रविवार, 6 मई 2018
मुहब्बत ग़ज़ल म़े हिम्मत सिंग त्यागी की कुछ ग़ज़लें
काफिया - "म"
रदीफ़ - सताये
ख्वाब मे आ कर हसीं बालम सताये ।।
बात कर लो गर वफ़ा का गम सताये।
प्यार में इक दर्द का आलम सताये ।।
इश्क मे तेरी जफ़ा हम दम सताये ।।
वस्ल की शब आज क्यों जानम सताये।
वज्ऩ - 1222 1222 1222 1222
काफिया - "ई"
रदीफ़ - है
ग़ज़ल का शौक बादाखार को अब ख़ुशगुवारी है ।।
यकीं कर हर सुहानी बज्म मे साकी दिवानी है ।।
सहारा अब वही यादें, नशे की शब गुलाबी है ।।
मुझे समझा नहीं सकतीं नज़र ऐसे सवाली है ।।
कहां मांगें वफ़ा 'त्यागी' यहां तो सब भिखारी है ।।
काफिया - "ना"
रदीफ़ - चाहता हूं
समंदर में उतरना चाहता हूं ।।
जुदाई मे इबादत कर खुदा की ।
खुदा से आज मिलना चाहता हूं ।।
वफ़ा अपनी दिखाना चाहता हूं ।।
बहर पर रोज लिखना चाहता हूं।।
लगी दिल की छुपाना चाहता हूं ।।
काफिया - अर्द
रदीफ - हूं
वक़्त से सीखने आज शागिर्द हूं ।।
वक़्त है टूटती सांस पर मर्द हूं ।।
सांस आया नही तो बना गर्द हूं ।।
मेरे "मुर्शिद" गरीबों का हम दर्द हूं ।।
रात 'त्यागी' वहां रोशनी जर्द हूं ।
काफिया - "आ"
रदीफ़ - है
वक़्त का हाकिम खुदा है ।।
आप जानों क्या हुआ है ।।
हाल उलफ़त का पुछा है ।।
वो मुहब्बत से जुदा है ।।
ये ग़ज़ल रब की दुआ है।
छाया मे रंक राजा हो जाता है।
काफिया "ता"
रदीफ़ - रहा
वक़्त को मैं समझता रहा ।।
दर्द दिल का यूं ही बढ़ता रहा ।।
मर्ज को याद करता रहा ।।
रोज मय को तरसता रहा ।।
हुस्न पे इश्क मरता रहा ।।
काफिया - "ए"
रदीफ़ - है
अश्क आंखों से बहे है ।।
राज़ आंखें सब कहे है ।।
रुख की रंगत जो उड़े है ।।
राज़ उल्फ़त का रखे है ।।
आज दोबारा बहे है ।।
काफिया - "आर"
रदीफ़ - हो जाये
पुनर्मिलन की जगी आस यार हो जाये ।
निबाह तो न किया जिंदगी रही तन्हा ।
न बागबां तो चमन सूख खार हो जाये ।।
फरेब का हैं जहां तार तार हो जाये ।।
निक़ाब रूख न हो दिल निसार हो जाये ।।
जरा नज़र तू उठा तीर पार हो जाये ।।
मुहब्बत ग़ज़ल संग्रह में रवि रश्मि ' अनुभूति ' की कुछ ग़ज़लें
क़ाफ़िये - ई ( स्वर )
रदीफ - नहीं आयी
यूँ खुशी की घड़ी नहीं आयी ।।
मस्तियों की नदी नहीं आयी ।।
पर हमें बंदगी नहीं आयी ।।
मौत लेकिन कभी नहीं आयी ।।
जिसको चाहा वही नहीं आयी ।।
मन - उमंगें तभी नहीं आयीं ।।
बस खुशी की सदी नहीं आयी ।।
बदमिज़ाज़ी अभी नहीं आयी ।।
' रश्मि ' सुन वो खुशी नहीं आयी ।।
काफिया - आ
रदीफ - होगा
कि जिस आँचल में हर औलाद का सपना पला होगा ।।
कि जिस औलाद की हरक़त से माँ का दिल दुखा होगा ।।
जिगर का ख़ून का रिश्ता , कभी कैसे जुदा होगा ।।
हमेशा माँ के होंठों पर सदा बच्चों दुआ होगा ।।
कि जब नाराज़ होगी माँ , खुदा फिर तब ख़फ़ा होगा ।।
यही कुछ सोच कर ' रश्मि ' , कि हक़ माँ का अदा होगा ।।
मुंबई
काफिया - आला
रदीफ - हैं
पुलिस का , दे दिया हवाला है ।।
तो नहीं निकलता , दिवाला है ।।
क्यों ख़बर का बना मसाला है ।।
फक़्त बेकार सा रसाला है ।।
वो भी निकला पुलिस का साला है ।।
माँ ने ऐसा हमें यूं ढाला है ।।
आँधियों में , दीपक ही बाला है ।।
© रवि रश्मि 'अनुभूति'
अरकान - मफ़ाईलुन, मफ़ाईलुन, मफ़ाईल
क़ाफ़िया - आरे
रदीफ़ - देख हर रोज़
दहकते हैं अँगारे , देख हर रोज़ ।।
दलाली के पहाड़े, देख हर रोज़ ।।
कटी - सी हैं बहारें , देख हर रोज़ ।।
सभी बोझे उतारे, देख हर रोज़ ।।
क्यों दुख में भी दहाड़ें , देख हर रोज़ ।।
निहारें रहमतें हम, देख हर रोज़ ।।
चमकते हैं सितारे , देख हर रोज़ ।।
© रवि रश्मि ' अनुभूति '
अरकान - मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ैलुन
क़ाफ़िये - आन
रदीफ़ - जैसा है
जहां नसीब खुले तो आसमान जैसा है ।।
सुनों ये दिल मेरा प्राणी , महान जैसा है ।।
ख़याल मेरा बोला ये ग़ुमान जैसा है ।।
भरता हुआ पेट , सायबान जैसा है ।।
ये मुद्दा इश्क़ चढ़ा आशियान जैसा है ।।
ये इश्क़ मेरा सनम अब मकान जैसा है ।।
लगे यही अभी तक सब अंजान जैसा है ।।
© रवि रश्मि ' अनुभूति '
अरकान - फ़ाइलुन मफ़ाइलुन फ़अल
क़ाफ़िया - आल
रदीफ़ - मत करो
इस तरह सवाल मत करो ।।
चैन अब हलाल मत करो ।।
छोड़ दो, बवाल मत करो ।।
बातों से धमाल मत करो ।।
बाद में ज़वाल मत करो ।।
नष्ट अब ज़लाल मत करो ।।
इस तरह मलाल मत करो ।।
© रवि रश्मि ' अनुभूति '
अरकान - मफ़ाईलुन × 4
क़ाफ़िये - अत
रदीफ़ - की कसम खाओ
न भूलेंगें शहीदों की शहादत की कसम खाओ ।।
करें कुछ भी बचाना है मुहब्बत की कसम खाओ ।।
चलो अब हम करें इसकी हिफ़ाज़त की कसम खाओ ।।
बदल दें हम भ्रष्ट होती सियासत को कसम खाओ ।।
रहें यूँ ही बहारें अब सलामत को कसम खाओ ।।
भरो सब जोश बाँहों में बगावत को कसम खाओ ।।
समझ लो तुम मिटाने की अदावत को कसम खाओ ।।
© रवि रश्मि ' अनुभूति '
काफिया - ऊ
रदीफ - है आज फिर
दृश्य मोहक चार सू है आज फिर ।।
होती दिल भर गुफ़्तगू है आज फिर ।।
मुझको दिखता तू ही तू है आज फिर ।।
के आँचल की छाँव तू है आज फिर ।।
हर दिली तमन्ना पूर्ण है आज फिर ।।
पेट भरना, आरज़ू है आज फिर ।।
के उजाला चार सू है आज फिर ।।
ज़िंदगी की जुस्तजू है आज फिर ।।
ख़ून मेरा उबला सा है आज फिर ।।
बुधवार, 11 अप्रैल 2018
ग़ज़ल - यूं हम दोनों' वादा वफा का निभा दें - अक़्स बदायूंनी
मुहब्बत भरा दिल तुम्हीं पे लुटा दें ।।
चलो आज सच दिल का' उसको बता दें ।।
बता दो जरा तुम कि कैसे भुला दें ।।
बीती हैं जो' दिल पर तुम्हें हम सुना दें ।।
ग़ज़ल
इंसाँ छोड़ जाता' है निशानियाँ कभी कभी।
ख़त्म शो हो' खूब बजती' तालियाँ कभी कभी ।।
कुछ अलग करो तो हट के बनती हैं हमेशा ही ।
कुछ ही लोगों' की नई कहानियाँ कभी कभी ।।
धर्म के ही' नाम पर शहर में' हो रहे दंगे ।
तब इंसानों की' होती' तबाहियाँ कभी कभी ।।
अब गली में' शोर होता' ही नही पढाई' के ।
बोझ से बच्चों की खत्म छुट्टीयाँ कभी कभी ।।
जिंदगी में' लगता' है यहाँ आ' के खो' ही जाये ।
यूँ ही मिलती है हसीन वादियाँ कभी कभी ।।
पहले' होता इंतजार फोन का यूँ' अब तो' बस ।
मेरे' घर आती हैं' उसकी' चिठ्ठियाँ कभी कभी ।।
"अक़्स" उसका कोई' भी पता नही लगा अभी ।
बंद रहती' उसके' घर की' खिड़कियाँ कभी कभी ।।
© विकास भारद्वाज
9627193400
बदायूं (उ०प्र०)
वह कि जिसे लिखना-कहना नामुमकिन है - आदित्य तोमर
वही नाम होंटों पर आने लगता है.
वह कि धूल बरसों से जिसे दबाए है,
आँखों में तस्वीर वही छा जाती है.
सुना ? अभी छन-छन-छन नूपुर ध्वनि गूंजी.
अभी-अभी इक महक हवा लेकर आई
अभी-अभी सिहरन सी तन में दौड़ पड़ी.
चलो ख़ैर, तुम क्या समझो यह मोहजाल
वह क्या जान सका जो व्यक्ति न मोहा हो.
वही हृदय यह कम्पन पहचाने जिसके
तार कसे हों विधि ने निरत संयोगों से.
सबका सम्मिश्रण करके जो सत्व बना,
उसी सत्व को सुधी प्रेम कहते शायद
अश्रु कहा जाता जिसका पहचान पत्र.
कितने चित्र सजे रहते तहखानों में.
कितने अश्रु-अनबहे बिखरे पड़ते हैं
रह जाती कितनी पीड़ा अनकही हाय,
मन के झंझावाती कठिन थपेड़े भी
द्वार डिगा पाते ही नहीं और इक दिन
जग पर धूल न पड़ पाती लेकिन हमको
उन चित्रों पर धूल डालनी पड़ती है.
-
आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)
9368656307
कटाई के ही मौसम में सदा आती रही बारिश - आदित्य तोमर
वक़्त पर जलदान का न निभा पाते फ़र्ज़,
आता तुम्हें कोई उपकार भी नहीं है मेघ.
गरज-गरज के डराना चाहते हमेशा
कैसा है हृदय जहाँ प्यार भी नहीं है मेघ.
जोकि तप्त मन की अगन का शमन करे
तुम पर ऐसी जलधार भी नहीं है मेघ.
हाड़तोड़ यत्न से ये पकी है फ़सल, तुम्हें-
नष्ट करने का अधिकार भी नहीं है मेघ.
उधर खेत में पका पकाया भीग रहा है धान्य हमारा
यह मौसम अपने किसान का खुलेआम आखेट करेगा.
कितने ही मासूमों को फिर सोना भूखे पेट पड़ेगा.
-
आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ
सोमवार, 9 अप्रैल 2018
गजल- तुम पे ही जां निसार कर लें क्या
आँखों' से आँखे' चार कर ले क्या ?
तुमपे' ही जाँ निसार कर लें क्या ?
रातों' को नींद ही न आये अब ।
उससे' दिल का क़रार कर लें क्या ?
नाम तेरा लबों पे क्या आया ।
दिल को हम बेकरार कर ले क्या ?
प्यार करना गुनाह है तो हम ।
ये ख़ता सच में' यार कर लें क्या ?
यूं मिले हैं ज़माने से धोखे ।
उसका' हम ऐतबार कर लें क्या ?
इक नज़र भर उसे देखा हमने ।
दिल को' फिर राजदार कर लें क्या ?
यार क्या सोचा वक्त हैं रुखसत ।
"अक़्स" बाहों को हार कर लें क्या ?
© विकास भारद्वाज "अक़्स बदायूँनी"
8 अप्रेल 2018
बुधवार, 4 अप्रैल 2018
देवी छंद
सुन जाना
घर आना
दिल गाया
मन भाया ।।
शिव भोले
मन डोले
जग सेवा
मिल मेवा ।।
© विकास भारद्वाज सुदीप
5 अप्रेल 2018
गजल
वफा की कसम वास्ता दे कर गया ।
वजह वो न कोई बता कर गया ।।
वो' रूठा किसी बात पर मुझसे' फिर ।
वो' हमसे ही' हमको जुदा कर गया ।।
जुबाँ बंद आँखे शायद कुछ कहे ।
वो' यूँ दो दिलों की सजा कर गया ।।
मेरा दिल न जाने कहाँ गुम हुआ ।
कोई तो है' जो बावरा कर गया ।।
मेरे दिल की' धड़कन कहें अब कि वो ।
गलतफहमी' से फासला कर गया ।।
बीती रात के बाद वो फिर न जाने क्यूँ ।
शहर छोड़ मुझको तन्हा कर गया ।।
उसे शाम ही मैं मिला था कि एक ।
सुबह "अक्स" खुद का खात्मा कर गया ।।
© विकास भारद्वाज "अक़्स बदायूँनी"
4 अप्रेल 2018
बुधवार, 28 मार्च 2018
गजल
यूं हम दोनों' वादा वफा का निभा दें ।
चलो जिन्दगी को मुहब्बत बना दें ।।
मेरी रूह है अब तुम्हारी अमानत ।
मुहब्बत भरा दिल तुम्हीं पे लुटा दें ।।
© विकास भारद्वाज
28 मार्च 2018
मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018
अहमद फराज की गजल
Ahmed Faraz ✒....
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं
सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं
सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं
सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं
सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं
सुना है उसकी सियाह चश्मगी क़यामत है
सो उसको सुरमाफ़रोश आह भर के देखते हैं
सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते हैं
सुना है आईना तमसाल है जबीं उसकी
जो सादा दिल हैं उसे बन सँवर के देखते हैं
सुना है जब से हमाइल हैं उसकी गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं
सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उसकी कमर के देखते हैं
सुना है उसके बदन के तराश ऐसे हैं
के फूल अपनी क़बायेँ कतर के देखते हैं
वो सर-ओ-कद है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
के उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं
बस एक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रहर्वान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं
सुना है उसके शबिस्तान से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीन उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं
रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं
किसे नसीब के बे-पैरहन उसे देखे
कभी-कभी दर-ओ-दीवार घर के देखते हैं
कहानियाँ हीं सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं
अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जायेँ
फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
फ़राज़ अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं
जुदाइयां तो मुक़द्दर हैं फिर भी जाने सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चलके देखते हैं
रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-खुराम कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं
तू सामने है तो फिर क्यों यकीं नहीं आता
यह बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं
ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफिल में
जो लालचों से तुझे, मुझे जल के देखते हैं
यह कुर्ब क्या है कि यकजाँ हुए न दूर रहे
हज़ार इक ही कालिब में ढल के देखते हैं
न तुझको मात हुई न मुझको मात हुई
सो अबके दोनों ही चालें बदल के देखते हैं
यह कौन है सर-ए-साहिल कि डूबने वाले
समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं
अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं
बहुत दिनों से नहीं है कुछ उसकी ख़ैर ख़बर
चलो फ़राज़ को ऐ यार चल के देखते हैं
गुरुवार, 11 जनवरी 2018
प्राकृतिक सौंदर्य और मनुष्य
विषय -प्राकृतिक सौंदर्य और मनुष्य में बढ़ता हुआ फासला
मानव जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है | हम अपनी आवश्यकता की लगभग सभी चीजें प्रकृति से ही प्राप्त करते हैं |
मनुष्य और प्रकृति के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है। मानव द्वारा प्रकृति की रक्षा करने से प्रकृति में हरा भरा और वातावरण स्वच्छता होने से प्रकृति सौन्दर्यमयी का अनुभव करने लगती है।
सुबह के नर्म हवा घूमना स्वास्थ के लिए लाभदायक है और धूप में पेडों की छाया में बैठना कितना सुखद और आरामदायक लगता है लेकिन समय के बढते चक्र में प्रकृति मे प्रदूषण बढने लगा है ।
पर्यावरण में अब विषैली गैसें घुलने लगी है ।
वनों की अधाँधुध कटान के कारण तथा नदियों मे विषैले रसायन से प्रकृति मे प्रदूषण तथा नई नई बीमारीयाँ फैल रही है।
मनुष्य की आयु कम होने लगी। धरती एक-एक बूँद पानी के लिए तरसने लगी है, लेकिन यह वैश्विक तपन हमारे लिए चिन्ता का विषय नहीं बना।
तापमान में तेजी से बढ़ोत्तरी के कारण दुनिया भर में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। यही हाल रहा तो आगामी कुछ दशकों में हमारी धरती वन विहीन हो जाएगी। हमारे पड़ोसी देशों में जितने वृक्ष काटे जाते हैं, उतने परिमाण में लगाए भी जाते हैं। हमें इस बात पर विचार करना चाहिए ।
मनुष्य और प्राकृतिक के बीच बढता फासला हमें बतलाता है कि जब पाप अधिक बढ़ता है तो धरती काँपने लगती है। यह भी कहा गया है कि धरती घर का आंगन है, आसमान छत है, सूर्य-चन्द्रमाँ ज्योति देने वाले दीपक हैं, समुद्र पानी के मटके हैं और पेड़-पौधे आहार के साधन हैं।
ध्यान रखना होगा हमें कि प्रकृति किसी के साथ भेदभाव या पक्षपात नहीं करती। इसके द्वार सबके लिए समान रूप से खुले हैं, लेकिन जब हम प्रकृतिक संसाधनों से खिलवाड़ करते हैं तब उसका परिणाम भूकम्प, सूखा, बाढ़, सैलाब, तूफान की शक्ल में आता है, फिर लोग काल के गाल में समा जाते हैं।
हम कह सकते हैं कि प्रकृति से मनुष्य का सम्बन्ध अलगाव का नहीं है, सचमुच प्रकृति से प्रेम हमें उन्नति की ओर ले जाता है और इससे अलगाव हमारे लिए विनाशकाल के कारण बनते हैं।
विकास भारद्वाज 'सुदीप'
21 जुलाई 2017
सोमवार, 8 जनवरी 2018
गजल (47) - झूटी शानो शौकत
नये जमाने' का' अब हमने' पैरहन देखा ।
बड़ा अजीब यहाँ का रहन सहन देखा ।।
वो शंहशाह हो' या कोई' रंक हो हमने ।
सभी पे चलते समय एक सा ही कफ़न देखा
न कोई' अपना' न कोई पराया' लगता है ।
हरेक आदमी' का जब मतलब से मिलन देखा
बिखरती' जिंदगियां झूठी शानो-शौकत में ।
ये' कैसा' हमने' शहर का तेरे' चलन देखा ।।
बे-घर किये बूढे' माँ बाप आज बच्चों ने ।
ठिठुरते' सर्द रातों में पड़े सयन देखा ।।
बहार आती' थी' खिलते थे फूल बागों में ।
विकास आज वो' उजड़ा हुआ चमन देखा ।।
सयन- नीद्रा,सोना
©विकास भारद्वाज "अक्स बदायूँनी"
2 जनवरी 2018
गुरुवार, 28 दिसंबर 2017
गजल- निश्छल आँखे
चला आया बादल उमड़ता हुआ ।
अम्बर से झमाझम बरसता हुआ ।।
कोई आशियाना भी था कल यहाँ ।
चमन आज ये कैसा उजड़ा हुआ ।।
किसी की आहें गूंजती हैं शायद ।
दफ़न है कोई राज अरसा हुआ ।।
बिखरते गऐ दिल के अरमाँ मेरे ।
कभी था ये गुलशन महकता हुआ ।।
तुफानी सी लहरो में कश्ती फँसी ।
अभी अपना दरिया है ठहरा हुआ ।।
जिसे देखती "अक्स" निश्छल आँखें ।
फलक पर जैसे चाँद ठहरा हुआ ....।।
© विकास भारद्वाज "अक्स"
27 दिसम्बर 2017
बुधवार, 13 दिसंबर 2017
"माँ याद तुम्हारी सताती है "
माँ तो बच्चों के लिए खुद को भूल जाती है ।
माँ ही सदा हमें पापा की डाँट से बचाती है ।।
जमाने के ताने - बाने से घबराता मेरा मन,
माँ अब घर से दूर याद तुम्हारी सताती है ।।
माँ से हर मनुष्य के आस्तित्व का आधार है ।
माँ से पल बढ कर बनता जीवों का संसार है ।।
संयम, जीवन-त्याग और ममता की मुरत,
माँ तो इस धरती पर भगवान का अवतार है ।।
अपना ख्याल छोड़ कर परिवार के लिए माँ हर दुख सहती है ।
हम माँ का इंतज़ार करें न करें पर माँ हर पल इंतज़ार करती है ।।
जिसके ममता भरे आँचल को पाने भगवान भी तरस जाते है,
नजर लगें न बच्चों को माथे पर माँ काला टीका रखती है ।।
दुनिया के सब रिश्ते-नातों में सबसे प्यारा रिश्ता माँ का होता है ।
हर झूठे रिश्ते नातों में सुदीप बस सच्चा प्यार माँ का होता है ।।
ठोकर लगने पर रास्ते पर फिर हाथ पकड़ कर सभाँले रखती,
अनजाने में हुई गलती माफ कर दे वो दिल सिर्फ माँ का होता है ।।
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
12 दिसम्बर 2017
शनिवार, 25 नवंबर 2017
कविता- तुम्हारा क्रंदन, तुम्हारा बलिदान
26/11/2008 के मुंबई हमले की आज 9 वीं बरसी है वीर जवानो की शहादत को मेरा सलाम, भावपूर्ण श्रद्धांजलि इस हमले में कई लोगों की जान गई थी
काले लिवासधारी मौत का सामान लाये हैं ।
हर तरफ धमाके और संगीनों के साये हैं ।।
शहर में अब बढती वारदातो से लगता हैं ।
छुपकर सीमा से कुछ आतंकवादी आये हैं ।।
मजहवी कट्टरपंथी ने फैला दी नफरत की दीवारें ।
इस जंग में लड़ते भारत माँ के जवान शहीद हुये ।। आतंकवाद के खिलाफ शहादत को वीर जवानों ।
तुम्हारा क्रंदन, तुम्हारा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा ।।
मासूम बच्चों के शव, बेबस हाथों में उठाये थे ।
गद्दारों ने इस कदर दुखों के बादल गिराये थे ।।
जालिमो ने बेगुनाहों पर ऐसे चलाई गोलीयाँ ।
खुशहाल परिवारों को खून के आँसू रूलाये थे ।।
हो गये लाचार और अनाथ न जाने कितने ।
जालिमों तुमको जरा भी दया न आयी थी ।।
इन मुश्किल हालात में मुँहतोड़ जवाब देने की ।
जिम्मेदारी एनएसजी कंमाडों ने पायी थी ।।
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
25 नवम्बर 2017
शनिवार, 11 नवंबर 2017
तेरा दिल बेक़रार अच्छा था
तेरा दिल बेक़रार अच्छा था ।
मेरा भी इंतजार अच्छा था ।।
ये सनम दिल मेरा जलाने का.. ।
वो तुम्हारा अंदाज अच्छा था ।।
बेचैनी दिल की बढती ही जाये... ।
पहले दिल का करार अच्छा था ।।
उसका भी खूब दबदबा होगा... ।
वो शायद जानकार अच्छा था ।।
साँस दे कर्ज कर दिया चुकता ।
वो हमारा कर्जदार अच्छा था ।।
दर्द ए दिल की तुम दवा करते...।
वो तुम्हारा रोजगार अच्छा था ।।
लोग करते हैं' बात मय्यत पर ....।
आदमी दिल का यार अच्छा था ।।
हर दवा बेअसर हैं जख्म़ो पर ।
बेवफा तेरा वार अच्छा था..।।
देखते अब सुदीप राहों में ......।
उसका भी ऐतबार अच्छा था ।।
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
10 नवम्बर 2017
मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017
दीपावली दोहे
नन्हें दीपक की लगन, आँधी को दे मात ।
अँधेरा दूर भगा कर, उगा लालिमा प्रात ।।
सजा दिया थाल पूजा, साथ रहे परिवार ।
मनाओ घर - घर ऐसे , दीपों का त्यौहार ।।
बाज़ार में चमक है पटाखों की आवाज ।
खूब रौनक बढी है दीपावली पर आज ।।
चाइनीज दीपक छोड, मिट्टी दीप उद्दीप ।
जलाओ दिवाली पर, हर घर में अब दीप ।।
धन त्रयोदशी, गोवर्धन,भैया दूज सर्व ।
कार्तिक मास अमावस दीपावली पर्व ।।
पटाखे फूटने लगे, दीप जले अविराम ।
लक्ष्मी-गणेश पूजा आरम्भ होगी शाम ।।
घर में कैसे जलेगें , सजन इस बार दीप ।
काहे की दीपावली, जब तुम नहीं समीप ।।
लहंगा, चुनरी, बिंदी, कंगन, छुमके संग ।
तुझसे गोरी फूटते, फुलझड़ियों से रंग ।।
चमके जब लौ दीप की, लोग रहे हरसाय ।
तब घूँघट में नव वधू, मन ही मन मुस्काय ।।
भाईचारे की भावना को बल मिल जाए ।
सभी के घर में आनंद के सुखद क्षण आए ।।
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
11 अक्टूबर 2017
शनिवार, 14 अक्टूबर 2017
हाइकु दीपावली
दीपक जले
दीपावली की शाम
उजाला फैले
दिवाली पर्व
जगमग बाजार
रोशन द्वार
चिराग जला
लक्ष्मी गणेश पूजा
कृपा कर दो
माटी के दीप
जलाओ सब लोग
चाइना छोड़ो
तुम करना
गरीबों को भी दान
पुण्य मिले
बम - पटाखे
क्षण भर आनन्द
प्रदुषण हो
©विकास भारद्वाज 'सुदीप'
14 अक्टूबर 2017
गजल
आपको जबसे दिल में बसाने लगे ।
फिर नये गीत हम गुनगुनाने लगे ।।
चाँद उतरा बिखरने लगी चाँदनी ।
प्यार तुमसे हुआ वो बताने लगे ।।
कर दिया आपके इश्क ने फिर नशा ।
बिन पिये आज हम लडखडाने लगे ।।
जुस्तजू थी मुझे वो अचानक मिले ।
दोस्त हमको गले से लगाने लगे ।।
टूट कर जब बिखरने लगी जिंदगी ।
लोग क्या खूब हमको गिराने लगे ।।
जिंदगी ख्वाब अहसास ए आरजू ।
ये वफा, तुमसे यूँ हम निभाने लगे ।।
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
16 अक्टूबर 2017
शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017
गजल
बह्र 👉👉 : २१२ २१२ २१२ २१२
अरकान : फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
काफिया : ऐ स्वर
रदीफ : रहे
🌹 🌹
तुम भुला हमको दिल जलाते रहे ।
रात भर याद कर वो रूलाते रहे ।।
साथ छूटे न तुमसे हमारा कभी ।
फक्त इसलिए जख़म को छुपाते रहे ।।
टूट जाऐ नहीं दिल तुम्हारा सनम ।
ग़म छुपा साथ तेरे मुस्कुराते रहे ।।
इश्क का ये हमें रोग ऐसा चढा ।
रात भर वो ख्बावों में सताते रहे ।।
भूल हमको किसी गैर के नाम की ।
मेंहदी हाथों पर वो रचाते रहे ।।
हमने वादे वफा के निभाये सभी ।
वक्त - बेवक्त तुम याद आते रहे ।।
इक जरा सी हमारी खता क्या हुई ।
लोग फिर तो कमीयाँ गिनाते रहे ।।
चाहते हैं अभी भी अमन चैन हम ।
और वो लोग साजिश बनाते रहे ।।
खूब आतंक फैला रहा पाक फिर ।
सर जवानों के कब तक कटाते रहे ।।
©विकास भारद्वाज "सुदीप"
12 अक्टूबर 2017
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