा  सादा  था  मार्ग  प्रिये   प्यार  का ।
नाज  नखरो  से  सपनो  में  रोना  पढ़ा ।।

सोचता   हूँ   बचा  लू   मैं   पैसे  अभी ।
आयी जी. एस. टी. है तबसे सूखा पड़ा ।

आज   बरबाद   होकर   खड़ा   सामने ।
फिर भी मुँह तेरा ये क्यो  है लटका पड़ा ।।

खर्च  तूने  किया  इतना  जानू  मेरा ।
तेरे श्रंगार पर मुझको बिकना पड़ा ।।

प्यार  तुमसे  करू  या  तुम्हे  छोड़  दू ।
आज संशय में *साथी* बिचारा पड़ा ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल  4
बहर -2122 , 1212 , 22
काफिया - आब
रदीफ - होती है

जिंदगी इक  किताब  होती  है ।
खूबसूरत   जबाब   होती   है ।।

आईने  पर  यकींन  कर  लेना ।
हर कली ही  गुलाब  होती है ।।

प्यार मिलता नही यहाँ सच्चा ।
हुश्न  जग  में शबाब  होती  है ।।

मत पियो जाम मँहगा है यारो ।
इससे तबियत खराब होती है ।।

नैन  तुमसे मिले  है  अब  शामें ।
बिन  पिये  बेहिसाब  होती   है ।।

आदते गम भुलाने की सीखो ।
यादें मीठा ही ख्वाब होती है ।।

आज *साथी* चले आओ दिल में ।
कब मुहब्बत  हिसाब  होती  है ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल 5
बहर-2122  1212   22
काफियाँ-  ईर
रदीफ- बनता है

प्यादा जब भी वजीर बनता है ।
देख  लेना  नजीर   बनता  है ।।

तोड़   डाली  कमर  गरीबी  ने  ।
कौन  वरना  फकीर  बनता  है ।।

जो मिला है सबक अमल करना ।
कौन  वरना  कबीर   बनता   है ।।

बिछ रही है बिसात धोखे  की ।
राजनेता   अमीर   बनता   है ।।

क्यो किया है  गुरूर काया पर  ।
माँस  से  ही  शरीर  बनता  है ।।

जी रहे  आज किस वहम में हो ।
दूध  फटकर  पनीर  बनता  है ।।

सत्य असहाय सा खड़ा दिखता ।
झूठ  हरदम  अबीर  बनता  है ।।

देख लो सरहदो को अब *साथी* ।
प्यार से  कब  जमीर  बनता है ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल 6
बहर-1222 ,1222 ,122
काफियाँ-  आ
रदीफ-   दो

लगे जो हमसफर अपना पता दो ।
पकड़कर हाथ थोड़ा सा दबा दो ।।

नशे में झूमने  का शौक  जिनको ।
पता मत पूछना उनको पिला दो ।।

पहनकर  बैठते  जामा  सियासी ।
हकीकत से उन्हे वाकिफ करा दो ।।

बने  बैठे  है  जो  गामा  फिरोजी ।
बिना पूछे सिरो को अब उडा़ दो ।।

गरीबों  की  बनी  है  ठंड  दुश्मन ।
बदन पर आज तुम कम्बल उढ़ा दो ।।

मिटा दो आज नफरत को दिलो से ।
सभी का धर्म हो भारत सिखा दो ।।

नशे  *साथी*  बुरे  सब  छोड़  देना ।
युवा  तस्वीर  भारत  की सजा दो ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"

गजल  7
बहर-212 , 212 ,212
काफियाँ -  आना
रदीफ-  नही

बेबसो  को  सताना नही ।
डूबते  को  बहाना  नही ।।

रूठने की है आदत बुरी ।
रात में अब सताना नही ।।

हाल दिल का तो हम जानते ।
बात  हमसे  छुपाना  नही ।।

ज़िन्दगी से तू लेना सबक ।
दिल किसी का दुखाना नही ।।

आज दिल की ही सुनना *साथी*।
पर  किसी  को   बताना   नही  ।।

कवि बृजमोहन  श्रीवास्तव "साथी"

गजल  8
बहर- 212, 212, 212, 212
रदीफ- कर दिया
काफियाँ- आ

हाथ मेने जो पकड़ा मना कर दिया ।
गैर बाँहो में झूली ये क्या कर दिया ।।

आँख  मुझसे  कभी  भी  मिलायी नही ।
डूब आँखो में किसकी भला कर दिया ।।

प्यास  मिलने  की तुमसे बहुत थी मुझे ।
हमको आँसू दिखा कर विदा कर दिया ।।

आँखो  में था  बसाया खुशी से सनम ।
अश्क हमको बनाकर दगा कर दिया ।।

प्यार  पावन  मेरा  यार  लज्जा  नही ।
मेरी चाहत को तुमने जफा कर दिया ।।

मत  कराओ  कभी  अपना दीदार तुम ।
आज सजदे में तुमको खुदा कर दिया ।।
 
जी  नही  सकते  साथी  तुम्हारे  बिना ।
जानकर भी हमें क्यूँ  जुदा कर दिया ।।

कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"
डबरा
2:55 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में सन्तोष कुमार 'प्रीत' की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल  1
बह्र - 1222      1222    1222   1222
काफिया - ना
रदीफ - नही अच्छा

लगाते ठेस अपने ही मगर रोना नही अच्छा ।
सदा उनके लिए तो बेरुखी होना नही अच्छा ।।

अगर हो क्रोध में कोई तो कुछ भी बोल देता है ।
हमेशा ऐसी बातें दिल पे तो ढोना नही अच्छा ।।

जो जैसा करता है उसकी वही आदत है ये समझो ।
किसी की बातों से विश्वास को खोना नही अच्छा ।।

किसी के वास्ते गर तुम फूल बन कर खिल नही सकते ।
किसी  की  राह  में  कांटो  का  तो  बोना नही अच्छा ।।

अगर  जो चाहते हो तुम कभी सेहत नही बिगड़े ।
सुबह फिर इस तरह से देर तक सोना नही अच्छा ।।

किसी की बातों से सकूँन का खोना नही अच्छा।
किसी के भी लिए तो 'प्रीत' ना होना नही अच्छा।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल 2
वज्न - 2122   2122    2122   12
काफिया - ई
रदीफ़ - अच्छी नही

दिल लगी तो ठीक है दिल की लगी अच्छी नही ।
जब  जमाना  बेरहम  हो  सादगी  अच्छी  नही ।।

हर किसी के सीने में दिल है कोई पत्थर नही ।
प्यार करना तो भला है आशिकी अच्छी नही ।।

यूँ नही कोई जो करता ही न हो कोई नशा ।
हर नशा तो लाजमी है बेखुदी अच्छी नही ।।

कोई  सजदा  कोई  पूजा  कर  रहा है देखो ।
मन मे जब श्रद्गा न हो तो बंदिगी अच्छी नही ।।

हर किसी की होती हसरत वो बड़ा इंसान हो ।
धन का बढ़ना ठीक है पर साहबी अच्छी नही ।।

'प्रीत' ही दिल मे न हो तो है जुदाई ही भली ।
हो अगर जो सामने तो बेरुखी अच्छी नही ।।


सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल  3
बह्र - २१२२ १२१२ २२
काफिया- आर
रदीफ - कर लें क्या

हम भी जीवन में प्यार कर लें क्या ।
जिंदगी  में बहार  कर  लें  क्या ।।।

उसने  देखा  अदा  से  यूं  हमको ।
तीर इस दिल के पार कर लें क्या ।।

दिल  अभी  तक  सकूँ  से  मेरा  है ।
दिल को फिर बेकरार कर लें क्या ।।

उसको दे कर के जीत हम अपनी ।
नाम  सब  अपने  हार कर लें क्या ।।

उसके  जीवन को फूल से भर कर ।
अपने  हिस्से  में  खार  कर लें क्या ।।

माना   है   इश्क   आग   का  दरिया ।
डूब  कर  उसको  पार  कर  लें क्या ।।

मौत  जीवन  पे  है  सदा  भारी ।
मौत  से  ही करार  कर लें क्या ।।

'प्रीत' में दिल तो दे दिया पहले ।
जान  कुर्बान  यार कर लें क्या ।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल  4
वज़्न - 122 122 122 122
काफिया - आ
रदीफ़ - हुआ है

मेरे चाँद का फिर से आना हुआ है ।
दिवाना तो उसका जमाना हुआ है ।।

कि है ईद छत पर सभी आ गए है ।
उन्हें  देखने  का बहाना हुआ है ।।

खिजां से भी गुजरे तो आये बहारें ।
के चर्चा में उसका फ़साना हुआ है ।।

जिसे देख ले एक नज़र होश खो दे ।
निगाहें छलकता पैमाना हुआ है ।।

ग़ज़ल गीत नगमे उसी के लिए है ।
लिए 'प्रीत' दिल में तराना हुआ है ।।

 - सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल 5
वज्न - 1222        1222    122
काफ़िया - आर
रदीफ़ - देखा

कलम देखा कलम की धार देखा ।
बदलते  वक्त  की  रफ्तार  देखा  ।।

इन्हें अब आ गयी मौकापरस्ती ।
इन्हें  बिकते सरे बाजार  देखा ।।

जो सच के साथ है तन्हा खड़ा है ।
कि मिलते झूठ को उपहार देखा ।।

सियासत इस तरह हॉबी हुई है ।
इतर इसके नही अखबार देखा ।।

दिखाता आइना सच को कभी था ।
वहीं   होते   हुए   व्यापार   देखा ।।

कही  लालच  कही मजबूरिया है ।
समय की 'प्रीत' इन पे मार देखा ।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल  6
बह्र - 2122  2122  2122  22
काफ़िया - अर
रदीफ़ - जाता है

वक़्त जैसा भी हो आता है गुजर जाता है ।
बेवजह टूटकर इंसान बिखर जाता है ।।

दर्द और गम ही न आये तो जिंदगी क्या है ।
बाद तपने के ही कुंदन तो निखर जाता है ।।

क्या गुजरती है न पूछो ये किसी के दिल से ।
वादा जब करके कोई अपना मुकर जाता है ।।

हिम्मत हारे नही इंसान तो क्या मुश्किल है ।
अच्छी तदवीर से तकदीर सवर जाता है ।।

एक  न  एक  दिन  बुझनी  ही  है  चरागे हयात ।
'प्रीत' फिर किसलिए कोई मौत से डर जाता है ।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल 7
बह्र- 2122   2122   2122  22
काफ़िया - ई
रदीफ़ - रखना

दर्द   सीने  में न आंखों  में  तू  नमी रखना ।
अच्छे दिन आएंगे इस बात पे यकीं रखना ।।

हो   अगर  दृढता विस्वास  में तो फलती है ।
सोच नकारात्मक अपनी कभी नही रखना।।

वक़्त  जब  साथ  न  दे लोग बदल जाते है ।
फिर भी व्यवहार में अपने नही कमीं रखना।।

एक  न  एक दिन आसान तो हो जाएगी ।
 मुश्किले लाख सही होंठो पर हँसी रखना ।।

हौसला  आसमां  छुए  तो कोई  बात नही ।
'प्रीत' पर पॉव को अपने सदा जमीं रखना।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

ग़ज़ल 8
बह्र  - 2122   2122   212
काफ़िया - इल
रदीफ़ - नही

कौन  सी  राहें  जहाँ  मुश्किल नही।
हर किसी को तो मिले मंजिल नही।।

मुश्किलें जो  पार  कर  आगे बढे ।
दूर उससे फिर कोई साहिल नही ।।

हम   समझ  पाते  नही  है उम्रभर ।
वरना ऐसा कौन जो काबिल नही ।।

दूसरों    को    दोष    देना   छोड़   दे ।
इससे होगा तुझको कुछ हासिल नही ।।

वेवजह उनसे शिकायत क्यों करे ।
तेरे अरमानों का वो कातिल नही ।।


आदमी    को   आदमी   से    जोड़ता ।
'प्रीत' जिस दिल मे न हो वो दिल नही ।।

सन्तोष कुमार 'प्रीत'

रविवार, 6 मई 2018

3:17 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में पारस गुप्ता की कुछ ग़ज़लें

नाम-   पारस वार्ष्णेय
साहित्यिक नाम- पारस गुप्ता शायर दिल से
पिता का नाम- श्री प्रेमहंस गुप्ता
माता का नाम- स्व0 श्रीमति राधा वार्ष्णेय 
जन्मतिथि - 6 दिसम्बर 1995
निवासी- कैथल गेट चन्दौसी जिला- सम्भल
शिक्षा- बीएससी , एमएससी०(गणित) 
समप्रति - अध्ययनरत् 

ग़ज़ल क्र 1
बहर- १२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया- आ
रदीफ- देना

अगर हमसे मुहब्बत हैं सनम हमको बता देना ।
मिटा देना बसी नफरत गिलें शिकवें मिटा देना ।।

अगर तुम कर सको इतना तो करना सिर्फ इतना तुम ।
करो  जो  प्यार  तुम  हमसे  तो हमदम जाँ लुटा देना ।।

भला कैसे कहूं तुमको हैं कितना प्यार अब तुमसे ।
हैं चाहत अब यहीं तुमसे कसम खुद ही बता देना ।।

करें ऐसी मुहब्बत जो कि हम तुम  इस जहां पर ही ।
करेंगी याद जब दुनिया कहानी तुम सुना देना  ।।

न किस्सा ये मुहब्बत का, सुनाना अब किसी से तुम ।
करेंगे लोग जब चर्चे, तो किस्सा तुम सुना देना ।।

अगर हमसे मोहब्बत हैं सनम हमको बता देना ।
मिटा देना बसी नफरत गिलें शिकवें मिटा देना ।।

©  पारस गुप्ता 
        चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र 2
बहर- १२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया- आना
रदीफ- बना डाला

मोहब्बत  के  ख़यालों ने हमें काना बना डाला ।
कभी बिकते कभी मिटते कभी आना बना डाला ।।

करें किससे शिकायत हम ज़माने की बताओ तुम ।
शिकायत को मेरी तुमने कैसे नाना बना डाला ।।

सुनो हम आज भी तुमसे मोहब्बत खूब करते हैं ।
मोहब्बत की बीमारी ने हमें साना बना डाला ।।

गिले शिकवे सभी इतने सुहाने से लगे मुझको ।
कि शिकवों ने तेरे फिर तो हमें ताना बना डाला ।।

नशा दुनिया में हैं इतने लगें मुझको सभी फीकें ।
यूं उसकी एक नज़र नें हमको दीवाना बना डाला ।।

करेंगे हम नशा इतना उन्हीं की आँख में गिरकर ।
उन्हीं की आँख को शायर ने मैखाना बना डाला ।।

1.काना= मोहब्बत में डूबे रहना 
2.आना= पैसा
3.नाना= जिसको कोई सुनने वाला नहीं
4.साना=आशिक

© पारस गुप्ता 
      चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र 3
बहर-१२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया - आनी
रदीफ - हैं

नादाने दिल हमारा हैं तिरी कातिल जवानी हैं ।
हुआ फिर चांद भी बेकल परी तू आसमानी हैं.....

कई शायर चलें आए ग़ज़ल कहने अदाओं पर ।
लचकती जब क़मर तेरी हुई दुनिया दिवानी हैं ।।

खिलें गुलशन बहारों में फिजाओं में नशा छाया ।
हवा चल दी मुहब्बत की हवाओं में रवानी हैं ।।

उठा पर्दा छुपे रुख से हुआ पहरा सितारों पर ।
घटा छाई हैं काली सी कि आई शब सुहानी हैं ।।

नही दिल्ली नही पटना नही रांची नही जम्मू ।
मेरा दिल तो बना डिस्ट्रिक बनी तू राजधानी हैं ।।

जरा इक बार तो कह दो सनम झूठा सही लेकिन ।
नही हमसे मुहब्बत हैं तुम्हें नफरत निभानी हैं ।।

पकड़कर हाथ जब बोले कहाँ जाते हो तुम जानम ।
नही कटते सहर-शामौ बनी हर शब विरानी हैं  ।।

चलें महफ़िल में *पारस* भी लिखें जातें जहाँ किस्सें ।
नहीं किस्सा लिखा हमने लिखी तुमपे कहानी हैं ।।

© पारस गुप्ता
       चंदौसी (सम्भल)


ग़ज़ल क्र  4

बह्र - 2122 2122 2122
काफ़िया - अत 
रदीफ- हो गयी तिरछी नज़र से

इक इनायत हो गयी तिरछी नज़र से ।
दिल में चाहत हो गयी तिरछी नज़र से ।।

गिर के फिर से उठ गयी उनकी नज़र जो ।
दिल में आफ़त हो गयी तिरछी नज़र से ।।

क्या कहें दिल घायल अब हो गया हैं ।
इक शरारत हो गयी तिरछी नज़र से ।।

क्यों रखें दिल अब गिले शिकवों की चाहत ।
हाँ   इज़ाजत  हो  गयी   तिरछी   नज़र  से ।।

आइने की दीद हसरत क्यों करें दिल ।
अब कयामत हो गयी तिरछी नज़र से ।।

© पारस "दिलसे"

ग़ज़ल क्र 5
बह्र - 1222   1222   1222    1222
रदीफ- से
काफिया- आने

मिलें तुझको सितम कितने, बता उनके सुहाने से ।
लगें कितने वो अपने से, सुना सब कुछ ज़माने से  ।।

सुनाऊँ हाल क्या दिल का, किसी से यार अपना मैं ।
नहीं लगता हैं दिल मेरा, किसी का दिल दुखाने से ।।

लिखूं किस्सा मुहब्बत का, मैं दिल के खून से अपने ।
लिखूंगा प्यार के किस्से, हमेशा दिल चुराने से  ।।

ग़ज़ल से गीत से दुनिया, सदा आबाद हैं अपनी ।
सुनें हैं गीत अपने भी, जुबां उनकी भी गाने से ।।

मिला जो आज अबतक हैं, न ग़म उसका भी करना तुम ।
तसल्ली हैं मुझें उसमें, मिला जितना ख़जाने से ।।

मिज़ाजे - दिल रखा अपना, सदा मैंने गरीबों सा ।
कभी हासिल तुम्हें होगा, न कुछ मेरे ठिकाने से ।।

हुई किस्मत मिरी रुकसत कहूं क्या यार मैं उनसे ।
बड़े  मगरूर  से  वो  बेवफा शायर दिवाने से ।।

© पारस गुप्ता 
    चंदौसी (सम्भल)

ग़ज़ल क्र 6
2122  2122  2122  212
काफिया- आर
रदीफ- है

दिल्लगी  का दौर हैं  और प्यार में तकरार है ।
प्यार में तकरार ही अब प्यार का इकरार है ।।

हुस्न उसका लग रहा हैं मानो जैसे चाँद सा ।
चाँद  का  देखो  जमीं पर हो गया दीदार है ।।

जुल्फ़ें हैं उसकी सुनहरी आँखें कातिल भी लगें ।
जब हयाँ करती हैं वो नख़रा बना अगियार है ।।

कशमकश में हैं जो देखें चांदनी का नूर सब  ।
हुस्न उनका लग रहा अब दो-धारी तलवार है ।।

ऐ खुदा कर देना बरकत जाए मिल बाजार में ।
देख कर नज़रें मिली थी फिर हुआ इज़हार है ।।

वो हमें भी देखकर यूं  मुस्कुराकर चल दिये ।
हो गया हो जैसे उसको भी तो मुझसे  प्यार है 

1. अगियार    -  दुश्मन
2. कशमकस -  आन्तरिक संघर्ष

©  पारस गुप्ता 
     चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र 7
बहर- २१२२,२१२२,२१२२,२१२
रदीफ- के लिये
काफिया- आने

वो मिलें हैं सिर्फ हमको आजमाने के लिये ।
ज़ख्म क्या काफ़ी नहीं थे दिल दुखाने के लिये ।।

जब मिलें तब मुस्कुराने की वजह को पूछते ।
मुस्कुराता हूं मैं अक्सर ग़म छिपाने के लिये ।।

क्या कमी हैं इस जहां में आशिकों की भी कहो ।
सैकड़ों आशिक पड़े हैं,  दिल लगाने के लिये ।।

क्या कहें तुमको बताओ मैखाने का पैमाना ।
जानता हूं, वो मिलें हैं,  दिल जलाने के लिये ।।

नाम क्या आया ग़ज़ल में ऐसा आलम हो गया ।
हो गया, मशहूर मैं भी, अब ज़माने के लिये ।।

आजमाने को पड़ी थी, दुनिया  पूरी क्यों  मगर ।
उनको पारस ही मिला फिर आजमाने के लिये ।।

© पारस गुप्ता 
चंदौसी (सम्भल)



ग़ज़ल क्र० 8
बह्र-  १२२२,१२२२,१२२२,१२२२
काफिया- आज
रदीफ- कहता हूं

कहा तुमने नहीं अब तक चलो मैं आज कहता हूं ।
हमें  तुमसे मोहब्बत है मैं दिल का राज कहता हूं ।।

लिखा  था  ख़त  मैंने  तुमको  पढ़ा  तुमने नहीं दिलवर ।
चलो अब ख़त की छोड़ो तुम दिलों अल्फ़ाज़ कहता हूं ।।

मोहब्बत की कहानी क्या दिवानी क्या जवानी क्या ।
निशानी हो अनूठी तुम तुम्हें मैं ताज कहता हूं ।।

बदल बेशक गये हो तुम मगर खोये नहीं हो तुम ।
तलाशें क्यूं तुम्हें अब हम तुम्हें मैं बाज कहता हूं ।।

ग़ज़ल गाकर सुनाना तुम लिखीं हमने जो तुम पर हैं ।
सुना   देना   सभी  गजलें के सरगम साज कहता हूं ।।

जमाना क्या कहेगा अब न सोचो तुम सनम इतना ।
बनोगी तुम मेरी दुल्हन फक़्त दिल राज कहता हूं ।।

हमें   तुमसे  मोहब्बत  हैं   चलो  मैं आज कहता हूं ।
कहां तुमने नहींं अबतक मैं दिल का राज कहता हूं ।।

© पारस "दिल से"
3:08 am

मुहब्बत ग़ज़ल म़े हिम्मत सिंग त्यागी की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल  1
वज्ऩ -  2122  2122  2122
काफिया - "म"
रदीफ़ - सताये

रात  में  क्यों  आरज़ू  का  गम  सताये  ।
ख्वाब  मे  आ कर  हसीं बालम  सताये ।।
हाल  दिल का  जान  कर  वो खूब रोये ।
बात  कर लो  गर  वफ़ा का गम सताये।
जख्म जब तक इश्क का जाहिर नहीं हैं ।
प्यार  में   इक  दर्द  का  आलम  सताये ।।
इश्क  अफसाना  नहीं  अब  हैं  फसाना ।
इश्क   मे   तेरी  जफ़ा   हम दम  सताये  ।।
राज़  उल्फ़त  का   हमेशा   राज़  'त्यागी' ।
वस्ल  की शब  आज क्यों जानम  सताये।
© हिम्मत सिंग त्यागी

ग़ज़ल  2
वज्ऩ - 1222  1222  1222  1222
काफिया - "ई"
रदीफ़ - है

करम  तेरा  रहा साकी  वही नाजुक  मिजाजी है ।
ग़ज़ल का शौक बादाखार को अब ख़ुशगुवारी है ।।
सुराही  को न  खोलो तुम नशा मुझको गिरा देगा ।
यकीं  कर हर  सुहानी  बज्म मे साकी दिवानी है ।।
जवां  होती  गई  रातें रहे  उस  इश्क  की खुश्बू ।
सहारा अब  वही यादें, नशे  की  शब  गुलाबी है ।।
शराबी  मैं  नहीं   तेरी   निगाहों  में  कहां  प्याले ।
मुझे  समझा  नहीं सकतीं  नज़र  ऐसे सवाली है ।।
मिली हैं  इश्क  मे तेरी  वफ़ा क्यूं अब सताती है ।
कहां मांगें वफ़ा  'त्यागी'  यहां तो सब भिखारी है ।।
© हिम्मत सिंग त्यागी

ग़ज़ल  3
वज्ऩ - 1222  1222  122
काफिया - "ना" 
रदीफ़ - चाहता हूं

मुहब्बत  का  फ़साना  चाहता हूं ।
समंदर    में   उतरना चाहता  हूं ।।
  
जुदाई मे  इबादत  कर  खुदा की ।
खुदा से आज मिलना चाहता हूं ।।
गरीबी  आज  अपनी  दूर  होगी ।
वफ़ा  अपनी दिखाना चाहता हूं ।।
अदीबो  सा  तजुर्बा  है मुझे  भी ।
बहर पर रोज लिखना चाहता हूं।।
रखा है राज़ उल्फ़त राज़ 'त्यागी' ।
लगी दिल की छुपाना चाहता हूं ।।
© हिम्मत सिंग त्यागी

ग़ज़ल  4
बह्र - 212/212 /212 /212
काफिया - अर्द
रदीफ - हूं

वक़्त   के   साथ  चलता  हुआ  दर्द  हूं ।
वक़्त   से   सीखने   आज   शागिर्द  हूं ।।
जिस्त ने आज गम की तपिश को सहा ।
वक़्त   है  टूटती     सांस   पर   मर्द  हूं ।।
जिंदगी   का  पता   क्या  बताऊं  तुम्हें ।
सांस   आया   नही   तो   बना  गर्द  हूं ।।
मुफलिसी  तंग  रोटी  से  कर  दे  जहां ।
मेरे  "मुर्शिद" गरीबों  का   हम  दर्द  हूं ।।
इश्क   के   मकबरे    खास   होतें   रहे ,
रात  'त्यागी'   वहां    रोशनी   जर्द   हूं ।
© हिम्मत सिंग त्यागी

ग़ज़ल  5
वज्ऩ - 2122 /2122
काफिया - "आ"
रदीफ़ - है

आप   कहतें  हो  हुमा  है ।
वक़्त का हाकिम खुदा है ।।
हम  खता   तो  कर चलें है ।
आप  जानों क्या  हुआ  है ।।
दर्द   अपना  जान   तुम से ।
हाल उलफ़त  का  पुछा है ।।
इश्क  को   तामीर  कर  दे  ।
वो   मुहब्बत   से   जुदा  है ।।
लफ्ज   'त्यागी'   बोलते  है ।
ये ग़ज़ल  रब   की दुआ  है।
हुमा = कल्पित पक्षी जिसकी
छाया मे रंक राजा हो जाता है।
© हिम्मत सिंग त्यागी

ग़ज़ल  6
वज्ऩ - 212  212  212
काफिया "ता"
रदीफ़ - रहा
आज को कल बदलता रहा ।
वक़्त  को  मैं समझता रहा ।।
चुप  रहा  तो  सिला  ये मिला ।
दर्द दिल का यूं ही बढ़ता रहा ।।
दर्द  निकला  पुराना  कभी ।
मर्ज  को  याद  करता रहा ।।
बेखुदी  ने  किया  मस्त  तो ।
रोज  मय को  तरसता रहा ।।
राज़ की बात  'त्यागी'  कहूं ।
हुस्न  पे  इश्क  मरता  रहा ।।
© हिम्मत सिंग त्यागी

ग़ज़ल 7
वज्ऩ - 2122 /2122
काफिया - "ए"
रदीफ़ - है
दर्द    जख्मों     का  बढ़े  है ।
अश्क   आंखों    से   बहे  है ।।
ना   छुपाओ   राज़    हमसे  ।
राज़   आंखें   सब   कहे  है  ।।
तुम  यकीनन   इश्क  मे  हो ।
रुख की  रंगत  जो  उड़े  है  ।।
इश्क    की    बातें   दबा  दी ।
राज़    उल्फ़त   का  रखे  है ।।
जख्म 'त्यागी' देख दिल का ।
आज     दोबारा     बहे   है ।।
© हिम्मत सिंग त्यागी

ग़ज़ल  8
वज्ऩ - 1212/1122/1212/22
काफिया - "आर"
रदीफ़ - हो जाये
नज़र कभी न मिले और प्यार  हो जाये ।
पुनर्मिलन की जगी आस यार हो जाये ।

निबाह तो  न  किया  जिंदगी रही तन्हा ।
न बागबां तो चमन  सूख खार हो जाये ।।
फरेब  तुम न  करो  जिंदगी  बिगड़ती है ।
फरेब का  हैं  जहां  तार  तार  हो जाये ।।
नसीब था न हुआ इश्क अंत तक तुम से ।
निक़ाब रूख न हो दिल निसार हो जाये ।।
यकीन आज हुआ आंख मारती 'त्यागी' ।
जरा नज़र  तू  उठा  तीर पार  हो जाये ।।
© हिम्मत सिंग त्यागी
3:00 am

मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में रवि रश्मि ' अनुभूति ' की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल  1
बह्र- 2122    1212    22
क़ाफ़िये -   ई  ( स्वर )
रदीफ -   नहीं आयी

ठोकरों  में  कमी नहीं आयी ।
यूँ खुशी की घड़ी नहीं आयी ।।

दूर तक फैला दर्द का सागर ।
मस्तियों की नदी नहीं आयी ।।

सोचते हैं झुकें सदा हम ही ।
पर  हमें  बंदगी नहीं आयी ।।

ऊबकर   बारहा   पुकारा   है ।
मौत लेकिन कभी नहीं आयी ।।

लोग  यूँ  तो बहुत मिले हमको ।
जिसको चाहा वही नहीं आयी ।।

दें  सहारा  हमीं   गरीबों  को ।
मन - उमंगें तभी नहीं आयीं ।।

दर्द   के   माहो - साल  आते  हैं ।
बस खुशी की सदी नहीं आयी ।।

उनसे मिलते हैं इसलिए अब तक ।
बदमिज़ाज़ी  अभी  नहीं  आयी ।।

जिसको चाहा था दिल ही दिल हमने ।
' रश्मि ' सुन  वो  खुशी  नहीं आयी ।।

© रवि रश्मि ' अनुभूति '

ग़़जल   2
बह्र - 1222    1222    1222    1222
काफिया -  आ
रदीफ -  होगा

उसी माँ की दुआओं से हमारा हर भला  होगा ।
कि जिस आँचल में हर औलाद का सपना  पला  होगा ।।

सुकूं मिलता नहीं है दीन दुनिया में कभी उसको ।
कि जिस औलाद की हरक़त से माँ का  दिल दुखा होगा ।।

बहुत ही खूबसूरत जीवन मैंने माँ संग गुज़रा है ।
जिगर का ख़ून का रिश्ता , कभी कैसे जुदा होगा ।।

कभी वो बद्दुआ करती नहीं , औलाद को अपनी ।
हमेशा माँ के होंठों पर सदा बच्चों दुआ होगा ।।

सुनो माँ की खुशी में है , खुदा की हर खुशी शामिल ।
कि जब नाराज़ होगी माँ , खुदा फिर तब ख़फ़ा होगा ।।

खुशी अपनी हरेक क़ुर्बान कर दी , माँ की खुशियों पर ।
यही कुछ सोच कर ' रश्मि ' , कि हक़ माँ का अदा  होगा ।।

© रवि रश्मि ' अनुभूति '
       मुंबई

ग़ज़ल  3
बह्र - 2122    1212   22
काफिया - आला
रदीफ - हैं

काम उनका , बहुत निराला है ।
पुलिस का , दे दिया हवाला है ।।

जान - पहचान , जो कभी होती ।
तो  नहीं निकलता , दिवाला है ।।

रख लिया था , सभी छुपाकर तो ।
क्यों ख़बर  का  बना मसाला है ।।

कब ख़बर हो गयी अच्छी बोलो ।
फक़्त   बेकार   सा  रसाला  है ।।

अब जाने हम, मदद वही करता ।
वो भी निकला पुलिस का साला है ।।

मुश्किलों  से , नहीं  हटेगें  हम ।
माँ  ने  ऐसा  हमें  यूं  ढाला है ।।

डर हमें  तो नही  सुनो  दोस्तों ।
आँधियों में , दीपक ही बाला है ।।
         
© रवि रश्मि 'अनुभूति'

ग़ज़ल  4
वज़्न     -  1222     1222    1221
अरकान - मफ़ाईलुन, मफ़ाईलुन, मफ़ाईल
क़ाफ़िया  -  आरे
रदीफ़    -  देख हर रोज़

बहकते हैं सहारे , देख हर रोज़ ।
दहकते हैं अँगारे , देख हर रोज़ ।।

विभागों में करे कोई, न अफ़सोस ।
दलाली के पहाड़े, देख हर रोज़ ।।

किसी के भी ज़माना , अब न हो साथ ।
कटी - सी  हैं  बहारें ,   देख हर रोज़ ।।

किसी पर क्यूं हमीं , बोझा बनें आज ।
सभी बोझे उतारे, देख हर रोज़ ।।

किनारे कर तू अपने , ग़म सभी दिल से ।
क्यों दुख में भी दहाड़ें , देख हर रोज़ ।।

दिखी हैं दिलक़शी अब तो खुदा खोज ।
निहारें रहमतें हम, देख हर रोज़ ।।

सुहानी चांदनी हैं रश्मि, अब रात ।
चमकते हैं सितारे , देख हर रोज़ ।।
                
© रवि रश्मि ' अनुभूति '

ग़ज़ल 5
वज़्न-  1212   1122   1212   22
अरकान - मुफ़ाइलुन  फ़इलातुन  मुफ़ाइलुन  फ़ैलुन
क़ाफ़िये -  आन
रदीफ़   -   जैसा है

हरेक पल क्यों मेरा इम्तिहान जैसा है ।
जहां नसीब खुले तो आसमान जैसा है  ।।

फ़कीर है मेरा दिल तो , कहाँ नसीबा  है ।
सुनों ये दिल  मेरा प्राणी , महान जैसा है ।।

लिखा नहीं सितारे बाम पर आये होंगे ।
ख़याल मेरा बोला ये ग़ुमान जैसा है ।।

फाके पड़े तो जाना भूख होती हैं क्या अब ।
भरता  हुआ  पेट ,  सायबान  जैसा  है ।।

न छोड़ता आस पर मैं , ज़िंदा रहना है ।
ये मुद्दा इश्क़ चढ़ा  आशियान जैसा है ।।

कि प्यार की तो अभी आज़माइशें छोड़ो ।
ये इश्क़ मेरा सनम अब मकान जैसा है ।।

ये इश्क़ तो रश्मि अब तो दीवानी करता है ।   
लगे यही अभी तक सब अंजान जैसा है ।।
         
© रवि रश्मि ' अनुभूति '

ग़ज़ल  6
वज़्न      -  212    1212    12
अरकान  -  फ़ाइलुन  मफ़ाइलुन  फ़अल
क़ाफ़िया   - आल
रदीफ़     -  मत करो

गुज़रे हो तो ख़्याल मत करो ।
इस  तरह  सवाल  मत करो ।।

जात  -  पात   देखना   नहीं ।
चैन  अब  हलाल  मत  करो ।।

रात  भर  कही  गयी ,  तभी ।
छोड़  दो,  बवाल  मत  करो ।।

मैं  तुम्हीं  से  प्यार  कर  रही ।
बातों  से   धमाल  मत  करो ।।

कह  लिया  कहन  जभी- तभी ।
बाद   में   ज़वाल   मत   करो ।।

ज़हमतें   बहुत    उठा   चुके ।
नष्ट  अब  ज़लाल  मत  करो ।।

लड़ चुके कभी तो ' रश्मि ' अब ।
इस   तरह  मलाल   मत   करो ।।
           
© रवि रश्मि ' अनुभूति '

ग़ज़ल 7
वज़्न -  1222  1222  1222  122
अरकान -  मफ़ाईलुन   ×  4
क़ाफ़िये  -   अत
रदीफ़    -   की कसम खाओ

बचाया हैं तुम्हें तो उस अमानत की कसम खाओ ।
न भूलेंगें शहीदों की शहादत की कसम खाओ ।।

हमारे जन्म की ही भूमि है ये जान से प्यारी ।
करें कुछ भी बचाना है मुहब्बत की कसम खाओ ।।

हमारा देश है आज़ाद हम भूलें नहीं बातें ।
चलो अब हम करें इसकी हिफ़ाज़त की कसम खाओ ।।

लुटाते जान सरहद पर उन्हें हम सब नमन कर लें ।
बदल दें हम भ्रष्ट होती सियासत को कसम खाओ ।।

रंगीं मौसम हमें मदहोश हैं करता  हुआ भाता ।
रहें यूँ ही बहारें अब सलामत को कसम खाओ ।।

क़दम जो भी रखे दुश्मन , यहाँ की सरज़मीं पर तो ।
भरो सब जोश बाँहों में बगावत को कसम खाओ  ।।

शहर में ' रश्मि ' होते मज़हबी दंगे   कैसे अब तो ।
समझ लो तुम मिटाने की अदावत को कसम खाओ ।।
                  
© रवि रश्मि ' अनुभूति '

ग़़जल 8
वज़्न- 2122    2122    212 
काफिया - ऊ
रदीफ -  है आज फिर

चल माँ घूमें चार सू है आज फिर ।
दृश्य मोहक चार सू है आज फिर ।।

मेरे दिल के हो गये अरमां दफन ।
होती दिल भर गुफ़्तगू है आज फिर ।।

तुझसे मिलकर दिल मेरा भरता नहीं ।
मुझको दिखता तू ही तू है आज फिर ।।

गोद में तेरी रखूं सर अपना फिर ।
के आँचल की छाँव तू है आज फिर ।।

आज  मौसम  की  बहारों  में  जादू ।
हर दिली तमन्ना पूर्ण  है आज फिर ।।

तेरे हाथों की रोटीयां मिल जाये ।
पेट भरना, आरज़ू है आज फिर ।।

तब की अब तू न कोई बात कर ।
के उजाला चार सू है आज फिर ।।

आज जीवन में छा जाये खुशियाँ फिर ।
ज़िंदगी की जुस्तजू है आज फिर ।।

दिल कभी कोई न ज़ख़्मी 'रश्मि' हो ।
ख़ून मेरा उबला सा है आज फिर ।।

©  रवि रश्मि  'अनुभूति'

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

8:44 pm

ग़ज़ल - यूं हम दोनों' वादा वफा का निभा दें - अक़्स बदायूंनी

यूं   हम   दोनों'   वादा   वफा   का  निभा  दें ।
चलो    जिन्दगी    को    मुहब्बत    बना    दें ।।

मेरी    रूह    है    अब    तुम्हारी    अमानत  ।
मुहब्बत   भरा    दिल   तुम्हीं    पे   लुटा   दें ।।

पागल  हैं   ये'  दिल  प्यार  में  उसके  यारों ।
चलो  आज  सच  दिल  का' उसको बता दें ।।

ये'   दिल   चाहता   है  उसे  हद  से'  ज्यादा ।
बता   दो   जरा   तुम    कि   कैसे   भुला  दें ।।

मैं   अब   रातों'  में  जाने'  क्या  सोचता  हूँ ।
बीती  हैं  जो'  दिल  पर  तुम्हें  हम  सुना  दें ।।

© विकास भारद्वाज "अक़्स" 


8:43 pm

ग़ज़ल


इंसाँ    छोड़   जाता'   है   निशानियाँ   कभी   कभी।

ख़त्म  शो  हो'  खूब  बजती'  तालियाँ  कभी  कभी ।।


कुछ  अलग  करो  तो  हट  के  बनती  हैं  हमेशा  ही ।

कुछ   ही   लोगों'  की   नई  कहानियाँ  कभी  कभी ।।


धर्म   के   ही'   नाम   पर   शहर   में'   हो   रहे   दंगे ।

तब   इंसानों   की'   होती'   तबाहियाँ   कभी  कभी ।।


अब    गली    में'   शोर   होता'   ही  नही  पढाई'  के ।

बोझ   से   बच्चों   की   खत्म   छुट्टीयाँ  कभी  कभी ।।


जिंदगी  में'  लगता'  है  यहाँ  आ'  के  खो'  ही  जाये ।

यूँ   ही   मिलती   है   हसीन   वादियाँ   कभी   कभी ।।


पहले'  होता  इंतजार  फोन  का  यूँ'  अब  तो'  बस ।

मेरे'  घर   आती  हैं'  उसकी'  चिठ्ठियाँ  कभी  कभी ।।


"अक़्स"  उसका   कोई'  भी  पता  नही  लगा  अभी ।

बंद  रहती' उसके'  घर  की' खिड़कियाँ  कभी कभी ।।


© विकास भारद्वाज

9627193400

बदायूं (उ०प्र०)

3:29 am

वह कि जिसे लिखना-कहना नामुमकिन है - आदित्य तोमर

वह कि जिसे लिखना-कहना नामुमकिन है,
वही नाम होंटों पर आने लगता है.
वह कि धूल बरसों से जिसे दबाए है,
आँखों में तस्वीर वही छा जाती है.
अभी-अभी बिजली चमकी, देखा तुमने ?
सुना ? अभी छन-छन-छन नूपुर ध्वनि गूंजी.
अभी-अभी इक महक हवा लेकर आई
अभी-अभी सिहरन सी तन में दौड़ पड़ी.
चलो ख़ैर, तुम क्या समझो यह मोहजाल
वह क्या जान सका जो व्यक्ति न मोहा हो.
वही हृदय यह कम्पन पहचाने जिसके
तार कसे हों विधि ने निरत संयोगों से.
रुदन-ठहाके-पीर और आनन्द गहन
सबका सम्मिश्रण करके जो सत्व बना,
उसी सत्व को सुधी प्रेम कहते शायद
अश्रु कहा जाता जिसका पहचान पत्र.
पल-पल कितनी यादों, कितनी बातों के
कितने चित्र सजे रहते तहखानों में.
कितने अश्रु-अनबहे बिखरे पड़ते हैं
रह जाती कितनी पीड़ा अनकही हाय,
मन के झंझावाती कठिन थपेड़े भी
द्वार डिगा पाते ही नहीं और इक दिन
जग पर धूल न पड़ पाती लेकिन हमको
उन चित्रों पर धूल डालनी पड़ती है.
-
आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
9368656307
3:24 am

कटाई के ही मौसम में सदा आती रही बारिश - आदित्य तोमर

कटाई के ही मौसम में सदा आती रही बारिश
वक़्त पर जलदान का न निभा पाते फ़र्ज़,
आता तुम्हें कोई उपकार भी नहीं है मेघ.
गरज-गरज के डराना चाहते हमेशा
कैसा है हृदय जहाँ प्यार भी नहीं है मेघ.
जोकि तप्त मन की अगन का शमन करे
तुम पर ऐसी जलधार भी नहीं है मेघ.
हाड़तोड़ यत्न से ये पकी है फ़सल, तुम्हें-
नष्ट करने का अधिकार भी नहीं है मेघ.
भगवन अभी ज़हर है बारिश नहीं-नहीं रसवंती धारा
उधर खेत में पका पकाया भीग रहा है धान्य हमारा
यह मौसम अपने किसान का खुलेआम आखेट करेगा.
कितने ही मासूमों को फिर सोना भूखे पेट पड़ेगा.
-
आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

9:09 pm

गजल- तुम पे ही जां निसार कर लें क्या

आँखों'   से   आँखे'   चार   कर   ले  क्या  ?
तुमपे'    ही    जाँ   निसार   कर   लें  क्या  ?  

रातों'     को    नींद    ही   न  आये   अब  ।
उससे'   दिल   का   क़रार   कर  लें  क्या  ?

नाम      तेरा    लबों    पे     क्या    आया  ।
दिल    को    हम   बेकरार   कर  ले  क्या  ?

प्यार     करना     गुनाह     है     तो    हम ।
ये   ख़ता   सच   में'   यार   कर   लें   क्या  ?

यूं      मिले      हैं     ज़माने     से     धोखे  ।
उसका'    हम    ऐतबार    कर    लें   क्या  ?

इक    नज़र     भर      उसे     देखा    हमने  ।
दिल   को'   फिर    राजदार   कर   लें   क्या  ?
 
यार    क्या     सोचा    वक्त    हैं    रुखसत ।
"अक़्स"  बाहों    को    हार   कर   लें   क्या ?

© विकास भारद्वाज "अक़्स बदायूँनी"
    8 अप्रेल  2018

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

7:55 am

गजल

वफा   की   कसम   वास्ता   दे   कर   गया ।
वजह   वो    न    कोई    बता    कर   गया ।।

वो'  रूठा  किसी  बात   पर   मुझसे'   फिर ।
वो'  हमसे   ही'   हमको   जुदा   कर   गया ।।

जुबाँ    बंद    आँखे    शायद   कुछ    कहे  ।
वो'   यूँ    दो   दिलों   की  सजा  कर  गया ।।

मेरा   दिल    न    जाने   कहाँ    गुम  हुआ ।
कोई    तो    है'   जो   बावरा    कर   गया ।।

मेरे  दिल  की' धड़कन  कहें  अब  कि वो ।
गलतफहमी'    से    फासला   कर   गया ।।
                        
बीती  रात  के  बाद  वो  फिर  न  जाने  क्यूँ ।
शहर    छोड़    मुझको    तन्हा    कर   गया ।।

उसे    शाम    ही   मैं    मिला   था   कि  एक ।
सुबह  "अक्स" खुद  का   खात्मा   कर  गया ।।

© विकास भारद्वाज "अक़्स बदायूँनी"
    4  अप्रेल  2018

बुधवार, 28 मार्च 2018

11:56 pm

गजल

यूं  हम  दोनों' वादा  वफा  का  निभा  दें ।
चलो   जिन्दगी   को  मुहब्बत   बना   दें ।।
मेरी   रूह   है   अब   तुम्हारी   अमानत ।
मुहब्बत  भरा   दिल   तुम्हीं   पे  लुटा  दें ।।

© विकास भारद्वाज
28 मार्च  2018

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

5:41 pm

अहमद फराज की गजल

Ahmed Faraz ✒....                                    
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं

सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं

सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं

सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं

सुना है उसकी सियाह चश्मगी क़यामत है
सो उसको सुरमाफ़रोश आह भर के देखते हैं

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते हैं

सुना है आईना तमसाल है जबीं उसकी
जो सादा दिल हैं उसे बन सँवर के देखते हैं

सुना है जब से हमाइल हैं उसकी गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं

सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उसकी कमर के देखते हैं

सुना है उसके बदन के तराश ऐसे हैं
के फूल अपनी क़बायेँ कतर के देखते हैं

वो सर-ओ-कद है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
के उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं

बस एक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रहर्वान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं

सुना है उसके शबिस्तान से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीन उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं

रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं

किसे नसीब के बे-पैरहन उसे देखे
कभी-कभी दर-ओ-दीवार घर के देखते हैं

कहानियाँ हीं सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं

अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जायेँ
फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
फ़राज़ अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं

जुदाइयां तो मुक़द्दर हैं फिर भी जाने सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चलके देखते हैं

रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-खुराम कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं

तू सामने है तो फिर क्यों यकीं नहीं आता
यह बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं

ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफिल में
जो लालचों से तुझे, मुझे जल के देखते हैं

यह कुर्ब क्या है कि यकजाँ हुए न दूर रहे
हज़ार इक ही कालिब में ढल के देखते हैं

न तुझको मात हुई न मुझको मात हुई
सो अबके दोनों ही चालें बदल के देखते हैं

यह कौन है सर-ए-साहिल कि डूबने वाले
समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं

अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं

बहुत दिनों से नहीं है कुछ उसकी ख़ैर ख़बर
चलो फ़राज़ को ऐ यार चल के देखते हैं

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

8:10 pm

प्राकृतिक सौंदर्य और मनुष्य

विषय -प्राकृतिक सौंदर्य और मनुष्य में बढ़ता हुआ फासला

मानव जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है | हम अपनी आवश्यकता की लगभग सभी चीजें प्रकृति से ही प्राप्त करते हैं |
मनुष्य और प्रकृति के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है। मानव द्वारा प्रकृति की रक्षा करने से प्रकृति में हरा भरा और वातावरण स्वच्छता होने से प्रकृति सौन्दर्यमयी का अनुभव करने लगती है।
सुबह के नर्म हवा घूमना स्वास्थ के लिए लाभदायक है और धूप में पेडों की छाया में बैठना कितना सुखद और आरामदायक लगता है लेकिन समय के बढते चक्र में प्रकृति मे प्रदूषण बढने लगा है ।
पर्यावरण में अब विषैली गैसें घुलने लगी है ।
वनों की अधाँधुध कटान के कारण तथा नदियों मे विषैले रसायन से प्रकृति मे प्रदूषण तथा नई नई बीमारीयाँ फैल रही है।
मनुष्य की आयु कम होने लगी। धरती एक-एक बूँद पानी के लिए तरसने लगी है, लेकिन यह वैश्विक तपन हमारे लिए चिन्ता का विषय नहीं बना।
तापमान में तेजी से बढ़ोत्तरी के कारण दुनिया भर में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। यही हाल रहा तो आगामी कुछ दशकों में हमारी धरती वन विहीन हो जाएगी। हमारे पड़ोसी देशों में जितने वृक्ष काटे जाते हैं, उतने परिमाण में लगाए भी जाते हैं। हमें इस बात पर विचार करना चाहिए ।
मनुष्य और प्राकृतिक के बीच बढता फासला हमें बतलाता है कि जब पाप अधिक बढ़ता है तो धरती काँपने लगती है। यह भी कहा गया है कि धरती घर का आंगन है, आसमान छत है, सूर्य-चन्द्रमाँ ज्योति देने वाले दीपक हैं, समुद्र पानी के मटके हैं और पेड़-पौधे आहार के साधन हैं।
ध्यान रखना होगा हमें कि प्रकृति किसी के साथ भेदभाव या पक्षपात नहीं करती। इसके द्वार सबके लिए समान रूप से खुले हैं, लेकिन जब हम प्रकृतिक संसाधनों से खिलवाड़ करते हैं तब उसका परिणाम भूकम्प, सूखा, बाढ़, सैलाब, तूफान की शक्ल में आता है, फिर लोग काल के गाल में समा जाते हैं।
हम कह सकते हैं कि प्रकृति से मनुष्य का सम्बन्ध अलगाव का नहीं है, सचमुच प्रकृति से प्रेम हमें उन्नति की ओर ले जाता है और इससे अलगाव हमारे लिए विनाशकाल के कारण बनते हैं।

विकास भारद्वाज 'सुदीप'
21 जुलाई 2017

सोमवार, 8 जनवरी 2018

7:22 am

गजल (47) - झूटी शानो शौकत


नये  जमाने'  का'  अब  हमने'  पैरहन  देखा ।
बड़ा  अजीब  यहाँ  का  रहन  सहन  देखा ।।

वो  शंहशाह  हो'  या  कोई'  रंक  हो  हमने ।
सभी पे चलते समय एक सा ही कफ़न देखा

न  कोई'  अपना'  न  कोई  पराया' लगता है ।
हरेक आदमी' का जब मतलब से मिलन देखा

बिखरती' जिंदगियां झूठी शानो-शौकत में ।
ये'  कैसा'  हमने' शहर का तेरे' चलन देखा ।।

बे-घर किये बूढे' माँ बाप आज बच्चों ने ।
ठिठुरते'  सर्द रातों में पड़े सयन देखा ।।

बहार आती' थी' खिलते  थे फूल बागों में ।
विकास आज वो' उजड़ा हुआ चमन देखा ।।

सयन- नीद्रा,सोना

©विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"
   2 जनवरी 2018

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

2:35 am

गजल- निश्छल आँखे


                       
चला आया बादल उमड़ता हुआ ।      
अम्बर से झमाझम बरसता हुआ ।।
               
कोई आशियाना भी था कल यहाँ ।
चमन आज ये कैसा उजड़ा हुआ ।।

किसी की आहें गूंजती हैं शायद ।
दफ़न है कोई राज अरसा हुआ ।।

बिखरते गऐ दिल के अरमाँ मेरे ।
कभी था ये गुलशन महकता हुआ ।।

तुफानी सी लहरो में कश्ती फँसी ।
अभी अपना दरिया है ठहरा हुआ ।।

जिसे देखती "अक्स" निश्छल आँखें ।
फलक पर जैसे चाँद ठहरा हुआ ....।।

© विकास भारद्वाज "अक्स"
27 दिसम्बर 2017

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

8:07 pm

"माँ याद तुम्हारी सताती है "


माँ तो बच्चों के लिए खुद को भूल जाती है ।
माँ ही सदा हमें पापा की डाँट से बचाती है ।।
जमाने के ताने - बाने से घबराता मेरा मन,
माँ अब घर से दूर याद तुम्हारी सताती है ।।

माँ से हर मनुष्य के आस्तित्व का आधार है ।
माँ से पल बढ कर बनता जीवों का संसार है ।।
संयम, जीवन-त्याग और ममता की मुरत,
माँ तो इस धरती पर भगवान का अवतार है ।।

अपना ख्याल छोड़ कर परिवार के लिए माँ हर दुख सहती है ।
हम माँ का इंतज़ार करें न करें पर माँ हर पल इंतज़ार करती है ।।
जिसके ममता भरे आँचल को पाने भगवान भी तरस जाते है,
नजर लगें न बच्चों को माथे पर माँ काला टीका रखती है ।।

दुनिया के सब रिश्ते-नातों में सबसे प्यारा रिश्ता माँ का होता है ।
हर झूठे रिश्ते नातों में सुदीप बस सच्चा प्यार माँ का होता है ।।
ठोकर लगने पर रास्ते पर फिर हाथ पकड़ कर सभाँले रखती,
अनजाने में हुई गलती माफ कर दे वो दिल सिर्फ माँ का होता है ।।
   
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
   12 दिसम्बर 2017

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