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शैलेन्द्र खरे 'सोम' की छंदशाला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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शनिवार, 11 अप्रैल 2020

5:09 am

हारिणी छंद :- अनेक प्रकार विधान घने - शैलेन्द्र खरे"सोम"

◆हारिणी छंद◆
विधान~ [जगण जगण जगण+लघु गुरु]
(121  121  121  12)
11वर्ण, 4 चरण
[दो-दो चरण समतुकांत]

अनेक   प्रकार    विधान   घने।
सुछंद    भले    मधुगान   बने।।
कला-कविता मन साध सिखौ।
गुनौ  पहिले  सब  बाद लिखौ।।
                ~शैलेन्द्र खरे"सोम"

5:07 am

कली छंद :- हे कमलापत जू उर बसौ - शैलेन्द्र खरे"सोम"

◆कली छंद◆

विधान~
[भगण भगण भगण+लघु गुरु]
(211  211  211  12
11वर्ण,4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत]

हे कमलापत  जू  उर  बसौ।
दोष निवारि सुधा सुर लसौ।।
भाँति  अनेक पुकारत जना।
"सोम"स्वरूप सुधारत मना।।

           ~शैलेन्द्र खरे"सोम"

5:05 am

मनहरन छंद :- नित नमन मातेश्वरी कंठिका धारिणी - शैलेन्द्र खरे सोम

◆मनहरन छंद◆

विधान~
[नगण सगण रगण रगण रगण]
(111 112  212  212 212
15वर्ण,4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत]

नित  नमन   मातेश्वरी  कंठिका  धारिणी।
दमन  कर  दो  पाप  माँ  शत्रु  संहारिणी।।
गगन  धरती  आपका  रूप  अम्बालिके।
प्रखर लगती कालकी काल माँ कालिके।।

                             ~शैलेन्द्र खरे"सोम"

5:03 am

वंशस्थ छंद :- अनीत होते मत आप देखिये - शैलेन्द्र खरे"सोम"

◆वंशस्थ छंद◆

विधान~
[ जगण तगण जगण रगण]
(121   221   121  212)
12वर्ण,4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत]

अनीत  होते  मत  आप देखिये।
विरोध कीजे जड़ खोद फेंकिये।।
समाज  ऐसी  अपनी  बनी  रहे।
दुखी  न  कोई  समता नदी बहे।।

                ~शैलेन्द्र खरे"सोम"

5:02 am

मंजुभाषिणी छंद :- सबसे दयालु यशुदा किशोर जी - शैलेन्द्र खरे सोम

◆मंजुभाषिणी छंद◆

विधान~
[ सगण जगण सगण जगण+गुरु]
(112  121   112  121 2)
13 वर्ण,4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत]

सबसे   दयालु   यशुदा   किशोर जी।
अति भाय मोहि छवि चित्त चोर की।।
बस  नेह   दृष्टि  प्रभु  डाल  दीजिये।
अब    दीनबंधु   खुशहाल  कीजिये।।

                      ~शैलेन्द्र खरे"सोम

5:00 am

भुजंगप्रयात छंद :- हरे पीर जो भी सदा ही पराई - शैलेन्द्र खरे"सोम"

◆भुजंगप्रयात छंद◆

विधान~
(भुजंगी छंद+गुरु)
[ यगण यगण यगण यगण]
(122  122  122 122 )
12 वर्ण,4 चरण
दो-दो चरण समतुकांत]

हरे  पीर  जो  भी  सदा ही पराई।
गुने  गान  गोविन्द  के चित्त लाई।।
चले जो सदा न्याय के पंथ जानो।
सुनो"सोम" साँचा उसे संत मानो।।

                  ~शैलेन्द्र खरे"सोम"

4:59 am

हीर छंद :- साधक नित साधत सब , वंदत कर जोरि कै - शैलेन्द्र खरे सोम

◆हीर छंद◆

विधान~
[ भगण सगण नगण जगण नगण रगण]
(211  112   111  121 111 212)
18 वर्ण,4 चरण,यति 10-8 वर्णों पर
दो-दो चरण समतुकांत]

साधक  नित साधत सब , वंदत कर जोरि कै।
पान  करत  अमृत  गुण, सागर  मन बोरि कै।।
नाहक  सब  जाल जगत, बंधन सब छोर दो।
"सोम"शरण धूल चरण,श्री जुगल किशोर दो।।

                                    ~शैलेन्द्र खरे"सोम

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