मुहब्बत ग़ज़ल म़े हिम्मत सिंग त्यागी की कुछ ग़ज़लें
काफिया - "म"
रदीफ़ - सताये
ख्वाब मे आ कर हसीं बालम सताये ।।
बात कर लो गर वफ़ा का गम सताये।
प्यार में इक दर्द का आलम सताये ।।
इश्क मे तेरी जफ़ा हम दम सताये ।।
वस्ल की शब आज क्यों जानम सताये।
वज्ऩ - 1222 1222 1222 1222
काफिया - "ई"
रदीफ़ - है
ग़ज़ल का शौक बादाखार को अब ख़ुशगुवारी है ।।
यकीं कर हर सुहानी बज्म मे साकी दिवानी है ।।
सहारा अब वही यादें, नशे की शब गुलाबी है ।।
मुझे समझा नहीं सकतीं नज़र ऐसे सवाली है ।।
कहां मांगें वफ़ा 'त्यागी' यहां तो सब भिखारी है ।।
काफिया - "ना"
रदीफ़ - चाहता हूं
समंदर में उतरना चाहता हूं ।।
जुदाई मे इबादत कर खुदा की ।
खुदा से आज मिलना चाहता हूं ।।
वफ़ा अपनी दिखाना चाहता हूं ।।
बहर पर रोज लिखना चाहता हूं।।
लगी दिल की छुपाना चाहता हूं ।।
काफिया - अर्द
रदीफ - हूं
वक़्त से सीखने आज शागिर्द हूं ।।
वक़्त है टूटती सांस पर मर्द हूं ।।
सांस आया नही तो बना गर्द हूं ।।
मेरे "मुर्शिद" गरीबों का हम दर्द हूं ।।
रात 'त्यागी' वहां रोशनी जर्द हूं ।
काफिया - "आ"
रदीफ़ - है
वक़्त का हाकिम खुदा है ।।
आप जानों क्या हुआ है ।।
हाल उलफ़त का पुछा है ।।
वो मुहब्बत से जुदा है ।।
ये ग़ज़ल रब की दुआ है।
छाया मे रंक राजा हो जाता है।
काफिया "ता"
रदीफ़ - रहा
वक़्त को मैं समझता रहा ।।
दर्द दिल का यूं ही बढ़ता रहा ।।
मर्ज को याद करता रहा ।।
रोज मय को तरसता रहा ।।
हुस्न पे इश्क मरता रहा ।।
काफिया - "ए"
रदीफ़ - है
अश्क आंखों से बहे है ।।
राज़ आंखें सब कहे है ।।
रुख की रंगत जो उड़े है ।।
राज़ उल्फ़त का रखे है ।।
आज दोबारा बहे है ।।
काफिया - "आर"
रदीफ़ - हो जाये
पुनर्मिलन की जगी आस यार हो जाये ।
निबाह तो न किया जिंदगी रही तन्हा ।
न बागबां तो चमन सूख खार हो जाये ।।
फरेब का हैं जहां तार तार हो जाये ।।
निक़ाब रूख न हो दिल निसार हो जाये ।।
जरा नज़र तू उठा तीर पार हो जाये ।।
